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  • 17 Feb, 2020
  • 15 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

अफगानिस्तान संघर्ष और भारत

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इस विषय पर चर्चा की गई है कि क्या भारत को अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजनी चाहिये या नहीं। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग के पाँचवें संस्करण को संबोधित करते हुए अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्ला मोहिब ने तालिबान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता को देखते हुए प्रत्यक्ष तौर पर भारत के समक्ष अफगानिस्तान में भारतीय सैनिकों की तैनाती पर विचार करने का प्रस्ताव रखा था। आधिकारिक तौर पर आर्थिक और मानवीय सहायता के माध्यम से अफगानिस्तान की मदद करने का तर्क देते हुए भारत कई बार अफगानिस्तान को प्रत्यक्ष सैन्य सहयोग प्रदान करने से इनकार करता रहा है। हालाँकि अतीत में इस प्रकार के सभी अनुरोध अमेरिका द्वारा ही किये गए हैं, जिसके कारण उन्हें खारिज करना अपेक्षाकृत आसान था। ऐसे में अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति का विश्लेषण करते हुए यह जान लेना आवश्यक है कि क्या भारत को अफगानिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप करना चाहिये या नहीं।

अफगानिस्तान में संघर्ष की पृष्ठभूमि

  • अमेरिका के आक्रमण से पूर्व ही अफगानिस्तान लगभग 20 वर्षों तक निरंतर युद्ध की स्थिति में रहा था। अफगानिस्तान संघर्ष की शुरुआत अफगानिस्तान में तख्तापलट के एक वर्ष पश्चात् 1979 में हुई जब सोवियत सेना ने अफगानिस्तान पर अपनी साम्यवादी सरकार का समर्थन करने के लिये आक्रमण कर दिया।
  • सोवियत सेना अफगानिस्तान सरकार की ओर से अफगान मुजाहिदीनों के विरुद्ध जंग लड़ रही थी, ज्ञात हो कि इन अफगान मुजाहिदीनों को अमेरिका, पाकिस्तान, चीन और सऊदी अरब जैसे देशों का समर्थन प्राप्त था। युद्ध की शुरुआत के कुछ ही वर्षों में सोवियत सेना ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्ज़ा कर लिया। हालाँकि इस युद्ध में सोवियत सेना के 15000 से भी अधिक सैनिक मारे गए।
  • वर्ष 1989 में सोवियत संघ ने कुछ आंतरिक कारणों के परिणामस्वरूप अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाने का निर्णय लिया और 15 फरवरी 1989 को सोवियत सेना की अंतिम टुकड़ी भी अफगानिस्तान से वापस चली गई। हालाँकि अफगानिस्तान में अभी भी गृहयुद्ध की स्थिति बनी हुई थी।
  • अफगानिस्तान से सोवियत सेना की वापसी के पश्चात् ही वहाँ तालिबान के उदय की शुरुआत होती है। तालिबान पश्तो भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘छात्र’। दरअसल तालिबान का उदय 1990 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में हुआ, जब सोवियत सेना अफगानिस्तान से वापस जा चुकी थी।
    • 1980 के दशक के अंत में सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद वहाँ कई गुटों में आपसी संघर्ष शुरू हो गया और वहाँ के आम लोग भी मुजाहिदीनों से काफी परेशान थे। ऐसे हालात में जब तालिबान का उदय हुआ था तो अफगान लोगों ने उसका स्वागत किया।
  • पश्तूनों के नेतृत्व में उभरा तालिबान, अफगानिस्तान के परिदृश्य पर पूर्णरूप से वर्ष 1994 में सामने आया। इससे पहले तालिबान धार्मिक आयोजनों या मदरसों तक सीमित था, जिसे ज़्यादातर धन सऊदी अरब से मिलता था।
  • प्रारंभ में तालिबान को इसलिये लोकप्रियता मिली क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई, अव्यवस्था पर अंकुश लगाकर अपने नियंत्रण में आने वाले इलाकों को सुरक्षित बनाया ताकि लोग व्यवसाय कर सकें।
  • दक्षिण-पश्चिम अफगानिस्तान में तालिबान ने जल्द ही अपना प्रभाव बढ़ाया। सितंबर 1995 में तालिबान ने ईरान सीमा से लगे हेरात प्रांत पर कब्ज़ा कर लिया।
  • धीरे-धीरे तालिबान ने अफगानिस्तान में अपना दबदबा बढ़ाना शुरू किया और वर्ष 1996 में बुरहानुद्दीन रब्बानी को सत्ता से हटाकर अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्ज़ा कर लिया। वर्ष 1998 तक लगभग 90 फीसदी अफगानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण हो गया था।
  • दुनिया का ध्यान तालिबान की ओर तब आकर्षित हुआ जब न्यूयॉर्क में वर्ष 2001 में आतंकवादी हमले किये गए। तालिबान पर आरोप लगाया गया कि उसने ओसामा बिन लादेन और अल कायदा को पनाह दी है जिसे न्यूयॉर्क हमलों का दोषी बताया जा रहा था। 7 अक्तूबर, 2001 को अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया।
  • इस प्रकार अमेरिका भी अफगान संघर्ष में शामिल हो गया और अपनी सैन्य शक्ति की बदौलत अमेरिका ने कुछ ही समय में अफगानिस्तान से तालिबान को कमोबेश समाप्त कर दिया। किंतु अफगानिस्तान में तालिबान अब भी पूर्णतः खत्म नहीं हुआ है और वह धीरे-धीरे पुनः वैश्विक परिदृश्य पर उभर रहा है।

अफगानिस्तान संघर्ष के प्रति भारत की नीति

  • भारत हमेशा से तालिबान शासन का विरोध करता रहा है, भारत का सदैव यह दृष्टिकोण रहा है कि वह तालिबान से संबंधित किसी प्रत्यक्ष वार्ता में संलग्न नहीं होगा। हालाँकि वर्ष 2018 में भारत ने मास्को में तालिबान के साथ आयोजित वार्ता में शामिल होने के लिये गैर-आधिकारिक स्तर पर अपने दो सेवानिवृत्त राजनयिकों को भेजा था।
    • कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत का तालिबान के साथ खुला संपर्क होना चाहिये क्योंकि तालिबान भी अब अफगानिस्तान की राजनीतिक प्रक्रिया का एक अंग बन गया है।
  • भारत उन देशों में से एक है जिन्होंने वर्ष 1996-2001 के तालिबान शासन को मान्यता प्रदान करने से इनकार कर दिया था। वर्ष 1999 में IC-814 के अपहरण के बाद यह पहला मौका था जब भारत सरकार के प्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से तालिबान से जुड़े मामलों में शामिल हुए थे।
  • तालिबान के प्रति भारत की नीति सदैव ही स्पष्ट रही है। यहाँ तक कि भारत ने अफगानिस्तान में तालिबान विरोधी ताकतों को सहायता भी प्रदान की है।

भारत-अफगानिस्तान संबंध

  • भारत और अफगानिस्तान के बीच पारंपरिक रूप से मज़बूत और मैत्रीपूर्ण संबंधों के साथ-साथ घनिष्ट तकनीकी, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध रहे हैं।
  • भारत और अफगानिस्तान के बीच संबंधों की जानकारी सिंधु घाटी सभ्यता से मिलती है।
  • वर्ष 1980 के दशक में सोवियत गणराज्य समर्थित डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान को मान्यता देने वाला भारत एकमात्र गणतंत्र देश था।
  • हालाँकि वर्ष 1990 के अफगान गृहयुद्ध और तालिबान सरकार के दौरान दोनों देशों के बीच आपसी संबंध प्रभावित हुए थे।

भारत के लिये अफगानिस्तान का महत्त्व

  • अफगानिस्तान एशिया के चौराहे पर स्थित होने के कारण रणनीतिक महत्त्व रखता है क्योंकि यह दक्षिण एशिया को मध्य एशिया और मध्य एशिया को पश्चिम एशिया से जोड़ता है।
  • भारत का संपर्क ईरान, अज़रबैजान, तुर्कमेनिस्तान तथा उज़्बेकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के माध्यम से होता है। इसलिये अफगानिस्तान भारत के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • अफगानिस्तान भू-रणनीतिक दृष्टि से भी भारत के लिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और मध्य एशिया के बीच स्थित है जो व्यापार की सुविधा भी प्रदान करता है।
  • यह देश रणनीतिक रूप से तेल और गैस से समृद्ध मध्य-पूर्व और मध्य एशिया में स्थित है जो इसे एक महत्त्वपूर्ण भू-स्थानिक स्थिति प्रदान करता है।
  • अफगानिस्तान पाइपलाइन मार्गों के लिये महत्त्वपूर्ण स्थान बन जाता है। साथ ही अफगानिस्तान कीमती धातुओं और खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भी समृद्ध है।

क्या भारत को भेजनी चाहिये अपनी सेना?

  • वर्ष 2001 में तालिबान की समाप्ति के बाद से ही भारत अफगानिस्तान का सबसे बड़ा क्षेत्रीय भागीदार बनकर उभरा है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, भारत ने अब तक अफगानिस्तान को 3 बिलियन डॉलर से अधिक की आर्थिक सहायता प्रदान की है।
  • भारत ने अफगानिस्तान में कुछ प्रमुख ढाँचागत परियोजनाओं की शुरुआत की है और साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में अफगानिस्तान की क्षमता निर्माण में भी मदद की है।
  • इनके अलावा बामयान प्रांत में बंद-ए-अमीर तक सड़क संपर्क, परवान प्रांत में चारिकार शहर के लिये जलापूर्ति नेटवर्क और मजार-ए-शरीफ में पॉलीटेक्नीक के निर्माण में भी भारत सहयोग दे रहा है।
  • अफगानिस्तान में भारत के इतने बड़े निवेश को देखते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अफगानिस्तान में शांति स्थापित करना भारत के लिये बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत सक्रिय सैन्य हस्तक्षेप नहीं करता है तो अमेरिकी सेना की वापसी के पश्चात् वे आतंकवादी कश्मीर घाटी के रास्ते भारत आकर राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिये यह अधिक विवेकपूर्ण होगा कि उन आतंकियों से अपने क्षेत्र में संघर्ष करने के बजाय भारत पहले ही उन्हें अफगानिस्तान में चुनौती दे।
  • भारत अंतर्राष्ट्रीय पटल पर एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरना चाहता है और अफगानिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप भारत को यह अवसर प्रदान कर सकता है। साथ ही इसके माध्यम से भारत को विदेशी धरती पर सैन्य अभियान संचालित करने का अनुभव भी प्राप्त होगा।

प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप के विपक्ष में तर्क

  • भारत के सुरक्षा और रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अफगानिस्तान में प्रत्यक्ष रूप से सैन्य हस्तक्षेप न करने का निर्णय पूरी तरह से सही है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अफगानिस्तान में विदेशी शक्तियों द्वारा सैनिकों की तैनाती से विनाशकारी परिणाम सामने आए हैं और भारत इसे अच्छी तरह से समझता है।
  • सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि सैन्य हस्तक्षेप के कारण भारत ने आम अफगानी नागरिकों और अफगानिस्तान के प्रमुख नेताओं के मध्य जो ख्याति अर्जित की है वह भी लगभग समाप्त हो जाएगी।
  • यदि भारत अफगानिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप करता है तो यह भारत को एक लगातार बढ़ती हुई सैन्य प्रतिबद्धता की ओर लेकर जाएगा और अफगानिस्तान के संघर्ष के इतिहास पर गौर करें तो यह बिलकुल भी भारत के हित में नहीं है।
  • यदि भारत अफगानिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप करता है तो भारत को संसाधनों की कमी की चुनौती का भी सामान करना पड़ेगा।

आगे की राह

  • यदि अमेरिका और तालिबान के मध्य शांति वार्ता सफल रहती है और अफगानिस्तान से अमेरिका अपनी सेना को वापस बुला लेता लेता है तो इससे अफगानिस्तान पर एक बार फिर से तालिबान का राज कायम हो जाएगा, जो कि स्पष्ट तौर पर भारत के हित में नहीं है।
  • गौरतलब है कि क्षेत्रीय सहयोग के लिये अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देश में शांति कायम होना बेहद ज़रूरी है। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि एक पड़ोसी के रूप में भारत को अफगानिस्तान का साथ मिलता रहे। इसके लिये अफगानिस्तान में विकास कार्यों के अलावा भारत को अफगानिस्तान सहित अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने की ज़रूरत है।
  • जहाँ तक प्रश्न अफगानिस्तान की सुरक्षा का है तो भारत को चाहिये कि वह इस मुद्दे पर रूस और चीन से संवाद करने का प्रयास करे। एक अन्य उपाय यह हो सकता है कि यदि भारत चाहे तो संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से भी अफगानिस्तान में अपनी सेना भेज सकता है, लेकिन इसके लिये संयुक्त राष्ट्र को नेतृत्व की कमान संभालनी होगी।

प्रश्न: अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता के परिप्रेक्ष्य में चर्चा कीजिये कि क्या भारत को अफगानिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप करना चाहिये या नहीं?


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