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डेली न्यूज़

  • 31 Mar, 2020
  • 53 min read
भूगोल

आर्द्रता स्तर एवं COVID-19

प्रीलिम्स के लिये:

निरपेक्ष आर्द्रता, सापेक्ष आर्द्रता

मेन्स के लिये:

आर्द्रता के प्रकार 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (Massachusetts Institute of Technology- MIT) के शोधकर्त्ताओं द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार मानसून के समय में COVID- 19 का प्रभाव कम हो सकता है। 

मुख्य बिंदु:

  • अध्ययन के अनुसार, कोरोनावायरस नमी के प्रति संवेदनशील होता है तथा नमी के मध्यम स्तर पर इसके पनपने की संभावना कम होती है।
  • अध्ययन के अनुसार, 3-9 ग्राम/घन मीटर की औसत आर्द्रता सीमा वाले क्षेत्रों, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कई यूरोपीय देश शामिल है, में COVID -19 संक्रमण के मामलों की अधिकतम संख्या दर्ज की गई है।
  • सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और कतर जैसे गर्म तथा आर्द्र देशों में तुलनात्मक रूप से अधिक वायरस टेस्ट कराने के बाद भी संक्रमित लोगों की संख्या कम पाई गई है, तथा ऐसी संभावना है कि गर्म एवं आर्द्र मौसम वायरस के प्रसार को धीमा कर देता है।

पूर्व में किये गए अध्ययन: 

  • वर्ष 2018 के एक अध्ययन के अनुसार, जब सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity- RH) 85% से अधिक होती है तो इन्फ्लूएंजा तथा कोरोनावायरस के प्रसार में वृद्धि तथा जब RH 60% से नीचे रहती है तो कमी देखी जाती है। 
  • वर्ष 2010 में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, स्टेनलेस स्टील सतह पर इस वायरस के जीवित रहने की क्षमता का परीक्षण करने पर पाया गया कि 4°C पर संक्रामक वायरस 28 दिनों तक बना रहा जबकि 20% RH पर निष्क्रियता का स्तर निम्नतम पाया गया। 
  • इस अध्ययन के अनुसार वायरस 5 से 28 दिनों के मध्य जीवित रहता है तथा कम RH पर वायरस अधिक सक्रिय पाया गया। 

शोध का महत्त्व: 

  • यह भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देशों को इस महामारी को रोकने वाली शमन रणनीतियों को अपनाने में मदद कर सकता है।

आर्द्रता (Humidity): 

  • हवा में मौजूद जलवाष्प को आर्द्रता कहते हैं। मात्रात्मक दृष्टि से इसे विभिन्न प्रकार से व्यक्त किया जाता है।

निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute humidity): 

  • वायुमंडल में मौज़ूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहा जाता है। 
  • यह हवा के प्रति इकाई आयतन में जलवाष्प का वजन है एवं इसे ग्राम प्रति घनमीटर के रूप में व्यक्त किया जाता है। 
  • हवा द्वारा जलवाष्प को ग्रहण करने की क्षमता पूरी तरह से तापमान पर निर्भर होती है। 
  • निरपेक्ष आर्द्रता पृथ्वी की सतह पर अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग होती है। 

सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity- RH):

  • दिये गए तापमान पर अपनी पूरी क्षमता की तुलना में वायुमंडल में मौजूद आर्द्रता के प्रतिशत को सापेक्ष आर्द्रता कहा जाता है। 
  • हवा के तापमान के बदलने के साथ ही आर्द्रता को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है तथा सापेक्ष आर्द्रता भी प्रभावित होती है। 
  • यह महासागरों के ऊपर सबसे अधिक तथा महाद्वीपों के ऊपर सबसे कम होती है।
  • एक निश्चित तापमान पर जलवाष्प से पूरी तरह पूरित हवा को संतृप्त कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि हवा इस स्थिति में दिये गए तापमान पर और अधिक आर्द्रता को ग्रहण करने में सक्षम नहीं होती है।

स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

‘फोर्स मेजर’ के तहत रेलवे शुल्क पर राहत

प्रीलिम्स के लिये:

‘फोर्स मेजर’

मेन्स के लिये:

COVID-19 से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने हेतु भारत सरकार के प्रयास

चर्चा में क्यों?

हाल ही में रेल मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 22 मार्च, 2020 से 14 अप्रैल, 2020 तक के समय को ‘फोर्स मेजर’ (Force Majeure) के रूप में माना जायेगा और इस दौरान भारतीय रेलवे से जुड़ी कुछ सेवाओं के लिये कोई भी शुल्क नहीं लगाया जायेगा।

मुख्य बिंदु: 

  • ‘फोर्स मेजर’ (Force Majeure): 
    • केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने 19 फरवरी, 2020 को COVID-19 महामारी को ‘Force Majeure’ के रूप में स्वीकार करने की घोषणा की थी। 
    • वित्त मंत्रालय के अनुसार, ‘Force Majeure’ से आशय ऐसी असाधारण घटनाओं और परिस्थितियों से है, जो मानव नियंत्रण से परे हों। साथ ही वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कोरोनावायरस को प्राकृतिक आपदा माना जाना चाहिये और इसके लिये ‘फोर्स मेजर’ के प्रावधानों का उपयोग किया जा सकता है। 
    • वित्त मंत्रालय के अनुसार, इसके तहत सरकारी अनुबंध से जुड़ी वे कंपनियाँ जो आपूर्ति के लिये प्रभावित इलाकों पर निर्भर हैं, पर अनुबंध की शर्तें न पूरी कर पाने पर कोई दंड या अन्य नकारात्मक कार्यवाही नहीं की जाएगी। 
    • ‘फोर्स मेजर’ से संबंधित नियम ‘भारतीय संविदा अधिनियम, 1872’ की धारा 32 और 56 के तहत निर्धारित किये गए हैं। 
  • 27 मार्च, 2020 रेल मंत्रालय दी गई जानकारी के अनुसार, वित्त मंत्रालय द्वारा 19 फरवरी को की गई घोषणा को ध्यान में रखते हुए 22 मार्च, 2020 से 14 अप्रैल, 2020 तक ढुलाई सेवाओं से जुड़े कई प्रकार के शुल्क नहीं लिये जाएंगे। जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं- 
    1. विलंब-शुल्क (Demurrage)
    2. घाट या लोडिंग स्टेशन का सेवा शुल्क (Wharfage)
    3. स्टैकिंग (Staking) चार्ज
    4. पार्सल के आवागमन पर विलंब-शुल्क (Demurrage on parcel traffic)
    5. कंटेनर यातायात के मामले में भू-उपयोग शुल्क
  • गौरतलब है कि 23 मार्च, 2020 को रेलवे बोर्ड ने निर्देश जारी किये थे कि 24 मार्च, .2020 से 30 अप्रैल, 2020 तक खाली कंटेनरों/खाली फ्लैट वैगनों की आवाजाही के लिये कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा।

पृष्ठभूमि:

  • ध्यातव्य है कि देश में COVID-19 के बढ़ते मामलों को देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने 24 मार्च 2020 को पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन लागू करने की घोषणा की थी।
  • प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद पूरे भारत में सभी प्रकार की औद्योगिक गतिविधियों यातायात (सड़क, रेल, हवाई यात्रा) आदि पर रोक लगा दिया गया था। 
  • परंतु इस दौरान ‘अति आवश्यक वस्तुओं’ (Essential Commodities) की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये कुछ मालवाहक सेवाओं जैसे-रेलवे द्वारा तेल या अन्य वस्तुओं की ढुलाई को जारी रखा गया है। 

अतिआवश्यक वस्तुओं’ की आपूर्ति में रेलवे का योगदान: 

  • रेल मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में लगभग 1.6 लाख रेलवे डिब्बों/बोगियों के माध्यम से पूरे भारत में आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई की जा रही है। 
  • रेल मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वर्तमान में प्रतिदिन औसतन लगभग 25000 बोगियों (Wagons) के माध्यम से अति आवश्यक वस्तुओं जैसे-दूध, अनाज, खाद्य तेल, चीनी, सब्ज़ियाँ, फल और नमक आदि की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। 
  • इसके अतिरिक्त प्रतिदिन लगभग 20000 बोगियों का उपयोग कोयला और लगभग 1700 बोगियों का उपयोग पेट्रोलियम पदार्थों की ढुलाई के लिये किया जा रहा है।
  • रेल मंत्रालय के अनुसार, COVID-19 के कारण लागू हुए अनेक प्रतिबंधों के बीच आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति के लिये रेलवे राज्य सरकारों के साथ समन्वय बनाये हुए है।
  • साथ ही रेलवे तंत्र पर आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आवाजाही के लिये रेल मंत्रालय में एक ‘इमरजेंसी फ्रेट कंट्रोल’ (Emergency Freight Control) काम कर रहा है और वरिष्ठ स्तर पर अधिकारियों द्वारा माल ढुलाई पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। 

स्रोत: पीआईबी


शासन व्यवस्था

COVID-19 की निगरानी हेतु जीपीएस का प्रयोग

प्रीलिम्स के लिये:

जीपीएस ट्रैकिंग, COVID-19 

मेन्स के लिये:

स्वास्थ्य क्षेत्र पर COVID-19 के प्रभाव, स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीकी का प्रयोग  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में बृहन्मुंबई नगर निगम (Brihanmumbai Municipal Corporation- BMC) ने क्षेत्र में COVID-19 के उच्च संवेदनशीलता क्षेत्रों और इन क्षेत्रों में COVID-19 से संक्रमित लोगों की निगरानी के लिये जीपीएस (GPS) आधारित आँकड़ों का उपयोग करने का निर्णय लिया है।

मुख्य बिंदु:

  • BMC के अनुसार, लॉकडाउन और क्वारंटाइन (Quarantine) के तहत लागू प्रतिबंधों के उल्लंघन और COVID-19 के सामुदायिक प्रसार की आशंका को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
  • BMC की योजना के तहत उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों और संक्रमित लोगों की बेहतर निगरानी कर COVID-19 के प्रसार को नियंत्रित किया जाएगा।
  • BMC के अनुसार, शीघ्र ही इस ट्रैकर (Tracker) को निगम की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाएगा।

पृष्ठभूमि:

  • 30 मार्च, 2020 को शहर के घनी आबादी वाले वर्ली-कोलीवाडा (Worli-Koliwada) क्षेत्र में 8 लोगों के कोरोनावायरस से संक्रमित पाए जाने के बाद पुलिस द्वारा इस क्षेत्र में लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई थी।
  • साथ ही BMC के आँकड़ों के अनुसार, 30 मार्च, 2020 को मुंबई महानगर क्षेत्र में कोरोनावायरस संक्रमण के 47 नए मामले सामने आए थे। 
  • BMC के अनुसार, वर्तमान में संक्रमित लोगों और उनके परिसर क्षेत्रों के प्रति भेदभाव तथा अनावश्यक भय को कम करने के लिये कोरोनावायरस से संक्रमित व्यक्तियों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।
  • अभी तक कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों के बारे में जारी आँकड़ों में केवल उनकी आयु, लिंग और आवासीय क्षेत्र की जानकारी ही सार्वजनिक की जा रही थी। 

जीपीएस (GPS) ट्रैकिंग के लाभ: 

  • जीपीएस ट्रैकर के माध्यम से संक्रमित लोगों की गतिविधियों की बेहतर निगरानी की जा सकेगी। 
  • BMC के अनुसार, जीपीएस आधारित आँकड़ों के माध्यम से लोगों को ऐसे क्षेत्रों से दूर रहने के बारे में चेतावनी दी जा सकेगी जहाँ कोरोनावायरस के संक्रमण का खतरा अधिक होगा।
  • इन आँकड़ों का प्रयोग वार्ड के अधिकारियों (Ward Officers) द्वारा भी किया जायेगा, इन आँकड़ों के माध्यम से वार्ड अधिकारी ऐसे क्षेत्रों में लोगों की गतिविधियों को नियंत्रित करने के साथ-साथ अतिआवश्यक वस्तुओं जैसे- दवाई, राशन आदि की अनिवार्य होम डिलीवरी (Home Delivery) को सुनिश्चित कर सकेंगे।

COVID-19 के नियंत्रण के अन्य प्रयास: 

  • COVID-19 संक्रमण मामलों की बढ़ती संख्या के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ रहे दबाव को कम करने के लिये मेडिकल छात्रों को अस्पतालों में तैनात करने का निर्णय लिया गया है।
  • इसके तहत शहर के चार मेडिकल कॉलेजों से अंतिम वर्ष के मेडिकल छात्रों और दूसरे तथा तीसरे वर्ष के नर्सिंग छात्रों (Nursing Students) को अस्पतालों में सेवाएँ देने के लिये लगाया जाएगा।
  • इन छात्रों को सार्वजनिक अस्पतालों के बाह्य रोगी विभाग (Outpatient Department- OPD) और अस्पतालों के प्रशासनिक कार्यों के लिये लगाया जाएगा।
  • साथ ही अस्पतालों की भीड़ कम करने तथा उपलब्ध आइसोलेशन (Isolation) बेड का बेहतर प्रयोग करने के लिये संक्रमित लोगों के लक्षणों और उम्र के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँटा जाएगा। जो निम्नलिखित हैं-
    1. बगैर लक्षण (Asymptomatic) और सह रुग्णता के 55 वर्ष की आयु से कम के लोग। 
    2. बगैर लक्षण या हलके लक्षण वाले 55 वर्ष की आयु से अधिक के लोग। 
    3. स्पष्ट लक्षण वाले 55 वर्ष की आयु से अधिक के लोग।

लाभ:   

  • BMC के अनुसार, इस तरह तीन श्रेणियों में विभाजित कर स्थिर रोगियों के लिये संघरोध केंद्रों (Quarantine Centres) पर आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकेंगी।
  • साथ ही इस प्रक्रिया के तहत अस्पतालों में भीड़ कम कर गंभीर मरीज़ों को बेहतर चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो सकेगी। 

स्रोत:  द इंडियन एक्सप्रेस


शासन व्यवस्था

पीएम-केयर्स फंड

प्रीलिम्स के लिये:

पीएम-केयर्स फंड, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष

मेन्स के लिये:

COVID-19 से निपटने हेतु गठित किये गए कोष से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सरकार ने COVID-19 महामारी द्वारा उत्पन्न किसी भी प्रकार की आपातकालीन या संकटपूर्ण स्थिति से निपटने हेतु ‘आपात स्थितियों में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और राहत कोष (Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund)’ की स्थापना की है। 

कोष के बारे में:

  • PM-CARES Fund एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट (Public Charitable Trust) है जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री है। अन्य सदस्यों के रूप में रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री शामिल हैं।
  • कोष में राशि की सीमा निर्धारित नही की गई है जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग योगदान करने में सक्षम होंगे।
  • कोष आपदा प्रबंधन क्षमताओं को मज़बूत एवं नागरिकों की सुरक्षा हेतु अनुसंधान को प्रोत्साहित करेगा।

कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी के तहत योगदान:

(Corporate Social Responsibility-CSR)

  • कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) ने स्पष्ट किया है कि PM-CARES Fund में CSR के तहत कंपनियों को योगदान देना अनिवार्य है।
  • कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत, CSR का प्रावधान उन कंपनियों पर लागू होता है, जिनका कुल मूल्य (Net Worth) 500 करोड़ रुपए से अधिक हो या कुल कारोबार (Turnover) 1000 रुपए करोड़ से अधिक हो या शुद्ध लाभ (Net Profit) 5 करोड़ रुपए से अधिक हो।
  • CSR के तहत उपरोक्त कंपनियों को अपने पिछले तीन वर्षों के शुद्ध लाभों के औसत का 2% योगदान करना आवश्यक है।

प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष के बारे में:

(Prime Minister’s National Relief Fund)

  • पाकिस्तान से विस्थापित लोगों की मदद करने के लिये जनवरी, 1948 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की अपील पर जनता के अंशदान से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की स्थापना की गई थी।
  • प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की धनराशि का इस्तेमाल अब प्रमुखतया बाढ़, चक्रवात और भूकंप आदि जैसी प्राकृतिक आपदाओं में मारे गए लोगों के परिजनों तथा बड़ी दुर्घटनाओं एवं दंगों के पीड़ितों को तत्काल राहत पहुँचाने के लिये किया जाता है।
  • इसके अलावा, हृदय शल्य-चिकित्सा, गुर्दा प्रत्यारोपण, कैंसर आदि के उपचार के लिये भी इस कोष से सहायता दी जाती है।
  • यह कोष केवल जनता के अंशदान से बना है और इसे कोई भी बजटीय सहायता नहीं मिलती है। समग्र निधि को अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों तथा अन्य संस्थाओं में विभिन्न रूपों में निवेश किया जाता है।
  • कोष से धनराशि प्रधानमंत्री के अनुमोदन से वितरित की जाती है। प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष का गठन संसद द्वारा नहीं किया गया है। इस कोष की निधि को आयकर अधिनियम के तहत एक ट्रस्ट के रूप में माना जाता है और इसका प्रबंधन प्रधानमंत्री अथवा विविध नामित अधिकारियों द्वारा राष्ट्रीय प्रयोजनों के लिये किया जाता है।
  • प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष को आयकर अधिनियम 1961 की धारा 10 और 139 के तहत आयकर रिटर्न भरने से छूट प्राप्त है।
  • प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष के अध्यक्ष होते हैं और अधिकारी/कर्मचारी अवैतनिक आधार पर इसके संचालन में उनकी सहायता करते हैं। 
  • प्रधान मंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में किये गये अंशदान को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80 (छ) के तहत कर योग्य आय से पूरी तरह छूट हेतु अधिसूचित किया जाता है। 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


शासन व्यवस्था

ईपीएफ खातों से निकासी

प्रीलिम्स के लिये:

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, ईपीएफ खातों से निकासी मापदंड में छूट के नियम, उमंग एप

मेन्स के लिये:

COVID-19 से निपटने हेतु ईपीएफ खातों से निकासी मापदंड में छूट के नियम से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय (Labour and Employment Ministry) ने ‘कर्मचारी भविष्य निधि (Employees’ Provident Funds-EPF) योजना’ में संशोधन कर जमा धनराशि को निकालने की अनुमति दी है। 

प्रमुख बिंदु:

  • COVID-19 की रोकथाम के लिये ‘लॉकडाउन’ की वजह से लोगों को राहत देने को लेकर यह कदम उठाया गया है।
  • कर्मचारी भविष्य निधि नियमनों में संशोधन कर खातों से कुल राशि के 75% का गैर-वापसी योग्य अग्रिम या तीन माह का पारिश्रमिक, इनमें से जो भी कम हो, प्राप्‍त करने की अनुमति दी गई है। 
  • EPF के तहत पंजीकृत चार करोड़ कामगारों के परिवार इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं।
  • EPF योजना के दायरे में आने वाले देश भर में कारखानों और विभिन्न प्रतिष्ठानों में कार्यरत कर्मचारी इस राशि को निकालने के लिये पात्र हैं। इसके लिये EPF योजना, 1952 के पैरा 68 एल में उप-पैरा (3) को जोड़ा गया है।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन:

  • यह भारत सरकार का एक राज्य प्रोत्साहित अनिवार्य अंशदायी पेंशन तथा बीमा योजना प्रदान करने वाला संगठन है।
  • कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की स्थापना 15 नवम्बर, 1951 को कर्मचारी भविष्य निधि अध्यादेश के जारी होने के साथ हुई थी। इस अध्यादेश को कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम 1952 द्वारा बदला गया था।
  • कर्मचारी भविष्य निधि बिल को संसद में वर्ष 1952 के बिल संख्या 15 के रूप में लाया गया ताकि कारखानों तथा अन्य संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के भविष्य निधि की स्थापना के प्रावधान हो सके। 
  • इस संगठन के प्रबंधकों में केंद्रीय न्यासी मंडल, केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों के प्रतिनिधि, नियोक्ता एवं कर्मचारी शमिल होते हैं।
  • इस संगठन की अध्यक्षता भारत सरकार के केंद्रीय श्रम एवं रोज़गार मंत्री द्वारा की जाती है।

उमंग एप (Umang App): 

  • उमंग एप की सहायता से सभी बड़ी सरकारी सेवाओं को एक प्लेटफॉर्म पर एक्सेस करने में आसानी होगी। वर्तमान में इस कार्य के लिये वेब, एस.एम.एस. एवं आई.वी.आर. जैसी व्यवस्थाओं का प्रयोग किया जा रहा है।
  • इस एप में आधार, डिजीलॉकर, भारत बिल पेमेंट सिस्टम जैसी बहुत सी महत्त्वपूर्ण सुविधाएँ भी शामिल की गई हैं।
  • इतना ही नहीं उमंग एप को कर का भुगतान करने, एल.पी.जी. सिलेंडर की बुकिंग करने तथा पी.एफ. एकाउंट इत्यादि डिजिटल सुविधाओं के संदर्भ में इस्तेमाल किया जा सकता है।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की प्रमुख योजनाएँ:

  • कर्मचारी भविष्य निधि (Employees’ Provident Fund-EPF), 1952
  • कर्मचारी पेंशन योजना (Employment Pension Scheme-EPS), 1995
  • बीमा योजना (Insurance Scheme), 1976

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय अर्थव्यवस्था

कॉरपोरेट दिवालियापन से निपटने हेतु प्रारंभिक सीमा में बढ़ोतरी

प्रीलिम्स के लिये:

कोरोना वायरस, MCA-21

मेंस के लिये:

कोरोना वायरस से निपटने हेतु भारत सरकार के प्रयास

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने कॉरपोरेट दिवालियापन की कार्यवाई शुरू करने हेतु प्रारंभिक सीमा (Insolvency Threshold) को 1 लाख रुपए से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपए करने की घोषणा की है। 

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि यह कदम कोरोना वायरस के प्रकोप (Corona Virus Outbreak) के दौरान कंपनियों पर अनुपालन बोझ को कम करने और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को दिवालिया होने से रोकने के लिये किया गया है। 
  • इस कदम से कंपनियों को मौजूदा व्यावसायिक परिस्थितियों में कंपनियों और पेशेवरों पर बोझ को कम करने तथा व्यावसायिक ज़रूरतों को तत्काल पूरा करने की अनुमति मिलेगी। 
  • यदि 30 अप्रैल तक कोरोना वायरस की वज़ह से उत्पन्न परिस्थितियों में सुधार न होने पर सरकार छह महीने के लिये कंपनियों के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने पर रोक लगा सकती है।
  • गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के MCA-21 पोर्टल के साथ अनिवार्य फाइलिंग पर स्थगन की घोषणा की है। इस अवधि के दौरान अनिवार्य फाइलिंग देर से दाखिल करने पर आरोपित अतिरिक्त शुल्क को भी हटा दिया गया है।
    • MCA-21, भारत सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs- MCA) की एक ई-गवर्नेंस पहल है, जो कॉर्पोरेट संस्थाओं, पेशेवरों और नागरिकों को मंत्रालय की सेवाओं की आसान और सुरक्षित पहुँच के लिये सक्षम बनाता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, दिवाला कार्यवाई की शुरुआत हेतु प्रारंभिक सीमा में वृद्धि से मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्यमों (MSMEs) को आवश्यक सुरक्षा प्राप्त होगी।
  • कंपनी अधिनियम के तहत 'कम-से-कम एक निदेशक के वर्ष में कम-से-कम 182 दिनों तक देश में निवास करने' की आवश्यक शर्त से भी कंपनियों को बाहर रखा जाएगा।

दिवाला एवं दिवालियापन हेतु सामान्य कार्य प्रक्रिया

  • अगर कोई कंपनी कर्ज वापस नहीं चुकाती तो ‘दिवाला एवं दिवालियापन कानून’ (IBC) के तहत कर्ज़ वसूलने के लिये उस कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है।
  • इसके लिये नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की विशेष टीम कंपनी से बात करती है और कंपनी के मैनेजमेंट के राजी होने पर कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है। 
  • इसके बाद उसकी पूरी संपत्ति पर बैंक का कब्ज़ा हो जाता है और बैंक उस संपत्ति को किसी अन्य कंपनी को बेचकर अपना कर्ज वसूल सकता है।
  • IBC में बाज़ार आधारित समय-सीमा के तहत इन्सॉल्वेंसी समाधान प्रक्रिया का प्रावधान है।
  • IBC की धारा 29 में यह प्रावधान किया गया है कि कोई बाहरी व्यक्ति (थर्ड पार्टी) ही कंपनी को खरीद सकता है।

पृष्ठभूमि 

  • केंद्र सरकार ने आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम उठाते हुए एक नया दिवालियापन संहिता संबंधी विधेयक 2016 में पारित किया था। 
  • दिवाला एवं दिवालियापन संहिता,1909 के 'प्रेसीडेंसी टाउन इन्सॉल्वेन्सी एक्ट’ और 'प्रोवेंशियल इन्सॉल्वेन्सी एक्ट 1920’ को रद्द करती है तथा कंपनी एक्ट, लिमिटेड लाइबिलिटी पार्टनरशिप एक्ट और 'सेक्यूटाईज़ेशन एक्ट' समेत कई कानूनों में संशोधन करती है। 
  • दरअसल, कंपनी या साझेदारी फर्म व्यवसाय में नुकसान के चलते कभी भी दिवालिया हो सकते हैं और यदि कोई आर्थिक इकाई दिवालिया होती है तो इसका तात्पर्य यह है कि वह अपने संसाधनों के आधार पर अपने ऋणों को चुका पाने में असमर्थ है। 
  • ऐसी स्थिति में कानून में स्पष्टता न होने पर ऋणदाताओं को भी नुकसान होता है और स्वयं उस व्यक्ति या फर्म को भी तरह-तरह की मानसिक एवं अन्य प्रताड़नाओं से गुज़रना पड़ता है।

स्रोत- इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय अर्थव्यवस्था

NRIs के लिये सरकारी प्रतिभूतियाँ

प्रीलिम्स के लिये 

सरकारी प्रतिभूतियाँ 

मेन्स के लिये 

NRIs के लिये सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से संबंधित प्रावधान

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) ने 1 अप्रैल से गैर-निवासी भारतीयों को निर्दिष्ट सरकारी बॉन्ड में निवेश करने हेतु सक्षम बनाने के लिये एक अलग चैनल ‘फुली एक्सेसिबल रूट’ (Fully Accessible Route-FAR) की शुरुआत की है।

प्रमुख बिंदु

  • उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट भाषण के दौरान कहा था कि कुछ निश्चित श्रेणियों में बिना किसी प्रतिबंध के सरकारी बॉण्ड पूरी तरह से गैर-निवासी भारतीय निवेशकों के लिये खोले जाएंगे।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के अनुसार, “योग्य निवेशक किसी भी निर्दिष्ट सरकारी प्रतिभूति में निवेश कर सकते हैं। यह योजना दो मौजूदा मार्गों अर्थात मीडियम टर्म फ्रेमवर्क (Medium Term Framework-MTF) और वोलंटरी रिटेंशन रूट (Voluntary Retention Route-VRR) के साथ संचालित होगी।
  • शुरुआत के रूप में केंद्रीय बैंक ने कुछ अधिक तरल और बेंचमार्क प्रतिभूतियों को चुना है

लाभ

  • रिज़र्व बैंक के इस निर्णय से भारत सरकार के प्रतिभूति बाज़ार में गैर-निवासी भारतीयों की पहुँच को आसान किया जा सकेगा।
  • इससे सरकारी बॉन्ड में स्थिर विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
  • इस कदम से भारत को वैश्विक बॉण्ड सूचकांकों में अपना स्थान खोजने में मदद मिलेगी।
    • बाज़ार विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक बॉण्ड सूचकांकों का हिस्सा होने से भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों को प्रमुख वैश्विक निवेशकों से बड़ी धनराशि आकर्षित करने में मदद मिलेगी।

सरकारी प्रतिभूति

(Government Securities)

  • सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Sec) वे सर्वोच्च प्रतिभूतियाँ हैं जो भारत सरकार की ओर से भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा बेंची जाती हैं। 
  • ऐसी प्रतिभूतियाँ अल्पकालिक या दीर्घकालिक होती हैं।
  • अल्पकालिक: आमतौर पर एक वर्ष से भी कम समय की मेच्योरिटी वाली इन प्रतिभूतियों को ट्रेज़री बिल (Treasury Bill) कहा जाता है जिसे वर्तमान में तीन रूपों में जारी किया जाता है, अर्थात् 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन।
  • दीर्घकालिक: आमतौर पर एक वर्ष या उससे अधिक की मेच्योरिटी वाली इन प्रतिभूतियों को सरकारी बॉण्ड या दिनांकित प्रतिभूतियाँ कहा जाता है।
  • भारत में, केंद्र सरकार ट्रेज़री बिल और बॉण्ड या दिनांकित प्रतिभूतियाँ दोनों को जारी करती है, जबकि राज्य सरकारें केवल बॉण्ड या दिनांकित प्रतिभूतियों को जारी करती हैं, जिन्हें राज्य विकास ऋण (State Development Loan-SDL) कहा जाता है।

गैर-निवासी भारतीय (NRI)

  • अनिवासी भारतीय (NRI) ऐसा भारतीय पासपोर्टधारक होता है जो किसी वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 120 दिनों के लिये किसी अन्य देश में रहता है।
  • ध्यातव्य है कि 1 फरवरी, 2020 को प्रस्तुत किये गए बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आवासीय स्थिति (Residential Status) के आधार पर व्यक्तियों की कर-क्षमता का निर्धारण करने के लिये मापदंड और अवधि को संशोधित किया था। संशोधित नियमों के अनुसार, एक व्यक्ति को तब भारत का साधारण निवासी (Resident) माना जाएगा, जब वह पिछले वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 120 दिनों के लिये भारत में रहा हो, यह अवधि पूर्व में 182 दिन थी। 
  • NRIs को वोट देने का अधिकार होता है और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि उनकी केवल वही आय भारत में कर योग्य होती है, जो वे भारत में कमाते हैं। 

स्रोत: द हिंदू


जैव विविधता और पर्यावरण

हिमालयन आईबेक्स

प्रीलिम्स के लिये:

हिमालयन आईबेक्स, एलोपैट्रिक, सिम्पैट्रिक

मेन्स के लिये:

हिमालयन जैव विविधता 

चर्चा में क्यों?

‘एंडेंजर्ड स्पीशीज़ रिसर्च’ (Endangered Species Research) पत्रिका में प्रकाशित लेख के अनुसार ‘भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण’ (Zoological Survey of India- ZSI) के वैज्ञानिकों द्वारा किये गए अध्ययन में यह देखा गया है कि हिमालयन आईबेक्स (Himalayan Ibex) प्रजाति, साइबेरियन आईबेक्स (Siberian Ibex) प्रजाति से अलग तथा विशिष्ट प्रजाति है।

मुख्य बिंदु:

  • पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित ‘हिमालय अध्ययन पर राष्ट्रीय मिशन’ (National Mission on Himalayan Studies) के माध्यम से वित्त पोषित एक परियोजना के तहत, लाहौल तथा स्पीति (हिमाचल प्रदेश) में आईबेक्स पर फील्ड सर्वेक्षण किया किया तथा इसके मल के नमूने एकत्र किये गए।
  • मध्य एशिया, ताजिकिस्तान, अल्ताई पर्वत, मंगोलिया और रूस की श्रेणियों में पाई जाने वाली आईबेक्स की प्रजातियों के आनुवांशिक अनुक्रम विश्लेषण किया गया तथा इसमें यह पाया गया कि हिमालयन साइबेरियाई आईबेक्स की अन्य सभी श्रेणियों से आनुवंशिक रूप से अलग है।
  • आनुवंशिक विश्लेषण से पता चला कि साइबेरियन आईबेक्स की आनुवांशिक संरचना में प्लीस्टोसिन युग (2.4 मिलियन वर्ष पहले) में परिवर्तन आया था न कि मायोसीन-प्लायोसीन (6.6 मिलियन वर्ष) युग के दौरान।

आईबेक्स का वितरण:

  • भौगोलिक क्षेत्र:
    • साइबेरियन आईबेक्स जंगली बकरी की एक प्रजाति है जो शीत मरुस्थल, चट्टानी दृश्य भूमि, तीव्र ढाल के क्षेत्र, उच्च समतल भूमि, पर्वतीय कगार तथा पहाड़ों की तलहटी जैसे विभिन्न आवासों में निवास करती है।
  • वैश्विक वितरण: 
    • इसकी आबादी मंगोलिया से अल्ताई, हंगाई (Hangai), गोबी-अल्ताई, हुरुख पर्वत (Hurukh Mountain) जैसी पर्वत शृंखलाओं के साथ-साथ सयान पर्वत (Sayan Mountains) तक पाई जाती है तथा कुछ-कुछ आबादी ट्रांस-अल्ताई गोबी के छोटे पहाड़ों में पाई जाती है।
  • एशिया में वितरण:
    • एशिया में आईबेक्स भारत, कज़ाकिस्तान, ताजिकिस्तान, मंगोलिया, पाकिस्तान, दक्षिणी साइबेरिया तथा चीन में 500 मीटर से 6,700 मीटर की ऊँचाई के पर्वतीय आवसों में निवास करती है। 
  • भारत में वितरण:
    • भारत में आईबेक्स मुख्य रूप से लद्दाख, जम्मू-कश्मीर के ट्रांस-हिमालय पर्वत श्रेणियों तथा हिमाचल प्रदेश के सतलज नदी क्षेत्र तक पाई जाती है।

हिमालयन आईबेक्स:

  • इसे IUCN (International Union for Conservation of Nature) की लीस्ट कंसर्ड (Least Concerned) श्रेणी में रखा गया है। 
  • इसका वैज्ञानिक नाम कैप्रा सिबेरिका (Capra Sibirica) है। 
  • इसे वन्यजीव (संरक्षण अधिनियम) की सूची-1 में रखा गया है। 
  • यह भारत में मुख्यत: पिन वैली (हिमाचल प्रदेश) तथा कांजी अभयारण्य (जम्मू-कश्मीर) में पाई जाती है। 

शोध का महत्त्व:

  • इस अध्ययन से आईबेक्स के वितरण तथा विकास प्रक्रिया को समझने में मदद मिलेगी।
  • यह अध्ययन वैश्विक विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित करेगा तथा IUCN के तहत प्रजातियों का फिर से मूल्यांकन करने में मदद करेगा।
  •  भारत-ताजिकिस्तान आईबेक्स की विशिष्ट पहचान वैश्विक स्तर पर इस प्रजाति के संरक्षण को प्राथमिकता देगा।

आगे की राह:

  • वैज्ञानिक समुदाय अब यह समझने की कोशिश कर रहे है कि किस प्रकार पर्वतीय दोलन (Mountain Oscillations: पर्वतीय ऊँचाई में समय के साथ परिवर्तन) एलोपैट्रिक प्रजातियों को जन्म देता है। 

प्रजातीयकरण (Speciation):

  • प्रजातीयकरण नए प्रकार के पौधे या जानवरों की प्रजाति उत्पत्ति संबंधी अवधारणा है। प्रजातीयकरण तब होता है जब एक प्रजाति के भीतर एक समूह अपनी प्रजातियों के अन्य सदस्यों से अलग हो जाता है तथा अपनी अनूठी विशेषताओं को विकसित करता है।
  • प्रजातीयकरण के पाँच प्रकार के होते हैं, इनमें से एलोपैट्रिक तथा सिम्पैट्रिक महत्त्वपूर्ण हैं।

एलोपैट्रिक (Allopatric):

  • जलवायु परिवर्तन की एक श्रृंखला, कालिक स्थलाकृतिक रुपांतरण प्रजातियों के सतत वितरण को प्रभावित करती है तथा एलोपैट्रिक प्रजातियों को जन्म देती है क्योंकि भौगोलिक तथा प्रजनन अलगाव के कारण विशिष्ट प्रजातियों की उत्पत्ति होती है।

सिम्पैट्रिक (Sympatric):

  • यहाँ भौतिक बाधा नहीं होती परंतु नई प्रजाति, शायद एक अलग खाद्य स्रोत या विशेषता के आधार पर अकस्मात विकसित होने लगती है, अर्थात कुछ प्रजातियाँ पर्यावरण के कुछ विशिष्ट कारकों पर निर्भर हो जाते हैं, जैसे कि आश्रय या भोजन के स्रोत, जबकि अन्य प्रजातियाँ इन पर निर्भर नहीं होते हैं।

स्रोत: द हिंदू


जैव विविधता और पर्यावरण

जलवायु परिवर्तन और जल गुणवत्ता

प्रीलिम्स के लिये

विश्व जल विकास रिपोर्ट

मेन्स के लिये

भारत में जल गुणवत्ता से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (United Nations-UN) द्वारा जारी विश्व जल विकास रिपोर्ट (World Water Development Report) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन बुनियादी मानव आवश्यकताओं के लिये जल की उपलब्धता, गुणवत्ता और मात्रा को प्रभावित करेगा, जिससे जल का बुनियादी मानवाधिकार और अरबों लोगों के लिये स्वच्छ जल की उपलब्धता प्रभावित होगी।

प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से प्रेरित हाइड्रोलॉजिकल परिवर्तन (Hydrological Changes) जल संसाधनों के स्थायी प्रबंधन के लिये चुनौती को ओर बढ़ा देगा, जो पहले से ही विश्व के अधिकांश क्षेत्रों में गंभीर दबाव में हैं।
  • खाद्य सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य, शहरी और ग्रामीण जन-जीवन, ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिक विकास, आर्थिक विकास और पारिस्थितिक तंत्र सभी जल पर निर्भर हैं और इस दृष्टि से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति संवेदनशील हैं।
  • इस प्रकार जल प्रबंधन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और न्यूनीकरण सतत् विकास और सतत् विकास लक्ष्य 2030 की प्राप्ति के लिये महत्त्वपूर्ण है।

जल संसाधनों पर प्रभाव

  • रिपोर्ट के अनुसार, बीते 100 वर्षों में वैश्विक जल उपयोग बढ़ती जनसंख्या, आर्थिक विकास और स्थानांतरण खपत पैटर्न के परिणामस्वरूप लगभग 1 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से लगातार बढ़ रहा है।
  • जलवायु परिवर्तन वर्तमान में जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों की स्थिति को और गंभीर करेगा और उन क्षेत्रों में जल तनाव उत्पन्न करेगा जहाँ अभी जल संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
  • जल के उच्च तापमान और जल में मौजूद ऑक्सीजन में कमी के परिणामस्वरूप जल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे पीने योग्य जल की स्वतः शुद्धिकरण क्षमता कम हो जाएगी।
  • कई पारिस्थितिक तंत्र, विशेष रूप से वन और आर्द्रभूमि भी गंभीर खतरे में हैं। 
  • पारिस्थितिक तंत्रों के क्षरण से न केवल जैव विविधता की हानि होगी, बल्कि यह जल से संबंधित पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं जैसे कि जल शोधन, प्राकृतिक बाढ़ सुरक्षा, कृषि, मत्स्य पालन को भी प्रभावित करेगा। 
  • जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन पर अधिकांश प्रभाव उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में दिखाई देगा, जहाँ विश्व के अधिकतर विकासशील देश हैं।

खाद्य और कृषि

  • रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक खाद्य उत्पादन पैटर्न भी प्रभावित होगा, जो खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करेगा और खाद्य कीमतों में वृद्धि होगी।
  • खाद्य कीमतों में वृद्धि देश में मुख्य तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी को बढ़ावा देगी।
  • रिपोर्ट में दिये गए अनुमान के अनुसार, उत्तरी और उष्णकटिबंधीय हिस्से अधिक नम हो जाएंगे, जबकि अफ्रीका के कुछ हिस्से, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप आदि सूख जाएंगे। इस प्रकार की परिस्थिति में कृषि के पैटर्न में भी बदलाव होगा।

आगे की राह

  • जल बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं के लिये काफी महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार जल की आवश्यक मात्रा और गुणवत्ता को बनाए रखना अनिवार्य है।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित हो रही जल गुणवत्ता लगभग संपूर्ण विश्व के लिये एक चुनौतीपूर्ण विषय है।
  • आवश्यक है कि इस विषय से संबंधित सभी पक्ष एक मंच पर आकर विषय से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करें और इस संदर्भ में यथासंभव संतुलित उपायों की खोज करें।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 31 मार्च, 2020

‘प्रगयाम’ एप

झारखंड सरकार ने राज्य में लॉकडाउन के दौरान आवश्‍यक सेवाओं की डिलीवरी में लगे प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को ई-पास जारी करने के लिये ‘प्रगयाम’ नाम से एक मोबाइल एप शुरू किया है। एंड्रोएड प्‍लेटफॉर्म पर चलने वाला और स्‍थानीय तौर पर डिज़ाइन किया गया यह एप गूगल प्‍ले स्‍टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। ज़िला यातायात अधिकारी इस एप पर अपलोड किये गए दस्‍तावेजों की जाँच के बाद गाड़ियों को ऑनलाइन ई-पास जारी कर सकते हैं। यह एप 21 दिन की लॉकडाउन अवधि के दौरान रोज़मर्रा की मेडिकल, बैकिंग और अन्‍य आवश्‍यक सेवाओं तथा आवश्‍यक वस्‍तुओं की आपूर्ति के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने में मदद करेगा। झारखंड सरकार के अनुसार, किसी भी तरह की अनियमितता या नकली पास दिखाने पर व्यक्ति के विरुद्ध सुसंगत धाराओं के तहत आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अधिसूचना के अनुसार, एप  के माध्यम से मिलने वाले पास के अप्रूवल के लिये ज़िला स्तरीय पदधिकारियों की विभिन्न टीमें बनाई गई हैं। 

एशियाई विकास बैंक (ADB)

हाल ही में एशियाई विकास बैंक (ADB) ने भारत सरकार द्वारा प्रवर्तित राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष (National Investment and Infrastructure Fund) के माध्यम से भारत की अवसंरचना में 100 मिलियन डॉलर की राशि का निवेश करने की घोषणा की है। ध्यातव्य है कि ADB द्वारा यह घोषणा ऐसे समय में की गई है जब भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोनावायरस (COVID-19) महामारी के कारण काफी बुरी तरह प्रभावित हुई है। एशियाई विकास बैंक (ADB) द्वारा राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष के माध्यम से किया जा रहा निवेश. निजी क्षेत्र की कंपनियों के दीर्घावधि वित्तपोषण के लिये लाभदायी होगा। इससे देश की अवसंरचना के विकास के साथ देश का आर्थिक विकास और गुणवत्तापूर्ण रोज़गार उपलब्ध कराने में मदद मिल सकेगी। ADB एक क्षेत्रीय विकास बैंक है, जिसकी स्थापना 19 दिसंबर, 1966 को की गई थी। इस बैंक की स्थापना का उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक और सामाजिक विकास को गति प्रदान करना था। इसका मुख्यालय मनीला, फिलीपींस में स्थित है।

पी.के. मिश्रा की अध्यक्षता में उच्च-स्तरित पैनल

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने 21 दिनों की लॉकडाउन अवधि के पश्चात् सामान्य स्थिति बहाल करने के लिये एक उच्च-स्तरीय पैनल का गठन किया है। यह उच्च-स्तरीय पैनल स्वास्थ्य देखभाल और अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार करने के लिये उपाय सुझाएगा। इस पैनल का गठन प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा की अध्यक्षता में गठित किया गया है। इस पैनल में अलग-अलग कार्य समूह हैं और प्रत्येक समूह में 6 सदस्य हैं। इसमें सभी 20 सचिवों और 40 अन्य अधिकारियों को नियुक्त किया गया है। ‘अर्थव्यवस्था और कल्याण’ पैनल आर्थिक मामलों के सचिव के अधीन गठित किया गया है। इस पैनल को औपचारिक तथा अनौपचारिक क्षेत्रों में कोरोनावायरस (COVID-19) के कारण उत्पन्न समस्याओं के समाधान का कार्य दिया गया है। वहीं नीति आयोग के सदस्य वी.के. पॉल के नेतृत्व में एक और समूह का गठन किया गया है। यह समूह चिकित्सा उपकरणों, दवाओं की निरंतर आपूर्ति बनाए रखने और अस्पताल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उपाय सुझाएगी।

ऑस्‍ट्रेलिया में वेतनभोगियों के लिये 130 अरब डॉलर का पैकेज

ऑस्‍ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्‍कॉट मॉरीसन ने देश में कोरोनावायरस (COVID-19) से प्रभावित 60 लाख से अधिक लोगों के वेतन के लिये 130 अरब डॉलर के पैकेज की घोषणा की है। ऑस्‍ट्रेलिया में इस महामारी से अब तक 19 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। ऑस्‍ट्रेलिया सरकार इस पैकेज से लोगों को कार्य पर बनाए रखने में कारो‍बारियों की सहायता करने के लिये प्रत्‍येक कर्मचारी के आधार पर प्रत्येक सप्‍ताह एक हजार पाँच सौ ऑस्‍ट्रेलियाई डॉलर की वेतन सब्सिडी देगी। ध्यातव्य है कि हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी ‘कोरोनावायरस’ (COVID-19) के विरुद्ध लड़ाई में गरीबों की मदद करने के उद्देश्‍य से ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ के तहत 1.70 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की थी। इससे पूर्व अमेरिका ने भी कोरोनावायरस (COVID-19) संचालित आर्थिक मंदी से निपटने के लिये 1 ट्रिलियन डॉलर का प्रस्ताव किया था, इसके अलावा जर्मनी ने कोरोनावायरस से प्रभावित हुई कंपनियों को राहत प्रदान करने के उद्देश्य से 610 बिलियन डॉलर के पैकेज की घोषणा की थी।


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