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एडिटोरियल

  • 01 Aug, 2020
  • 13 min read
जीव विज्ञान और पर्यावरण

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन: चुनौतियाँ और महत्त्व

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने वाले कुछ गैर-सरकारी संगठनों और पर्यावरणविदों ने यह आरोप लगाया है कि सरकार के द्वारा लाया गया पर्यावरणीय प्रभाव आकलन मसौदा, 2020 ( Environmental Impact assessment Draft) पर्यावरण प्रभाव आकलन के मूल प्रावधानों को कमज़ोर करता है, जो पर्यावरण को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।

पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 में बदलाव करने के लिये लाया गया यह नया मसौदा पर्यावरण विरोधी है। एक पर्यावरण कार्यकर्ता द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की गई याचिका में कहा गया था कि केंद्र सरकार की तरफ से अधिसूचना में आपत्तियों को आमंत्रित करने की अवधि को 60 दिनों तक बढ़ा दिया गया, लेकिन सरकार के द्वारा यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है कि 60 दिनों की अवधि कब शुरू होगी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को वर्ष 2020 के लिये पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment-EIA) की अधिसूचना के संबंध में आपत्तियाँ और सुझाव देने की अंतिम तिथि को लेकर स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया है। 

इस आलेख में पर्यावरण प्रभाव आकलन, उसके प्रभाव, पर्यावरणीय अनुमोदन की प्रक्रिया तथा पर्यावरण प्रभाव आकलन मसौदा, 2020 से जुडी समस्याओं का अध्ययन करने का प्रयास किया जाएगा। 

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन से तात्पर्य 

  • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन भारत की पर्यावरणीय निर्णय लेने की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जिसमें प्रस्तावित परियोजनाओं के संभावित प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।   
  • EIA किसी प्रस्तावित विकास योजना में संभावित पर्यावरणीय समस्या का पूर्व आकलन करता है और योजना के निर्माण व प्रारूप निर्माण के चरण में उससे निपटने के उपाय करता है।
  • यह योजना निर्माताओं के लिये एक उपकरण के रूप में उपलब्ध है, ताकि विकासात्मक गतिविधियों और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच समन्वय स्थापित हो सके।
  • इन रिपोर्टों के आधार पर पर्यावरण मंत्रालय या अन्य प्रासंगिक नियामक निकाय किसी परियोजना को मंज़ूरी दे सकते हैं अथवा नहीं।
  • भारत में EIA का आरंभ वर्ष 1978-79 में नदी-घाटी परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन से हुआ और कालांतर में इसके दायरे में उद्योग, ताप विद्युत परियोजनाएँ आदि को भी शामिल किया गया।
  • भारत में EIA प्रक्रिया अनुवीक्षण, बेसलाइन डेटा संग्रहण, प्रभाव आकलन, शमन योजना EIA रिपोर्ट, लोक सुनवाई आदि चरणों में संपन्न होती है।

पृष्ठभूमि

  • पर्यावरण पर स्टॉकहोम घोषणा (1972) के एक हस्ताक्षरकर्ता के रूप में भारत ने जल प्रदूषण (1974) और वायु प्रदूषण (1981) को नियंत्रित करने के लिये शीघ्र ही कानून बनाए। लेकिन वर्ष 1984 में भोपाल गैस रिसाव आपदा के बाद ही देश ने वर्ष 1986 में पर्यावरण संरक्षण के लिये एक अम्ब्रेला अधिनियम बनाया। 

स्टॉकहोम घोषणा (1972)

  • अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण चेतना एवं पर्यावरण आंदोलन के प्रारंभिक सम्मेलन के रूप में 1972 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में दुनिया के सभी देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में 119 देशों ने भाग लिया और एक ही धरती के सिद्धांत को सर्वमान्य तरीके से मान्यता प्रदान की गई। 
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत, भारत ने वर्ष 1994 में अपने पहले EIA मानदंडों को अधिसूचित किया, जो प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, उपभोग और (प्रदूषण) को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को विनियमित करने के लिये एक विधिक तंत्र स्थापित करता है। प्रत्येक विकास परियोजना को पहले पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करने के लिये EIA प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक है।

EIA

EIA के पूर्व मानदंड की समस्याएँ  

  • पर्यावरण की सुरक्षा के लिये स्थापित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन प्रक्रिया पूर्व में भी कई बार संदेह के घेरे में रही है। उदाहरण के लिये, पर्यावरण पर परियोजनाओं के संभावित हानिकारक प्रभावों से संबंधित EIA प्रक्रिया का आधार प्रायः कम दक्ष सलाहकार एजेंसियाँ ​​होती हैं जो इसका प्रयोग कर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं तथा सरकार को वास्तविक रिपोर्ट नहीं उपलब्ध करती हैं।
  • अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये प्रशासनिक क्षमता का अभाव समस्या को और अधिक कठिन  बना देता है।
  • दूसरी ओर, परियोजना के निर्माणकर्ताओं की शिकायत है कि EIA प्रक्रिया ने उदारीकरण की भावना को न्यून कर दिया है, जिससे लालफीताशाही और नौकरशाही को बढ़ावा मिला है। वर्ष 2014 में परियोजनाओं के पर्यावरणीय अनुमोदन में देरी चुनावी मुद्दा बनकर उभरी थी।

 पर्यावरणीय प्रभाव आकलन मसौदे के प्रावधान

  • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन मसौदा, 2020 EIA प्रक्रिया पर लालफीताशाही और नौकरशाही के लिये कोई ठोस उपाय नहीं करता है। इसके अतिरिक्त, यह पर्यावरण सुरक्षा में सार्वजनिक सहभागिता को सीमित करते हुए सरकार की विवेकाधीन शक्ति को बढ़ाने का प्रस्ताव करता है।
  • राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा से जुड़ीं परियोजनाओं को रणनीतिक माना जाता है, हालाँकि सरकार अब इस अधिसूचना के ज़रिये अन्य परियोजनाओं के लिये भी ‘रणनीतिक’ शब्द का प्रयोग कर रही है।
  • नये मसौदे के तहत उन कंपनियों या उद्योगों को भी क्लीयरेंस प्राप्त करने का मौका दिया जाएगा जो इससे पहले पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करती आ रही हैं इसे ‘पोस्ट-फैक्टो प्रोजेक्ट क्लीयरेंस’ कहते हैं
  • इस मसौदे में यह कहा गया है कि सरकार इस तरह के उल्लंघनों का संज्ञान लेगी। हालाँकि ऐसे पर्यावरणीय उल्लंघन या तो सरकार या फिर खुद कंपनी द्वारा ही रिपोर्ट किये जा सकते हैं।
  • नये मसौदे के तहत पर्यावरण अधिनियम का उल्लंघन करने वाली परियोजनाएँ भी अब मंज़ूरी के लिये आवेदन कर सकेंगी। यह बिना मंज़ूरी के संचालित होने वाली परियोजनाओं के लिये मार्च, 2017 की अधिसूचना का पुनर्मूल्यांकन है।

प्रस्तावित मसौदे की समस्याएँ

  • किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में सरकार को ऐसे कानूनों पर जनता की राय लेनी होती है, जिससे बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने की संभावना होती है और कानून के प्रावधानों में उन्हें भागीदार बनाना होता है, परंतु प्रस्तावित मसौदे में सरकार ने जनता के सुझावों के लिये तय समयसीमा को कम करने का प्रयास किया।        
  • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन से संबंधित नई अधिसूचना पर्यावरण को बचाने के संदर्भ में लोगों के अधिकारों को छीनकर उनकी भूमिका को बहुत कम करती है। 
  • सरकार ने प्रस्तावित मसौदे के ज़रिये अन्य परियोजनाओं के लिये भी ‘रणनीतिक’ शब्द का प्रयोग किया है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन मसौदा, 2020 के तहत अब ऐसी परियोजनाओं के बारे में कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी, जो इस श्रेणी में आती हैं। 
    • इसकी सबसे बड़ी हानि यह है कि अब पर्यावरण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाली विभिन्न परियोजनाओं के लिये रास्ता खुल जाएगा। उद्योग ऐसी परियोजनाओं को ‘रणनीतिक’ बताकर आसानी से अनुमति ले लेंगे। 
  • इसके अतिरिक्त नया मसौदा विभिन्न परियोजनाओं की एक बहुत लंबी सूची पेश करती है जिसे जनता के साथ विचार-विमर्श के दायरे से बाहर रखा गयाउदाहरण के तौर पर देश की सीमा पर स्थित क्षेत्रों में सड़क या पाइपलाइन जैसी परियोजनाओं के लिये सार्वजनिक सुनवाई की आवश्यकता नहीं होगी। 
  • एक चिंता यह भी है कि विभिन्न देशों की सीमा से 100 कि.मी. की हवाई दूरी वाले क्षेत्र को ‘बॉर्डर क्षेत्र’ के रूप में परिभाषित किया गया हैइसके कारण उत्तर-पूर्व का अधिकांश क्षेत्र इस परिभाषा के दायरे में आ जाएगा, जहाँ पर देश की सबसे घनी जैव विविधता पाई जाती है
    • इसके अंतर्गत सभी अंतरदेशीय जलमार्ग परियोजनाओं और राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण को EIA मसौदे के तहत मंजूरी लेने के दायरे से बाहर रखा गया है
  • सरकार के यह सारे प्रावधान पर्यावरण संरक्षण के लिये बने मूल कानून के साथ ही गंभीर विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न करते हैं। 

निष्कर्ष 

पर्यावरणीय मानदंडों में परिवर्तन से स्थानीय वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, साथ ही व्यक्ति की आज़ीविका को खतरा उत्पन्न हो सकता है, घाटी में बाढ़ आ सकती है और जैव-विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। सरकार को पर्यावरणविदों के द्वारा रेखांकित की गई चिंताओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिये। मानवीय जीवन के गरिमामयी विकास के लिये स्वच्छ पर्यावरण अति आवश्यक है।  

प्रश्न- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन से आप क्या समझते हैं? प्रस्तावित नये मसौदे के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख करते हुए उनसे संबंधित चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये।


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