हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

एडिटोरियल

  • 24 Nov, 2022
  • 13 min read
भूगोल

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की विकासात्मक आवश्यकताएँ

यह एडिटोरियल 22/11/2022 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “Development of Great Nicobar: strategic imperative and ecological concerns” लेख पर आधारित है। इसमें अंडमान और निकोबार के रणनीतिक महत्त्व तथा इससे संबंधित चुनौतियों के बारे में चर्चा की गई है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (ANI) हिंद महासागर के बंगाल की खाड़ी के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित 572 द्वीपों का एक समूह है। ये द्वीप इंडोनेशिया और थाईलैंड के निकट स्थित हैं।

सुरक्षात्मक और आर्थिक दृष्टिकोण से ANI के रणनीतिक महत्त्व को भारत द्वारा पूरी तरह से चिह्नित नहीं किया है और वर्तमान में ANI में पर्यावरणीय क्षरण चिंता का एक प्रमुख विषय है। इस परिदृश्य में, द्वीप की अर्थव्यवस्था के संवर्द्धन के साथ-साथ भारत की समुद्री क्षमता को सशक्त बनाने के लिये सतत् विकास पर वृहत ध्यान देने की आवश्यकता है।

भारत के लिये ANI का महत्त्व:

  • मूल्यवान जनजाति क्षेत्र: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह 5 विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहोंग्रेट अंडमानी (Great Andamanese), जरवा (Jarwas), ओंज (Onges), शोम्पेन (Shompens) और उत्तरी सेंटिनली (North Sentinelese) का निवास है।
  • समुद्री भागीदारों के लिये गतिविधि क्षेत्र: भारत के प्रमुख समुद्री भागीदार, जैसे अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांँस; अंडमान और निकोबार की रणनीतिक अवस्थिति को चिह्नित करते हैं और इसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
  • ANI के लिये हाल की विकास योजनाएँ:
    • जापान द्वारा विदेशी विकास सहायता: जापान ने वर्ष 2021 में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह विकास परियोजनाओं के लिये 265 करोड़ अमेरिकी डॉलर की अनुदान सहायता को मंज़ूरी दी है।
    • ग्रेट निकोबार के लिये नीति आयोग की परियोजना: इसमें एक अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक हवाई अड्डा, एक बिजली संयंत्र और एक टाउनशिप शामिल है।
    • लिटिल अंडमान के लिये नीति आयोग का प्रस्ताव: इस योजना में एक नए ग्रीनफील्ड तटीय शहर (greenfield coastal city) के विकास का प्रस्ताव किया गया है जो सिंगापुर और हांगकांग के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर सके।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से संबद्ध प्रमुख चुनौतियाँ

  • अवैध प्रवासन और तस्करी: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को गैर-पारंपरिक खतरों के रूप में आंतरिक सुरक्षा के संबंध में लिये वृहत चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन खतरों में बंगाल की खाड़ी के तटीय क्षेत्रों से अवैध प्रवासन, समुद्री एवं वन संसाधनों का अवैध दोहन, निर्जन द्वीपों के माध्यम से हथियारों एवं नशीले पदार्थों की तस्करी और प्राकृतिक आपदाएँ प्रमुख हैं।
  • असंवहनीय/असतत् विकास: अंडमान और निकोबार एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण क्षेत्र के रूप में उभरा है और इसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में कई विकास परियोजनाएँ शुरू की जा रही हैं। ये परियोजनाएँ एक ओर इन द्वीपों को व्यापक रूप से रूपांतरित कर देंगी तो दूसरी ओर इससे पारिस्थितिक स्थिरता को भी हानि पहुँचेगी।
    • विकास गतिविधियाँ इस क्षेत्र की प्रवाल भित्तियों को भी प्रभावित कर रही हैं जो पहले ही गर्म होते महासागरों के कारण खतरे में हैं। उल्लेखनीय है कि प्रवाल भित्तियाँ अत्यधिक पारिस्थितिक महत्त्व रखती हैं।
    • पर्यावरणविदों ने विकास परियोजना के परिणामस्वरूप द्वीप के मैंग्रोव की क्षति पर भी चिंता जताई है।
  • भूगर्भीय अस्थिरता: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भूकंप के दृष्टिकोण से अत्यधिक सक्रिय क्षेत्र में स्थित हैं। इसके कारण यह क्षेत्र कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त है।
    • उदाहरण के लिये, वर्ष 2004 में यहाँ आये एक भूकंप और उसके साथ आई सुनामी ने इस द्वीप शृंखला के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया था।
      • निकोबार और कार निकोबार (निकोबार का सबसे उत्तरी द्वीप) ने अपनी आबादी का लगभग पाँचवाँ हिस्सा और लगभग 90% मैंग्रोव खो दिये थे।
  • भू-राजनीतिक अस्थिरता: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह हिंद-प्रशांत भू-राजनीतिक थियेटर (Indo-Pacific geopolitical theatre) का अंग हैं, जहाँ चीन सक्रिय रूप से अपने प्रभाव का विस्तार करने का प्रयास कर रहा है और संभावित रूप से भारत की ब्लू इकॉनमी एवं समुद्री सुरक्षा के लिये खतरा उत्पन्न कर रहा है।
    • इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की चीन की महत्त्वाकांक्षाओं को श्रीलंका के हंबनटोटा में देखा जा सकता है जहाँ चीन श्रीलंका की अचल संपत्ति पर नियंत्रण रखता है।
  • जनजातीय क्षेत्र में अतिक्रमण: यद्यपि विशेष रूप से सुभेद्द्य जनजातीय समूहों (Particularly Vulnerable Tribal Groups- PVTGs) को स्थानीय प्रशासन द्वारा उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्रदान की जाती है, फिर भी विकास के नाम पर उनके क्षेत्रों में अतिक्रमण और प्रभावी पुनर्वास कार्यक्रम की कमी के कारण उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

आगे की राह

  • सतत् द्वीप विकास ढाँचा (Sustainable Island Development Framework): अंडमान और निकोबार में अवसंरचनात्मक एवं विकासात्मक परियोजनाएँ निस्संदेह भारत की सामरिक एवं समुद्री क्षमताओं में वृद्धि करेंगी, लेकिन ऐसा विकास अंडमान और निकोबार के पारिस्थितिकी तंत्र के दोहन की कीमत पर नहीं किया जाना चाहिये।
    • इस क्षेत्र में किसी भी विकास गतिविधि से पहले एक पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव आकलन (Environmental and Social Impact Assessment) को अनिवार्य बनाया जाना चाहिये।
    • एक सतत् द्वीप विकास ढाँचा न केवल अंडमान और निकोबार के लिये महत्त्वपूर्ण है बल्कि इसे अन्य भारतीय द्वीपों के लिये भी लागू किया जाना चाहिये।
  • सामुदायिक विकास के लिये मास्टर प्लान: स्वदेशी/मूल निवासी समुदायों की सुरक्षा के लिये कानूनों को सशक्त बनाया जाना चाहिये और आपदा के समय उनकी रक्षा के लिये एक उचित पुनर्वास योजना तैयार की जानी चाहिये।
    • यहाँ आने वाले पर्यटकों द्वारा हस्तशिल्प वस्तुओं की उच्च मांग के कारण यहाँ हस्तशिल्प उद्योग के विकास की वृहत संभावनाएँ मौजूद हैं। इस क्रम में भारत द्वीप क्षेत्रों में हस्तशिल्प उद्योग के औपचारीकरण के लिये एक मास्टर प्लान तैयार कर और ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा देकर दुनिया भर के द्वीपों के लिये एक खाका प्रदान कर सकता है।
  • द्वीप सुरक्षा मॉडल का विकास करना: एक द्वीप सुरक्षा मॉडल विकसित करने के लिये भारत को समुद्री सुरक्षा में क्षमता निर्माण में निवेश करने और अनुसंधान को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है; इसके साथ ही घुसपैठ के किसी भी प्रयास को ट्रैक करने के लिये अपनी नौसेना को नवीनतम तकनीक से लैस करने की भी आवश्यकता है।
  • लिंकिंग परियोजनाओं को पुनर्जीवित करना: सबमरीन ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC) के माध्यम से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को मुख्य भूमि से जोड़ने की योजना को भी पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
    • सबमरीन केबल अंडमान और निकोबार को सस्ती एवं बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करने और डिजिटल इंडिया के सभी लाभ (विशेष रूप से ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन, बैंकिंग और ऑनलाइन ट्रेडिंग में सुधार लाने) प्राप्त करने में भी मदद करेगी।
  • जहा निर्माण और मरम्मत उद्योग का संवर्द्धन: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की जीवन रेखा शिपिंग संचालन है, क्योंकि अधिकांश निर्माण गतिविधियाँ इससे ही संबंधित हैं। शिपिंग कार्यों को बिना किसी व्यवधान के जीवित रखने के लिये जहाज़ मरम्मत सुविधाओं को स्थापित करने की आवश्यकता है।
    • जहाज़ निर्माण और मरम्मत उद्योग भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में एक ‘जंक्शन’ के रूप में उभरने में भी सक्षम बनाएँगे और ट्रांस-शिपमेंट बंदरगाहों के विकास से दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार में भी सुविधा प्राप्त होगी।

अभ्यास प्रश्न: भारत के लिये अंडमान और निकोबार के रणनीतिक एवं आर्थिक महत्त्व पर विचार कीजिये। इस क्षेत्र से संबंधित प्रमुख पर्यावरणीय एवं भू-राजनीतिक चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा,विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न 1. भारत के निम्नलिखित क्षेत्रों में से किस में मैंग्रोव वन, सदाबहार वन और पर्णपाती वन का संयोजन है? (2015)

(a) उत्तरी तटीय आंध्र प्रदेश
(b) दक्षिण-पश्चिम बंगाल
(c) दक्षिणी सौराष्ट्र
(d) अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

उत्तर: (d)


प्रश्न 2. द्वीपों के निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म 'दस डिग्री चैनल' द्वारा एक दूसरे से अलग किया जाता है? (2014)

(a) अंडमान और निकोबार
(b) निकोबार और सुमात्रा
(c) मालदीव और लक्षद्वीप
(d) सुमात्रा और जावा

उत्तर: (a)


प्रश्न 3. निम्नलिखित में से किसमें प्रवाल भित्तियांँ हैं? (2014)

  1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
  2. कच्छ की खाड़ी
  3. मन्नार की खाड़ी
  4. सुंदरबन

नीचे दिये गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 2 और 4
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (a)


प्रश्न 4. निम्नलिखित में से किस स्थान पर शोम्पेन जनजाति पाई जाती है? (2009)

(a) नीलगिरि पहाड़ियाँ
(b) निकोबार द्वीप समूह
(c) स्पीति घाटी
(d) लक्षद्वीप द्वीप समूह

उत्तर: (b)


एसएमएस अलर्ट
Share Page