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एडिटोरियल

  • 19 Mar, 2020
  • 15 min read
भारतीय राजनीति

न्यायिक निष्पक्षता का सवाल

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में न्यायिक निष्पक्षता और उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

I Will See You In Court’ यह केवल एक वाक्य नहीं बल्कि न्यायिक व्यवस्था पर भारत की जनता के भरोसे का प्रतीक है। देश में कहीं भी जब दो लोगों के बीच कोई विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है तो वे न्याय निर्णयन के लिये न्यायालयों का रुख करते हैं। परंतु वह स्थिति कैसी होगी जब न्यायपालिका स्वयं न्यायिक निष्पक्षता के कटघरे में खड़ी हो? वर्तमान में कुछ ऐसी ही परिस्थितियाँ देश के सामने समस्या के रूप में खड़ी हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश के राज्यसभा सदस्य के रूप में मनोनयन की घोषणा से न्यायिक निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों (असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, सबरीमाला, अयोध्या मंदिर विवाद , राफेल विवाद , केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) की अध्यक्षता की है जिसमें सरकार एक पक्षकार के रूप में उपस्थित थी।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश की  सेवानिवृत्ति के चार माह बाद ही राज्यसभा सदस्य के लिये मनोनयन के निर्णय से यह प्रश्न उठता है कि क्या न्यायाधीशों पर सेवानिवृत्त हो जाने के बाद कम से कम कुछ वर्षों के लिये राजनीतिक पदों को स्वीकार करने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये, क्योंकि इस तरह के पदों को स्वीकार करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है। इस आलेख में भारत के न्यायिक व्यवस्था की संरचना तथा उसकी स्वतंत्रता के विधिक और संवैधानिक प्रावधानों को भी जानने का प्रयास किया जाएगा

भारत की न्यायिक व्यवस्था

  • भारतीय संविधान ने एकीकृत न्यायिक व्यवस्था की स्थापना की है, जिसमें शीर्ष स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय व उसके अधीन राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय की व्यवस्था है।
  • प्रत्येक उच्च न्यायलय के अधीन अधीनस्थ न्यायालयों की श्रेणियाँ हैं। अधीनस्थ न्यायालयों के अंतर्गत ज़िला एवं सत्र न्यायालय, परिवार न्यायालय तथा मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय आते हैं।
  • भारतीय संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 124 से 147 तक सर्वोच्च न्यायालय के गठन, स्वतंत्रता, न्यायक्षेत्र, शक्तियाँ प्रक्रिया आदि का उल्लेख है, तो वहीँ संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों के गठन, स्वतंत्रता, न्यायक्षेत्र, शक्तियाँ प्रक्रिया आदि का उल्लेख है। इस समय देश में 25 उच्च न्यायालय कार्यरत हैं।
  • भारतीय संविधान के भाग-7 में अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों का गठन किया गया है।

स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का आधार स्तंभ है। इसमें तीन आवश्यक शर्तें निहित हैं-
    • न्यायपालिका को सरकार के अन्य विभागों के हस्तक्षेप से उन्मुक्त होना चाहिये।
    • न्यायपालिका के निर्णय व आदेश कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका के हस्तक्षेप से मुक्त होने चाहिये।
    • न्यायाधीशों को भय या पक्षपात के बिना न्याय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिये।
  • सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कोलेज़ियम की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि न्यायिक नियुक्ति राजनीति से प्रेरित नहीं हैं।
  • न्यायाधीशों को कार्यकाल की सुरक्षा प्रदान की गई है। वे राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण नहीं करते हैं अर्थात् उन्हें नियुक्त किये जाने के बाद सरकार द्वारा मनमाने ढंग से नहीं हटाया जा सकता है, संविधान के अनुच्छेद 124(4) के प्रावधान के अनुसार, ‘साबित कदाचार या असमर्थता’ के आधार पर संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत से पारित महाभियोग प्रस्ताव के द्वारा ही उन्हें पद से हटाया जा सकता है। 
  • सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते, अवकाश, विशेषाधिकार तथा पेंशन का निर्धारण समय- समय पर संसद द्वारा किया जाता है। इनमें वितीय आपातकाल के अलावा किसी भी परिस्थिति में प्रतिकूल रूप से परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।   
  • महाभियोग प्रस्ताव के अतिरिक्त संविधान के द्वारा न्यायाधीशों के आचरण पर संसद में या राज्य विधानमंडल में बहस करने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
  • सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत के किसी भी न्यायलय में वकालत नहीं कर सकते हैं जबकि उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालय के अतिरिक्त कहीं भी वकालत नहीं कर सकते हैं। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिये किया गया है कि वह निर्णय देते समय भविष्य की चिंता न करें।
  • न्यायालयों को अपनी अवमानना पर दंड देने की शक्ति भी प्रदान की गई है
  • सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश को बिना कार्यकारी हस्तक्षेप के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को नियुक्त करने का अधिकार है
  • संसद को न्यायालयों के न्यायक्षेत्र एवं शक्तियों में कटौती का अधिकार नहीं है। हालाँकि संसद इसमें वृद्धि कर सकती है।
  • संविधान में न्यायपालिका को कार्यपालिका व विधायिका से पृथक करने की व्यवस्था की गई है। 

सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्तियों के संबंध में संविधान सभा का विचार  

  • संविधान सभा में, के.टी. शाह ने सुझाव दिया कि सर्वोच्च न्यायालय और  उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को सरकार के साथ कार्यकारी संबंध नहीं स्थापित करना चाहिये, “ताकि किसी न्यायाधीश को अधिक से अधिक परिलब्धियों, या प्रतिष्ठा के लिये प्रलोभन न दिया जा सके, क्योंकि ऐसे प्रलोभन किसी भी न्यायाधीश की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं ”।  
  • हालाँकि, इस सुझाव को प्रारूप समिति के अध्यक्ष बी.आर. अंबेडकर ने खारिज़ कर दियाउनके अनुसार, "न्यायपालिका जिन मामलों पर निर्णय करती है, उनमें सरकार की विशेष रूचि नहीं हैं, यदि किसी वाद में सरकार पक्षकार है भी तो इसका संबंध आम नागरिक के मुद्दों से नहीं है।”
  • स्वतंत्रता के बाद न्यायपालिका निज़ी विवादों के न्याय निर्णयन में व्यस्त थी, उस दौरान सरकार व नागरिकों के मध्य शायद ही किसी भी प्रकार का विवाद सामने आया हो। 
  • परिणामस्वरूप बी.आर. अंबेडकर ने यह माना कि, "सरकार द्वारा न्यायपालिका के एक सदस्य के आचरण को प्रभावित करने की संभावना अति न्यून है"।
  • हालाँकि वर्तमान में यह विचार प्रासंगिक नहीं रह गया है क्योंकि अब न्यायपालिका में सरकार के विरुद्ध ही सर्वाधिक वाद दायर किया जा रहे हैं।

न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति के उदाहरण

  • स्वतंत्रता के बाद से ही सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को राजनीतिक पदों पर नियुक्त किया गया है।
  • वर्ष 1952 में जस्टिस फज़ल अली को सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त होने के तुरंत बाद उड़ीसा का राज्यपाल नियुक्त किया गया था।
  • वर्ष 1958 में मुख्य न्यायाधीश एम.सी. चांगला ने प्रधानमंत्री नेहरू के निमंत्रण पर अमेरिका में भारत का राजदूत बनने के लिये बॉम्बे उच्च न्यायालय से त्यागपत्र दे दिया था।
  • वर्ष 1967 में मुख्य न्यायाधीश सुब्बा राव ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिये त्यागपत्र दे दिया था। 
  • वर्ष 1998 में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र को कांग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा सदस्य बनाया गया था।  
  • वर्ष 2014 में मुख्य न्यायाधीश पी. सताशिवम को केरल का राज्यपाल नियुक्त किया गया था।

संबंधित तथ्य

  • संविधान के अनुच्छेद 124(7) के अनुसार, कोई व्यक्ति जिसने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पद धारण किया है, भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी न्यायालय में या किसी प्राधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता है
  • इस प्रकार न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्ति न्यायिक स्वतंत्रता को समाप्त या कम कर सकती है। ऐसा इसलिये है क्योंकि कुछ न्यायाधीशों को सरकार द्वारा सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति की पेशकश नहीं की जाती है।
  • अक्सर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि यदि कोई न्यायाधीश जो सेवानिवृत्ति के करीब है, सरकार के विरुद्ध दायर विभिन्न वाद पर इस तरह निर्णय कर सकता है जिससे सरकार को लाभ प्राप्त हो
  • यदि कोई न्यायाधीश सरकार के पक्ष में अत्यधिक विवादास्पद मामलों पर निर्णय करता है और फिर सेवानिवृत्ति के बाद कोई शासकीय पद स्वीकार करता है तो इससे जनता के बीच यही संदेश जाता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता किया गया है, भले ही यह ‘क्विड प्रो क्वो’ (लाभ के बदले लाभ प्राप्त करना) का मामला न हो

विधि आयोग की अनुशंसा का उल्लंघन

  • वर्ष 1958 में विधि आयोग ने अपनी 14वीं  रिपोर्ट में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश दो प्रकार के कार्यों में संलग्न थे: 
    • प्रथम, "चैंबर प्रैक्टिस" (पक्षकार को राय देना और निजी विवादों में मध्यस्थ के रूप में सेवा प्रदान करना) और दूसरा, "सरकार के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण पदों को धारण करना"।
    • विधि आयोग ने चैंबर प्रैक्टिस की व्यवस्था पर नाराज़गी व्यक्त की, लेकिन इसके उन्मूलन की सिफारिश नहीं की।
    • हालाँकि विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिये सेवानिवृत्ति के बाद शासकीय पदों की धारण करने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की ज़ोरदार सिफारिश की क्योंकि सरकार के विरुद्ध न्यायालयों में बड़ी संख्या में वाद दायर किये जा रहे थे।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की राय

  • मुख्य न्यायाधीश वाई. वी. चंद्रचूड़ ने महसूस किया कि कुछ न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद शासकीय पदों के प्रलोभन में सरकार के हित में निर्णय लिख रहे थे।
  • मुख्य न्यायाधीश आर.एस. पाठक का मानना ​​था कि सर्वोच्च न्यायालय में छोटे कार्यकाल वाले न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद उपयुक्त शासकीय पदों के प्रलोभन में थे, उनके दृष्टिकोण में सरकार समर्थक होने की प्रवृत्ति अधिक थी।

आगे की राह

  • प्रशासनिक निकायों में कई सेवानिवृत्त हुए व्यक्तियों की नियुक्तियों के लिये कूलिंग ऑफ पीरियड की आवश्यकता होती है ताकि हितों के टकराव की संभावना या संदेह को समाप्त किया जा सके। इस कूलिंग ऑफ पीरियड को भारतीय न्यायपालिका तक बढ़ाया जाना चाहिये। 
  • पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा ने कम से कम 2 साल की कूलिंग ऑफ पीरियड की सिफारिश की है।
  • न्यायिक शुचिता को बरकरार रखने के लिये सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शासकीय पद धारण करने के किसी नही प्रलोभन से स्वयं को दूर रखना चाहिये।

प्रश्न- “संविधान निर्माताओं का यह मानना था कि न्यायिक स्वतंत्रता के बल पर ही सामाजिक न्याय की अवधारणा मूर्त रूप ले सकती है।” संविधान में न्यायिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने के लिये किये गए प्रावधानों का उल्लेख करते हुए यह बताएँ कि न्यायिक स्वतंत्रता, न्यायिक निष्पक्षता को किस प्रकार प्रोत्साहित करती है?   


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