हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

डेली न्यूज़

  • 27 Sep, 2022
  • 55 min read
मैप

भारत में मैंग्रोव वन

Mangroves-in-India

और पढ़ें...


भारतीय राजनीति

मृत्युदंड पर SC का संदर्भ

प्रिलिम्स के लिये:

मृत्युदंड, भारतीय दंड संहिता, बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य।

मेन्स के लिये:

भारत में मृत्युदंड के पक्ष और विरोध में तर्क, मृत्युदंड पर SC का संदर्भ।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने एक बड़ी बेंच को मृत्युदंड देने के मानदंडों से संबंधित मुद्दों को संदर्भित किया है।

न्यायालय का आदेश:

  • सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ का वर्तमान संदर्भ में पांँच-न्यायाधीशों की पीठ मेंं रूपांतरण इस तर्क पर आधारित है कि एक ही दिन में सज़ा की प्रक्रिया आरोपी के खिलाफ निराशाजनक रूप से झुकी हुई है।
  • पीठ ने कहा कि राज्य को मुकदमे की पूरी अवधि के दौरान अभियुक्तों के खिलाफ आपत्तिजनक परिस्थितियों को पेश करने का अवसर दिया जाता है।
  • दूसरी ओर, आरोपी अपनी दोषसिद्धि के बाद ही अपने पक्ष में परिस्थितियों को कम करने वाले साक्ष्य पेश करने में सक्षम होते हैं।

मुद्दा:

  • सज़ा की सुनवाई कब और कैसे होनी चाहिये, इस पर परस्पर विरोधी निर्णय हैं कि क्या सज़ा के निर्धारण पर कार्यवाही निर्णय के दिन ही होनी चाहिये या कुछ दिन बाद।
  • यह मुद्दा उन लोगों को अर्थपूर्ण अवसर देने से संबंधित है जो मृत्युदंड के दोषी पाए गए हैं और वे मृत्युदंड के बजाय आजीवन कारावास के संबंध में बेहतर दलील जैसे कारकों और परिस्थितियों को पेश कर सकें।
  • मुद्दा कानूनी आवश्यकता से उत्पन्न होता है कि जब भी कोई न्यायालय दोषसिद्धि दर्ज करता है, तो उसे सज़ा के स्तर को लेकर अलग से सुनवाई करनी होती है।

कानून और निर्णय क्या हैं?

  • दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 235 के अनुसार, यदि आरोपी को दोषी ठहराया जाता है, तो न्यायाधीश सज़ा के सवाल पर आरोपी की सुनवाई करेगा और फिर सज़ा सुनाएगा।
    • यह प्रक्रिया तब महत्त्वपूर्ण हो जाती है, यदि दोषसिद्धि किसी ऐसे अपराध के लिये है जिसमें मृत्यु या आजीवन कारावास शामिल है।
  • धारा 354(3) के अनुसार, मृत्युदंड या आजीवन कारावास के मामले में निर्णय में यह बताना होगा कि सज़ा क्यों दी गई।
  • यदि सज़ा, मृत्युदंड है तो निर्णय में "विशेष कारण" प्रदान करना होगा।
  • 1980 में सर्वोच्च न्यायालय ने 'बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य' में मृत्युदंड की संवैधानिकता को इस शर्त पर बरकरार रखा कि यह सज़ा "दुर्लभ से दुर्लभतम" मामलों में दी जाएगी।
    • महत्त्वपूर्ण रूप से न्यायालय ने यह भी ज़ोर दिया कि सज़ा की सुनवाई अलग से होगी, जहाँ एक न्यायाधीश को इस बात पर राजी करने की कोशिश की जाएगी कि मृत्युदंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिये।
  • न्यायालय के कई बाद के फैसलों में इस स्थिति को दोहराया गया था, जिसमें 'मिठू बनाम पंजाब राज्य', 1982 में पाँच न्यायाधीशों की बेंच ने अनिवार्य मृत्युदंड को खारिज कर दिया था, क्योंकि यह सज़ा देने से पहले किसी आरोपी के सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन करता है। .

निर्णय के दिन ही सज़ा:

  • भले ही सभी मुकदमों में सज़ा पर एक अलग सुनवाई का अभ्यास किया जाता है, लेकिन अधिकांश न्यायाधीश ऐसे मामले को दोबारा निर्णय के लिये भविष्य की तारीख के लिये स्थगित नहीं करते हैं।
  • जैसे ही 'दोषी' पर फैसला सुनाया जाता है, न्यायालय दोनों पक्षों के वकील से सज़ा पर बहस करने के लिये कहता है।
  • एक विचार है कि मृत्युदंड संबंधी निर्णय 'एक ही दिन में देने' से प्रतिवादी को अपर्याप्त समय मिलता है और यह प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है क्योंकि दोषियों की सज़ा को कम करने वाले कारकों को इकट्ठा करने के लिये पर्याप्त समय नहीं मिलता है।
  • निर्णयों की एक शृंखला में सर्वोच्च न्यायालय ने वकालत की है कि सज़ा की सुनवाई अलग से की जाए, यानी दोषसिद्धि के बाद भविष्य की तारीख में।
  • हालाँकि एक तरह के विरोधाभास के रूप में कई निर्णयों ने 'एक ही दिन' सज़ा देने की प्रथा को बरकरार रखा है।

संभावित परिणाम:

  • सज़ा के निर्णय संबंधी परिस्थितियों और कारकों पर संविधान पीठ व्यापक दिशा-निर्देश निर्धारित कर सकती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ट्रायल कोर्ट के लिये सज़ा सुनाने से पहले आरोपी को बेहतर तरीके से जानना ज़रूरी बना सकता है।
  • न्यायालय मनोवैज्ञानिकों और मनोविश्लेषणात्मक विशेषज्ञों की मदद का मसौदा तैयार कर सकता है।
    • सज़ा प्रक्रिया के हिस्से के रूप में आरोपी के बचपन के अनुभवों और पालन-पोषण, परिवार का मानसिक स्वास्थ्य इतिहास एवं दर्दनाक अतीत के अनुभव तथा अन्य सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों की संभावना का अध्ययन करना अनिवार्य हो सकता है।
  • इसका मतलब यह हो सकता है कि ट्रायल कोर्ट को वर्तमान कार्य प्रणालियों के विपरीत बेहतर तरीके से सूचित किया जाएगा, जब केवल बुनियादी डेटा जैसे कि शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का पता लगाने से पहले सज़ा सुनाई जाती है।

मृत्युदंड:

  • मृत्युदंड सज़ा का कठोरतम रूप है। यह दंड मानवता के विरुद्ध नृशंस और जघन्य अपराधों के लिये दिया जाता है।
    • भारतीय दंड संहित के तहत वे कुछ अपराध, जिनके लिये अपराधियों को मौत की सज़ा  दी जा सकती है:
      • हत्या (धारा 302)
      • डकैती (धारा 396)
      • आपराधिक षड्यंत्र (धारा 120B)
      • भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध या युद्ध का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना (धारा 121)
      • विद्रोह का उन्मूलन (धारा 132) और अन्य।
  • मृत्युदंड के लिये ‘डेथ पेनाल्टी’ और ‘कैपिटल पनिशमेंट’ शब्द का इस्तेमाल एक-दूसरे के स्थान पर होता रहा है, हालाँकि हमेशा ही अनिवार्य रूप से इस दंड का क्रियान्वयन नहीं होता है। इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति द्वारा आजीवन कारावास या क्षमा में रूपांतरित किया जा सकता है।
  • आगे की राह
  • सुनवाई इस बहस को प्रभावी ढंग से सुलझाएगी कि क्या ट्रायल कोर्ट द्वारा मौत की सज़ा देने वाली तीव्र सुनवाई- कुछ मामलों में कुछ दिनों में- कानूनी रूप से मान्य है।
  • मौत की सज़ा का निर्धारण करने वाले मानकों के स्तर को बढ़ाने की दिशा में भी यह फैसला एक महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है।
  • सज़ा का उद्देश्य केवल अपराधी को खत्म करना नहीं बल्कि अपराध को समाप्त करने पर भी होना चाहिये। आपराधिक कानून में सज़ा का उद्देश्य, यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक व्यवस्थित समाज के लक्ष्य को प्राप्त करना है। अपराधी और पीड़ित के अधिकारों को संतुलित करके शांति बहाली सुनिश्चित करने और भविष्य में होने वाले अपराधों को रोकने की आवश्यकता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. मृत्युदंड की सज़ा  को कम करने में राष्ट्रपति की देरी के उदाहरण न्याय से इनकार के रूप में सार्वजनिक बहस का मुद्दा रहे हैं। क्या ऐसी याचिकाओं को स्वीकार/अस्वीकार करने हेतु राष्ट्रपति के लिये कोई समय-सीमा निर्धारित होनी चाहिये? विश्लेषण कीजिये। (2014)

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

स्टार्टअप की मदद के लिये स्थापित कोष

प्रिलिम्स के लिये:

स्टार्टअप, स्टार्टअप क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप और योजनाएँ

मेन्स के लिये:

स्टार्टअप परितंत्र और इसका महत्त्व, सरकारी हस्तक्षेप

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत सरकार ने 88 वैकल्पिक निवेश कोष (AIFs) के लिये 2016 में शुरू किये गए स्टार्टअप इंडिया निवेश के लिये फंड ऑफ फंड के तहत 7,385 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।

  • बदले में AIF ने 720 स्टार्टअप में 11,206 करोड़ रुपए का निवेश किया है।

स्टार्टअप की मदद के लिये स्थापित कोष:

  • विषय:
    • FSS के तहत भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा पंजीकृत वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) को सहायता दी जाती है, जो बदले में स्टार्टअप्स में निवेश करते हैं।
    • FFS की घोषणा 10,000 करोड़ रुपए के कोष के साथ की गई थी। .
      • वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) द्वारा बजटीय सहायता के माध्यम से 14वें और 15वें वित्त आयोग चक्र (वित्त वर्ष 2016-2020 तथा वित्त वर्ष 2021-2025) में इस राशि का संग्रह किया जाना है।
    • FFS ने शुरुआती चरण, बीज चरण और विकास चरण में स्टार्टअप के लिये पूंजी उपलब्ध कराई है।
      • इसने घरेलू पूंजी जुटाने, विदेशी पूंजी पर निर्भरता को कम करने और घरेलू एवं नए उद्यम पूंजी कोष को प्रोत्साहित करने में भी भूमिका निभाई है।.
  • प्रदर्शन:
    • FFS के अंतर्गत तय राशि योजना के शुभारंभ के बाद से 21% से अधिक की CAGR (यौगिक वार्षिक वृद्धि दर) दर से प्रतिवर्ष बढ़ी है।
    • इस योजना के संचालन के लिये उत्तरदायी भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) द्वारा हाल ही में सुधारों की एक शृंखला शुरू की है ताकि FFS के तहत सहायता प्राप्त वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) को त्वरित गिरावट प्राप्त करके अभीष्ट स्थिति प्राप्त करने के सक्षम बनाया जा सके।
      • इसके परिणामस्वरूप गिरावट की राशि में साल-दर-साल 100% की वृद्धि हुई है।
    • FFS ने AIFs समर्थित 88 में से 67 AIF को एंकर करने में मदद की है।
      • इनमें से 38 बिल्कुल नए निवेश प्रबंधक हैं जो FFS के भारतीय स्टार्टअप्स के लिये उद्यम पूंजी निवेश के मुख्य उद्देश्य के अनुरूप हैं।
    • FFS के माध्यम से समर्थित प्रदर्शन करने वाले स्टार्टअप मूल्यांकन में 10 गुना से अधिक की वृद्धि दर्शा रहे हैं, उनमें से कई ने यूनिकॉर्न स्थिति (1 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का मूल्यांकन) प्राप्त कर ली है।

वैकल्पिक निवेश कोष:

  • विषय:
    • वैकल्पिक निवेश कोष भारत में स्थापित या निगमित कोई भी कोष जो निजी रूप से एक जमा निवेश साधन है तथा अपने निवेशकों के लाभ के लिये एक परिभाषित निवेश नीति के अनुसार निवेश करने हेतु परिष्कृत निवेशकों, चाहे भारतीय हो या विदेशी, से धन एकत्र करता है।
    • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) विनियम (AIFs), 2012 के विनियम 2(1)b में AIFs की परिभाषा दी गई है।
    • एक कंपनी, या सीमित देयता भागीदारी (LLP) के माध्यम से, एक वैकल्पिक निवेश कोष स्थापित किया जा सकता है।
  • श्रेणी:
    • आवेदक निम्नलिखित श्रेणियों में से एक में AIF के रूप में पंजीकरण की मांग कर सकते हैं:
    • श्रेणी I:
      • वेंचर कैपिटल फंड (एंजेल फंड सहित)
      • SME फंड
      • सामाजिक उद्यम निधि
      • इंफ्रास्ट्रक्चर फंड
    • श्रेणी II:
      • इसमें वे AIF शामिल हैं जो श्रेणी I और III में नहीं आते हैं और जो SEBI (वैकल्पिक निवेश निधि) विनियमों में अनुमति के अनुसार दिन-प्रतिदिन की परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करने के अलावा अन्य उधार नहीं लेते हैं।
      • उदाहरण: रियल एस्टेट फंड, प्राइवेट इक्विटी फंड (PE फंड), डिस्ट्रेस्ड एसेट्स के लिये फंड आदि।
    • श्रेणी III:
      • ये AIF, विविध एवं जटिल व्यापारिक रणनीतियों का प्रयोग करते हैं तथा सूचीबद्ध या गैर-सूचीबद्ध डेरिवेटिव में निवेश कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
      • उदाहरण: हेज फंड, पब्लिक इक्विटी में निजी निवेश (PIPE) फंड आदि।

भारत में स्टार्टअप्स की स्थिति:

  • स्टार्टअप का परिचय:
    • स्टार्टअप शब्द एक कंपनी के संचालन के पहले चरण को संदर्भित करता है। स्टार्टअप एक या एक से अधिक उद्यमियों द्वारा स्थापित किये जाते हैं जो मांग वाले उत्पाद या सेवा संबंधी उद्यम विकसित करना चाहते हैं।
    • ये कंपनियांँ आमतौर पर उच्च लागत और सीमित राजस्व के साथ शुरू होती हैं, यही वजह है कि वे उद्यम पूंजीपतियों जैसे विभिन्न स्रोतों से पूंजी की तलाश करती हैं।
  • भारत में स्थिति:
    • राष्ट्रीय परिदृश्य:
      • अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारितंत्र बन गया है।
      • भारत में 75,000 स्टार्टअप हैं।
      • 49% स्टार्टअप टियर-2 और टियर-3 शहरों में हैं।
      • वर्तमान में 105 यूनिकॉर्न हैं, जिनमें से 44 को वर्ष 2021 में और 19 को वर्ष 2022 में प्रारंभ किया गया था।
      • आईटी, कृषि, विमानन, शिक्षा, ऊर्जा, स्वास्थ्य और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भी स्टार्टअप उभर रहे हैं।
    • वैश्विक नवाचार सूचकांक:
      • विश्व की 130 अर्थव्यवस्थाओं में भारत को वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) की वैश्विक रैंकिंग में वर्ष 2015 के 81वें से 2021 में 46वें स्थान पर रखा गया है।
      • भारत 34 निम्न मध्यम-आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में दूसरे स्थान पर है और GII के संदर्भ में 10 मध्य और दक्षिणी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में प्रथम स्थान पर है।
    • अन्य रैंकिंग:
      • प्रकाशन:
        • राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन डेटाबेस के आधार पर वर्ष 2013 के छठे स्थान से विश्व स्तर पर तीसरे (2021) स्थान पर पहुँच गया।
      • पेटेंट:
        • रेजिडेंट पेटेंट फाइलिंग के मामले में विश्व स्तर पर 9वें (2021) स्थान पर है।
      • अनुसंधान प्रकाशनों की गुणवत्ता:
        • 2013ं के 13वें स्थान से वैश्विक स्तर पर 9वें (2021) स्थान पर पहुँच गया।
  • स्टार्टअप के लिये पहल:
    • नवाचारों के विकास और दोहन के लिये राष्ट्रीय पहल (निधि)
    • स्टार्टअप इंडिया एक्शन प्लान (SIAP)
    • स्टार्टअप पारितंत्र को समर्थन पर राज्यों की रैंकिंग (RSSSE)
    • स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम (SISFS):
      • इसका उद्देश्य स्टार्टअप को अवधारणा के प्रमाण, प्रोटोटाइप विकास, उत्पाद परीक्षण, बाज़ार में प्रवेश और व्यावसायीकरण के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
    • राष्ट्रीय स्टार्टअप पुरस्कार:
      • उन उत्कृष्ट स्टार्टअप्स और पारितंत्र एनेबलर्स की पहचान और उन्हें पुरस्कृत करना जो नवाचार एवं प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देकर आर्थिक गतिशीलता में योगदान दे रहे हैं।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

प्रश्न. वेंचर कैपिटल से तात्पर्य है: (2014)

(A) उद्योगों को प्रदान की जाने वाली एक अल्पकालिक पूंजी
(B) नए उद्यमियों को प्रदान की गई दीर्घकालिक स्टार्टअप पूंजी
(C) नुकसान के समय उद्योगों को प्रदान की गई धनराशि
(D) उद्योगों के प्रतिस्थापन और नवीनीकरण के लिये प्रदान की गई धनराशि

उत्तर: (B)

व्याख्या:

  • वेंचर कैपिटल एक नए या बढ़ते व्यवसाय के लिये फंड का एक रूप है। यह आमतौर पर उद्यम पूंजी फर्मों से आता है जो उच्च जोखिम वाले वित्तीय पोर्टफोलियो बनाने में विशेषज्ञ होते हैं।
  • वेंचर कैपिटल के साथ वेंचर कैपिटल फर्म स्टार्टअप में इक्विटी के बदले स्टार्टअप कंपनी को फंडिंग करती है।
  • जो लोग इस पैसे का निवेश करते हैं उन्हें वेंचर कैपिटलिस्ट (वीसी) कहा जाता है। उद्यम पूंजी निवेश को जोखिम पूंजी या रोगी जोखिम पूंजी के रूप में भी संदर्भित किया जाता है, क्योंकि इसमें उद्यम सफल नहीं होने पर धन खोने का जोखिम शामिल होता है और निवेश को फलने-फूलने के लिये मध्यम से लंबी अवधि की अवधि लगती है।
  • अतः विकल्प (B) सही है।

स्रोत: पी.आई.बी.


भारतीय अर्थव्यवस्था

मेक इन इंडिया के आठ वर्ष

प्रिलिम्स के लिये:

मेक इन इंडिया, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI), नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS), एक ज़िला-एक उत्पाद (ODOP)।

मेन्स के लिये:

भारतीय अर्थव्यवस्था को ट्रांसफॉर्म करने में मेक इन इंडिया का महत्त्व ।

चर्चा में क्यों?

मेक इन इंडिया ने आठ वर्ष के पथ-प्रदर्शक सुधार कर लिये हैं और वर्ष 2022 में वार्षिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश दोगुना होकर 83 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है।

FDI

मेक इन इंडिया कार्यक्रम:

  • परिचय:
    • वर्ष 2014 में लॉन्च किये गए मेक इन इंडिया का मुख्य उद्देश्य देश को एक अग्रणी वैश्विक विनिर्माण और निवेश गंतव्य में बदलना है।
    • यह पहल दुनिया भर के संभावित निवेशकों और भागीदारों को 'न्यू इंडिया' की विकास गाथा में भाग लेने हेतु एक खुला निमंत्रण हैै।
    • मेक इन इंडिया ने 27 क्षेत्रों में पर्याप्त उपलब्धियांँ हासिल की हैं। इनमें विनिर्माण और सेवाओं के रणनीतिक क्षेत्र भी शामिल हैं।
  • उद्देश्य:
    • नए औद्योगीकरण के लिये विदेशी निवेश को आकर्षित करना और चीन से आगे निकलने के लिये भारत में पहले से मौजूद उद्योग आधार का विकास करना।
    • मध्यावधि में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि को 12-14% वार्षिक करने का लक्ष्य।
    • देश के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को वर्ष 2022 तक 16% से बढ़ाकर 25% करना।
    • वर्ष 2022 तक 100 मिलियन अतिरिक्त रोज़गार सृजित करना।
    • निर्यात आधारित विकास को बढ़ावा देना।
  • परिणाम:
    • FDI अंतर्वाह: 2014-2015 में भारत में FDI अंतर्वाह 45.15 बिलियन अमेरिकी डॉलर था और तब से लगातार आठ वर्षों में रिकॉर्ड FDI प्रवाह तक पहुंँच गया है।
      • वर्ष 2021-22 में 83.6 अरब अमेरिकी डॉलर का अब तक का सबसे अधिक FDI दर्ज किया गया।
      • हाल के वर्षों में आर्थिक सुधारों और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस की वजह से भारत चालू वित्त वर्ष (2022-23) में FDI में 100 बिलियन अमेरिकी डाॅलर को आकर्षित करने की राह पर है।
    • वित्तीय वर्ष 2021-22 में खिलौनों का आयात 70% घटकर (877.8 करोड़ रुपए) हो गया है। भारत के खिलौनों के निर्यात में अप्रैल-अगस्त 2022 में 2013 की इसी अवधि की तुलना में 636% की जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई है।
    • प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI): 14 प्रमुख विनिर्माण क्षेत्रों में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना 2020-21 में मेक इन इंडिया पहल को एक बड़े बढ़ावा के रूप में शुरू की गई थी।

मेक इन इंडिया योजना में सहायक पहल:  

  • राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS):
    • राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS) का सितंबर 2021 में शुभारंभ किया गया ताकि निवेशकों को अनुमोदन और मंज़ूरी के लिये एकल डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रदान करके व्यापार करने में आसानी हो।
    • इस पोर्टल ने निवेशकों के अनुभव को बढ़ाने के लिये भारत सरकार और राज्य सरकारों के विभिन्न मंत्रालयों/विभागों की कई मौजूदा निकासी प्रणालियों को एकीकृत किया है।
  • गति शक्ति:
    • सरकार ने देश में विनिर्माण क्षेत्रों के लिये मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी हेतु एक कार्यक्रम भी शुरू किया है, जिसे प्रधानमंत्री गतिशक्ति कार्यक्रम कहा जाता है यह कनेक्टिविटी में सुधार करने वाले बुनियादी ढाँचे के निर्माण के माध्यम से व्यावसायिक संचालन में ढुलाई-संबंधी दक्षता सुनिश्चित करेगा।
  • एक ज़िला एक उत्पाद योजना (ODOP):
    • इस पहल का उद्देश्य देश के प्रत्येक ज़िले को स्वदेशी उत्पादों के प्रचार और उत्पादन की सुविधा प्रदान करना तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों के हथकरघा, हस्तशिल्प, वस्त्र, कृषि एवं प्रसंस्कृत उत्पादों के कारीगरों और निर्माताओं को एक वैश्विक मंच प्रदान करना है, जिससे देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान मिलता है।
  • खिलौना निर्यात में सुधार और आयात को कम करना:
    • निम्न गुणवत्ता और खतरनाक खिलौनों के आयात को संबोधित करने तथा खिलौनों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिये सरकार द्वारा बुनियादी सीमा शुल्क को 20% से बढ़ाकर 60% करने, गुणवत्ता नियंत्रण आदेश का कार्यान्वयन, आयातित खिलौनों का अनिवार्य नमूना परीक्षण, घरेलू खिलौना निर्माताओं को 850 से अधिक बीआईएस लाइसेंस देने, खिलौना क्लस्टरों के विकास आदि जैसे कई रणनीतिक हस्तक्षेप किये गए हैं।
  • अर्द्धचालक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने हेतु योजना:
    • विश्व अर्थव्यवस्था में अर्द्धचालकों के महत्त्व को स्वीकार करते हुए सरकार ने भारत में एक अर्द्धचालक, प्रदर्शन और डिज़ाइन पारिस्थितिकी तंत्र बनाने हेतु 10 बिलियन अमेरिकी डाॅलर की प्रोत्साहन योजना शुरू की है।

मेक इन इंडिया कार्यक्रम से संबंधित मुद्दे:

  • शेल कंपनियों से निवेश: भारतीय एफडीआई का बड़ा हिस्सा न तो विदेशी है और न ही प्रत्यक्ष बल्कि मॉरीशस स्थित शेल कंपनियों से आता है, जिनके बारे में संदेह है कि वे केवल भारत से काले धन का निवेश कर रहे हैं, जो मॉरीशस के माध्यम से भेजा जाता है।
  • कम उत्पादकता: भारतीय कारखानों की उत्पादकता कम है और श्रमिकों के पास अपर्याप्त कौशल है।
    • मैकिंजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि विनिर्माण क्षेत्र में भारतीय श्रमिक थाईलैंड और चीन में अपने समकक्षों की तुलना में औसतन लगभग चार से पाँच गुना कम उत्पादक हैं।
  • लघु औद्योगिक इकाइयाँ: पैमाने की वांछित अर्थव्यवस्थाओं को प्राप्त करने, आधुनिक उपकरणों में निवेश करने तथा आपूर्ति् शृंखला विकसित करने के लिये औद्योगिक इकाइयों का आकार छोटा है।
  • बुनियादी ढाँचा: भारत और चीन में विद्युत की लागत लगभग समान है, लेकिन भारत में विद्युत की कटौती बहुत अधिक है।
  • परिवहन: चीन में औसत गति लगभग 100 किमी. प्रति घंटा है, जबकि भारत में यह लगभग 60 किमी. प्रति घंटा है। भारतीय रेलवे संतृप्त हो गया है और बहुत से एशियाई देशों के लिये भारतीय बंदरगाहों का प्रदर्शन बेहतर किया गया है।
    • विश्व बैंक के वर्ष 2018 लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स (LPI) ने 160 देशों में भारत को 44वाँ स्थान दिया। सिंगापुर सातवें, चीन को 26वें और मलेशिया को 41वें स्थान पर रखा गया। सिंगापुर में जहाज़ का औसत टर्नअराउंड समय एक दिन से भी कम था और भारत में यह 2.04 दिन था।
  • लालफीताशाही: नौकरशाही प्रक्रियाएँ और भ्रष्टाचार भारत को निवेशकों के लिये कम आकर्षक बनाते हैं।

आगे की राह

  • मेक इन इंडिया पहल यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि देश में व्यापार पारिस्थितिकी तंत्र भारत में व्यापार करने वाले निवेशकों के लिये अनुकूल है और राष्ट्र के वृद्धि एवं विकास में योगदान दे।
  • यह कई सुधारों के माध्यम से संभव हुआ है जिससे निवेश प्रवाह में वृद्धि हुई है और साथ ही आर्थिक विकास भी हुआ है।
  • इस पहल के अंतर्गत भारत में व्यवसायों का लक्ष्य है कि जो उत्पाद 'मेड इन इंडिया' हैं, वे 'मेड फॉर द वर्ल्ड' भी हैं, जो गुणवत्ता के वैश्विक मानकों का पालन करते हैं।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. विनिर्माण क्षेत्र में विकास को बढ़ावा देने के लिये भारत सरकार की हालिया नीतिगत पहल क्या है/हैं? (2012)

  1. राष्ट्रीय निवेश और विनिर्माण क्षेत्रों की स्थापना
  2. 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस' का लाभ प्रदान करना
  3. प्रौद्योगिकी अधिग्रहण और विकास कोष की स्थापना

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: d

  • राष्ट्रीय निवेश और विनिर्माण क्षेत्र एक नई अवधारणा है जो राष्ट्रीय विनिर्माण नीति, 2011 का एक अभिन्न अंग है। राष्ट्रीय विनिर्माण नीति विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिये नामित क्षेत्रों का चयन करने हेतु लागू किया जाने वाला एक नीति उपकरण है। अत: 1 सही है।
  • इसके तहत 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस' की सुविधा प्रदान की गई है, जो लालफीताशाही को कम करेगा और देश में निवेश एवं व्यापार करने में आसानी की सुविधा प्रदान करेगा। अत: 2 सही है।
  • प्रौद्योगिकी अधिग्रहण और विकास कोष (TADF) को राष्ट्रीय विनिर्माण नीति के तहत लॉन्च किया गया था। TADF सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) द्वारा भारत अथवा विश्व स्तर पर बाज़ार में उपलब्ध प्रौद्योगिकी/अनुकूलित उत्पादों/विशिष्ट सेवाओं/पेटेंट/औद्योगिक डिज़ाइन के रूप में स्वच्छ, हरित तथा ऊर्जा कुशल प्रौद्योगिकियों के अधिग्रहण की सुविधा के लिये एक नई योजना है। अत: 3 सही है।
  • इसका उद्देश्य "मेक इन इंडिया" के राष्ट्रीय फोकस में योगदान करने के लिये MSME क्षेत्र में विनिर्माण विकास को उत्प्रेरित करना है। अतः विकल्प (d) सही उत्तर है।

मेन्स:

प्रश्न. “मेक इन इंडिया कार्यक्रम की सफलता 'कौशल भारत’ (Skill India) कार्यक्रम की सफलता और क्रांतिकारी श्रम सुधारों पर निर्भर करती है।" तार्किक तर्कों के साथ चर्चा कीजिये। (2019)


भारतीय अर्थव्यवस्था

सेमीकंडक्टर चिप निर्माण हेतु संशोधित प्रोत्साहन योजना

प्रिलिम्स  के लिये:

अर्द्धचालक (Semiconductor) और संबंधित योजनाएँ,  चिप निर्माण पहल, पीएलआई योजना, डीएलआई योजना, इलेक्ट्रॉनिक घटकों और अर्द्धचालकों के विनिर्माण हेतु प्रोत्साहन योजना (SPECS), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT)।

मेन्स के लिये:

भारतीय अर्थव्यवस्था में अर्द्धचालक उपकरणों का महत्त्व, अर्द्धचालक और भारत में इसका भविष्य।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम के विकास हेतु योजना में बदलाव को मंज़ूरी दी है ताकि भारत की 10 बिलियन डॉलर की चिप निर्माण पहल को निवेशकों के लिये अधिक आकर्षक बनाया जा सके।

भारत की चिप निर्माण योजना में स्वीकृत परिवर्तन:

  • पृष्ठभूमि:
    • वर्ष 2021 में भारत ने देश में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित करने के लिये लगभग $ 10 बिलियन डॉलर की उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना की घोषणा की।
    • साथ ही डिज़ाइन सॉफ्टवेयर, आईपी अधिकारों आदि से संबंधित वैश्विक और घरेलू निवेश को बढ़ावा देने के लिये एक डिज़ाइन-लिंक्ड इनिशिएटिव (DLI) योजना की घोषणा की गई।
  • परिवर्तन:
    • एक समान 50% वित्तीय सहायता: योजना के पिछले संस्करण में केंद्र सरकार 45nm से 65nm चिप उत्पादन के लिये परियोजना लागत का 30%, 28nm से 45nm के लिये 40% और 28nm या उससे कम के लिये 50% या आधी लागत की सहायता करती थी। संशोधित योजना सभी नोड्स के लिये एक समान 50% वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
    • वेदांता और ताइवान की चिपमेकर फॉक्सकॉन ने गुजरात में 1,54,000 करोड़ रुपए का सेमीकंडक्टर प्लांट लगाने के लिये समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये हैं।
    • दो अन्य परियोजनाओं की भी घोषणा की गई है:
      • इंटरनेशनल कंसोर्टियम आईएसएमसी द्वारा कर्नाटक में 3 बिलियन डॉलर का प्लांट।
        • आईएसएमसी अबू धाबी स्थित नेक्स्ट ऑर्बिट वेंचर्स और इज़रायल के टॉवर सेमीकंडक्टर का संयुक्त उद्यम है।
      • सिंगापुर के आईजीएसएस वेंचर्स द्वारा तमिलनाडु में 3.5 बिलियन डॉलर का प्लांट।
      • 45nm चिप का उत्पादन: संशोधित योजना ने 45nm चिप के उत्पादन पर भी ज़ोर दिया, जो उत्पादन के मामले में काफी कम समय लेने वाला और किफायती है।
      • इन चिप्स की उच्च मांग है, जो मुख्य रूप से ऑटोमोटिव, पावर और दूरसंचार अनुप्रयोगों द्वारा संचालित है।
  • महत्त्व:
    • इन परिवर्तनों से अर्द्धचालकों के सभी प्रौद्योगिकी नोड्स के लिये सरकारी प्रोत्साहनों में सामंजस्य स्थापित होगा।
    • यह भारत में एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिये चिप के सभी क्षेत्रों को प्रोत्साहित करेगा।
    • PLI और DLI योजनाओं ने भारत में अर्द्धचालक निर्माण संयंत्र (fabs) स्थापित करने के लिये कई वैश्विक अर्द्धचालक अभिकर्त्ताओं को आकर्षित किया था एवं संशोधित कार्यक्रम इन निवेशों को और तेज़ करने के साथ ही अधिक आवेदकों को आमंत्रित करेगा।
  • चिंताएँ:
    • हालाँकि यह योजना एक उत्साहजनक कदम है, चिप उत्पादन एक संसाधन-गहन और महँगी प्रक्रिया है। नई योजना प्रक्रिया के सभी चरणों के लिये समान वित्तपोषण प्रदान करती है। तथापि, इस योजना का परिव्यय 10 अरब डॉलर है।
    • केवल एक सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करने के लिये 3 से 7 बिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता होती है।

सेमीकंडक्टर चिप्स:

  • विषय:
    • सेमीकंडक्टर ऐसी सामग्री है जिसमें चालकता सुचालक और कुचालक के बीच होती है
    • ये शुद्ध धातु, सिलिकॉन अथवा ज़र्मेनियम या कोइ यौगिक, गैलियम, आर्सेनाइड या कैडमियम सेलेनाइड हो सकते हैं।
    • सेमीकंडक्टर चिप का मूल घटक सिलिकॉन का एक टुकड़ा होता है, जिसे अरबों सूक्ष्म ट्रांजिस्टर के साथ उकेरा जाता है और विशिष्ट खनिजों एवं गैसों के साथ प्रक्षेपित किया जाता है, जो विभिन्न संगणकीय निर्देशों का पालन करते हुए विद्युत् धारा के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिये प्रतिरूप बनाते हैं।
    • आज के समय में उपलब्ध सबसे उन्नत अर्द्धचालक प्रौद्योगिकी नोड 3 nm और 5 nm (Nanometer) वाले हैं।
    • उच्च नैनोमीटर मान वाले अर्द्धचालक ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स आदि में लगाए जाते हैं, जबकि कम मान वाले अर्द्धचालकों का उपयोग स्मार्टफोन और लैपटॉप जैसे उपकरणों में किया जाता है।
    • चिप बनाने की प्रक्रिया जटिल और बहुत सटीक है, जिसमें आपूर्ति शृंखला में कई अन्य चरण होते हैं जैसे कि कंपनियों द्वारा उपकरणों में उपयोग के लिये नई सर्किट विकसित करने हेतु चिप-डिज़ाइनिंग, चिप्स के लिये सॉफ्टवेयर डिज़ाइन करना और केंद्रीय बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के माध्यम से उनका पेटेंट कराना।
      • इसके अंतर्गत चिप-निर्माण मशीन बनाना शामिल है; फैब या कारखाने, ATMP स्थापित करना।
  • महत्त्व:
    • सेमीकंडक्टर्स स्मार्टफोन से लेकर इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) में जुड़े उपकरणों तक लगभग हर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के थंबनेल के आकार के बिल्डिंग ब्लॉक हैं। वे उपकरणों को संगणकीय शक्ति देने में मदद करते हैं।
  • वैश्विक परिदृश्य:
    • चिप बनाने वाला उद्योग अत्यधिक केंद्रित है, जिसमें बड़े अभिकर्त्ता ताइवान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका हैं। वास्तव में ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) द्वारा ताइवान में 5nm चिप्स का 90% बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है।
    • इसलियवैश्विक चिप की कमी, ताइवान पर अमेरिका-चीन तनाव और रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण आपूर्ति शृंखला अवरोधों ने प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को नए सिरे से चिप बनाने के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिये प्रेरित किया है।
    • वैश्विक अर्द्धचालक उद्योग का मूल्य वर्तमान में 500-600 बिलियन अमेरिकी डॉलर है और वर्तमान में लगभग 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग कि पूर्ति करता है।
  • भारतीय परिदृश्य:
    • भारत वर्तमान में सभी चिप्स का आयात करता है और वर्ष 2025 तक बाज़ार के 24 अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। हालाँकि सेमीकंडक्टर चिप के घरेलू निर्माण के लिये भारत ने हाल ही में कई पहल शुरू की हैं:
      • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'अर्द्धचालक और प्रदर्शन विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र' के विकास का समर्थन करने के लिये 76,000 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की है।
      • भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों और अर्द्धचालकों के निर्माण के लिये इलेक्ट्रॉनिक घटकों एवं अर्द्धचालकों के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना (SPECS) भी शुरू की है।
      • वर्ष 2021 में MeitY ने सेमीकंडक्टर डिज़ाइन में शामिल कम-से-कम 20 घरेलू कंपनियों का पोषण करने और उन्हें अगले 5 वर्षों में 1500 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार हासिल करने की सुविधा के लिये डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना भी शुरू की।
    • भारत में अर्द्धचालकों की अपनी खपत वर्ष 2026 तक 80 अरब डॉलर और वर्ष 2030 तक 10 अरब डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है।

आगे की राह

  • हालाँकि भारत ऑटोमोटिव और उपकरण क्षेत्र को आपूर्ति करने के लिये शुरुआत में "लैगिंग-एज" प्रौद्योगिकी नोड्स पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, वैश्विक मांग पैदा करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि ताइवान जैसी बड़ी कंपनियाँ दुनिया भर में व्यवहार्य अत्याधुनिक चिप-टेक प्रदान करती हैं। इस प्रकार वैश्विक अभिकर्त्ताओं को यहाँ स्थापित करने के लिये आकर्षित करना फायदेमंद होगा क्योंकि वे अपने ग्राहक आधार के साथ आते हैं।
  • वर्तमान योजना परिव्यय का अधिकांश भाग डिस्प्ले फैब, पैकेजिंग और परीक्षण सुविधाओं तथा चिप डिज़ाइन केंद्रों सहित अन्य तत्त्वों का समर्थन करने के लिये आवंटित किया जा सकता है। हालाँकि शुरुआती फंडिंग डिज़ाइन और R&D जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित होनी चाहिये, जिसके लिये भारत के पास पहले से ही एक स्थापित प्रतिभा क्षेत्र है।
  • चिप बनाने के लिये भी एक दिन में गैलन अति शुद्ध जल की आवश्यकता होती है, जो कि सरकार के लिये कारखानों को उपलब्ध कराने के काम आ सकता है, इसके अतिरिक्त देश के बड़े हिस्से में अक्सर सूखे की जटिल स्थिति भी देखी गई है।
    • इसके अलावा जलापूर्ति विद्युत की एक निर्बाध आपूर्ति प्रक्रिया के लिये आवश्यक है, केवल कुछ सेकंड के उतार-चढ़ाव या स्पाइक्स के कारण लाखों का नुकसान हो सकता है।
  • सरकार के लिये एक और जटिल काम सेमीकंडक्टर उद्योग में उपभोक्ता मांग को बढ़ाना है ताकि ऐसी स्थिति न उत्पन्न हो जाए जहाँ उद्यम केवल तब तक सफल रहें जब तक करदाताओं को आवश्यक सब्सिडी प्रदान किया जाए।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. फोटोवोल्टिक इकाइयों में इस्तेमाल होने वाले सिलिकॉन वेफर्स के निर्माण में भारत दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा देश है।
  2. सौर ऊर्जा शुल्क भारतीय सौर ऊर्जा निगम द्वारा निर्धारित किये जाते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: D

व्याख्या:

  • सिलिकॉन वेफर्स सेमीकंडक्टर के पतले स्लाइस होते हैं, जैसे क्रिस्टलीय सिलिकॉन (c-Si), एकीकृत/इंटीग्रेटेड सर्किट के निर्माण और फोटोवोल्टिक सेल के निर्माण के लिये उपयोग किया जाता है। चीन अब तक सिलिकॉन का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसके बाद रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्राज़ील का स्थान है। भारत सिलिकॉन एवं सिलिकॉन वेफर्स के शीर्ष पांँच उत्पादकों में शामिल नहीं है। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • सोलर टैरिफ का निर्धारण केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग द्वारा किया जाता है, न कि भारतीय सौर ऊर्जा निगम द्वारा। अतः कथन 2 सही नहीं है

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

नवीकरणीय ऊर्जा एवं रोज़गार

प्रिलिम्स के लिये:

IRENA, ILO, नवीकरणीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा।

मेन्स के लिये:

नवीकरणीय ऊर्जा और रोज़गार -वार्षिक समीक्षा 2022। 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने "नवीकरणीय ऊर्जा एवं   रोज़गार-वार्षिक समीक्षा 2022" शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में केवल एक वर्ष में लगभग 700,000 नई नौकरियां सृजित हुई हैं।

  • इस रिपोर्ट में श्रम के साथ घरेलू बाज़ार के आकार को नौकरी सृजन को प्रभावित करने वाले एक प्रमुख कारक के रूप में पहचाना गया है।

प्राप्त निष्कर्ष:

  • अवलोकन:
    • अक्षय ऊर्जा क्षेत्र ने वर्ष 2021 में दुनिया भर में 12.7 मिलियन लोगों को रोज़गार दिया, जो 2020 से 12 मिलियन अधिक है।
    • इस प्रकार की सभी नौकरियों में लगभग दो-तिहाई हिस्सेदारी एशिया की है। अकेले चीन की वैश्विक स्तर पर 42% हिस्सेदारी है। इसके बाद यूरोपीय संघ और ब्राज़ील  का स्थान आता है (जिसमें से प्रत्येक की 10% हिस्सेदारी ) तथा फिर संयुक्त राज्य अमेरिका एवं भारत  (जिसमें से प्रत्येक की 7% हिस्सेदारी) का स्थान आता है।
    • विकसित अर्थव्यवस्थाओं की अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में निवेश की बड़ी हिस्सेदारी है। ये देश 2022 तक स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में 60% की वृद्धि हासिल करने की राह पर हैं।
  • क्षेत्रीय रुझान:
    • दक्षिण-पूर्व एशियाई देश प्रमुख सौर फोटोवोल्टिक (PV) विनिर्माण केंद्र और जैव ईंधन उत्पादक बन रहे हैं, जबकि चीन सौर पीवी पैनलों का पूर्व-प्रतिष्ठित निर्माता एवं इंस्टॉलर है तथा अपतटीय पवन क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियाँ सृजित कर रहा है।
  • भारत ने 10 गीगावाट से अधिक सौर पीवी जोड़े, जिससे कई इंस्टॉलेशन में कई नौकरियाँ सृजित हुईं, लेकिन आयातित पैनलों पर बहुत अधिक निर्भर है।
    • यूरोप दुनिया के पवन निर्माण उत्पादन का लगभग 40% हिस्सा है और पवन ऊर्जा उपकरणों का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्यातक है; यह अपने सौर पीवी विनिर्माण उद्योग का पुनर्गठन करने की कोशिश कर रहा है।
    • अफ्रीका में विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा में रोज़गार के अवसर बढ़ रहे हैं, जबकि अमेरिका में मेक्सिको पवन टरबाइन ब्लेड का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है।
    • ब्राज़ील जैव ईंधन में अग्रणी नियोक्ता बना हुआ है, साथ ही पवन और सौर पीवी प्रतिष्ठानों में कई नौकरियाँ भी जोड़ रहा है।
    • अमेरिका उभरते अपतटीय पवन क्षेत्र के लिये एक घरेलू औद्योगिक आधार बनाना शुरू कर रहा है।
  • सौर ऊर्जा:
    • सौर ऊर्जा सबसे तेज़ी से उभरता क्षेत्र बना हुआ है।
    • वर्ष 2021 में इसने कुल नवीकरणीय ऊर्जा कार्यबल के एक-तिहाई से अधिक लगभग 4.3 मिलियन नौकरियाँ प्रदान कीं।
      • वर्ष 2021 में वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड 132.8 गीगावाट सौर पीवी क्षमता स्थापित की गई थी, जो वर्ष 2020 में 125.6 गीगावाट थी।
    • चीन ने इस वृद्धि में 53 गीगावाट (40%) का योगदान दिया। इसके बाद अमेरिका, भारत और ब्राज़ील का नंबर आता है, जिन्होंने नए वार्षिक रिकॉर्ड बनाए।
  • विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा:
    • वर्ष 2021 में विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (Decentralised Renewable Energy-DRE) में प्रत्यक्ष रूप से कार्यरत लोगों की संख्या भारत में 80,000 (ज़्यादातर सौर PV में), केन्या और नाइजीरिया प्रत्येक में 50,000, युगांडा में लगभग 30,000 से अधिक थी।
      • DRE एक ऐसी प्रणाली है जो स्थानीय तरीके से विद्युत के उत्पादन, भंडारण और वितरण के लिये नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करती है।
    • शोधकर्त्ताओं ने पाया कि DRE कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी, खासकर कुशल नौकरियों के क्षेत्र में अभी भी कम है।
      • कुल मिलाकर DRE में महिलाओं की हिस्सेदारी केन्या में 41 फीसदी, इथियोपिया और नाइजीरिया में 37 फीसदी, युगांडा में 28 फीसदी तथा भारत में 21 फीसदी थी।

सिफारिशें:

  • ऊर्जा संक्रमण जिसे न केवल अच्छे रोज़गार सृजित करने की आवश्यकता है, बल्कि संक्रमण के दौरान प्रभावित श्रमिकों, समुदायों और क्षेत्रों के लिये सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की भी आवश्यकता है।
  • सफल और न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण के लिये नीति कार्यान्वयन हेतु मज़बूत सार्वजनिक नीति हस्तक्षेप और सक्षम संस्थानों की आवश्यकता होती है।
  • ऐसी औद्योगिक नीतियों का अनुसरण करना जो घर पर ही नवीकरणीय ऊर्जा की अच्छी नौकरियों के विस्तार को प्रोत्साहित करें।
  • न केवल ऊर्जा संक्रमण का अंतिम परिणाम बल्कि सभी अर्थव्यवस्थाओं के दशकों लंबे परिवर्तन की प्रक्रिया भी न्यायसंगत होनी चाहिये।
  • नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार को समग्र नीति पैकेजों के साथ समर्थन देने की आवश्यकता है, जिसमें श्रमिकों के लिये प्रशिक्षण भी शामिल है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि रोज़गार उचित, उच्च गुणवत्ता, भुगतान और उचित संक्रमण के क्षेत्र में विविधता हो।

अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA):

  • यह एक अंतर-सरकारी संगठन है, इसकी आधिकारिक तौर पर स्थापना जनवरी 2009 में बॉन, जर्मनी में की गई थी।
  • इसमें कुल 168 सदस्य हैं और भारत IRENA का 77वाँ संस्थापक सदस्य है।
  • इसका मुख्यालय आबू धाबी, संयुक्त अरब अमीरात में है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन:

  • यह एकमात्र त्रिपक्षीय संयुक्त राष्ट्र (UN) एजेंसी है। यह 187 सदस्य राज्यों (भारत एक सदस्य है) की सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिकों को एक मंच प्रदान करता है, श्रम मानकों को निर्धारित करने, नीतियों को विकसित करने तथा सभी महिलाओं एवं पुरुषों के लिये अच्छे काम को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम तैयार करता है।
  • 1969 में इसे नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया।
  • 1919 में वर्साय की संधि द्वारा राष्ट्रसंघ की एक संबद्ध एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था।
  • 1946 में यह संयुक्त राष्ट्र की पहली संबद्ध विशिष्ट एजेंसी बनी।
  • मुख्यालय: जिनेवा, स्विटज़रलैंड।

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. देश में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से संबंधित वर्तमान स्थिति और प्राप्त किये जाने वाले लक्ष्यों का विवरण दीजिये। प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) पर राष्ट्रीय कार्यक्रम के महत्त्व पर संक्षेप में चर्चा कीजिये। (2016)

स्रोत: डाउन टू अर्थ


एसएमएस अलर्ट
Share Page