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भारत के फार्मा सेक्टर के लिये अगला बड़ा कदम

यह एडिटोरियल 30/03/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘India is the pharmacy of the world. But we are losing the drug development race’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख जेनेरिक औषधियों के निर्माण में भारत के प्रभुत्व और नियामक विलंब के कारण नई औषधियों के विकास में इसकी कमज़ोर नवोन्मेष क्षमता के विरोधाभास को उजागर करता है। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि तत्काल सुधारों के बिना, भारत उच्च मूल्य वाले फार्मास्युटिकल नवोन्मेष में AI-संचालित परिवर्तन से चूकने का जोखिम उठा सकता है।

प्रिलिम्स के लिये: एक्टिव फार्मास्युटिकल इन्ग्रेडिएंट्स (API), रोगाणुरोधी प्रतिरोध, औषधि और सौंदर्य प्रसाधन नियमों के अंतर्गत अनुसूची M, बायोसिमिलर, PLI योजना, 'बायोफार्मा SHAKTI' पहल, PRIP (फार्मा में अनुसंधान और नवोन्मेष को प्रोत्साहन) 

मेन्स के लिये: भारत के फार्मास्युटिकल क्षेत्र को आकार देने वाले प्रमुख हालिया घटनाक्रम, भारत के फार्मा क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे।

भारत विश्व का सबसे बड़ा जेनेरिक औषधि निर्माता है, फिर भी वह स्वयं लगभग कोई नई औषधियाँ विकसित नहीं करता। इसकी प्रमुख बाधा एक धीमी नैदानिक परीक्षण स्वीकृति प्रणाली है, जहाँ एक अत्यधिक कार्यभार से ग्रस्त नियामक को उन परीक्षणों को स्वीकृति देने में वर्षों लग जाते हैं, जिन्हें चीन कुछ ही दिनों में अनुमोदित कर देता है। अब जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता औषधि विकास की समय-सीमा को वर्षों से घटाकर महीनों में समेट रही है, यह नियामकीय विलंब भारत के लिये अगली पीढ़ी के औषधि विकास में नेतृत्व का अवसर खोने का कारण बन रहा है। अतः भारत को अपने नैदानिक परीक्षण ढाँचे तथा व्यापक औषधि क्षेत्रीय पारितंत्र में त्वरित सुधार करने की आवश्यकता है, ताकि वह तीव्र गति से उच्च-मूल्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित औषधि नवोन्मेष की ओर अग्रसर विश्व में केवल कम-लाभ वाले जेनेरिक उत्पादक के रूप में सीमित न रह जाए।

भारत के फार्मास्युटिकल क्षेत्र को आकार देने वाले प्रमुख हालिया घटनाक्रम क्या हैं?

  • आपूर्ति शृंखला में आत्मनिर्भरता: भारत महत्त्वपूर्ण एक्टिव फार्मास्युटिकल इन्ग्रेडिएंट्स (API) और की स्टार्टिंग मैटेरियल्स (KSM) के लिये एकल स्रोत आयात पर अपनी दीर्घकालिक निर्भरता को तेज़ी से कम कर रहा है ताकि अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित कर सके। यह रणनीतिक परिवर्तन इस क्षेत्र को एक कमज़ोर 'केवल फॉर्मूलेटर' मॉडल से एक ऊर्ध्वाधर रूप से एकीकृत विनिर्माण शक्ति में परिवर्तित कर रहा है।
    • उदाहरण के लिये, थोक औषधियों के लिये PLI योजना ने उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है और दिसंबर 2025 तक ग्रीनफील्ड परियोजनाओं में ₹4,814 करोड़ का निवेश (प्रतिबद्ध ₹4,329 करोड़ के मुकाबले) आकर्षित किया है।
    • इसने महत्त्वपूर्ण API/KSM के लिये 56,800 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की क्षमता सृजित की है, जिससे ₹2,720 करोड़ की बिक्री हुई है, जिसमें ₹528 करोड़ का निर्यात शामिल है।
  • स्वदेशी रोगाणुरोधी औषधियों में बड़ी सफलता: भारत ने नैफिथ्रोमाइसिन के विकास के साथ एक जेनेरिक निर्माता से नवप्रवर्तक के रूप में अपनी पहचान बनाई है, जो देश की पहली स्वदेशी रूप से परिकल्पित और चिकित्सकीय रूप से मान्य एंटीबायोटिक है। 
    • यह खोज वैश्विक रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) संकट के लिये एक रणनीतिक अनुक्रिया है, जो यह सिद्ध करती है कि भारतीय अनुसंधान एवं विकास जीवन-घातक श्वसन संक्रमणों के लिये 'अपनी श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ' अणु तैयार कर सकता है।
  • 'फार्मा 4.0' की ओर संक्रमण: उद्योग पारंपरिक 10-वर्षीय विकास चक्र को कम करने और विनिर्माण सटीकता को बढ़ाने के लिये 'डिजिटल बायोलॉजी' और AI-संचालित औषधि नवोन्मेष की ओर रुख कर रहा है।
    • वैश्विक स्तर पर जटिल बायोलॉजिक्स और 'डिजिटल थेरेप्यूटिक्स' (DTx) बाज़ारों में प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये भारतीय कंपनियों के लिये यह डिजिटल प्रगति आवश्यक है।
    • वर्ष 2026 तक AI-संचालित फार्माकोविजिलेंस और क्लिनिकल ट्रायल सिमुलेशन के लिये 'डिजिटल ट्विन्स' मुख्यधारा बन चुके हैं तथा वर्ष 2033 तक भारत में क्लिनिकल ट्रायल बाज़ार के 2954.1 मिलियन अमेरिकी डॉलर के अनुमानित राजस्व तक पहुँचने की उम्मीद है।
  • मेगा बल्क ड्रग एंड मेडिकल डिवाइस पार्क: सरकार उत्पादन का विकेंद्रीकरण कर रही है और सामान्य अपशिष्ट उपचार एवं लॉजिस्टिक्स सुविधाओं के माध्यम से उत्पादन लागत को कम करने के लिये 'प्लग-एंड-प्ले' अधोसंरचना तैयार कर रही है।
    • ये पार्क 'उत्कृष्टता के समूहों' की ओर एक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो लघु एवं मध्यम उद्यमों को अधोसंरचना पर अत्यधिक पूंजीगत व्यय किये बिना विस्तार करने की अनुमति देते हैं।
    • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2022-23 में आंध्र प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश राज्यों में 3 बल्क ड्रग पार्क स्वीकृत किये गए। केंद्र सरकार द्वारा साझा अवसंरचना सुविधाओं (CIF) के निर्माण के लिये वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
  • गुणवत्ता सामंजस्य - संशोधित अनुसूची M का जनादेश: हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय नियामक जाँच के बाद भारतीय निर्यात की वैश्विक प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों (GMP) का कड़ाई से प्रवर्तन किया जा रहा है।
    • वर्ष 2024 में भारत ने औषधि एवं प्रसाधन नियमों के अंतर्गत ‘अनुसूची M’ में संशोधन किया, जिससे परिसर, संयंत्र और उपकरणों से संबंधित आवश्यकताओं को शामिल करते हुए गुणवत्ता मानकों को सुदृढ़ किया गया।
    • इन ‘वैश्विक मानक’ मानदंडों को अपनाना अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि उन भारतीय कंपनियों के लिये अस्तित्व की अनिवार्य शर्त बन गया है जो संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाज़ारों में प्रवेश करना चाहती हैं।
    • इसके अलावा, भारत में अमेरिका के बाहर USFDA-अनुपालन वाले संयंत्रों की संख्या सबसे अधिक है और WHO-GMP द्वारा अनुमोदित 2,000 से अधिक संयंत्र हैं, जो 150 से अधिक देशों को निर्यात करते हैं।
  • उच्च-मूल्य विविधीकरण: भारतीय फार्मा कंपनियाँ वैश्विक पेटेंट समाप्ति की अगली लहर का लाभ उठाने के लिये सरल रासायनिक जेनेरिक औषधियों से आगे बढ़कर उच्च-लाभ वाले 'नए जैविक तत्त्वों' (NBE) और जटिल बायोसिमिलर क्षेत्र में कदम रख रही हैं। 
    • यह परिवर्तन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि घरेलू बायोसिमिलर बाज़ार तेज़ी से विस्तार कर रहा है, जो वैज्ञानिक क्षमता में एक परिष्कृत परिवर्तन को दर्शाता है।
    • उदाहरण के लिये, भारत में बायोसिमिलर बाज़ार का मूल्य वर्ष 2024 में लगभग 437 करोड़ रुपये था और अनुमान है कि यह वर्ष 2034 तक 14.2% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CGAR) के साथ लगभग 1,649 करोड़ रुपये तक बढ़ जाएगा।
      • सिप्ला और बायोकॉन जैसी प्रमुख कंपनियाँ CAR-T सेल एव mRNA थेरेपी में हुई महत्त्वपूर्ण खोजों को वित्त पोषित करने के लिये PRIP (फार्मा में अनुसंधान और नवोन्मेष को बढ़ावा देने वाली योजना) का तेज़ी से उपयोग कर रही हैं।
  • उच्च स्तरीय चिकित्सा उपकरणों की ओर संक्रमण: भारत समर्पित औद्योगिक पार्कों और प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से चिकित्सा प्रौद्योगिकी के शुद्ध आयातक होने से उच्च स्तरीय निदान और शल्य चिकित्सा उपकरणों के केंद्र में परिवर्तित हो रहा है।
    • इस परिवर्तन का उद्देश्य MRI और सीटी स्कैनर जैसे अत्याधुनिक उपकरणों के लिये वर्तमान 70-80% आयात निर्भरता को कम करना है।
    • चिकित्सा उपकरणों के लिये PLI योजना, जिसका परिव्यय ₹3,420 करोड़ है, MRI, सीटी और रेडियोथेरेपी उपकरण जैसे उच्च श्रेणी के क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दे रही है। 
      • सितंबर 2025 तक 22 परियोजनाओं ने 55 उत्पादों को परिचालन में ला दिया था, जिससे ₹12,344 करोड़ की बिक्री हुई, जिसमें ₹5,869 करोड़ का निर्यात शामिल है।
  • बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के लिये राष्ट्रीय मिशन: सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में बायोलॉजिक्स के लिये एक समर्पित 'बायोफार्मा SHAKTI' पहल शुरू की है, जो पारंपरिक रासायनिक औषधियों की तुलना में अधिक जटिल और उच्च मूल्य वाले होते हैं।
    • इस रणनीतिक कदम का लक्ष्य वैश्विक जैव-औषधीय बाज़ार में 5% हिस्सेदारी हासिल करना है, साथ ही भारत को अगली पीढ़ी के उपचारों के लिये 'विश्व की फार्मेसी' के रूप में स्थापित करना है।
    • सरकार तीन नए राष्ट्रीय औषध शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों (NIPER) की स्थापना और सात मौजूदा NIPERs के उन्नयन के माध्यम से बायोफार्मा-केंद्रित नेटवर्क के विस्तार तथा सुदृढ़ीकरण पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है।
  • ग्रीन फार्मा - ESG एकीकरण और सतत रसायन विज्ञान: भारतीय औषधि कंपनियाँ कड़े वैश्विक पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) मानकों को पूरा करने के लिये हरित रसायन विज्ञान, प्रवाह रसायन विज्ञान एवं नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाकर 'बायोपॉज़िटिव' विनिर्माण की ओर बढ़ रही हैं। 
    • यह परिवर्तन यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे नियंत्रित बाज़ारों में पहुँच बनाए रखने के लिये अत्यंत आवश्यक है, जहाँ आपूर्ति शृंखला की स्थिरता अब एक अनिवार्य व्यापारिक शर्त बन चुकी है।
    • मौजूदा अनुमानों से पता चलता है कि फ्लो केमिस्ट्री और सॉल्वेंट रिकवरी को अपनाने से अग्रणी कंपनियों को चुनिंदा पायलट संयंत्रों में रासायनिक अपशिष्ट को कम करने में सहायता मिली है।

भारत के फार्मा सेक्टर से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • गुणवत्ता संबंधी धारणा का संकट — ‘नकली औषधि’ का कलंक: भारत में निर्मित दूषित सिरप और आई ड्रॉप्स के बारे में संदूषण से संबंधित बार-बार आने वाली वैश्विक चेतावनियों ने 'ब्रांड इंडिया' की प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया है, जिससे गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस (GMP) के प्रति असंगत अनुपालन उजागर हुआ है।  
    • लघु एवं मध्यम उद्यमों में गुणवत्ता का सामंजस्य स्थापित करने में विफलता एक खंडित नियामक परिदृश्य को जन्म देती है, जहाँ निम्नस्तरीय उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय विश्वास और रोगी सुरक्षा को खतरे में डालते हैं।
    • उदाहरण के लिये, CDSCO द्वारा राज्य नियामकों के सहयोग से 905 इकाइयों में किये गए निरीक्षणों से व्यापक गैर-अनुपालन का पता चला है, जिसमें दिसंबर 2025 तक 694 नियामक कार्रवाइयाँ की गई हैं, जो GMP मानकों के पालन में लगातार कमियों को उजागर करती हैं।
  • नवोन्मेष की कमी– अनुसंधान एवं विकास में कम निवेश: भारत एक 'सामान्य महाशक्ति' तो बना हुआ है, लेकिन 'नवोन्मेष में पिछड़ा' देश है, जहाँ अधिकांश कंपनियाँ उच्च जोखिम, उच्च लाभ वाली नई रासायनिक संस्थाओं (NCE) के बजाय क्रमिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। 
    • औषधियों की खोज में लगने वाली उच्च पूंजी लागत और लंबी विकास अवधि निजी निवेश को हतोत्साहित करती है, जिससे भारत जीवन रक्षक विशेष औषधियों के लिये पश्चिमी बौद्धिक संपदा पर निर्भर बना रहता है।
    • अनुसंधान एवं विकास (R&D) की तीव्रता के मामले में वैश्विक कंपनियों ने भारतीय कंपनियों से 3.0 गुना बेहतर प्रदर्शन किया।
  • आयात संबंधी लगातार बनी रहने वाली असुरक्षा - API अवरोध: PLI योजनाओं के बावजूद, भारत अभी भी विशिष्ट किण्वन-आधारित API और उच्च-स्तरीय की स्टार्टिंग मैटेरियल्स (KSM) के लिये चीन पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे एक रणनीतिक 'आपूर्ति शृंखला असुरक्षा' उत्पन्न होती है। 
    • अस्थिर भू-राजनीतिक संबंध और वैश्विक थोक औषधि बाज़ार में कीमतों में उतार-चढ़ाव भारतीय तैयार औषधियों को बाहरी लागत झटकों के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।
    • उदाहरण के लिये, भारत अभी भी अपनी कुल API आवश्यकताओं का लगभग 65-70% मूल्य के हिसाब से चीन से आयात करता है।
  • नियामक अतिक्रम और मूल्य निर्धारण संबंधी समस्याएँ: उद्योग को CDSCO, राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरणों से जुड़ी एक जटिल, बहुस्तरीय नियामक संरचना से जूझना पड़ता है, जिससे 'अनुपालन थकान' एवं अनुमोदन में विलंब होता है। 
    • इसके अलावा, राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) के विस्तार से 'मार्जिन स्क्वीज़' की स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ सख्त मूल्य सीमाओं के कारण बढ़ती इनपुट लागत उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जा सकती है।
    • राष्ट्रीय विकास अधिनियम, 2022 के तहत कीमतों के पुनर्निर्धारण के कारण औसत मूल्य में लगभग 17% की कमी आई, जिससे प्रायः लघु एवं मध्यम उद्यमों को अधिक महॅंगी, आधुनिक विनिर्माण प्रौद्योगिकी में अपग्रेड करने से हतोत्साहित किया गया।
  • प्रतिभा का बेमेल और कौशल अंतराल: पारंपरिक फार्मेसी शिक्षा और बायोफार्मा की 'इंडस्ट्री 4.0' आवश्यकताओं के बीच एक बढ़ता हुआ अंतर है, जिसके लिये बायोइन्फॉर्मेटिक्स, क्लिनिकल डेटा साइंस और जटिल बायोलॉजिक्स में विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। 
    • उच्च स्तरीय अनुसंधान कार्यबल की कमी भारतीय कंपनियों को उच्च मूल्य वाले सेल और जीन थेरेपी (CGT) और mRNA क्षेत्रों में कुशलतापूर्वक आगे बढ़ने से रोकती है।
    • भारत में बड़ी संख्या में फार्मेसी कॉलेज होने के बावजूद, कम्प्यूटेशनल केमिस्ट्री जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में PhD धारकों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, जो वैश्विक स्तर पर नवोन्मेष के लिये आवश्यक प्रतिभा की कमी को पूरा करता है।
  • जलवायु परिवर्तन का 'मौन' जोखिम— संधारणीयता और ESG अनुपालन: यह क्षेत्र एक गंभीर 'डीकार्बोनाइजेशन संकट' का सामना कर रहा है क्योंकि वैश्विक खरीदार, विशेष रूप से यूरोपीय संघ में अपने आपूर्तिकर्त्ताओं से सख्त पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) डेटा अनिवार्य करना शुरू कर रहे हैं।
    • भारतीय लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME), जो आपूर्ति शृंखला की रीढ़ हैं, प्रायः कोयला आधारित ऊर्जा से हरित विनिर्माण में परिवर्तन करने के लिये पूंजी की कमी से जूझते हैं, जिससे निर्यात बाज़ार हिस्सेदारी में भारी नुकसान का खतरा रहता है।
    • उदाहरण के लिये, फार्मास्युटिकल क्लीनरूम वाणिज्यिक भवन प्रणालियों की तुलना में 15 गुना अधिक ऊर्जा की खपत कर सकते हैं, जिसमें 50% से अधिक बिजली संयंत्र HVAC क्लीनरूम प्रणालियों द्वारा खपत की जाती है।
  • डिजिटल विभाजन - खंडित डेटा और साइबर सुरक्षा: हालाँकि 'फार्मा 4.0' लक्ष्य है, लेकिन अधिकांश भारतीय कंपनियाँ 'डेटा साइलो' से पीड़ित हैं, जहाँ विनिर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण और अनुसंधान एवं विकास प्रणालियाँ आपस में समन्वय नहीं करती हैं, जिससे अभिलेखी त्रुटियाँ और FDA के चेतावनी नोटिस प्राप्त होते हैं। 
    • इसके अलावा, कनेक्टेड OT (ऑपरेशनल टेक्नोलॉजी) की ओर तेज़ी से बढ़ते कदम ने एक 'साइबर-कमज़ोरी का अंतर' उत्पन्न कर दिया है, जिससे महत्त्वपूर्ण विनिर्माण लाइनें रैंसमवेयर के निशाने पर आ गई हैं जो जीवन रक्षक औषधियों के उत्पादन को रोक सकती हैं।
  • 'बायोसिमिलर विरोधाभास': बायोसिमिलर औषधियों के क्षेत्र में प्रवेश ‘पेटेंट थिकेट्स’ के कारण कठिन सिद्ध हो रहा है, जहाँ नवोन्मेषी कंपनियाँ प्रतिस्पर्द्धा को विलंबित करने हेतु अनेक द्वितीयक पेटेंट स्थापित करती हैं, साथ ही तृतीय चरण नैदानिक परीक्षणों की अत्यधिक लागत भी बाधा बनती है।
    • रासायनिक जेनेरिक औषधियों के विपरीत, बायोसिमिलर औषधियों के लिये विशेष 'कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स' और गहन वैज्ञानिक विश्वसनीयता की आवश्यकता होती है, जिससे छोटे भारतीय उत्पादकों के लिये 'मूल्य-प्रदर्शन अनुपात' बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
    • बायोसिमिलर विकसित करने में 100 मिलियन डॉलर से अधिक की लागत आती है और इसमें 5 से 9 वर्ष लगते हैं। जबकि एक पारंपरिक जेनेरिक औषधि की लागत 1 से 2 मिलियन डॉलर होती है और इसे विकसित करने में लगभग 2 वर्ष लगते हैं। 

भारत को अपने औषधि क्षेत्र को मज़बूत और उन्नत बनाने के लिये कौन-से उपाय अपनाने चाहिये?

  • नियामक सामंजस्य - 'एकल-खिड़की' केंद्रीकरण की ओर संक्रमण: भारत को अपने खंडित राज्य-स्तरीय लाइसेंसिंग को 'राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल नियामक प्राधिकरण' के तहत एक एकीकृत संघीय संरचना में समेकित करने की आवश्यकता है ताकि क्षेत्राधिकार संबंधी अतिव्यापन और 'अनुपालन दबाव' को समाप्त किया जा सके। 
    • यह 'एक राष्ट्र, एक नियामक' मॉडल लघु एवं मध्यम उद्यमों में उत्तम विनिर्माण प्रथाओं (GMP) को मानकीकृत करेगा, जिससे गुणवत्तापूर्ण ऑडिट वैश्विक स्वास्थ्य मानकों (WHO-PICS) के अनुरूप समन्वित हो सकें।
    • एक एकीकृत पोर्टल के माध्यम से 'प्रयोगशाला से बाज़ार तक' संपूर्ण उत्पाद जीवनचक्र को डिजिटाइज़ करके, यह क्षेत्र नवोन्मेषी चिकित्सीय औषधियों के लिये 'अनुमोदन-से-बाज़ार तक' के समय को काफी कम कर सकता है।
  • अनुसंधान एवं विकास पुनर्जागरण - 'नवोन्मेष बॉण्ड' और VGF के माध्यम से जोखिम साझाकरण: सामान्य रिवर्स-इंजीनियरिंग से आगे बढ़ने के लिये, सरकार को उच्च-अवधि वाले नए रासायनिक इकाई (NCE) अनुसंधान के जोखिम को कम करने के लिये 'फार्मा-विशिष्ट नवोन्मेष बॉण्ड' एवं व्यवहार्यता अंतर वित्त पोषण (VGF) लागू करना चाहिये। 
    • उद्योग-अकादमिक-चिकित्सक के बीच निर्बाध तालमेल को सुगम बनाने वाले 'उत्कृष्टता केंद्र' समूहों की स्थापना से औषधि-अन्वेषण में आने वाली उस 'वैली ऑफ डेथ' को समाप्त किया जा सकेगा, जहाँ पूंजी की कमी के कारण संभाव्य अणु (घटक) विफल हो जाते हैं।   
    • स्वदेशी रूप से विकसित बौद्धिक संपदा के लिये व्यापक रियायतों के साथ एक समर्पित 'पेटेंट बॉक्स टैक्स व्यवस्था' स्थानीय फर्मों को उच्च-मूल्य वाली 'नई जैविक संस्थाओं' की ओर रुख करने के लिये और अधिक प्रोत्साहित करेगी।
  • आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ीकरण: PLI से परे 'चक्रीय जैव-विनिर्माण' की ओर: अपस्ट्रीम आत्मनिर्भरता को मज़बूत करने के लिये महत्त्वपूर्ण किण्वन-आधारित API पर 'चीन-प्लस-वन' निर्भरता को बेअसर करने के लिये 'चक्रीय जैव-विनिर्माण' और हरित रसायन विज्ञान की ओर परिवर्तन की आवश्यकता है। 
    • मेगा बल्क ड्रग पार्कों में सामान्य विलायक पुनर्प्राप्ति और अपशिष्ट उपचार संयंत्रों के साथ 'प्लग-एंड-प्ले' अधोसंरचना का विकास करने से पर्यावरण स्थिरता सुनिश्चित करते हुए MSME के लिये प्रवेश बाधा कम हो जाएगी। 
    • की स्टार्टिंग मैटेरियल्स (KSM) में 'पिछड़े एकीकरण' को बढ़ावा देने के लिये स्तरित उत्पादन प्रोत्साहन के माध्यम से, भारत अपने निर्यात-उन्मुख मॉडल को वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और मूल्य झटकों से बचा सकता है।
  • 'फार्मा 4.0' और AI-बायो एकीकरण को गति देना: इस क्षेत्र को विनिर्माण उत्पन्नवार को अनुकूलित करने तथा जटिल नैदानिक ​​परीक्षणों की अवधि को कम करने के लिये 'डिजिटल ट्विन' तकनीक और AI-संचालित भविष्यसूचक मॉडलिंग को सक्रिय रूप से अपनाने की आवश्यकता है।
    • संपूर्ण आपूर्ति शृंखला में 'ब्लॉकचेन-इनेबल्ड ट्रेसिबिलिटी' को लागू करना आवश्यक है, जिससे नकली औषधियों के संकट का सामना किया जा सके तथा औषधि निर्यात में वैश्विक 'ब्रांड इंडिया' के विश्वास को पुनः स्थापित किया जा सके।
    • नियामक अनुमोदन प्रक्रिया में 'वास्तविक-विश्व साक्ष्य' (RWE) को एकीकृत करने से स्वचालित फार्माकोविजिलेंस के माध्यम से कठोर सुरक्षा मानकों को बनाए रखते हुए जीवन रक्षक विशेष औषधियों के लिये बाज़ार में तेज़ी से पहुँच संभव हो सकेगी।
  • मानव संसाधन कौशल उन्नयन - 'बायोफार्मा-बायोइन्फॉर्मेटिक्स' अंतर को समाप्त करना: भारत को 'बायोलॉजिक्स वेव' के लिये कार्यबल तैयार करने के लिये 'कम्प्यूटेशनल बायोलॉजी,' जीनोमिक्स और उन्नत बायोप्रोसेसिंग को शामिल करने के लिये अपने फार्मेसी पाठ्यक्रम में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है।
    • वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी संस्थानों के साथ साझेदारी में ‘औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों’ की स्थापना से स्नातकों का उच्च स्तरीय अनुसंधान एवं विकास तथा जटिल बायोसिमिलर निर्माण के लिये आवश्यक ‘उद्योग-उपयुक्त’ कौशल-विकास सुनिश्चित होगा।
    • 'ग्लोबल टैलेंट कॉरिडोर' बनाकर तथा 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' के लिये अनुसंधान फैलोशिप की पेशकश करके, भारत अपने उभरते सेल और जीन थेरेपी (CGT) क्षेत्रों का नेतृत्व करने के लिये विश्व स्तरीय वैज्ञानिक नेतृत्व को आकर्षित कर सकता है।
  • रणनीतिक बाज़ार विविधीकरण: भारत को अछूते ग्लोबल साउथ बाज़ारों में अग्रणी बढ़त हासिल करने के लिये 'दुर्लभ औषधि' विकास और 'उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों' (NTD) के उपचार की ओर उन्मुख होना चाहिये।
    • AMR या चयापचय संबंधी विकारों जैसी घरेलू स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को लक्षित करने वाली स्वदेशी औषधियों के लिये 'फास्ट-ट्रैक मार्केट एक्सक्लूसिविटी' प्रदान करने से एक स्थायी 'नवोन्मेष-से-राजस्व' चक्र का निर्माण होगा। 
    • सरकार समर्थित 'स्वदेशी अणुओं के लिये खरीद गारंटी' द्वारा समर्थित यह 'मिशन-मोड' दृष्टिकोण, उच्च जोखिम वाले फार्मास्युटिकल उद्यमशीलता के लिये एक आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र को उत्प्रेरित करेगा।
  • ESG-आधारित वैश्विक एकीकरण: उभरते ESG प्रकटीकरण मानदंडों के तहत अत्यधिक विनियमित यूरोपीय संघ और अमेरिकी बाज़ारों तक पहुँच बनाए रखने के लिये 'कार्बन-तटस्थ विनिर्माण' जनादेश का अंगीकरण अब कोई विकल्प नहीं बल्कि एक अनिवार्य शर्त बन चुका है। 
    • नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित 'ग्रीनफील्ड सुविधाओं' की ओर संक्रमण और 'फ्लो केमिस्ट्री' को अपनाने से खतरनाक अपशिष्ट कम हो जाएगा तथा API सिंथेसिस के पर्यावरणीय प्रभाव में उल्लेखनीय कमी आएगी। 
    • भारत को 'सतत रूप से उत्पादित' औषधि केंद्र के रूप में स्थापित करके, उद्योग 'ग्रीन प्रीमियम' प्राप्त कर सकता है और स्वयं को उन प्रतिस्पर्द्धियों से अलग कर सकता है जो पारंपरिक, उच्च-उत्सर्जन उत्पादन विधियों पर निर्भर हैं।

निष्कर्ष: 

भारत एक निर्णायक मोड़ पर स्थित है— जहाँ एक ओर वह वैश्विक जेनेरिक औषधि आपूर्तिकर्त्ता के रूप में अपनी परंपरागत पहचान को बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर नवोन्मेष-आधारित औषधि महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है। नियामक अंतरालों को समाप्त करना, अनुसंधान एवं विकास को सुदृढ़ करना तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित ‘फार्मा 4.0’ का अंगीकरण इसकी भावी दिशा को निर्धारित करेंगे। वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में बने रहने के लिये गुणवत्ता, संधारणीयता और उच्च-मूल्य जैव-औषधियों की ओर रणनीतिक संक्रमण अनिवार्य है। समयबद्ध सुधारों के माध्यम से भारत ‘विश्व की फार्मेसी’ से आगे बढ़कर अगली पीढ़ी के औषधि नवोन्मेष में अग्रणी बन सकता है।

दृष्टि मेन्स का प्रश्न: 

भारत का औषधि क्षेत्र जेनेरिक औषधियों में अपनी मज़बूती और नवोन्मेष-आधारित विकास की आवश्यकता के बीच एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। इसके सामने मौजूद प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये तथा इसे उच्च-मूल्य वाली औषधियों के विकास के लिये एक वैश्विक केंद्र में परिवर्तित करने के उपाय सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: 

1. जेनेरिक औषधियों के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी होने के बावजूद भारत नई औषधियों के नवोन्मेष में पिछड़ा क्यों है? 
भारत काफार्मा क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से उच्च जोखिम वाले नवोन्मेष के बजाय कम लागत वाली जेनेरिक औषधियों के निर्माण पर केंद्रित रहा है। सीमित अनुसंधान एवं विकास निवेश, लंबी विकास अवधि, नैदानिक ​​परीक्षणों में नियामक विलंब और विशेषज्ञ प्रतिभाओं की कमी नई औषधियों तथा नवीन अणुओं के विकास में बाधक हैं।

2. PLI योजनाओं और बल्क ड्रग पार्कों जैसी पहलें भारत की फार्मास्युटिकल आपूर्ति शृंखला को किस प्रकार परिवर्तित कर रही हैं? 
PLI योजनाएँ और बल्क ड्रग पार्क API और KSM के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो रही है, विशेष रूप से चीन पर। ये बैकवर्ड इंटीग्रेशन को सक्षम बनाते हैं, साझा अधोसंरचना के माध्यम से पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ बनाते हैं तथा आपूर्ति शृंखला की समुत्थानशीलता और लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता को मज़बूत करते हैं।

3. भारत के फार्मा सेक्टर की वैश्विक प्रतिष्ठा को प्रभावित करने वाली प्रमुख नियामक और गुणवत्ता संबंधी चुनौतियाँ क्या हैं? 
खंडित नियामक निगरानी, GMP अनुपालन में असंगति (विशेष रूप से MSME में) और निम्नस्तरीय औषधियों पर वैश्विक चेतावनियों ने 'ब्रांड इंडिया' की छवि को धूमिल किया है। NLEM के तहत मूल्य निर्धारण नियंत्रण और अतिव्यापी प्राधिकरण भी अनुपालन का बोझ बढ़ाते हैं तथा गुणवत्ता उन्नयन को हतोत्साहित करते हैं।

4. भारत में 'फार्मा 4.0' की ओर संक्रमण किस प्रकार औषधि अन्वेषण और विनिर्माण को नया स्वरूप दे रहा है? 
फार्मा 4.0 औषधि अन्वेषण को गति देने, विनिर्माण को अनुकूलित करने और गुणवत्ता नियंत्रण को बढ़ाने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल ट्विन एवं डेटा एनालिटिक्स को एकीकृत करता है। यह विकास अवधि को कम करता है, सटीक चिकित्सा को सक्षम बनाता है तथा वास्तविक काल की निगरानी और स्वचालन के माध्यम से नियामक अनुपालन में सुधार करता है।

5. भारत को उच्च मूल्य वाले जैव औषधीय नवोन्मेष के वैश्विक केंद्र के रूप में उभरने के लिये किन संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है? 
भारत को एकल-खिड़की प्रणाली के माध्यम से नियामक सामंजस्य, अनुसंधान एवं विकास वित्तपोषण में वृद्धि (जैसे: नवोन्मेष बॉण्ड), अकादमिक जगत और उद्योग के बीच मज़बूत संबंध, जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में प्रतिभाओं का कौशल विकास, ESG-अनुरूप विनिर्माण तथा जैविक उत्पादों तथा नवीन औषधियों के विकास के लिये प्रोत्साहन की आवश्यकता है।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-से, भारत में सूक्ष्मजैविक रोगजनकों में बहु-औषध प्रतिरोध के होने के कारण हैं? (2019) 

  1. कुछ व्यक्तियों में आनुवंशिक पूर्ववृत्ति (जेनेटिक प्रीडिस्पोज़ीशन) का होना
  2. रोगों के उपचार के लिये प्रतिजैविकों (एंटिबॉयोटिक्स) की गलत खुराकें लेना
  3. पशुधन फार्मिंग में प्रतिजैविकों का इस्तेमाल करना
  4. कुछ व्यक्तियों में चिरकालिक रोगों की बहुलता होना

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) 1 और 2 

(b) केवल 2 और 3

(c) 1, 3 और 4

(d) 2, 3 और 4

उत्तर: (b)


मेन्स

प्रश्न 1. भैषजिक कंपनियों के द्वारा आयुर्विज्ञान के पारंपरिक ज्ञान को पेटेंट कराने से भारत सरकार किस प्रकार रक्षा कर रही है? (2019)


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