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एडिटोरियल

  • 04 Oct, 2022
  • 13 min read
कृषि

कृषि-रसायन: वरदान या अभिशाप

यह एडिटोरियल 01/10/2022 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “Let The Land Heal: Why minimising chemical farm input has become an urgent necessity” लेख पर आधारित है। इसमें रासायनिक उर्वरकों एवं पीड़कनाशकों के उपयोग को न्यूनतम करने की आवश्यकता और अन्य संबंधित समाधानों के संबंध में चर्चा की गई है।

संदर्भ

भारत में बहुसंख्यक आबादी के लिये कृषि आजीविका का प्रमुख स्रोत बनी हुई है और कृषि-रसायन (Agrochemicals), यानी रासायनिक उर्वरक और पीड़कनाशक इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। हरित क्रांति के बाद से संश्लेषित उर्वरकों और पीड़कनाशकों के उपयोग में कई गुना वृद्धि आई है।

  • वर्तमान में भारत विश्व में कृषि-रसायनों के प्रमुख उत्पादकों में से एक है। लेकिन संश्लेषित उर्वरकों एवं पीड़कनाशकों के गैर-वैज्ञानिक और अत्यधिक उपयोग ने न केवल पर्यावरण एवं कृषि भूमि के जीवन को क्षति पहुँचाई है, बल्कि इसने खाद्य शृंखला में भी प्रवेश कर लिया है जिससे पादप, मानव और पशु स्वास्थ्य प्रभावित हो रहे हैं।
  • पारिस्थितिक गतिशीलता पर नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिये उर्वरकों और पीड़कनाशकों के उपयोग को कम किया जाना चाहिये और इनके संवहनीय विकल्पों का पता लगाया जाना चाहिये।

उर्वरक एवं पीड़कनाशक उपयोग की वर्तमान स्थिति

  • उर्वरक (Fertilisers): वित्त वर्ष 2020 के दौरान भारत ने लगभग 61 मिलियन टन उर्वरक की खपत की जिसमें यूरिया की हिस्सेदारी 55% थी। वित्त वर्ष 2011 में यह आँकड़ा बढ़कर 65 मिलियन टन तक होने का अनुमान है।
    • वर्तमान में देश का उर्वरक उत्पादन 42-45 मिलियन टन है, जबकि लगभग 18 मिलियन टन उर्वरक का आयात किया जाता है।
    • प्रत्येक संयंत्र में उत्पादन लागत के आधार पर यूरिया उर्वरक के लिये केंद्र द्वारा सब्सिडी का भुगतान किया जाता है। उर्वरक निर्माताओं के लिये सरकार के अधिकतम खुदरा मूल्य (MSP) पर अपने उत्पाद बेचना आवश्यक है।
  • पीड़कनाशक (Pesticides): भारत में पीड़कनाशकों को कीटनाशी अधिनियम, 1968 (Insecticides Act, 1968) और कीटनाशी नियम, 1971 (Insecticides Rules, 1971) के माध्यम से विनियमित किया जाता है।
    • कीटनाशक (Insecticides), शाकनाशी (Herbicides), कृंतकनाशक (Rodenticides) और कवकनाशी (Fungicides) पीड़कनाशक (Pesticides) के प्रमुख प्रकार हैं।
    • भारतीय पीड़कनाशक बाज़ार वर्ष 2021 में लगभग 212 बिलियन रुपये मूल्य तक पहुँच गया और वर्ष 2027 तक इसके 320 बिलियन रुपये तक पहुँचने का अनुमान है।

संवहनीय/सतत खेती के लिये सरकार की हाल की पहलें

उर्वरकों और पीड़कनाशकों से संबद्ध मुद्दे

  • उर्वरकों का अनुपयुक्त उपयोग: देश के 525 ज़िलों में से 292 ज़िले ((56%) कुल उर्वरक उपयोग में 85% हिस्सेदारी रखते हैं। इसके अलावा, उर्वरक की खपत का अनुपात यूरिया की ओर अधिक झुका हुआ है।
    • चूँकि इस पर कोई नियंत्रण नहीं है कि सब्सिडीयुक्त उर्वरक की खरीद कौन कर सकता है और कितनी मात्रा में कर सकता है, खेती में उर्वरकों का उपयोग बढ़ गया है, साथ ही यूरिया कई अन्य उद्योगों (जैसे डेयरी, वस्त्र, पेंट, मत्स्य पालन आदि) की ओर मोड़ा जा रहा है।
      • उर्वरकों के अति उपयोग से उनके प्रति फसल प्रतिक्रिया में गिरावट आई है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता और किसानों की लाभप्रदता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
  • जैव आवर्धन (Biomagnification): कृत्रिम उर्वरकों में उपयोग किये जाने वाले रसायनों में अत्यधिक जहरीले पदार्थ मौजूद होते हैं जिसके परिणामस्वरूप जीवों के ऊतकों में विषाक्त पदार्थों का संचयन (जिसे जैव आवर्धन कहा जाता है) होता है जिससे उनके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है।
  • ‘डेड ज़ोन’ का निर्माण: रासायनिक उर्वरकों में फॉस्फेट, नाइट्रेट आदि तत्व मौजूद होते हैं जो मृदा में अप्रयुक्त रूप से शेष रह जाते हैं। ये तटीय जल, झीलों और नदियों की ओर अपवाहित हो सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सुपोषण या यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) की स्थिति बनती है। 
    • यह जल निकायों में शैवाल के विकास को उत्प्रेरित करता है। शैवाल विघटित होने से पहले जल के ऑक्सीजन को समाप्त कर देते हैं जिससे इस पारितंत्र की अन्य प्रजातियों के लिये अस्तित्व बनाए रखना कठिन हो जाता है और यहाँ एक मृत क्षेत्र या डेड ज़ोन (dead zones) का निर्माण होता है।
  • मृदा स्वास्थ्य में गिरावट: कृषि रसायनों के अति उपयोग से मृदा के अम्लीकरण की स्थिति बन सकती है, इस प्रकार मृदा में जैविक पदार्थ (ह्यूमस सामग्री) की मात्रा कम हो जाती है जिससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है और यहाँ तक कि इससे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की स्थिति बनती है।
  • पीड़कनाशकों का अनुपयुक्त उपयोग: पीड़कनाशकों के आनुपातिक उपयोग के बारे में वैज्ञानिक जागरूकता की कमी के कारण भारत में बड़ी संख्या में किसान अत्यधिक मात्रा में पीड़कनाशकों का उपयोग करते हैं।
    • इसके अलावा, भारत में पीड़कनाशक लाइसेंसिंग और विपणन में अंतरविभागीय सहयोग और समन्वय के साथ ही उचित विनियमन का अभाव है। एक आकलन के अनुसार भारत में अभी भी 104 से अधिक ऐसे पीड़कनाशकों का उत्पादन/उपयोग किया जाता है जिन्हें विश्व में दो या दो से अधिक देशों में अब प्रतिबंधित कर दिया गया है।

आगे की राह

  • जैव-उर्वरकों का समावेश: जैव उर्वरकों (जैसे राइज़ोबियम) के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिये क्योंकि वे लागत प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल होते हैं तथा जब भी उनकी बड़ी मात्रा में आवश्यकता हो उन्हें खेतों में ही उत्पन्न किया जा सकता है। वे फसल पैदावार को 10-40% तक बढ़ा सकते हैं और नाइट्रोजन को 40-50 किलोग्राम तक स्थिर करते हैं।
  • वर्ष भर भू-आच्छादन सुनिश्चित करना: कटाव-प्रवण क्षेत्रों में किसान परती समय के दौरान भूमि संरक्षी सस्य (Cover Crops) या बारहमासी प्रजातियाँ लगा सकते हैं जिससे उनका संरक्षण सुनिश्चित होगा। उल्लेखनीय है कि फसल मौसमों के बीच की अवधि में जब भूमि परती पड़ी होती है तब कटाव और क्षति (जल अपवाह का शिकार होने) के लिये सर्वाधिक संवेदनशील होती है।
    • इसके अलावा, खेतों के किनारों पर वृक्षों, झाड़ियों और घासों को रोपा जा सकता है। विशेष रूप से जल निकायों के आसपास स्थित खेतों के लिये यह उपाय किया जाना महत्त्वपूर्ण है।
      • इस तरह के बफ़र खेतों के पोषक तत्वों को अवशोषित या फ़िल्टर कर इनके जल निकाय में बह जाने से होने वाली क्षति को कम कर कर सकते हैं।
  • ग्रामीण उर्वरक बैंक (Rural Fertiliser Banks): ग्रामीण उर्वरक बैंक स्थापित कर उर्वरकों के उपयोग को विनियमित किया जा सकता है। उर्वरक खरीद के लिये आधार-लिंक्ड खातों को अनिवार्य बनाया जा सकता है, जबकि बिक्री के डिजिटल रिकॉर्ड रखे जाने चाहिये जिनका उपयोग फसल निगरानी (Crop Surveillance) के समय किया जा सकता है।
    • इसके साथ ही नैनो-यूरिया को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
  • क्रॉप ऑडिट और किसान जागरूकता: उर्वरकों और कीटनाशकों की सामग्री का पता लगाने के लिये समय-समय पर विशेषज्ञों द्वारा पंचायत स्तरीय क्रॉप ऑडिट किया जाना चाहिये। इसके साथ ही, किसानों को उर्वरक और कीटनाशकों के आनुपातिक उपयोग के बारे में सूचित करने के लिये विभिन्न जागरूकता कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
  • जैविक कृषि की ओर: रसायन-मुक्त कृषि की दिशा में एक धीमी लेकिन उल्लेखनीय संक्रमण की आवश्यकता है। इसके साथ ही, प्राकृतिक खाद के उपयोग, फसल रोटेशन, इंटरक्रॉपिंग, जैविक कीट नियंत्रण जैसे प्राकृतिक और जैविक तरीकों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जो कम ऊर्जा की खपत करता है, नाइट्रोजन अपवाह प्रेरित प्रदूषण को कम करता है और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिये एक अग्रणी योद्धा की भूमिका निभा सकता है।

अभ्यास प्रश्न: खेती में कृषि-रसायनों के प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए भारत द्वारा संवहनीय खेती की ओर आगे बढ़ सकने हेतु आवश्यक उपायों के सुझाव दें।

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रारंभिक परीक्षा

Q. पर्माकल्चर कृषि पारंपरिक रासायनिक कृषि से कैसे अलग है? (वर्ष 2021)

  1. पर्माकल्चर कृषि एकल-फसल प्रथाओं को हतोत्साहित करती है लेकिन पारंपरिक रासायनिक कृषि में एकल-फसल प्रथाएँ प्रमुख हैं।
  2. पारंपरिक रासायनिक कृषि से मिट्टी की लवणता में वृद्धि हो सकती है लेकिन पर्माकल्चर खेती में ऐसी घटना नहीं देखी जाती है।
  3. अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में पारंपरिक रासायनिक कृषि आसानी से संभव है लेकिन ऐसे क्षेत्रों में पर्माकल्चर कृषि इतनी आसानी से संभव नहीं है।
  4. पर्माकल्चर खेती में मल्चिंग का अभ्यास बहुत महत्त्वपूर्ण है लेकिन पारंपरिक रासायनिक खेती में ऐसा ज़रूरी नहीं है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।

 (A) 1 और 3
 (B) 1, 2 और 4
 (C) केवल 4
 (D) 2 और 3

 उत्तर: (B)


मुख्य परीक्षा

Q. चावल-गेहूँ प्रणाली को सफल बनाने के लिए कौन से प्रमुख कारक ज़िम्मेदार हैं?  इस सफलता के बावजूद भारत में यह व्यवस्था कैसे अभिशाप बन गई है?  (वर्ष 2020)


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