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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

पर्यावरण प्रभाव आकलन की प्रासंगिकता

  • 30 Aug 2018
  • 11 min read

संदर्भ

हाल ही में दिल्ली में पुनर्विकास परियोजना कानूनी अड़चनों और पर्यावरणीय अनुमोदन संबंधी कारणों से चर्चा का कारण बनी रही। दरअसल, लगातार चल रहे ‘पेड़ बचाओ अभियान’ के कारण, आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय ने लोगों को आश्वासन दिया है कि इस परियोजना की पुनः समीक्षा की जाएगी। उल्लेखनीय है कि इस परियोजना में आवासीय कॉलोनियों का विशाल वाणिज्यिक सुविधाओं के रूप में निर्माण तथा दक्षिणी दिल्ली के नौरोजी नगर के स्थान पर अब वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बनाना शामिल है। इस लेख में पर्यावरण प्रभाव आकलन से संबंधित जानकारी के अलावा, उन तीन तरीकों का उल्लेख किया गया है जिसके द्वारा इन परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) प्रक्रिया का उपयोग नागरिकों के अधिकार को ध्यान में रखते हुए बेहतर पर्यावरण के निर्माण के लिये किया जा सकता है। 

पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)

  • EIA रिपोर्ट भारत की पर्यावरणीय निर्णय लेने की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जिसमें उन्हें प्रस्तावित परियोजनाओं के संभावित प्रभावों का विस्तृत अध्ययन माना जाता है।
  • EIA किसी प्रस्तावित विकास योजना में संभावित पर्यावरणीय समस्या का पूर्व आकलन करता है और योजना के निर्माण व प्रारूप निर्माण के चरण में उससे निपटने के उपाय करता है।
  • यह योजना निर्माताओं के लिये एक उपकरण के रूप में उपलब्ध है, ताकि विकासात्मक गतिविधियों और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच समन्वय स्थापित हो सके।
  • इन रिपोर्टों के आधार पर पर्यावरण मंत्रालय या अन्य प्रासंगिक नियामक निकाय किसी परियोजना को मंज़ूरी दे सकते हैं अथवा नहीं।
  • भारत में EIA का आरंभ 1978-79 में नदी-घाटी परियोजनाओं के प्रभाव आकलन से हुआ और कालांतर में इसके दायरे में उद्योग, ताप विद्युत परियोजनाएँ आदि को भी शामिल किया गया।
  • भारत में EIA प्रक्रिया अनुवीक्षण, बेसलाइन डेटा संग्रहण, प्रभाव आकलन, शमन योजना EIA रिपोर्ट, लोक सुनवाई आदि चरणों में संपन्न होती है।

EIA के लाभ 

  • स्वस्थ स्थानीय पर्यावरण विकास में सहायक। 
  • पर्यावरण मानकों का पालन। 
  • पर्यावरण की हानि या आपदाओं में कम जोखिम।
  • जैव विविधता का रख-रखाव।
  • सूचित निर्णयन के कारण संसाधनों के उपयोग में कमी।
  • समुदायों की भागीदारी में वृद्धि तथा सतत् विकास की सुनिश्चितता।

पुनर्विकास परियोजनाओं में पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) की प्रक्रिया का उपयोग नागरिकों के अधिकारों  को ध्यान में रखते हुए बेहतर पर्यावरण के निर्माण हेतु किया जा सकता है। इससे संबंधित तीन उपाय हो सकते हैं जो निम्न प्रकार से हैं-

गैर-नीतिगत मामलों में सुधार 

  • माना जा रहा है कि उपर्युक्त पुनर्विकास परियोजनाओं की EIA रिपोर्ट सबसे खराब संभव अनुसंधान प्रथाओं और नीतियों का एक अभ्यास है।
  • उल्लेखनीय है कि नौरोजी नगर परियोजना के सलाहकार ने कॉपीराइट किये गए कागज़ात, वेबपृष्ठों और अन्य EIA रिपोर्टों से सामग्री का उपयोग किया है जिसमें उल्लेख किया गया है कि NBCC को सौंपे जाने से एक साल पूर्व इस परियोजना से जुड़े जल की गुणवत्ता संबंधी अध्ययन-2015 किया गया था।
  • यह रिपोर्ट कॉपीराइट पुस्तक (2015) की सामग्री की एक कार्बनकॉपी है, जिसका शीर्षक "जलवायु परिवर्तन के युग में जल, ऊर्जा और जैव संसाधन प्रबंधन: उभरते मुद्दे और चुनौतियाँ" है ।
  • पर्यावरण मंत्रालय की विफलता के चलते EIA की इस तरह की शोध प्रथाएँ  निरंतर जारी हैं।
  • अतः इस प्रकार की अनुसंधान प्रथाओं और नीतियों को दुरुस्त करके नागरिकों हेतु एक स्वस्थ्य पर्यावरण की कल्पना की जा सकती है।

  • NBCC की स्थापना आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय के अधीन भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व में एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के रूप में नवंबर 1960 में हुई थी ।
  • तब से लेकर अब तक सिविल इंजीनियरिंग के सभी पहलुओं पर परियोजना प्रबंधन परामर्शदाता और संविदाकार की हैसियत से इसने भारत में और विदेश में कई गुना वृद्धि की है और निर्माण कंपनी के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की है।
  • कंपनी ने वर्ष 1988 में स्थावर संपदा कारोबार में कदम रखा और उसके बाद से बाज़ार में उल्लेखनीय प्रगति की है।
  • वास्तव में NBCC स्थावर संपदा में कदम रखने वाला पहला केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है।
  • वर्तमान में NBCC स्थावर संपदा में कार्यरत भारत सरकार की एकमात्र कंपनी है।
  • स्थावर संपदा व्यापार में आवासीय, वाणिज्यिक और संस्थागत परियोजनाओं का विकास भी शामिल है।

भ्रामक और त्रुटिपूर्ण जानकारियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही 

  • भ्रामक और त्रुटिपूर्ण जानकारी इन परियोजनाओं के संभावित प्रभाव को कम करती है। उदाहरण के लिये नौरोजी नगर हेतु EIA की 'संदर्भ की शर्तें' (TOR), जो अनिवार्य रूप से एक वाणिज्यिक परियोजना है, "वाणिज्यिक" शब्द का उल्लेख करने में विफल रही है।
  • संदर्भ की शर्तों में EIA रिपोर्ट के लिये एक विस्तृत यातायात प्रभाव विश्लेषण शामिल करने की आवश्यकता है, लेकिन यह भी गायब है।
  • साथ ही इस रिपोर्ट में कई पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक विरासत स्थलों, जो निर्माण से प्रभावित होंगे, का उल्लेख नहीं किया गया है।
  • EIA अधिसूचना, 2006 में उल्लेखित है कि "जानबूझकर छिपाने और/या झूठी या भ्रामक जानकारी या डेटा जमा करने पर आवेदन को अस्वीकार किया सकता है या अनुमोदन को रद्द किया जा सकता है।
  • हालाँकि, मंत्रालय ने इन परियोजनाओं के खिलाफ उपर्युक्त आधार पर कोई कठोर कदम नहीं उठाया है, क्योंकि इसका मतलब शहरी विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण परियोजना को रोकना होगा।
  • हालाँकि, भ्रामक और त्रुटिपूर्ण जानकारियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही किये बिना इन परियोजनाओं को पर्यावरण और लोगों के अनुकूल नहीं बनाया जा सकता।

सार्वजनिक परामर्श की अनिवार्यता 

  • अधिकांश परियोजनाओं के लिये EIA -आधारित अनुमोदन में सार्वजनिक सुनवाई करने की प्रक्रिया भी शामिल है ताकि परियोजना को मंज़ूरी देने के फैसले से पूर्व प्रभावित होने वाले लोगों के विचारों पर बोर्ड द्वारा निर्णय लिया जा सके।
  • ऐसी दुनिया में जहाँ पर्यावरणीय गिरावट और सामाजिक संघर्ष से कई चुनौतीपूर्ण स्थितियाँ जन्म ले रही हैं, विद्वानों को सार्वजनिक भागीदारी को विकास के लिये  "प्रारंभिक शर्त" के रूप में वरीयता देनी चाहिये।
  • हालाँकि, यह निराशाजनक है कि सरकार ने उदारतापूर्वक रियल एस्टेट परियोजनाओं को सार्वजानिक सुनवाई से मुक्त कर दिया है।
  • गौरतलब है कि दिल्ली की "पुनर्विकास" परियोजनाओं को सार्वजनिक परामर्श के बिना ही मंज़ूरी दे दी गई थी, इसलिये EIA के बारे में नागरिकों द्वारा उठाई गई किसी भी समस्या पर उपलब्ध करायी जाने वाली कोई भी जानकारी, बाद में प्रदान की जाने वाली जानकारी के समान होगी।

आगे की राह 

उपर्युक्त आधार पर कहा जा सकता है कि नागरिक आंदोलनों और मुकदमेबाज़ी ने इन परियोजनाओं के समर्थकों और शहरी विकास मंत्रालय पर दवाब बनाया है कि वे वृक्ष गिरने को कम करने या रोकने के लिये अपनी योजनाओं में आवश्यक संशोधन करें। हालाँकि, यह प्रतिक्रिया न तो पर्याप्त है और न ही कानूनी रूप से स्वीकार्य है। इस संदर्भ दिल्ली उच्च न्यायालय जो कि इस मामले की सुनवाई कर रहा है, को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि ये पुनर्विकास परियोजनाएँ एक एकीकृत कानून के अनुसार अनुमोदन के लिये दोबारा लागू हों। इसके साथ ही इन दोषों को देखते हुए ‘रणनीतिक पर्यावरण आकलन’ पर विचार किया जा सकता है, जो अवधारणा चरण में ही आयोजित होता है और इस प्रकार अग्रसक्रिय होता है। एक स्वतंत्र राष्ट्रीय पर्यावरण विनियामक की स्थापना भी की जा सकती है, जो EIA प्रक्रिया की निगरानी करे। साथ ही EIA पेशेवरों के प्रशिक्षण, प्रक्रियाओं पर मार्गदर्शन की व्यवस्था और अनुसंधान पर बल देना चाहिये। 

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