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ध्यान दें:

प्रिलिम्स फैक्ट्स

प्रारंभिक परीक्षा

भारत-ऑस्ट्रिया संबंध

स्रोत: पीआईबी  

चर्चा में क्यों? 

ऑस्ट्रिया गणराज्य के फेडरल चांसलर क्रिश्चियन स्टॉकर ने भारत की चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा की। यह कूटनीतिक दौरा एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, क्योंकि चार दशकों (पिछली यात्रा 1984 में हुई थी) से अधिक समय बाद किसी ऑस्ट्रियाई चांसलर की यह पहली भारत यात्रा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने IIT दिल्ली और ऑस्ट्रिया की मोंटानायूनिवर्सिटैट लेबेन के बीच गुरुवार को हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MoU) को “ज्ञान आदान-प्रदान का एक उत्कृष्ट उदाहरण” बताया।

ऑस्ट्रियाई चांसलर की वर्ष 2026 की भारत यात्रा के प्रमुख परिणाम क्या हैं?

  • रक्षा एवं सुरक्षा एकीकरण: सैन्य मामलों पर एक आशय पत्र (LoI) पर हस्ताक्षर किये गए, जिसका उद्देश्य रक्षा उद्योग और प्रौद्योगिकी साझेदारी को बढ़ावा देना है, जो जनवरी 2026 की भारत-EU रक्षा और सुरक्षा साझेदारी को सुदृढ़ करता है।
    • दोनों देशों ने आतंकवाद-रोधी सहयोग को मज़बूत करने और वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ प्रयासों में समन्वय बढ़ाने के लिये एक संयुक्त कार्यसमूह स्थापित करने पर सहमति जताई।
  • आर्थिक एवं व्यापार सुगमता: निवेशकों के लिये परिचालन संबंधी बाधाओं को दूर करने हेतु एक फास्ट-ट्रैक तंत्र स्थापित किया गया, जिससे दोनों देशों के बीच ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ में उल्लेखनीय सुधार होगा।
  • उच्च प्रौद्योगिकी और अनुसंधान एवं विकास (R&D): तकनीकी सहयोग को इस साझेदारी के एक केंद्रीय स्तंभ के रूप में सुदृढ़ किया गया, जिसका मुख्य ध्यान क्वांटम प्रौद्योगिकी, मशीन लर्निंग, लेज़र और पदार्थ विज्ञान जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान एवं विकास पर है।
  • अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग: वर्ष 2026 की शरद ऋतु में वियना में एक संयुक्त द्विपक्षीय अंतरिक्ष उद्योग सेमिनार आयोजित करने की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के अंतरिक्ष नवाचार पारितंत्र को एकीकृत करना है।
  • वैश्विक शांति स्थापना: भारत के संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना केंद्र और ऑस्ट्रियाई सशस्त्र बल अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (AUTINT) के मध्य एक रणनीतिक साझेदारी हुई।
  • खाद्य सुरक्षा और कृषि व्यापार: FSSAI (भारत) और AGES (ऑस्ट्रिया) के बीच जोखिम मूल्यांकन में सामंजस्य स्थापित करने, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने और सुरक्षित कृषि उत्पादों के व्यापार को बढ़ावा देने के लिये एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए।
  • साइबर सुरक्षा और अवसंरचना: एक समर्पित संस्थागत साइबर सुरक्षा संवाद शुरू किया गया और उन्नत सड़क अवसंरचना, विशेष रूप से वाहनों के लिये इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम (ITS) में तकनीकी सहयोग को नवीनीकृत किया गया।
  • कौशल विकास और युवा गतिशीलता: वर्किंग हॉलिडे प्रोग्राम को संचालित किया गया, साथ ही दोहरे व्यावसायिक प्रशिक्षण और शैक्षिक एवं व्यावसायिक योग्यताओं की पारस्परिक मान्यता को बढ़ावा देने के लिये एक समझौता ज्ञापन (LoI) पर हस्ताक्षर किये गए।
  • स्टार्टअप और शैक्षणिक विनिमय: भारत-ऑस्ट्रिया स्टार्टअप ब्रिज (2024) को बढ़ाया गया और शीर्ष ऑस्ट्रियाई तकनीकी विश्वविद्यालयों द्वारा भारतीय इंजीनियरिंग छात्रों के लिये प्रवेश की सुविधा प्रदान करने हेतु "फोकस इंडिया" पहल शुरू की गई।
    • IIT दिल्ली और मोंटानायूनिवर्सिटैट लेबेन के बीच हस्ताक्षरित एक समझौता ज्ञापन को भारत एवं ऑस्ट्रिया के बीच "बढ़ते ज्ञान के आदान-प्रदान और शैक्षणिक सहयोग के एक शानदार उदाहरण" के रूप में रेखांकित किया गया।

भारत और ऑस्ट्रिया के द्विपक्षीय संबंध कैसे हैं?

  • उल्लेखनीय व्यापार वृद्धि: द्विपक्षीय व्यापार में एक महत्त्वपूर्ण ऊर्ध्वगामी प्रक्षेपवक्र देखा गया है, जो वर्ष 2019-20 में 1.08 बिलियन अमेरिकी डॉलर से दोगुना होकर वर्ष 2023-24 में 2.06 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जो 17.36% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्शाता है।
    • भारत ने वर्ष 2023-24 में ऑस्ट्रिया के साथ अपने व्यापार घाटे को कम कर 214 मिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार अधिशेष दर्ज किया।
  • प्रमुख व्यापारिक वस्तुएँ: भारत मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक सामान, वस्त्र एवं मशीनरी का निर्यात करता है, जबकि ऑस्ट्रिया से उसके आयात में भारी मशीनरी और इस्पात का प्रभुत्व है।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से संबंधित प्रवृत्तियाँ: ऑस्ट्रिया का भारत में संचयी FDI 663 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया (अप्रैल 2000 और मार्च 2024 के बीच)।
  • मौलिक आर्थिक संधियाँ: आर्थिक साझेदारी महत्त्वपूर्ण समझौतों द्वारा समर्थित है, विशेष रूप से दोहरे कराधान से बचाव समझौता (1999, 2017 में संशोधित) और निवेश के संवर्द्धन और संरक्षण पर द्विपक्षीय समझौता (1999)।
  • प्रवासन और गतिशीलता समझौता: एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्रवासन और गतिशीलता के लिये व्यापक साझेदारी (2023) है, जिसे भारतीय कुशल श्रमिकों, छात्रों और शोधकर्त्ताओं की कानूनी, निर्बाध आवागमन की सुविधा प्रदान करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • अंतरिक्ष: ऑस्ट्रिया के पहले दो उपग्रह TUGSAT-1/BRITE और UniBRITE वर्ष 2013 में भारत के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से लॉन्च किये गए थे।

ऑस्ट्रिया की भौगोलिक और रणनीतिक रूपरेखा

  • स्थान और सीमाएँ: ऑस्ट्रिया दक्षिण-मध्य यूरोप में स्थित एक पर्वतीय तथा स्थलरुद्ध (landlocked) देश है।
    • इसकी सीमाएँ जर्मनी (उत्तर-पश्चिम), चेक गणराज्य (उत्तर), स्लोवाकिया (उत्तर-पूर्व), हंगरी (पूर्व), स्लोवेनिया (दक्षिण), इटली (दक्षिण-पश्चिम) तथा स्विट्ज़रलैंड और लिकटेंस्टाइन (पश्चिम) से मिलती हैं।
  • भू-राजनीतिक रुख: स्विट्ज़रलैंड के साथ मिलकर ऑस्ट्रिया यूरोप के ‘तटस्थ केंद्र’ (Neutral Core) का निर्माण करता है।
    • इसने वर्ष 1955 में (द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मित्र राष्ट्रों के नियंत्रण के पश्चात) स्थायी तटस्थता स्थापित की, हालाँकि यह वर्ष 1995 से यूरोपीय संघ (EU) का पूर्ण सदस्य भी है।
    • जवाहरलाल नेहरू ने शीतयुद्ध के दौरान एक तटस्थ ऑस्ट्रिया के उभरने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कूटनीतिक मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हुए संयुक्त राष्ट्र में ऑस्ट्रिया के पक्ष का समर्थन किया तथा सोवियत संघ के साथ वार्त्ता में शामिल होकर ऑस्ट्रियाई राज्य संधि (1955) से संबंधित गतिरोध को समाप्त करने में सहायता की।
      • संधि के पश्चात, जवाहरलाल नेहरू जून 1955 में नवस्वतंत्र ऑस्ट्रिया की यात्रा करने वाले पहले विदेशी नेता थे।
  • रणनीतिक पारगमन केंद्र: इसकी प्रमुख भौगोलिक स्थिति इसे यूरोपीय व्यापार के केंद्र में स्थापित करती है, जहाँ यह डेन्यूबियन व्यापार मार्ग के माध्यम से पूर्व और पश्चिम को तथा महत्त्वपूर्ण आल्प्स दर्रों के माध्यम से उत्तर और दक्षिण को जोड़ता है।
  • स्थलाकृति एवं भू-आकृति: देश की भौतिक संरचना का मुख्य आधार ऑस्ट्रियाई आल्प्स हैं (जिन्हें उत्तरी एवं दक्षिणी चूना-पत्थर श्रेणियों तथा एक केंद्रीय क्रिस्टलीय श्रेणी में विभाजित किया जाता है)।
    • देश की सबसे ऊँची चोटी ग्रॉसग्लॉकनर है तथा उत्तरी क्षेत्र में बोहेमियन मैसिफ का एक भाग शामिल है।
  • जल निकासी तंत्र: ऑस्ट्रिया का लगभग पूरा क्षेत्र डेन्यूब नदी तंत्र में जल निकास करता है, जो अंततः पूर्व की ओर बहती हुई काले सागर में गिरती है।     

Austria

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वर्ष 2026 में ऑस्ट्रिया के चांसलर की यात्रा क्यों महत्वपूर्ण है?
यह 40 से अधिक वर्षों में पहली यात्रा है, जो भारत-ऑस्ट्रिया के रणनीतिक संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। 

2. ऑस्ट्रिया भौगोलिक रूप से कहाँ स्थित है?
ऑस्ट्रिया दक्षिण-मध्य यूरोप में स्थित एक स्थलरुद्ध देश है, जो प्रमुख यूरोपीय मार्गों के चौराहे पर स्थित है। 

3. ऑस्ट्रिया की सीमाएँ किन देशों से मिलती हैं?
इसकी सीमाएँ जर्मनी (उत्तर-पश्चिम), चेक गणराज्य (उत्तर), स्लोवाकिया (उत्तर-पूर्व), हंगरी (पूर्व), स्लोवेनिया (दक्षिण), इटली (दक्षिण-पश्चिम) तथा स्विट्ज़रलैंड और लिकटेंस्टाइन (पश्चिम) से मिलती हैं। 

4. ऑस्ट्रिया के ‘तटस्थ केंद्र’ का क्या अर्थ है?
ऑस्ट्रिया 1955 से स्थायी तटस्थता की नीति का पालन करता है, स्विट्ज़रलैंड की तरह और किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। 

5. ऑस्ट्रिया के अधिकांश भाग का जल निकास किस नदी प्रणाली में होता है?
ऑस्ट्रिया की जल निकासी प्रणाली का प्रमुख हिस्सा डेन्यूब नदी है, जो पूर्व दिशा में बहकर काला सागर में मिलती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)

  1. यूरोपीय संघ का 'स्थिरता एवं संवृद्धि समझौता' (स्टेबिलिटी एंड ग्रोथ पैक्ट) ऐसी संधि है, जो:
  2. यूरोपीय संघ के देशों के बजटीय घाटे के स्तर को सीमित करती है
  3. यूरोपीय संघ के देशों के लिये अपनी आधारिक संरचना सुविधाओं को आपस में बांटना सुकर बनाती है
  4. यूरोपीय संघ के देशों के लिये अपनी प्रौद्योगिकियों को आपस में बांटना सुकर बनाती है

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

(a)  केवल एक                        

(b)  केवल दो

(c)  सभी तीन                         

(d)  कोई भी नहीं

उत्तर: (a)


रैपिड फायर

भारत में चमगादड़ों की स्थिति पर रिपोर्ट

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

भारत के चमगादड़ों की पहली राष्ट्रीय स्तर की आकलन रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ बैट्स (2024–25)’ में भारत में चमगादड़ प्रजातियों के प्रति बढ़ती उपेक्षा और शहरीकरण, वनोन्मूलन, भूमि उपयोग परिवर्तन तथा जलवायु प्रभावों से उत्पन्न खतरों को रेखांकित किया गया है।

  • नेचर कंज़र्वेशन फाउंडेशन और बैट कंज़र्वेशन इंटरनेशनल के विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट गंभीर डेटा अंतराल और अनुसंधान की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
  • चमगादड़ों की महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिकाओं और जूनोटिक रोगों के साथ उनके संबंध को देखते हुए निष्कर्षों का जैव विविधता संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है।

मुख्य निष्कर्ष

  • परिचय: भारत में चमगादड़ों की लगभग 135 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें 16 स्थानिक प्रजातियाँ शामिल हैं, जो महत्त्वपूर्ण जैव विविधता को दर्शाती हैं।
  • आवास एवं बसेरा: ये गुफाओं, पेड़ों और इमारतों एवं स्मारकों जैसी मानव निर्मित संरचनाओं में बसेरा करते हैं, क्योंकि गुफाएँ स्थिर जलवायु और शिकारियों से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
    • रॉबर्स केव (महाबलेश्वर) में फिलिप्स लॉन्ग-फिंगर्ड बैट का सबसे बड़ा बसेरा स्थित है।
  • कार्य: चमगादड़ परागण, बीज प्रकीर्णन, कीट नियंत्रण तथा मिट्टी पोषक समृद्धीकरण जैसी महत्त्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान करते हैं, जो उन्हें कृषि उत्पादकता एवं स्थिरता के लिये अपरिहार्य बनाती हैं।
  • मुद्दे: रिपोर्ट अनुसंधान अनुमतियों में नौकरशाही अवरोधों को उजागर करती है, जो डेटा की कमी को बनाए रखने में योगदान दे रहे हैं। कोविड-उपरांत सामाजिक पूर्वाग्रह ने उनकी छवि को और भी खराब कर दिया है, जो चमगादड़ों को गलत रूप से मुख्यतः रोगवाहक के रूप में चित्रित करता है, जबकि उनकी पारिस्थितिकीय उपयोगिताएँ निर्विवाद हैं।

State of India’s Bats Report

और पढ़ें: इंडियन फ्लाइंग फॉक्स बैट: टेरोपस गिगेंटस  


रैपिड फायर

भारत में पहला सेमीकंडक्टर फैब

स्रोत: पीआईबी 

भारत ने गुजरात के ढोलेरा में एक नए विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) के भीतर देश के पहले सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन प्लांट (चिप निर्माण इकाई) की स्थापना को आधिकारिक रूप से अधिसूचित किया है, जो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी विनिर्माण पारिस्थितिक तंत्र में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।

  • भारत में पहला सेमीकंडक्टर फैब: यह विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर तथा IT/ITES के लिये समर्पित है और इससे लगभग 21,000 लोगों के लिये रोज़गार सृजन होने की संभावना है।
  • सेमीकंडक्टर फैब: सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन प्लांट या ‘फैब’ एक अत्यंत उन्नत, बहु-अरब डॉलर की लागत वाला संयंत्र होता है, जहाँ माइक्रोचिप्स (इंटीग्रेटेड सर्किट) का निर्माण अति-शुद्ध सिलिकॉन वेफर्स पर नैनो-स्तरीय सटीकता के साथ किया जाता है।
    • क्लास 1 क्लीनरूम के भीतर फोटोलीथोग्राफी, डोपिंग और मेटलाइज़ेशन जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से अरबों ट्रांजिस्टर तैयार किये जाते हैं, जो स्मार्टफोन से लेकर एआई प्रणालियों तक विभिन्न उपकरणों को शक्ति प्रदान करते हैं।
  • प्रगतिशील SEZ नियम संशोधन (जून 2025): इस क्षेत्र में उच्च मूल्य और पूंजी-गहन निवेश को सुगम बनाने के लिये सरकार ने SEZ नियम, 2006 में संशोधन किया। प्रमुख सुधारों में शामिल हैं:
    • क्षेत्र-विशिष्ट SEZs के लिये न्यूनतम भूमि आवश्यकता को 50 हेक्टेयर से घटाकर 10 हेक्टेयर करना।
    • बोझ/बंधन मानकों में लचीलापन लाना।
    • नेट विदेशी मुद्रा (NFE) गणना में बिना लागत आपूर्ति को शामिल करने की अनुमति देना।
    • घरेलू टैरिफ क्षेत्र (DTA) में लागू शुल्कों के भुगतान के अधीन घरेलू बिक्री की अनुमति देना।
  • रणनीतिक महत्त्व: भारत भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के तहत एक संपूर्ण घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिक तंत्र विकसित कर रहा है, जिसका लक्ष्य देश के भीतर रसायनों और गैसों से लेकर चिप निर्माण मशीनरी तक पूरी सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला का उत्पादन करना है।
    • इन पहलों का उद्देश्य घरेलू मूल्य शृंखलाओं को प्रोत्साहित करना, उच्च कौशल वाले रोज़गार सृजित करना, आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को सेमीकंडक्टर तथा इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन के लिये वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी केंद्र के रूप में स्थापित करना है।

और पढ़ें: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0


रैपिड फायर

मासिक धर्म अवकाश संबंधी नीति पर कर्नाटक उच्च न्यायालय

स्रोत: द हिंदू 

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को मासिक धर्म अवकाश संबंधी नीति को सख्ती से और ईमानदारी से लागू करने का निर्देश दिया है, जो मासिक धर्म स्वास्थ्य को गरिमा, समानता और मौलिक अधिकारों के मामले के रूप में सुदृढ़ करता है।

  • अनिवार्य कार्यान्वयन: राज्य को 18-52 वर्ष की आयु की महिला कर्मचारियों के लिये प्रति माह एक दिन का अवकाश देने वाली मासिक धर्म अवकाश (ML) संबंधी नीति को समान रूप से लागू करना चाहिये, जब तक कि कर्नाटक मासिक धर्म अवकाश और स्वच्छता विधेयक, 2025 औपचारिक रूप से अधिनियमित नहीं हो जाता।
    • न्यायालय ने ज़ोर दिया कि जागरूकता एवं सुगमकारी तंत्रों को संगठित प्रतिष्ठानों (जैसे– कारखाना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत पंजीकृत) से परे विस्तारित किया जाना चाहिये ताकि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, जैसे– दैनिक मज़दूरी करने वाले श्रमिकों को सक्रिय रूप से सम्मिलित किया जा सके।
    • उच्च न्यायालय ने माना कि महिलाओं के स्वास्थ्य और शारीरिक स्वायत्तता में जैविक अंतरों को पहचानना समता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता है।
      • इसके बजाय यह केवल "औपचारिक समानता" से परे वास्तविक समानता प्रदान करता है, जो महिलाओं की विशिष्ट जैविक आवश्यकताओं के कारण होने वाले "संरचनात्मक बहिष्कार" को संबोधित करता है।
  • जीवन और गरिमा का अधिकार: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने माना कि एक महिला का मासिक धर्म स्वास्थ्य अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार से अंतर्निहित रूप से जुड़ा हुआ है।
    • उच्च न्यायालय का यह रुख डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य (2026) में सर्वोच्च न्यायालय के महत्त्वपूर्ण निर्णय को प्रतिध्वनित करता है, जिसने आधिकारिक तौर पर मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता (MHH) को अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान की।

और पढ़ें: महिलाओं के लिये मासिक धर्म अवकाश का मुद्दा 


रैपिड फायर

पार्किंसंस रोग

स्रोत: द हिंदू 

अप्रैल माह को पार्किंसंस रोग जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है, जो जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिये शीघ्र निदान और समय पर उपचार के महत्त्व को उजागर करता है।

  • यूरोप के पार्किंसंस ने अप्रैल 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के समर्थन से विश्व पार्किंसंस दिवस की स्थापना की, ताकि जेम्स पार्किंसंस के जन्मदिन को चिह्नित किया जा सके, जिन्होंने पहली बार वर्ष 1817 में इस बीमारी का वर्णन किया था।

पार्किंसंस रोग

  • परिचय: पार्किंसंस रोग एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनरेटिव विकार है जो गति को क्षीण करता है और अंततः गतिहीनता और मनोभ्रंश का कारण बन सकता है।
  • व्यापकता: पिछले 25 वर्षों में पार्किंसंस रोग का वैश्विक बोझ दोगुना हो गया है, जिसमें भारत में लगभग 10% मामले हैं।
  • आयु और लिंग: यह आमतौर पर लोगों को उनके 5वें-6ठे दशक (जब वे 50 या 60 वर्ष की आयु में होते हैं) में प्रभावित करता है, हालाँकि युवा व्यक्ति भी प्रभावित हो सकते हैं और पुरुष महिलाओं की तुलना में अधिक प्रभावित होते हैं
  • प्रमुख लक्षण: इस रोग की पहचान कंपन (Tremors), गति में धीमापन (ब्रैडीकिनेसिया) और माँसपेशियों की जकड़न (Rigidity) से की जाती है।
  • गैर-गतिशील लक्षण: प्रारंभिक संकेतों में कब्ज़ और नींद संबंधी विकार शामिल हो सकते हैं, जो शारीरिक लक्षणों के प्रकट होने से कई वर्ष पहले दिखाई दे सकते हैं।
  • निदान की चुनौती: लक्षणों को अक्सर गलत समझ लिया जाता है या नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जिससे निदान में देरी होती है और रोगी को लंबे समय तक कष्ट सहना पड़ता है।
  • उपचार: इसका कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन दवाओं के माध्यम से लक्षणों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार किया जा सकता है।
    • उपचार की उन्नत तकनीकें: डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) और MR-गाइडेड फोकस्ड अल्ट्रासाउंड जैसी आधुनिक पद्धतियाँ विशिष्ट रोगियों के लिये प्रभावी विकल्प हैं। ये तकनीकें सीधे प्रभावित क्षेत्र पर केंद्रित होकर लक्षणों को नियंत्रित करने में उच्च स्तर की सटीकता प्रदान करती हैं।

और पढ़ें: पार्किंसंस रोग


रैपिड फायर

प्रोजेक्ट हिम सरोवर

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स

हाल ही में केंद्र सरकार ने लद्दाख में वर्ष भर बनी रहने वाली जल की कमी की समस्या को दूर करने के लिये 'प्रोजेक्ट हिम सरोवर' की शुरुआत की है। इस क्षेत्र में वर्तमान में हिमनदों (ग्लेशियर) के विगलन से प्राप्त अधिकांश जल बिना उपयोग के ही नदियों और नालों में बह जाता है।

  • परिचय: यह एक सतत जल प्रबंधन पहल है, जिसका उद्देश्य अधिक ऊँचाई वाले शीत मरुस्थलीय क्षेत्र में कम उपयोग हो रहे हिम-विगलित जल को संचित कर उपयोग में लाना है।
  • आवश्यकता: लद्दाख में कम वर्षा और हिमनदों के खिसकने के कारण लगातार जल की कमी बनी रहती है, जबकि बढ़ते पर्यटन और सशस्त्र बलों की उपस्थिति ने क्षेत्र में जल की मांग को काफी बढ़ा दिया है।
  • उद्देश्य: संचित जल का उपयोग सिंचाई, ग्रामीण आवश्यकताओं और दीर्घकालिक जलवायु-सहिष्णु जल प्रबंधन के लिये करना।
  • कार्यान्वयन क्षेत्र: यह परियोजना लेह (निम्मू, नुब्रा, डिस्किट आदि) और कारगिल (सुरु, पदुम आदि) के क्षेत्रों को कवर करती है।
  • परियोजना की डिज़ाइन: इस पहल के अंतर्गत विगलित हिम जल (Meltwater) को संचित और संग्रहित करने हेतु गुरुत्वाकर्षण-आधारित प्रणालियों तथा सौर लिफ्ट तंत्रों का उपयोग करते हुए 'पर्कोलेशन टैंक' तथा लघु जलाशयों का निर्माण किया जाता है।
  • अतिरिक्त घटक: इसमें नदी किनारों और सड़कों के किनारे वृक्षारोपण अभियान, जमे हुए जल निकायों पर शीतकालीन खेल और आइस-स्केटिंग सुविधाओं का विकास तथा आजीविका को समर्थन देने के लिये खूबानी, सी-बकथॉर्न और सेब जैसी स्थानीय फसलों को बढ़ावा देना शामिल है।

और पढ़ें: जल प्रबंधन: अभाव से स्थायित्व तक


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