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डेली न्यूज़

  • 28 Mar, 2020
  • 54 min read
शासन व्यवस्था

कोरोना के कुछ मामलों में घ्राण इंद्रियों का नष्ट होना

प्रीलिम्स के लिये:

कोरोनावायरस

मेंस के लिये:

कोरोनावायरससे संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में कोरोनावायरस से ग्रसित कुछ रोगियों में घ्राण इंद्रियों के नष्ट होने (Anosmia) के मामले सामने आए हैं, विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस का पता लगाने का एक नया संकेत हो सकता है।

प्रमुख बिंदु

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-WHO) ने COVID-19 के सबसे आम संकेतों को बुखार, थकान और सूखी खाँसी के रूप में सूचीबद्ध किया है।

घ्राणशक्ति का नाश- एनोस्मिया (Anosmia):

  • एनोस्मिया (Anosmia) गंध की भावना का आंशिक या पूर्ण अभाव होता है।  यह अभाव अस्थायी या स्थायी हो सकता है।
  • यह नाक में सूजन या किसी प्रकार के ब्लॉकेज के कारण होता है जो गंध को नाक के ऊपरी हिस्से तक पहुँचने से रोकता है।
  • श्वसन वायरल संक्रमण गंध के अभाव के सामान्य कारणों में से एक है। गंध का आभास संक्रमण के खत्म होने पर ही होता है।
  • एनोस्मिया के अन्य मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
    • नाक की श्लेष्मा झिल्ली (Mucous Membranes) परत में चिड़चिड़ाहट या जलन।
    • नाक के मार्ग में रुकावट।
    • मस्तिष्क या तंत्रिका क्षति।

जटिलताएँ: 

  • एनोस्मिया से ग्रसित  व्यक्ति पूरी तरह से खाद्य पदार्थों का स्वाद लेने में सक्षम नहीं हो सकते हैं और खाने में रुचि खो सकते हैं।
  • इससे वज़न का कम होना या कुपोषण की समस्या हो सकती है।

स्वाद-अनुभूति का अभाव- एजुसिया (Ageusia):

  • एजुसिया (Ageusia) एक ऐसी स्थिति है जो जीभ की स्वाद संबंधी क्रियाएँ को पूर्णतः निष्क्रिय कर देती है।
  • ऐसे लोग जिनमें स्वाद की क्षमता कम होती है उन्हें हाइपोगेसिया (Hypogeusia) कहा जाता है।

सामान्य कारण:

    • उम्र का बढ़ना
    • नाक की वायुमार्ग की समस्याएँ।
    • ऊपरी वायुमार्ग संक्रमण, जैसे कि साइनस संक्रमण, गलसुओं की सूजन, या गले में खराश


स्रोत: द हिंदू


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

जुबा शांति वार्ता

प्रीलिम्स के लिये 

ब्लू नील, व्हाइट नील, आदिस अबाबा समझौता

मेन्स के लिये

सूडान में राजनीतिक स्थिरता के लिये जुबा शांति वार्ता

चर्चा में क्यों? 

25 मार्च, 2020 को दक्षिण सूडान की राजधानी जुबा में अपने देश की सरकार और विद्रोही समूहों के बीच शांति वार्ता के दौरान सूडान के रक्षा मंत्री जमाल एल्डिन उमर इब्राहिम (Jamal Aldin Omar Ibrahim) का निधन हो गया।

मुख्य बिंदु:

  • उमर सूडान की संप्रभु परिषद के सदस्य थे जिसने पिछले वर्ष देश में सैन्य और लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के बीच 39 महीने के सत्ता साझा करने के समझौते के तहत सत्ता संभाली थी। इस आंदोलन ने पूर्व तानाशाह राष्ट्रपति उमर अल-बशीर के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्त्व किया था। 
  • सूडान सरकार वर्ष 2019 से विद्रोही समूहों के साथ शांति वार्ता को सफल बनाने का प्रयास कर रही है।
  • इस शांति वार्ता का आयोजन दक्षिण सूडान की राजधानी जुबा में किया जा रहा है जिसका उद्देश्य सूडान में राजनीतिक स्थिरता लाना है तथा राष्ट्रपति उमर अल-बशीर के सैन्य शासन को समाप्त करने के बाद राष्ट्र में लोकतंत्र की स्थापना करने में मदद करना है।
  • सूडान में हुए कई विद्रोहों में हजारों लोग मारे गए जिसमें पश्चिमी सूडान का दारफुर क्षेत्र (Darfur Region) प्रमुख है। इसी क्षेत्र में 2000 के दशक की शुरुआत में उमर अल-बशीर ने क्रूरतापूर्वक नागरिको का दमन किया था जिसके कारण अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) ने युद्ध अपराध एवं नरसंहार के आरोप पर उमर अल-बशीर को दोषी ठहराया है।

सूडान: राजनीतिक घटनाक्रम 

  • 1 जनवरी, 1956 को ब्रिटिश और मिस्र से आज़ादी मिलने के बाद सूडान में सत्ता को लेकर संघर्ष शुरू हो गया।
    • उत्तरी सूडान की अधिकतर आबादी मुस्लिम धर्म जबकि दक्षिणी सूडान की अधिकतर आबादी ईसाई धर्म को मानती है। 
    • उत्तरी सूडान के मुस्लिम समूहों द्वारा सूडान को कट्टरपंथी मुस्लिम राष्ट्र में बदलने के संदेह के कारण दक्षिणी सूडान के लोगों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया जिससे सूडान में गृहयुद्ध छिड़ गया तथा सूडान की सत्ता सेना के हाथ में आ गई।
  • वर्ष 1965 में सूडान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव हुए जिसके तहत एक मुस्लिम प्रभुत्व वाली सरकार सत्ता में आई किंतु वर्ष 1969 में इस मुस्लिम सरकार का गफर मोहम्मद अल-निमरी (Gaafar Mohamed el-Nimeri) के नेतृत्व में तख्तापलट कर दिया गया। निमरी ने सूडानी सोशलिस्ट पार्टी (Sudanese Socialist Party) द्वारा एक दलीय शासन स्थापित किया।   
    • निमरी के शासनकाल में वर्ष 1972 में एक्वाटोरिया (Equatoria) की आतंरिक स्वायत्तता के लिये आदिस अबाबा समझौता (Addis Ababa Agreement) हुआ, जिससे सूडान के दक्षिणी प्रांतों में 17 वर्षों से चल रहा गृहयुद्ध समाप्त हो गया।
    • हालाँकि वर्ष 1983 में उत्तरी सूडान में मुस्लिम ब्रदरहुड की बढती ताकत को देखते हुए निमरी ने सूडान में कानूनों को सख्त करने तथा इस्लामी कानून संहिता ‘शरिया’ के अनुरूप लाने के लिये अपनी नीतियों को पलट दिया और दक्षिणी प्रांतो को केंद्रीय प्रशासन के अंतर्गत लेन के लिये इसी वर्ष आदिस अबाबा समझौते को भी निरस्त कर दिया गया जिससे दक्षिण के प्रांतों में फिर से अशांति एवं विद्रोह शुरू हो गया।  
  • वर्ष 1989 में सूडान सरकार और दक्षिणी प्रांत के विद्रोहियों ने युद्ध को समाप्त करने के लिये बातचीत शुरू की किंतु उमर अल-बशीर के नेतृत्व में सेना ने सरकार का तख्तापलट कर दिया और उमर अल-बशीर ने खुद को राष्ट्रपति घोषित किया। 
    • वर्ष 2003 में सूडान में दारफुर के पश्चिमी क्षेत्र में सूडान लिबरेशन मूवमेंट और जस्टिस एंड इक्वलिटी मूवमेंट समूहों द्वारा सूडान सरकार पर दारफुर क्षेत्र की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए  विद्रोह शुरू किया। 
  • वर्ष 2004 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council) ने एक संकल्प पत्र जारी किया जिसमें कहा गया कि सूडान सरकार ने दक्षिणी प्रांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया तथा इस संकल्प पत्र में दारफुर क्षेत्र में सैन्य समर्थित हमलों पर चिंता व्यक्त की गई।        
    • वर्ष 2009 में अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (International Criminal Court) ने अल-बशीर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया जिस पर दारफुर क्षेत्र में मानवता एवं युद्ध अपराधों के खिलाफ अपराध का आरोप लगाया गया था।  
  • जनवरी 2011 में दक्षिणी सूडान की स्वतंत्रता के लिये जनमत संग्रह कराया गया और 9 जुलाई, 2011 को दक्षिण सूडान गणराज्य एक स्वतंत्र देश बन गया। 
  • उमर अल-बशीर द्वारा दक्षिणी सूडान की स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया गया किंतु सूडान और दक्षिणी सूडान गणराज्य द्वारा अब्येई (Abyei) क्षेत्र पर दावा किये जाने के कारण दोनों देशों के बीच यह विवादित क्षेत्र हो गया।

भारत-सूडान संबंध:

  • भारत-सूडान के संबंध लगभग 5000 साल पुराने सिंधु घाटी सभ्यता के समय के हैं। बताया जाता है कि सिंधुवासी अरब सागर और लाल सागर के रास्ते सूडान से व्यापार करते थे।  
  • वर्ष 1935 में समुद्र के रास्ते इंग्लैंड जाते हुए महात्मा गांधी सूडान के बंदरगाह पर रुके जहाँ भारतीय समुदाय द्वारा उनका स्वागत किया गया।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश भारतीय सैनिकों ने वर्ष 1941 में इरीट्रिया में सूडान के साथ मिलकर केरेन (Keren) की निर्णायक लड़ाई जीती।
  • वर्ष 1953 में सूडान का पहला संसदीय चुनाव भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन द्वारा आयोजित कराया गया था वहीं वर्ष 1956 में सूडान को स्वतंत्रता मिलने के बाद वर्ष 1957 में गठित सूडान चुनाव आयोग (Sudanese Election Commission) में भारतीय चुनाव आयोग से संबंधित नियम एवं कानूनों की सबसे अधिक मदद ली गई।
  • तेल और गैस क्षेत्र पर सहयोग पर भारत-सूडान संयुक्त कार्य समूह की पहली बैठक नवंबर 2010 में खार्तूम शहर में हुई थी। 
  • भारत सूडान के साथ मिलकर स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में काम कर रहा है जिसके अंतर्गत  भारतीय क्षमता निर्माण कार्यक्रमों द्वारा सूडान के प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके अलावा सस्ते चिकित्सा उपचार का लाभ उठाने के लिये भारत सूडान के लिये प्रमुख गंतव्य स्थान बन गया है।

सूडान: भौगोलिक परिदृश्य 

  • सूडान पूर्वी मध्य अफ्रीका में स्थित है। यह उत्तर में मिस्र, उत्तर-पूर्व में लाल सागर (Red Sea), पूर्व में इरिट्रिया एवं इथियोपिया, दक्षिण में दक्षिण सूडान गणराज्य, दक्षिण-पश्चिम में मध्य अफ्रीकी गणराज्य (Central African Republic), पश्चिम में चाड (Chad) और उत्तर-पश्चिम में लीबिया से घिरा हुआ है।
  • अल्जीरिया और पूर्वी कांगो के बाद सूडान अफ्रीकी महाद्वीप का तीसरा सबसे बड़ा देश है।
  • इथोपियन उच्च भूमि (Ethiopian highlands) से निकलने वाली ब्लू नील (Blue Nile) और मध्य अफ्रीकी झीलों (Central African lakes) से निकलने वाली व्हाइट नील (White Nile) नदियाँ खार्तूम शहर में मिलकर नील नदी का निर्माण करती हैं जो उत्तर की ओर मिस्र से होते हुए भूमध्य सागर तक प्रवाहित होती है।
  • संसाधन: पेट्रोलियम सूडान का प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है। यहाँ क्रोमियम अयस्क, तांबा, लौह अयस्क, अभ्रक, चाँदी, सोना, टंगस्टन और जस्ता के महत्त्वपूर्ण भंडार हैं। 

स्रोत: द हिंदू


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

COVID-19 के लिये एंटीबॉडी किट

प्रीलिम्स के लिये:

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद

राइबोन्यूक्लिक एसिड, आरटी-पीसीआर टेस्ट

मेन्स के लिये

COVID-19 से निपटने के लिये भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research- ICMR)  ने COVID-19 संक्रमण के निदान हेतु संदिग्ध रोगियों की जांच में मदद करने के लिये विनिर्माताओं को 5 लाख एंटीबॉडी किट आपूर्ति करने के लिये आमंत्रित किया।

प्रमुख बिंदु:

  • COVID-19 के परीक्षण के लिये एंटीबॉडी परीक्षण एक स्क्रीनिंग प्रक्रिया के रूप में कार्य करेगा जो कुछ घंटों में ही त्वरित परिणाम देगा।
  • एंटीबॉडी परीक्षण वायरस के कारण शरीर में होने वाली प्रतिक्रिया का पता लगाता है। यह एक संकेत देता है कि व्यक्ति वायरस के संपर्क में आया है या नहीं।
  • यदि परीक्षण सकारात्मक है तो स्वाब (Swab) एकत्र किया जाता है और पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (Polymerase Chain Reaction- PCR) किट का उपयोग करके एक राइबोन्यूक्लिक एसिड (Ribonucleic Acid- RNA) परीक्षण  किया जाता है। इसलिए यह परीक्षण दो चरणों में संपन्न होता है।

राइबोन्यूक्लिक एसिड (Ribonucleic Acid- RNA):

  • RNA सभी जीवित कोशिकाओं में पाया जाता है। यह डीएनए से निर्देश लेता है जो प्रोटीन के संश्लेषण को नियंत्रित करता है।
  • यह मुख्य रूप से प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करता है। डीएनए (Deoxyribonucleic acid- DNA) से से ही RNA का संश्लेषण होता है यह डीएनए के निर्देशों द्वारा नियंत्रित होता है जिसमें जीवन के विकास एवं रखरखाव के लिये आवश्यक आनुवंशिक निर्देश शामिल होते हैं।
  • कुछ वायरस में डीएनए के बजाय RNA आनुवंशिक सूचना का वहन करता है।
  • हालाँकि एंटीबॉडी परीक्षण यह निश्चित रूप से संकेत नहीं देता है कि कोई व्यक्ति COVID-19 संक्रमण से संक्रमित है कि नहीं। इसका उपयोग मात्र स्क्रीनिंग के लिये किया जाता है।
  • वर्तमान में COVID-19 संक्रमण का पता लगाने के लिये भारत केवल पारंपरिक आरटी-पीसीआर (Reverse Transcription Polymerase Chain Reaction) परीक्षण कर रहा है।

एंटीबॉडी किट बनाम आरटी-पीसीआर टेस्ट (Antibody Kit vs RT-PCR Test):

  • RT-PCR परीक्षण RNA से संबंधित वायरस आनुवंशिक सामग्री का पता लगाता है। जबकि एंटीबॉडी परीक्षण वायरस से संबंधित शरीर की प्रतिक्रिया का पता लगाता है।
  • RT-PCR प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करता है जबकि एंटीबॉडी किट अप्रत्यक्ष साक्ष्य प्रदान करते हैं।

एंटीबॉडी किट की आवश्यकता क्यों?

  • जहाँ लोगों की संख्या अधिक है वहाँ RT-PCR परीक्षण किट की कमी को देखते हुए एंटीबॉडी परीक्षण किट का प्रयोग किया जायेगा।
  • RT-PCR परीक्षण अत्यधिक जटिल, महंगा तथा अधिक समय लेता है। जिससे जाँच में तेज़ी नहीं आती है परिणामतः संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
    • दक्षिण कोरिया जैसे कुछ देशों में एंटीबॉडी परीक्षण का प्रयोग किया गया था जिसके सकारात्मक परिणाम आए थे।
    • दक्षिण कोरिया में यात्रा करने एवं सामूहिक संपर्क में आने वाले लोगों की जाँच के लिये एंटीबॉडी किट का प्रयोग किया जा रहा है।
    • दक्षिण कोरिया में एंटीबॉडी किट का प्रयोग करके बड़ी संख्या में संदिग्ध मरीज़ों को संपर्क अनुरेखण (Contact Tracing) द्वारा खोजा जा रहा है।

संपर्क अनुरेखण (Contact Tracing):

  • संपर्क अनुरेखण संक्रमित व्यक्तियों से अन्य लोगों में वायरस के प्रसार को रोकने के लिये लोगों की पहचान करने, आकलन करने और उन्हें प्रबंधित करने की प्रक्रिया है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

क्वांटम प्रौद्योगिकी

प्रीलिम्स के लिये:

क्वांटम प्रौद्योगिकी और एप्लिकेशन पर आधारित राष्ट्रीय मिशन, क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग

मेन्स के लिये:

क्वांटम प्रौद्योगिकी और क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय बजट 2020-21 में क्वांटम टेक्नोलॉजी और एप्लिकेशन पर आधारित राष्ट्रीय मिशन (National Mission on Quantum Technologies and Applications-NMQTA) के तहत पाँच वर्ष के लिये 8,000 करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा की है।

प्रमुख बिंदु:

  • इस मिशन के तहत क्वांटम कंप्यूटिंग से जुड़ी तकनीकों को विकसित करना एवं भारत को अमेरिका और चीन के बाद इस क्षेत्र में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बनाना है।
  • क्वांटम टेक्नोलॉजी से न केवल अल्ट्रा फास्ट कंप्यूटिंग क्षमताएँ बढेंगी, बल्कि इसके रणनीतिक और आर्थिक फायदे भी होंगे।
  • बजट में नई घोषणा से संसाधन समस्या को ठीक करने में बहुत मदद मिलेगी लेकिन संपूर्ण विश्व उच्च गुणवत्ता वाली जनशक्ति की कमी से अभी भी जूझ रहा है।

क्वांटम कंप्यूटिंग:

  • क्वांटम प्रौद्योगिकी, क्वांटम यांत्रिकी के सिद्धांतों पर आधारित है जिसे 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में प्रकृति में छोटे परमाणुओं और कणों का वर्णन करने के लिये विकसित किया गया था।
  • इस क्रांतिकारी तकनीक ने पहले चरण में भौतिक दुनिया के प्रकाश और पदार्थ के बारे में हमारी समझ विकसित की है, साथ ही लेज़र और सेमीकंडक्टर ट्रांजिस्टर जैसे सर्वव्यापी आविष्कार किये हैं।
  • हालांकि, अनुसंधान की एक सदी के बावज़ूद क्वांटम दुनिया अभी भी रहस्यमय है और रोज़मर्रा की जिंदगी पर आधारित हमारे अनुभवों से दूर है।
  • वर्तमान में कंप्यूटिंग के क्षेत्र में क्वांटम यांत्रिकी को केंद्र में बनाए रखने के साथ ही एक दूसरी क्रांति चल रही है।
  • क्वांटम कंप्यूटर भौतिक विज्ञान के क्वांटम सिद्धांत पर कार्य करता है। इसके विपरीत आधुनिक कंप्यूटर भौतिकी के विद्युत् प्रवाह के नियमों पर कार्य करता है।
  • एक सामान्य कंप्यूटर अपनी सूचनाओं को बिट में संग्रहीत करता है, जबकि क्वांटम कंप्यूटर में सूचना ‘क्वांटम बिट’ या ‘क्यूबिट’ में संग्रहीत होती है।
  • सामान्य कंप्यूटर, प्रोसेसिंग के दौरान बाइनरी इनपुट (0 या 1) में से किसी एक को ही एक बार ऑपरेट कर सकते हैं वहीं क्वांटम कंप्यूटर दोनों बाइनरी इनपुट को एक साथ ऑपरेट कर सकते हैं।
  • 100 क्युबिट से कम की क्षमता रखने वाला क्वांटम कंप्यूटर किसी बहुत अधिक आँकड़े वाली उन समस्याओं को भी हल कर सकता है जो किसी आधुनिक कंप्यूटर की क्षमता से बाहर है।
  • क्वांटम कंप्यूटर को किसी बड़े वातानुकूलित सर्वर रूम में रखा जाता है जहाँ कई सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट को स्टैक में रखा जाता है।

क्वांटम प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग:

  • सुरक्षित संचार
  • अनुसंधान
  • आपदा प्रबंधन
  • औषधि
  • औद्योगिक क्रांति 4.0 को संवर्द्धित करना

भारत के संदर्भ में चुनौतियाँ:

  • विश्व स्तर पर इस क्षेत्र में अनुसंधान लगभग दो दशक से चल रहा है, लेकिन भारत में केवल पाँच वर्षों से कुछ ही संस्थानों में गंभीर प्रयोगात्मक कार्य हो रहे हैं।
  • भारत इस क्षेत्र में पर्याप्त संसाधनों, उच्च गुणवत्ता वाली जनशक्ति और समयबद्धता की कमी से जूझ रहा है।
  • क्वांटम कंप्यूटर में प्रयोग होने वाले क्यूबिट को क्रायोजेनिक तापमान पर ही स्थिर रखा जा सकता है, इसलिये इसका रख-रखाव एक बड़ी चुनौती है।
  • क्वांटम कंप्यूटर को तैयार करने में अत्यधिक विकसित तकनीक तथा भारी निवेश की आवश्यकता होगी।

आगे की राह:

  • सरकार को NMQTA के घोषणा के साथ ही हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप द्वारा घोषित कार्यक्रमों जैसे कार्यक्रमों पर अत्यधिक निवेश करने की आवश्यकता है।
  • हालाँकि, क्वांटम प्रौद्योगिकी से जुड़ी चुनौतियों का तत्काल समाधान करने की आवश्यकता है जैसे:
    • क्वांटम कंप्यूटिंग से संबंधित मुद्दों और इसे जल्दी से पूरा करने हेतु संस्थानों और वैज्ञानिकों को एक साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

COVID-19 टेस्टिंग किट

प्रीलिम्स के लिये 

COVID-19 टेस्टिंग किट 

मेन्स के लिये 

स्वास्थ्य क्षेत्र पर COVID-19 का प्रभाव, स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीकी का प्रयोग

चर्चा में क्यों?

हाल ही में पुणे स्थित स्वास्थ्य क्षेत्र की एक निजी कंपनी मायलैब (MyLab) को COVID-19 परीक्षण के लिये टेस्टिंग किट बनाने की मंज़ूरी दे दी गई है।

मुख्य बिंदु:

  • मायलैब (MyLab) भारत का पहला स्थानीय/स्वदेशी निर्माता है, जिसे COVID-19 के परीक्षण के लिये टेस्टिंग किट बनाने की अनुमति दी गई है।
  • मायलैब प्रबंध निदेशक के अनुसार, ‘मेक इन इंडिया’ पहल को ध्यान में रखते हुए COVID-19 टेस्टिंग किट को स्थानीय तथा केंद्र सरकार के सहयोग से तैयार किया गया है।
  • साथ ही इस किट के निर्माण में विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization- WHO) और रोग नियंत्रण एवं निवारण केंद्र (Centers for Disease Control and Prevention -CDC) द्वारा निर्धारित आवश्यक दिशा निर्देशों का भी ध्यान रखा गया है।  
  • इस टेस्टिंग किट का पूरा नाम ‘मायलैब पैथोडिटेक्ट COVID-19 क्वांटिटेटिव पीसीआर किट’ (Mylab PathoDetect Covid-19 qualitative PCR kit) है।  
  • मायलैब प्रबंध निदेशक के अनुसार, निजी प्रयोगशालों द्वारा COVID-19 परीक्षण के लिये आवश्यक दिशा-निर्देश कंपनी द्वारा जारी कर दिये हैं और अभी तक 12 निजी प्रयोगशालों ने पंजीकरण कराकर काम करना शुरू कर दिया है।
  • वर्तमान में मायलैब से जुड़ी इन प्रयोगशालाओं के पास पूरे भारत में 15,000 संग्रह केंद्रों पर COVID-19 के नमूने लेने की व्यवस्था है। अन्य प्रयोगशालाओं के पंजीकरण के साथ संग्रह केंद्रों की संख्या में भी वृद्धि होगी।
  • मायलैब प्रबंध निदेशक के अनुसार, ‘भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद’ (Indian Council of Medical Research-ICMR) नेटवर्क के तहत 111 प्रयोगशालाओं के माध्यम से सरकार के पास एक दिन में 10,000 से अधिक नमूनों की जाँच करने की क्षमता है।   

टेस्टिंग किट बनाने की अनुमति के लिये आवश्यक प्रक्रिया: 

  • हालाँकि COVID-19 के परीक्षण के लिये भारत अधिकांशतः विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है, परंतु हाल ही में कई स्थानीय कंपनियों ने टेस्टिंग किट बनाने की अनुमति के लिये ‘राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान’ (National Institute Of Virology) में आवेदन किया था।  
  • ICMR के लिखित दिशा-निर्देशों के तहत देश में उन्हीं कंपनियों की टेस्टिंग किट को COVID-19 के व्यावसायिक परीक्षण की अनुमति दी जाती है जिन्हें या तो ‘यू.एस. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ (US Food and Drug Administration- USFDA) की अनुमति प्राप्त हो या यूरोपीय संघ द्वारा प्रमाणित किया गया हो।
  • परंतु, 23 मार्च, 2020 को ICMR द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वर्तमान में यदि किसी टेस्टिंग किट को ‘राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान’ की स्वीकृति प्राप्त है तो उन्हें USFDA या यूरोपीय संघ की अनुमति के बिना भी बनाने की अनुमति दी जा सकती है।    

कैसे काम करती है यह टेस्टिंग किट?  

  • मायलैब के प्रतिनिधि के अनुसार, इस परीक्षण में कोरोनावायरस के संक्रमण का पता लगाने के लिये संक्रमित व्यक्ति में वायरस के RNA की पहचान की जाती है।
  • किसी व्यक्ति की अंगुलियों की छाप (Fingerprints) की तरह ही हर वायरस के RNA की एक विशिष्ट पहचान होती है।
  • इस टेस्ट में ‘रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन’ (Reverse Transcription Polymerase Chain Reaction- RTPCR) तकनीक का प्रयोग किया जाता है। 
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के सुझाव के अनुसार, किसी व्यक्ति के कोरोनावायरस से संक्रमित होने की पुष्टि के लिये कम-से-कम दो RNA फिंगरप्रिंट की पहचान की जानी चाहिये।
  • साथ ही इस परीक्षण के दौरान व्यक्ति में वायरस के प्रति कुछ अन्य प्रतिक्रियाओं की भी जाँच की जाती है।
  • मायलैब के अनुसार, इस टेस्टिंग किट के माध्यम से मात्र 2.5 घंटों में ही परीक्षण के परिणाम जाने जा सकते हैं।

टेस्टिंग किट के लाभ: 

  • वर्तमान में विश्व के किसी भी देश में COVID-19 के प्रमाणिक उपचार की की खोज नही की जा सकी है, ऐसे में इस बीमारी के नियंत्रण का एक ही विकल्प इसके प्रसार को रोकना है। इस टेस्टिंग किट के माध्यम से कम समय में ही संक्रमित व्यक्तियों की पहचान कर COVID-19 के प्रसार को रोकने में सहायता प्राप्त होगी।  
  • इस टेस्टिंग किट के परीक्षण के दौरान सभी प्रयासों में 100% सही परिणाम प्राप्त हुए, जो इस किट की विश्वसनीयता को सिद्ध/ प्रमाणित करता है।
  • वर्तमान में COVID-19 से बीमार हो रहे लोगों के अतिरिक्त अन्य स्वस्थ नागरिकों और प्रशासन के लिये यह महामारी एक गंभीर मानसिक तनाव/दबाव का कारण बनी है, ऐसी स्थिति में स्थानीय टेस्टिंग किट के निर्माण जैसी छोटी सफलता से भी इस बीमारी से लड़ने में नागरिकों, स्वास्थ्य कर्मियों तथा सरकार का मनोबल मज़बूत होगा।  

चुनौतियाँ:

  • हालाँकि इस टेस्टिंग किट की लागत (लगभग 1,200 रुपए) पहले से उपलब्ध अन्य विकल्पों से कम है परंतु अभी भी बहुत से लोग बिना किसी आर्थिक सहायता के पूरे परिवार के लिये इस परीक्षण को नहीं ले पाएंगे।
  • हाल के दिनों में देश में COVID-19 से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ी है ऐसे में यह अति आवश्यक है कि शीघ्र ही अधिक-से-अधिक संक्रमित लोगों की पहचान की जाए।  परंतु किट के निर्माताओं के लिये सरकार के सहयोग के बाद भी कम समय में बड़ी मात्रा में लोगों के लिये किट उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती होगी। 

COVID-19 की चुनौती से निपटने के अन्य प्रयास:

  • पिछले कुछ दिनों में COVID-19 के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा अन्य प्रयासों के साथ इस रोग के प्रसार की निगरानी करने व सुदूर क्षेत्रों में काम कर रहे स्वास्थ्य कर्मियों को जागरूक और प्रशिक्षित करने के लिये तकनीक की सहायता लेने का निर्णय लिया है। 

स्वास्थ्य कर्मियों के लिये वेबिनार:

  • इस प्रयास के तहत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सहयोग से एक वेबिनार (Webinar) प्लेटफॉर्म शुरू किया गया है। वेबिनार को आसान शब्दों में ऑनलाइन सेमिनार या इंटरनेट आधारित सेमिनार के रूप में समझा जा सकता है। 
  • इस वेबिनार के माध्यम से ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे चिकित्सा-सहायकों, नर्सों, आशा और आगनवाड़ी कार्यकर्ताओं आदि को प्रतिदिन एम्स के डॉक्टरों COVID-19 के संदर्भ में आवश्यक जानकारी दी जाएगी।
  • इस पहल के तहत COVID-19 के संदर्भ में स्थानीय भाषा के माध्यम से ज्यादातर लोगों तक जागरूकता फैलाने के लिये राज्य सरकारों का भी सहयोग लिया जायेगा। 
  • इसके साथ ही इस पहल के तहत ‘इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय’ (Ministry of Electronics and Information Technology) के सहयोग से फेसबुक और वाट्सएप पर चैटबॉक्स (Chatbox) की शुरुआत की जाएगी और इन वेबिनार कार्यक्रमों को फेसबुक, वाट्सएप और यूट्यूब आदि के माध्यम से भी प्रसारित किया जाएगा।

    कोरोना कवच:

    • ‘इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय’ (Ministry of Electronics and Information Technology) के सहयोग से कोरोनावायरस के प्रसार की निगरानी करने के लिये एक एप का निर्माण किया गया है।
    • यह एप फोन में इंस्टाल करने के बाद फोन के ब्लूटूथ और लोकेशन की सहायता से संक्रमण के संभावित प्रसार की चेतावनी दे सकता है।
    • वर्तमान में इस एप को अस्थायी रूप से ‘कोरोना कवच’ का नाम दिया गया है।
    • वर्तमान में ऐसे ही एक एप का प्रयोग सिंगापुर (Singapore) में किया जा रहा है। 

    कैसे काम करता है यह एप?

    • यह एप फोन के ब्लूटूथ के माध्यम से किसी स्थान पर व्यक्ति से 3-5 मीटर की दूरी पर स्थित सभी लोगों के आँकड़े सुरक्षित रखता है। शुरुआत में इस एप में एक हरे रंग का सांकेतिक चिन्ह होगा।
    • यदि कोई व्यक्ति कोरोना से संक्रमित पाया जाता है तो उसकी जानकरी लैब में दर्ज की जाएगी, संक्रमण की पुष्टि होने पर एप में सांकेतिक चिन्ह का रंग लाल (Red) हो जाएगा।
    • एप से प्राप्त जानकारी के आधार पर पिछले 14 दिनों में संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए सभी लोगों को सूचित कर दिया जाएगा और उनके एप में सांकेतिक चिन्ह का रंग पीला (Yellow) हो जाएगा। 
    • साथ ही उन्हें यह भी निर्देश दिया जाएगा कि वे अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें और अगले 14 दिनों तक किसी अन्य व्यक्ति के संपर्क में न आए।   

    COVID-19 की जागरूकता के लिये वाट्सएप का प्रयोग:

    • COVID-19 के बारे में सही जानकारी प्रदान करने और गलत सूचनाओं/समाचारों (Fake News) से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने हाल ही में एक वाट्सएप नंबर जारी किया है।
    • इस सेवा का लाभ लेने के लिये व्यक्ति को सरकार द्वारा जारी नंबर (9013151515) पर एक ‘Hi’ लिखकर भेजना होगा।
    • यह सेवा वर्तमान में हिंदी, अंग्रेजी और गुजराती भाषा में उपलब्ध है। साथ ही इसे मराठी में उपलब्ध कराने की तैयारी भी पूरी कर ली गई है।  
    • केरल और कर्नाटक की राज्य सरकारें भी इस सेवा को स्थानीय भाषा में जारी करने के लिये सहयोग कर रही हैं।  
    • इस सेवा को दो अन्य नंबरों पर जारी करने की तैयारी की जा रही है।

    चिकित्सा केंद्रों की ज़रूरतों के लिये मैप आधारित पोर्टल:

    • केंद्र सरकार ने COVID-19 के कारण चिकित्सा उपकरणों और अन्य आवश्यक ज़रूरतों को पूरा करने के लिये एक पोर्टल की शुरुआत करने पर कार्य शुरू कर दिया है। 
    • इस पोर्टल का उद्देश्य अस्पतालों और वे लोग जो सहायता प्रदान करने की इच्छा रखते हों के बीच आसानी से संपर्क स्थापित कराना है।  
    • इस योजना के तहत स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा विभिन्न अस्पतालों की ज़रूरतों के आँकड़े एक सिस्टम में दर्ज किये जाएँगे।
    • ‘इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय’ के सहयोग से एक पोर्टल तैयार किया जाएगा जिसमें मानचित्र की सहायता से किसी क्षेत्र विशेष में स्थित सभी अस्पतालों और उनकी ज़रूरतों का आँकड़ा जारी किया जा सकेगा।
    • इस पोर्टल की सहायता से इच्छुक व्यक्ति या संस्थाएँ अस्पतालों के लिये आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध करा सकेंगे। 

    स्रोत: द हिंदू


    भारतीय अर्थव्यवस्था

    पेट्रोल, डीज़ल पर उत्पाद शुल्क में वृद्धि

    प्रीलिम्स के लिये:

    वित्त विधेयक, वित्त अधिनियम की आठवीं अनुसूची में संशोधन

    मेन्स के लिये:

    उत्पाद शुल्क में वृद्धि से संबंधित मुद्दे

    चर्चा में क्यों:

    हाल ही में केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद शुल्क में वृद्धि एवं वित्त अधिनियम की आठवीं अनुसूची में संशोधन किया है।

    प्रमुख बिंदु:

    • सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय तेल की कीमतों में गिरावट से होने वाले लाभ को बढ़ाने की कोशिश की है।
    • पेट्रोल पर विशेष उत्पाद शुल्क 2 से 8 रुपए प्रति लीटर और डीज़ल के मामले में 4 रुपए प्रति लीटर बढ़ाया गया। इसके अतिरिक्त पेट्रोल और डीज़ल पर सड़क उपकर को 1 रुपए प्रति लीटर से बढ़ाकर 10 रुपए प्रति लीटर कर दिया गया।

    राजस्व में वृद्धि:

    • उत्पाद शुल्क में वृद्धि से सरकार के राजस्व में लगभग 39,000 करोड़ रुपए की वार्षिक वृद्धि होगी।
    • सरकार ने नवंबर 2014 और जनवरी 2016 के बीच वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में गिरावट से होने वाले लाभ को बढ़ाने की कोशिश हेतु पेट्रोल और डीजल पर नौ बार उत्पाद शुल्क लगाया।
    • सरकार ने वर्ष 2014-15 के पश्चात् पेट्रोल पर 1.77 रुपए प्रति लीटर और डीज़ल पर 13.47 रुपए प्रति लीटर की दर से उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी की थी जिसके परिणामस्वरूप राजस्व आय वर्ष 2014-15 के 99,000 करोड़ रुपए से बढ़कर वर्ष 2016-17 में 2,42,000 करोड़ रुपए हो गई।    
    • विशेषज्ञों के अनुसार, जहाँ इस वर्ष की पहली तिमाही में कच्चे तेल की कीमतों में कमी का लाभ उपभोक्ता को काफी मिला है, वहीं केंद्र ने तंग राजकोषीय स्थिति को देखते हुए कुछ राजस्व बढ़ाने के लिये शुल्क बढ़ाने का यह कदम उठाया है। बुनियादी ढाँचे के विकास और व्यय की अन्य विकासात्मक वस्तुओं के लिये संसाधन तैयार करने में मदद मिलेगी। 

    वित्त अधिनियम की आठवीं अनुसूची में संशोधन:

    • पहले पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद शुल्क में अधिकतम वृद्धि क्रमशः 10 और 4 रूपए प्रति लीटर का प्रावधान था। 
    • वित्त अधिनियम की आठवीं अनुसूची में संशोधन से अब पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद शुल्क में अधिकतम वृद्धि क्रमशः 18 और 12 रुपए प्रति लीटर का प्रावधान हो गया।
    • सदन में COVID-19 के प्रकोप के कारण वित्त विधेयक में संशोधन लोकसभा में बहस के बिना पारित कर दिया गया। 

    वित्त विधेयक (Finance Bill):

      • साधारणतया वित्त विधेयक, उस विधेयक को कहते है, जो वित्तीय मामलों जैसे राजस्व या व्यय से संबंधित होता है।
      • इसमें आगामी वित्तीय वर्ष में किसी नए प्रकार के कर लगाने या कर संशोधन आदि से संबंधित विषय शामिल होते हैं।

    • वित्त विधेयक के प्रकार:

      • धन विधेयक - अनुच्छेद 110
      • वित्त विधेयक - अनुच्छेद 117 (1)
      • वित्त विधेयक - अनुच्छेद 117 (3)
    • इस वर्गीकरण के अनुसार, सभी धन विधेयक, वित्त विधेयकों की श्रेणी में आते हैं। यद्यपि सभी धन विधेयक, वित्त विधेयक होते हैं किंतु सभी वित्त विधेयक, धन विधेयक नहीं होते हैं। केवल वे वित्त विधेयक ही धन विधेयक होते हैं, जिनका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 110 में किया गया है।
    • धन विधेयक को लोकसभाध्यक्ष द्वारा भी धन विधेयक के रूप में प्रमाणित किया जाता है।
    • वित्त विधेयक-I तथा II की चर्चा संविधान के अनुच्छेद 117 में की गई है।


    स्रोत: द हिंदू


    शासन व्यवस्था

    शेल्टर इन प्लेस

    प्रीलिम्स के लिये:

    शेल्टर इन प्लेस

    मेन्स के लिये

    COVID-19 की चुनौती से निपटने के वैश्विक प्रयास,  COVID-19 का वैश्विक प्रभाव

    चर्चा में क्यों?

    हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री ने देश में COVID-19 के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए देश के नागरिकों से एक दिन के लिये ‘जनता कर्फ्यू’ का पालन करने का आह्वान किया था। अमेरिका में भी किसी आपदा की स्थिति में नागरिकों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिये ऐसी ही एक व्यवस्था को अपनाया जाता है।  इसे शेल्टर इन प्लेस (Shelter In Place) के नाम से जाना जाता है। 

    मुख्य बिंदु:

    • पिछले दिनों संयुक्त राज्य अमेरिका में COVID-19  प्रसार को देखते हुए देश के कई राज्यों में लोगों की आवाजाही को सीमित करने के लिये कार्यकारी आदेश जारी किये गए थे।
    • इसके तहत लोगों को जितना संभव हो अपने घरों में रहने के निर्देश दिये गए और सामूहिक बैठकों को कम करने तथा बीमार वृद्ध लोगों के संदर्भ में भी विशेष दिशा निर्देश जारी किये गए थे। 
    • 15 मार्च, 2020 तक अमेरिका की कुल जनसंख्या के लगभग ⅕ लोगों पर ‘घर पर ही रहने’ (Stay at Home) के आदेश लागू थे और आने वाले दिनों में इसके बढ़ने की उम्मीदें की जा रही थी।

    क्या है ‘शेल्टर इन प्लेस’?

    • अमेरिका के संदर्भ में यह कोई विधिक शब्द (Legal Term) नहीं है, साथ ही इसके अर्थ और आशय भी अलग-अलग हैं।  
    • सामान्य अर्थों में यह किसी प्रकार के प्रतिबंध को लागू किये जाने के बारे में जानकारी देता है, परंतु इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। 
    • विशेषज्ञों के अनुसार, अंततः इस प्रोटोकॉल का आशय (किसी खतरे की स्थिति में) यह निर्णय लेना है कि लोगों को क्या करना चाहिये और क्या नहीं।
    • भारत में भी प्रधानमंत्री ने ‘जनता कर्फ्यू’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी कि लोगों को क्या करना चाहिये और क्या नहीं।
    • बल्कि अधिकारियों ने निषेधात्मक आदेशों की ही तरह अपीलों, सुझावों और कार्यकारी कार्रवाई (Executive action) के माध्यम से आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक कदम उठाए, साथ ही शहरों में व्यापारी संघ और हाउसिंग सोसायटियों ने स्वेच्छा से प्रधानमंत्री के आह्वान का अनुसरण किया।
    • सामान्य शब्दों में कहें तो भारत के साथ अन्य जगहों (देशों) में ‘शेल्टर इन प्लेस’, सामाजिक दूरी (Social Distancing) के माध्यम से COVID-19 की वैश्विक चुनौती को नियंत्रित करना है। 
    • 16 मार्च, 2020 को कैलिफोर्निया राज्य के ‘सैन फ्रांसिस्को’ (San Francisco) शहर में स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा जारी आदेश के अनुसार, इन आदेशों का उद्देश्य अनिवार्य सेवाओं को जारी रखते हुए अधिक-से-अधिक लोगों को उनके घरों में रहने और अपने को ‘सेल्फ आइसोलेट’ (Self-Isolate) करने का आग्रह करना था।   
    • इस आदेश में लोगों को बाहर निकलते समय अन्य लोगों से कम-से-कम 6 फीट की दूरी बनाने का भी सुझाव दिया गया। 

    चुनौतियाँ:

    • COVID-19 की महामारी के कारण विश्व के सभी देशों के स्वास्थ्य तंत्र पर भारी दबाव देखने को मिला है।
    • COVID-19 के प्रसार के लिये लंबी अवधि तक ‘शेल्टर इन प्लेस’ या ‘जनता कर्फ्यू’ जैसे प्रयासों से लोगों की आवाजाही पर नियंत्रण करना प्रशासन के लिये एक बड़ी चुनौती है।
    • इस तरह के प्रतिबंधों का प्रभाव देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी देखने को मिला है।
    • उद्योगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बंद होने से भारी मात्रा में बेरोज़गारी में वृद्धि हुई है।

    निष्कर्ष:  

    COVID-19 की महामारी का प्रभाव वैश्विक रूप से स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ अन्य क्षेत्रों में भी देखने को मिला है। वर्तमान में बिना किसी प्रमाणिक उपचार के आभाव में इस महामारी के नियंत्रण का एक ही उपचार इसके प्रसार को सीमित करना है। इस आपदा से निपटने में सभी नागरिकों को स्वेच्छा से अपना सहयोग देना चाहिए, जिससे इस आपदा से होने वाली क्षति को सीमित किया जा सके।          

    स्रोत:  द इंडियन एक्सप्रेस


    विविध

    Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 28 मार्च, 2020

    हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा

    हाल ही में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा को कोरोनावायरस (COVID-19) के उपचार के लिये एक आवश्यक दवा घोषित किया गया था, जिसके पश्चात् भारत सरकार ने इस दवा को अनुसूची H1 में शामिल कर कर दिया है, जिसके साथ ही इस देश में इस दवा के निर्यात पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और उसके फार्मूले के साथ बनने वाली अन्य सभी दवाओं को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स अधिनियम (Drugs and Cosmetics Act) की अनुसूची H1 में शामिल किया है। नियमों के अनुसार, अनुसूची H1 में शामिल दवा को पंजीकृत डाक्टर की अनुसंशा के बिना नहीं बेचा जा सकता है। साथ ही विक्रेता के लिये डॉक्टर की उस पर्ची को ड्रग विभाग के पास भी जमा करना अनिवार्य होता है। यह अनुसूची वर्ष 2013 में प्रस्तुत की गई थी। अभी तक इस सूची में एड्स समेत ऐसी गंभीर बीमारियों की दवाएँ शामिल की गई हैं, जिनका शरीर पर गंभीर दुष्प्रभाव होता है, किंतु मरीज़ की जान बचाने के लिये इन दवाओं का प्रयोग आवश्यक होता है।

    भारत की आर्थिक वृद्धि दर में कमी- मूडीज़ 

    वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज़ इन्वेस्टर्स सर्विस ने वित्तीय वर्ष 2020 में भारत की आर्थिक वृद्धि के पहले के अपने अनुमान को घटाकर 2.5 प्रतिशत कर दिया है। इससे पूर्व मूडीज़ ने इस अवधि के लिये भारत की आर्थिक वृद्धि दर 5.3 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था। मूडीज़ के अनुसार, कोरोनावायरस संकट का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कारोनावायरस आर्थिक गतिविधियाँ लगभग रुक गई हैं और इसी वजह से देश की वृद्धि दर घटने का अनुमान है। मूडीज़ के अनुसार, भारत में बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के पास नकद की कमी के चलते भारत में ऋण प्राप्त करने को लेकर पहले से ही बड़ी बाधा चल रही है।’ 

    ‘ऑपरेशन नमस्ते’

    हाल ही में भारतीय थल सेना ने देश में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिये ‘ऑपरेशन नमस्ते’ लॉन्च किया है। इस ऑपरेशन के तहत सेना भारत सरकार को घातक बीमारी से लड़ने में मदद करेगी। इस ऑपरेशन के तहत थल सेना ने अब तक 8 क्वारंटाइन स्थापित किये हैं। साथ ही, हेल्प लाइन नंबर भी जारी किये गए हैं। सैनिकों के परिवारों के लिये सुविधाओं की व्यवस्था भी की गई है। सेना ने जवानों को सुरक्षित रखने के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किये हैं, क्योंकि परिचालन और सामरिक कारणों से सामाजिक दूरी को बनाए रखना मुश्किल है। भारतीय थल सेना भारतीय सशस्त्र बलों का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जिसकी स्थापना वर्ष 1 अप्रैल, 1895 को ब्रिटिश भारतीय सेना के रूप में की गई थी। भारतीय सेना का प्राथमिक कार्य राष्ट्रीय की सुरक्षा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करना है। 

    हिमाचल प्रदेश 100 प्रतिशत LPG प्राप्तकर्त्ता

    हाल ही में हिमाचल प्रदेश, देश का प्रथम ‘100 प्रतिशत LPG गैस प्राप्तकर्त्ता’ राज्य बन गया है। हिमाचल प्रदेश की ‘हिमाचल गृहणी सुविधा योजना’ के तहत राज्य में लगभग सभी लोगों के पास LPG गैस की सुविधा उपलब्ध है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के कार्यान्वयन के पश्चात् राज्य सरकार ने मई 2018 में शेष घरों को कवर करने के लिये ‘हिमाचल गृहिणी सुविधा योजना’ शुरू की थी। 27 दिसंबर, 2019 तक राज्य में 2.64 लाख एलपीजी गैस कनेक्शन जारी किये गए है, उल्लेखनीय है की वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल जनसंख्या 68.64 लाख है। राज्य सरकार की इस योजना के तहत राज्य के उन सभी लोगों को शामिल किया गया था, जिनके परिवार में पेंशनभोगी, आयकरदाता या सरकार, बोर्ड अथवा निगम आदि में परिवार का कोई सदस्य नहीं है।


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