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मृत्युदंड पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख

  • 23 Sep 2022
  • 13 min read

यह एडिटोरियल 21/09/2022 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “Life and death: The Supreme Court’s initiative to raise the bar on capital punishment is welcome” लेख पर आधारित है। इसमें भारतीय न्याय प्रणाली में मृत्युदंड के दायरे और इस संबंध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के हालिया रुख के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ:

मृत्युदंड (Capital punishment) एक कानूनी दंड है जो न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसने कानून द्वारा निषिद्ध ऐसा कोई अपराध किया हो जिसके लिये इस कठोरतम दंड का प्रावधान है। भारत में यह केवल भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code- IPC) और दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure) के अनुसार दुर्लभतम (Rarest of the rare) मामलों में दिया जाता है।

मृत्युदंड सबसे विवादास्पद दंडात्मक अभ्यासों में से एक है जिस पर पूरी दुनिया में भारी बहस होती रही है और 'मृत्यु दंड का उन्मूलन' (Abolition of Death Penalty) शब्दावली संयुक्त राष्ट्र (UN) में सर्वाधिक चर्चित विषयों में से एक रहा है जहाँ मृत्युदंड को मानवाधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा जाता है।

मृत्युदंड क्या है?

  • मृत्युदंड सज़ा का कठोरतम रूप है। यह वह दंड है जो मानवता के विरुद्ध नृशंसतम और जघन्यतम अपराधों के लिये दिया जाता है।
  • भारतीय दंड संहिता के तहत वे कुछ अपराध, जिनके लिये अपराधियों को मौत की सज़ा दी जा सकती है:
    • हत्या (धारा 302)
    • डकैती (धारा 396)
    • आपराधिक षड्यंत्र (धारा 120B)
    • भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना (धारा 121)
  • विद्रोह का दुष्प्रेरण यदि उसके परिणामस्वरूप विद्रोह किया जाए (धारा 132); और अन्य।
  • मृत्युदंड के लिये ‘डेथ पेनाल्टी’ और ‘कैपिटल पनिशमेंट’ शब्द का इस्तेमाल एक-दूसरे के स्थान पर होता रहा है, हालाँकि हमेशा ही अनिवार्य रूप से इस दंड का क्रियान्वयन नहीं भी होता है। इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति द्वारा आजीवन कारावास या क्षमा में रूपांतरित किया जा सकता है।

भारत में मृत्युदंड के पक्ष में तर्क

  • प्रतिशोध (Retribution): प्रतिशोध इस विचार को संदर्भित करता है कि यह कठोर दंड इसलिये आवश्यक है क्योंकि अपराधी इसका ही भागी है और पीड़ितों, उनके परिवारों और/या समाज के लिये न्याय सुनिश्चित करने हेतु मृत्युदंड दिया जाना आवश्यक है।
    • मृत्युदंड पर बहस में इसके समर्थक कभी-कभी तर्क देते हैं कि ‘आँख के बदले आँख’ ही उपयुक्त है, दंड अपराध के अनुरूप ही होना चाहिये और दंड अपराध पर नैतिक प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्त हो।
  • विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 सभी व्यक्तियों के लिये प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण को मूल अधिकार घोषित करता है।
    • किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
    • विधिक रूप से इसका अर्थ यह हुआ है कि यदि कोई ऐसी प्रक्रिया स्थापित है, जो निष्पक्ष और वैध है, तो राज्य विधि बनाकर किसी व्यक्ति को उसके जीवन से वंचित कर सकता है।
  • प्रतिरोध या निवारण (Deterrence): मृत्युदंड के पक्ष में निवारण का तर्क सर्वाधिक आम रूप से व्यक्त किया जाता है। इस सिद्धांत का सार यह है कि ‘‘जब फाँसी दी जाती है, तो हिंसक अपराध कम हो जाते हैं।’’
    • इसका अर्थ है कि पकड़े जाने पर मृत्युदंड पाने के भय से बड़ी संख्या में लोग ऐसे जघन्य अपराधों को करने से बचेंगे, जिन्हें वे अन्यथा कर सकते थे।
  • नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण: भारत जैसा लोकतांत्रिक राष्ट्र ऐसे राज्य पर आश्रित है जो कानूनी व्यवस्था में जनता के विश्वास की सुरक्षा, संरक्षण और प्रवर्तन के साधन के रूप में कार्यरत हो।
    • भारतीय संविधान की प्रस्तावना सामाजिक न्याय को भी संदर्भित करती है, इसलिये मृत्युदंड का बचाव इस आधार पर भी किया जाता है कि राज्य का यह नैतिक दायित्व है कि वह अपने नागरिकों के कल्याण और सुरक्षा की रक्षा करे।

भारत में मृत्युदंड के विरुद्ध तर्क

  • दंड के उद्देश्य से भटकना: मृत्युदंड कैदियों का पुनर्वास (Rehabilition) नहीं करता है, जो दंड का मूल उद्देश्य होता है।
    • आरोपित को दंड इस दृष्टिकोण से दिया जाता है कि वह पुनः समाज में लौट सके और कानून का पालन करने वाले समुदाय के सदस्य के रूप में पुनः कार्य करने में सक्षम हो सके।
  • प्रतिशोध से जुड़ी अनैतिकता: जो लोग मृत्युदंड का विरोध करते हैं, उनका विचार है कि प्रतिशोध का दृष्टिकोण अनैतिक है और यह प्रतिहिंसा (vengeance) का ही एक शुद्ध रूप है।
    • इसके अलावा, दुनिया भर के डेटा निर्णायक रूप से यह साबित नहीं कर पाते हैं कि मृत्युदंड से अपराध दर, विशेषकर बलात्कार के मामलों में कोई कमी आती है।
    • वर्ष 2013 से ही बलात्कार के मामलों में मृत्युदंड दिया जाता रहा है (IPC की धारा 376A), फिर भी बलात्कार के मामले कम नहीं हुए हैं और वास्तव में बलात्कार की क्रूरता कई गुना बढ़ ही गई है। इससे यह प्रश्न उभरता कि मृत्युदंड अपराध के लिये वाकई एक प्रभावी निवारक है भी या नहीं।
  • सांस्कृतिक हिंसा की पारस्परिकता: मृत्युदंड का विरोध करने वाले लोगों का तर्क है कि यह समाज में मौजूदा सांस्कृतिक हिंसा का प्रतिकार करता है, समाधान नहीं देता है।
  • सामाजिक विफलता की अनदेखी: मृत्युदंड केवल बलात्कारी की 'व्यक्तिगत विफलता' पर विचार करता है, पृष्ठभूमि की 'सामाजिक विफलताओं' पर अपनी आँखें बंद रखता है।
    • मृत्युदंड का विरोध करने वाले लोगों का मानना है कि बलात्कारी को फाँसी देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति से समाज को महिलाओं के लिये सुरक्षित बनाने की ज़िम्मेदारी व्यक्तियों पर डाल दी जाती है, जबकि समाज को उसकी ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर दिया जाता है।
    • राष्ट्रीय आँकड़ों के अनुसार भारत में मृत्युदंड पाने वाले 74.1% कैदी व्यावसायिक एवं भूमि स्वामित्व के दृष्टिकोण से आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के हैं और उनमें से अधिकांश समाज के निचले तबके से संबंधित हैं।
  • निर्दोष को सज़ा का खतरा: मृत्युदंड के विरुद्ध एक तर्क यह भी है कि न्याय प्रणाली की गलतियाँ या खामियाँ निर्दोष लोगों की जान ले सकती हैं।

भारत में मृत्युदंड से संबंधित प्रमुख मामले

  • जगमोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 1973: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 21 के अनुसार जीवन से वंचित करना संवैधानिक रूप से अनुमेय है यदि यह विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है।
  • बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य 1979: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मृत्युदंड केवल दुर्लभतम या ‘रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर’ मामलों में ही दिया जाना चाहिये।
  • मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य 1983: सर्वोच्च न्यायालय ने उन कुछ कारकों को रेखांकित किया जो यह निर्धारित करते हैं कि किसी मामले को दुर्लभतम माना जाए या नहीं।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने उन दो प्रश्नों को सूचीबद्ध किया जिनके उत्तर अलग-अलग मामलों में मौत की सज़ा दिये जाने से पहले तलाश किये जाने चाहिये।
      • प्रथम, क्या अपराध इतना असाधारण है कि किसी अन्य दंड की कोई गुंजाइश नहीं है।
      • द्वितीय, भले ही जब शमनकारी परिस्थितियों (mitigating circumstances) को अधिक महत्त्व दिया गया हो, तब भी क्या वे परिस्थितियाँ मृत्युदंड की आवश्यकता रखती हैं।

मृत्युदंड पर सर्वोच्च न्यायालय का हालिया रुख

  • न्यायालयों द्वारा जिस तरह से मृत्युदंड दिया जा रहा है, उस पर व्यक्त चिंताओं का स्वत: संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रिया की समीक्षा शुरू की है। सर्वोच्च न्यायालय मृत्युदंड के मामलों में शमनकारी परिस्थितियों के निर्धारण के लिये दिशानिर्देश निर्धारित करने पर विचार करेगा।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आरोपित के पास अर्थपूर्ण, वास्तविक और प्रभावी सुनवाई का अवसर होना चाहिये, साथ ही दंड के प्रश्न से संबंधित साक्ष्य पेश करने का मौक़ा भी होना चाहिये।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुझाव भी दिया है कि मौत की सज़ा से संबंधित मामले में निर्णय सुनाते समय दोषी की सामाजिक पृष्ठभूमि, आयु, शैक्षिक स्तर को ध्यान में रखा जाना चाहिये।
  • इसके अतिरिक्त, मृत्युदंड दिया जाए या नहीं, यह तय करने से पहले, दोषी के मनोवैज्ञानिक अनुभवों और दोषसिद्धि के बाद के व्यवहार के संबंध में विचार किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

हमारा ध्यान केवल अपराधियों के उन्मूलन पर नहीं हो, अपराध के उन्मूलन पर भी हो। आपराधिक कानून में दंड का उद्देश्य, यदि व्यापक दृष्टिकोण एवं परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, तो एक व्यवस्थित समाज के लक्ष्यों को प्राप्त करना है। आवश्यकता है कि शांति की बहाली सुनिश्चित करने के लिये और भविष्य में होने वाले अपराधों को रोकने के लिये अपराधी और पीड़ित के प्रतिस्पर्द्धी अधिकारों को संतुलित किया जाए।

अभ्यास प्रश्न: सर्वोच्च न्यायालय के हाल के निर्णयों के आलोक में भारत में मृत्युदंड की तर्कसंगतता का परीक्षण कीजिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

मेन्स

प्रश्न: मृत्युदंड की सज़ा को कम करने में राष्ट्रपति की देरी के उदाहरण न्याय से इनकार के रूप में सार्वजनिक बहस के तहत आए हैं। क्या ऐसी याचिकाओं को स्वीकार/अस्वीकार करने के लिये राष्ट्रपति के लिए कोई समय निर्दिष्ट किया जाना चाहिये? विश्लेषण कीजिये। (2014)

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