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एडिटोरियल

  • 06 Sep, 2022
  • 15 min read
नीतिशास्त्र

जीवन कौशल का महत्त्व

यह एडिटोरियल 01/09/2022 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित “Life skills: The missing link between education and employment” लेख पर आधारित है। इसमें शिक्षा और रोज़गार के बीच की खाई को पाटने में जीवन कौशल की भूमिका के बारे में चर्चा की गई है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिये एक ऐतिहासिक पहल थी, जिसमें शिक्षा क्षेत्र में गहन सुधार और एक प्रणालीगत बदलाव का आह्वान किया गया था। इस नवीन नीति में जीवन कौशल (Life Skills) को पाठ्यक्रम के अंग के रूप में शामिल करने की अनुशंसा की गई जहाँ दृष्टिकोण यह है कि हमारी भावी पीढ़ियों के समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित करने के लिये शिक्षा को महज शैक्षणिक परिणामों तक सीमित नहीं रहना चाहिये बल्कि हमें इससे आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

संयोग से यह नीति एक ऐसे समय सामने आई जब दुनिया कोवि-19 महामारी की चपेट में थी। स्वास्थ्य संकट इस समयावधि की विशिष्टता थी और समग्र रूप से शिक्षा एवं सीखने के अवसरों को हो रही हानि को प्रकट कर रही थी।

यूनिसेफ द्वारा वर्ष 2019 में जारी एक रिपोर्ट में यह कहा गया कि वर्ष 2030 में दक्षिण एशिया के आधे से अधिक युवाओं के पास न तो ऐसी शिक्षा होगी और न ही कौशल कि वे रोगार पा सकें यह आकलन हमारे भविष्य की गंभीर वास्तविकता को उजागर करता है।

भारत की समस्या केवल बेरोगारी नहीं है, बल्कि रोज़गार पा सकने की अयोग्यता भी है। 650 मिलियन भारतीय 25 वर्ष से कम आयु के हैं, जो विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी है, यह एक अनूठी स्थिति को प्रकट करता है। अगले तीन दशकों में वृद्धिशील वैश्विक कार्यबल का लगभग 22% भारत से उत्पन्न होगा। उपयुक्त हस्तक्षेप के साथ इस जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को सरलता से एक संवहनीय/सतत् अवसर में परिवर्तित किया जा सकता है।

जीवन कौशल/लाइफ स्किल से क्या तात्पर्य है?

  • परिचय:
    • जीवन कौशल क्षमताओं, उपागमों और सामाजिक-भावनात्मक दक्षताओं का एक समूह है जो व्यक्तियों को स्वस्थ एवं उत्पादक जीवन जीने के लिये सीखने, सूचित निर्णय लेने व अधिकारों का प्रयोग करने में तथा फिर बाद में परिवर्तन के अभिकर्त्ता बनने में सक्षम बनाता है।
    • जीवन कौशल, युवाओं में जीवन की वास्तविकताओं का सामना करने के लिये मानसिक स्वास्थ्य एवं क्षमता को प्रोत्साहित करते हैं।
    • ये कौशल साक्षरता, संख्यात्मक ज्ञान, डिजिटल कौशल जैसे मूलभूत कौशल के विकास का समर्थन करते हैं साथ ही शिक्षा में लैंगिक समानता, पर्यावरण शिक्षा, शांति शिक्षा या विकास के लिये शिक्षा, आजीविका एवं आय सृजन और सकारात्मक स्वास्थ्य संवर्द्धन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भी इनका उपयोग किया जा सकता है।
    • जीवन कौशल युवाओं को अपने समुदायों में भागीदारी करने, निरंतर सीखने की प्रक्रिया से संलग्न होने, स्वयं की रक्षा करने और स्वस्थ एवं सकारात्मक सामाजिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिये सकारात्मक कार्रवाई करने हेतु सशक्त बनाता है।

भारतीय संदर्भ में जीवन कौशल की आवश्यकता

  • स्थिति के प्रति अनुकूल:
    • बच्चों के लिये समय प्रबंधन कौशल, विद्यार्थियों के लिये आत्म-जागरूकता संबंधी कौशल, पारस्परिक संबंध कौशल आदि परिस्थितियों के अनुकूल स्वयं को ढालने, दृढ़ बने रहने और जीवन का लगातार पुनर्मूल्यांकन एवं पुनर्संरचण करने की दक्षता प्रदान करते हैं।
  • छात्रों के लिये स्थितियों को समझने और संबोधित करने का अवसर:
    • आलोचनात्मक चिंतन कौशल (Critical thinking skills) छात्रों को उपलब्ध सूचना और तथ्यों के आधार पर स्थितियों को समझने और संबोधित करने की अनुमति देता है।
    • आलोचनात्मक चिंतन में किसी समस्या की रूपरेखा तैयार करने और प्रभावी समाधान विकसित करने के लिये तथ्यों, सूचनाओं एवं अन्य डेटा को व्यवस्थित और संसाधित करना शामिल है।
  • रचनात्मक चिंतन कौशल:
    • रचनात्मक चिंतन कौशल (Creative Thinking Skills) हमें किसी भी विषय पर नए परिप्रेक्ष्य और नए दृष्टिकोण से पुनर्विचार करने का अवसर देता है।
    • यह एक अभिनव चिंतन प्रक्रिया है जो उत्साहजनक परिणाम प्राप्त करने तथा कार्यों को नए तरीके से करने में सक्षम बनाता है।
    • नए विचारों के सृजन के लिये रचनात्मक चिंतन को पार्श्व चिंतन या विचार-मंथन की अनुपूरकता प्रदान की जा सकती है।
  • मज़ोर ज्ञान समाज:
    • ज्ञान किसी उत्पादक समाज का मूल है, हालाँकि समस्याओं को हल करने के लिये आलोचनात्मक चिंतन कौशल को सीखने और उसे प्रवर्तित करने की क्षमता (जहाँ दोनों को ‘कौशल’ के रूप में परिभाषित किया गया है) ज्ञान के संचय से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।
    • यह क्षमता व्यक्तियों को अविष्कार तथा नवाचार करने में सहायता करती है, जिससे सामाजिक एवं आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।
    • भारतीय बच्चों और किशोरों में लर्निंग/सीखने की कला अथवा क्षमता, विश्लेषणात्मक कौशल तथा मानवाधिकारों (लैंगिक समानता सहित) के ज्ञान के बारे में समझ तथा वैचारिक स्पष्टता का निम्न स्तर पाया जाता है।
      • राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (National Achievement Survey- NAS), राज्यस्तरीय लर्निंग उपलब्धि सर्वेक्षण (State Learning Achievement Surveys- SLAS), शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (Annual Status of Education Report- ASER) और अंतर्राष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम (Programme for International Student Assessment- PISA) आदि कुछ वृहत् स्तरीय आकलन हैं जिन्होंने आठ वर्ष की शिक्षा के बाद भी बच्चों में भाषा और गणित सीखने के खराब स्तर की ओर लगातार ध्यान आकर्षित किया है।
  • मानव पूंजी का ह्रास:
    • एक कमज़ोर ज्ञान समाज अपने सदस्यों द्वारा अवसरों को हासिल करने और एक उत्पादक समाज के निर्माण में लर्निंग/सीखने की क्षमता के महत्त्व को समझने एवं उसे लागू कर सकने की क्षमता को भी प्रभावित करता है।
    • यह स्वास्थ्य, शिक्षा तथा जीवन की संभावनाओं में असमानताओं को बढ़ावा दे रहा है और भारत के कुछ राज्यों एवं क्षेत्रों में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से नज़र आता है।
    • देश कई भौगोलिक क्षेत्रों में चरम गरीबी और निम्न विकास की स्थिति का अनुभव कर रहा है, जहाँ युवाओं में उत्पादक रोज़गार एवं आजीविका के लिये आवश्यक कौशल मौज़ूद नहीं है और गतिशील बाज़ार की बदलती मांगों के अनुरूप प्रमुख दक्षताओं के अभाव के साथ ही कार्यबल में तैयारी व उत्साह की कमी है।
  • असमानता:
    • स्वतंत्रता के बाद की कालावधि में भी भारत में असमानता और बहिर्वेशन की स्थिति बनी रही, जिसका कारण गहराई से अपनी जड़ें जमा चुकी सामाजिक (जैसे जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक और लिंग) और वर्ग आधारित संरचनाएँ हैं। ये लोगों के लिये अवसरों को स्थिर एवं सीमित करती हैं, उन्हें व्यवस्थित रूप से उन अधिकारों, अवसरों और संसाधनों का लाभ उठाने से रोकती हैं जो आमतौर पर समाज के सभी सदस्यों के लिये उपलब्ध होते हैं।
    • इन समूहों के भीतर, बालिकाओं के साथ लैंगिक आधार पर और भी अधिक भेदभाव किया जाता है। इन असमानताओं का स्तर विभिन्न क्षेत्रों और भू-भागों में पर्याप्त रूप से भिन्न-भिन्न भी है।

आगे की राह

  • एक ‘साझा शब्दावली’ (Common Vocabulary) का निर्माण करना:
    • एक सहमत शब्दावली और मूल्यांकन ढाँचे के बिना भारत में जीवन कौशल वितरण को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाना संभव नहीं है।
    • इसे सक्षम करने का सबसे सार्थक तरीका यह होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर एक साझा शब्दावली का विकास किया जाए।
      • यदि वर्ष 2005 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (National Curriculum Framework- NCF) ने अकादमिक दक्षताओं के लिये एक आधार रेखा के निर्माण में मदद की थी तो NEP 2020 द्वारा परिकल्पित नई रूपरेखा से अपेक्षा है कि वह यही भूमिका जीवन कौशल शिक्षा के मामले में करे। इसके लिये बुनियादी कार्रवाई शुरू हो चुकी है।
      • ‘लाइफ स्किल्स कोलैबोरेटिव’ (Life Skills Collaborative- LSC) बहु-क्षेत्रीय विशेषज्ञता वाले 30 संगठनों का एक संघ है जो राज्य सरकारों और शैक्षिक संस्थानों के सहयोग में कार्य कर रहा है। इसने जीवन कौशल से संबंधित प्रमुख शब्दों/पदों का एक शब्दकोष और जीवन कौशल प्रशिक्षण हेतु एक रूपरेखा तैयार करने में पिछले 18 माह व्यतीत किये हैं।
  • मूल्यांकन उपकरण का सृजन:
    • एक प्रबल मूल्यांकन उपकरण हमें जीवन कौशल प्रशिक्षण के प्रत्येक ढाँचे के प्रभाव का आकलन करने और सबसे प्रभावी ढाँचे को प्रवर्तित करने की दिशा में हमारे प्रयासों को व्यवस्थित करने में मदद करेगा।
      • उदाहरण के लिये, ‘यंग वॉरियर एनएक्सटी’ (Young Warrior NXT) के तहत 15 अलग-अलग पायलट अभियानों में तैनात ‘फ्यूचर रेडीनेस’ (Future Readiness) मूल्यांकन साधन को नामांकन, संलग्नता और शिक्षार्थी प्रतिसूचना (learner feedback) के तीन प्रमुख आयामों में तुलनीय मूल्यांकन व प्रज्ञता प्रदान करने के लिये अभिकल्पित किया गया था।
      • यह संवहनीयता और भविष्य की मापनीयता को सूचित करेगा, जो लाखों छात्रों तक पहुँच रखने वाले शिक्षा विभागों में बड़े प्रणालीगत बदलावों के प्रबंधन के लिये विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
  • जीवन कौशल पर क्यूरेटिंग सामग्री:
    • सभी के लिये आयु-उपयुक्त, प्रासंगिक और संदर्भगत शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराना 21वीं सदी के लिये जीवन कौशल के निर्माण की आधारशिला होगी।
    • कई ई-लर्निंग समाधान (जो सबसे बुनियादी शैक्षणिक विषयों पर उच्च गुणवत्तायुक्त शिक्षण सामग्री को एकत्रित करते हैं) ने वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने का कार्य किया है।
    • जीवन कौशल पर सामग्री को क्यूरेट करने का ऐसा ही एक समाधान बड़े पैमाने पर जीवन कौशल के लेनदेन में निवेश करने वाले हितधारकों को वृहत् रूप से लाभान्वित कर सकता है। यह न केवल युवाओं को अपनी स्वयं की प्रज्ञता (लर्निंग) का प्रभार लेने में सक्षम करेगा, बल्कि पारितंत्र में मौजूदा प्रयासों पर आगे बढ़ने और इस क्षेत्र में लर्निग विशेषज्ञों के साथ सहयोग करने के अवसर भी प्रदान करेगा।
  • मौजूदा तंत्र का उपयोग:
    • जीवन कौशल के बड़े पैमाने पर वितरण के लिये मौजूदा स्कूल प्रणालियों और व्यावसायिक प्रशिक्षण अवसंरचना का लाभ उठाया जाना चाहिये।
      • भारत में 10 मिलियन से अधिक शिक्षक और 1.5 मिलियन से अधिक स्कूल मौजूद हैं, जो एक महत्त्वपूर्ण संपत्ति आधार और वितरण चैनल है जिसका दोहन किया जा सकता है।
      • हालाँकि यह ध्यान रखना भी महत्त्वपूर्ण है कि शिक्षक पहले से ही कार्य बोझ से दबे हैं और कोविड काल में हुई शिक्षा की हानि की भरपाई का दबाव तंत्र पर अत्यधिक भार डाल रहा है।
    • इसलिये, यह आवश्यक है कि हम मुख्यधारा के पाठ्यक्रम के भीतर जीवन कौशल प्रशिक्षण के वितरण को सक्षम करने के लिये शैक्षणिक ढाँचे, पाठ योजनाओं और मूल्यांकन उपकरणों के साथ शिक्षकों की पर्याप्त सहायता, समर्थन और मार्गदर्शन करें।

अभ्यास प्रश्न: महामारी ने भारत की युवा बेरोज़गारी दर में वृद्धि की है जिससे रोज़गार बाज़ार में उनकी पहले से ही असुरक्षित स्थिति और भी अनिश्चित हो गई है। इस प्रसंग में शिक्षा और रोज़गार के बीच की खाई को पाटने में जीवन कौशल की भूमिका की विवेचना कीजिये।


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