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डेली न्यूज़

  • 22 May, 2020
  • 55 min read
भूगोल

भारत-नेपाल के बीच सुस्ता क्षेत्र विवाद

प्रीलिम्स के लिये:

सुस्ता क्षेत्र विवाद, कालापानी विवाद 

मेन्स के लिये:

भारत-नेपाल संबंध 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नेपाल द्वारा आधिकारिक रूप से नेपाल का नवीन मानचित्र जारी किया गया, जो उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura) और लिपुलेख  (Lipulekh) को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है।

प्रमुख बिंदु:

  • ‘विदेश मंत्रालय’ (Ministry of External Affairs- MEA) ने नेपाल के नवीन राजनीतिक मानचित्र को पूरी तरह से 'कृत्रिम' तथा भारत के लिये अस्वीकार्य बताया है।
  • 2 नवंबर, 2019 को भारत ने एक नवीन मानचित्र प्रकाशित किया था यह जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में दर्शाता है। इसी मानचित्र में कालापानी को भी भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है।

सुस्ता क्षेत्र (Susta Territorial):

  • उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्यों की सीमा पर पश्चिमी चंपारण ज़िलों के पास अवस्थित ‘सुस्ता क्षेत्र’ को भी नेपाल द्वारा अपने नवीन मानचित्र में शामिल किया गया है। 
  • नेपाल का दावा है कि भारत ने इस क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है तथा भारत को इस क्षेत्र को तुरंत खाली करना देना चाहिये।
  • तीस्ता क्षेत्र बिहार में 'वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व' की उत्तरी सीमा पर अवस्थित एक गाँव है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत अर्द्ध-सैनिक पुलिस बल, सशस्त्र सीमा बल की एक इकाई इस क्षेत्र में तैनात है।
  • सुस्ता क्षेत्र में 265 से अधिक परिवार निवास करते हैं तथा खुद को नेपाल से संबंधित मानते हैं।

विवाद का कारण:

  • विवाद का मूल कारण गंडक नदी के बदलते मार्ग को माना जाता है। गंडक नदी नेपाल और बिहार (भारत) के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है। गंडक नदी को नेपाल में नारायणी नदी के रूप में जाना जाता है।
  • नेपाल का मानना है कि पूर्व में सुस्ता क्षेत्र गंडक नदी के दाएँ किनारे अवस्थित था, जो नेपाल का हिस्सा था। लेकिन समय के साथ नदी के मार्ग में परिवर्तन के कारण यह क्षेत्र वर्तमान में गंडक के बाएँ किनारे पर अवस्थित है। वर्तमान में इस क्षेत्र को भारत द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

China

उत्तराखंड (भारत)-नेपाल सीमा पर विवाद:

  • नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार, सुगौली संधि (वर्ष 1816) के तहत काली (महाकाली) नदी के पूर्व के सभी क्षेत्र, जिनमें लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura), कालापानी (Kalapani) और लिपुलेख (Lipulekh) शामिल हैं, नेपाल का अभिन्न अंग हैं। भारत के अनुसार, यह क्षेत्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले का हिस्सा है जबकि नेपाल इस क्षेत्र को धारचूला ज़िले का हिस्सा मानता है।

Kalapani

मुद्दे पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण:

  • अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार, किसी नदी के मार्ग में परिवर्तन होता है तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा का निर्धारण नदी के मार्ग में बदलाव के स्वरूप के आधार पर किया जाता है अर्थात नदी मार्ग में आकस्मिक बदलाव (Avulsion) हो तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा अपरिवर्तित रहती है, यदि नदी मार्ग में बदलाव धीरे-धीरे हो (Accretion) तो सीमा उसके अनुसार परिवर्तित होती है।

आगे की राह:

  • दोनों देशों को मौजूदा संधियों के दायरे में एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के माध्यम से विवाद समाधान की दिशा में विचार-विमर्श किया जाना चाहिये।
  • भारत को नेपाल के साथ सीमा विवादों को कूटनीतिक संवाद के माध्यम से विवादों का अंतर्राष्ट्रीयकरण किये बिना सुलझाने का प्रयास करना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

दवा अनुमोदन प्रक्रिया में तीव्रता की आवश्यकता

प्रीलिम्स के लिये

दवा अनुमोदन प्रक्रिया, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन

मेन्स के लिये

दवा अनुमोदन प्रक्रिया में तीव्रता की आवश्यकता और इसका महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नई दवा की अनुमोदन प्रक्रिया (Approval Process) को सरल और तेज़ बनाने के उद्देश्य से गठित समिति की एक बैठक बुलाई है। 

प्रमुख बिंदु

  • उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि COVID-19 महामारी के मद्देनज़र देश में नई दवा के अनुमोदन की सुधार प्रक्रिया में तेज़ी लाना अनिवार्य हो गया है।
  • उल्लेखनीय है कि भारत में COVID-19 संक्रमण का आँकड़ा बढ़ता जा रहा है और ऐसे में संक्रमित लोगों का इलाज करने के लिये रेमेडिसविर (Remdesivir) और फेवीपिरवीर (Favipiravir) जैसी दवाओं की तत्काल आवश्यकता है।
  • ऐसे में देश में क्लीनिकल ट्रायल की प्रक्रिया में तेज़ी लाने के साथ-साथ नई दवाओं के विपणन अनुमोदन (Marketing Approval) में भी तेज़ी लाने की आवश्यकता है।

 काफी लंबी है विपणन अनुमोदन की प्रक्रिया

  • वर्तमान में भारत में किसी भी नई दवा के अनुमोदन (Approval) की सामान्य समय सीमा लगभग छह से नौ महीने की है, यहाँ तक ​​कि उन दवाओं के लिये भी इतना ही समय लगता है जिन्हें किसी अन्य देश द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है।
  • दवा के क्लीनिकल ट्रायल की सफलता के बाद दवा निर्माता सभी प्रासंगिक डेटा के साथ नियामक एजेंसियों के समक्ष विपणन अनुमोदन के लिये आवेदन करता है।
  • किसी दवा के क्लीनिकल ट्रायल में ही अनुमानतः 3 वर्ष से 10 वर्ष का समय लगता है, हालाँकि मौजूदा महामारी को देखते हुए इस समयावधि को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
  • ये नियामक एजेंसियाँ सभी देशों में दवाओं के विनियमन हेतु एक विशिष्ट एजेंसी के रूप में कार्य करती हैं। यही एजेंसियाँ किसी दवा के विपणन का अनुमोदन देती हैं और यही एजेंसियाँ संदेह अथवा विवाद की स्थिति में दवाओं के विपणन अनुमोदन को रद्द करती हैं। 
  • भारत में यह कार्य केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (Central Drugs Standard Control Organisation-CDSCO) द्वारा संपन्न किया जाता है।

समाधान

  • प्रक्रिया के अनुसार, किसी भी दवा निर्माता कंपनी को अपना प्रस्ताव एक विषय विशेषज्ञ समिति (Subject Expert Committee-SEC) के समक्ष समीक्षा के लिये प्रस्तुत करना होता है। 
  • विदित है कि फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (Federation of Indian Chambers of Commerce & Industry) ने हाल ही में एक प्रस्ताव दिया था कि अमेरिका, यूरोपीय देशों और कनाडा तथा जापान जैसे देशों द्वारा पहले ही अनुमोदित दवाओं को CDSCO द्वारा SEC के समक्ष प्रस्तुत किये बिना ही मंज़ूरी दी जानी चाहिये।
  • इसके अतिरिक्त ‘ऑर्फन ड्रग’ (Orphan Drugs) को इस प्रक्रिया में प्राथमिकता दी जानी चाहिये। ‘ऑर्फन ड्रग’ वे दवाएँ होती हैं, जिनका निर्माण काफी दुर्लभ रोगों के इलाज के लिये किया जाता है, और बिना सरकारी सहायता के इन दवाओं का निर्माण दवा निर्माता के लिये नुकसानदायक हो सकता है।

क्लीनिकल ट्रायल का अर्थ

  • क्लीनिकल ट्रायल (नैदानिक परीक्षण) का अभिप्राय ऐसे शोध या अध्ययन से होता है, जिनका उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि कोई चिकित्सकीय प्रणाली, दवा या कोई चिकित्सकीय उपकरण मनुष्य के लिये सुरक्षित और प्रभावी है अथवा नहीं। 
  • इन शोधों का उद्देश्य अनुसंधान होता है, अतः इनके लिये सख्त वैज्ञानिक मानकों का पालन किया जाता है।
  • ऐसे परीक्षणों की शुरुआत आमतौर पर एक नए विचार या प्रयोग से होती है और उसके आशाजनक पाए जाने पर परीक्षण पशु पर किया जाता है। 
  • पशु पर क्लीनिकल परीक्षण का उद्देश्य यह जानना होता है कि कोई दवा या चिकित्सा पद्धति जीवित शरीर पर क्या प्रभाव छोड़ती है अथवा वह हानिकारक तो नहीं है।
  • हालाँकि जो परीक्षण प्रयोगशाला में अथवा जानवरों पर सकारात्मक परिणाम देते हैं, यह ज़रूरी नहीं है कि वे मनुष्यों पर भी वही परिणाम दें। अतः इनका मनुष्यों पर भी परीक्षण आवश्यक है।
  • पशुओं और मनुष्यों पर किये जाने वाले क्लीनिकल ट्रायल सदैव से ही संपूर्ण विश्व में विवाद का विषय रहे हैं।

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) 

  • केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन (Central Drugs Standard Control Organisation- CDSCO) भारतीय दवाओं एवं चिकित्सा उपकरणों के लिये एक राष्ट्रीय विनियामक निकाय है।
  • CDSCO को दवाओं के अनुमोदन, क्लीनिकल परीक्षणों के संचालन, दवाओं के मानक तैयार करने, देश में आयातित दवाओं की गुणवत्ता पर नियंत्रण और राज्य दवा नियंत्रण संगठनों को विशेषज्ञ सलाह प्रदान करने जैसे कार्य सौंपे गए हैं।
  • इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।

स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड


शासन व्यवस्था

चुनावी भ्रष्टाचार का मुद्दा

प्रीलिम्स के लिये 

पोस्टल बैलेट, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951  

मेन्स के लिये 

लोकतंत्र पर चुनावी भ्रष्टाचार का प्रभाव  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में गुजरात उच्च न्यायालय ने राज्य के शिक्षा व कानून मंत्री भूपेन्द्र सिंह चूड़ास्मा (Bhupendrasinh Chudasama) की विधानसभा सदस्यता व उनके निर्वाचन को रद्द कर दिया है। 

प्रमुख बिंदु 

  • भूपेन्द्र सिंह चूड़ास्मा गुजरात की धौलका विधानसभा (Dholka constituency) से अपने प्रतिद्वंदी से मात्र 327 मतों से विजयी हुए थे।
  • धौलका विधानसभा क्षेत्र से चूड़ास्मा के प्रतिद्वंदी अश्विन राठौड़ ने गुजरात उच्च न्यायालय में चूड़ास्मा के निर्वाचन को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि तत्कालीन रिटर्निंग अधिकारी ने अवैध तरीके से 429 पोस्टल बैलेट को निरस्त कर दिया था। जिससे चुनाव का परिणाम प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ था। 

गुजरात उच्च न्यायालय का निर्णय 

  • गुजरात उच्च न्यायालय ने निर्णय देते हुए कहा कि रिटर्निंग अधिकारी के अनुसार, चुनाव के दौरान कुल 1356 पोस्टल बैलेट प्राप्त हुए जिनमें मतों की गिनती के समय 429 पोस्टल बैलेट को निरस्त कर दिया गया था।
  • न्यायालय ने कहा कि साक्ष्यों पर विचार करते हुए यह पाया गया कि निरस्त करने से पहले 429 पोस्टल बैलेट को न तो किसी उम्मीदवार को दिखाया गया, न याचिकाकर्त्ता को और न ही चुनाव पर्यवेक्षक को दिखाया गया।
  • साक्ष्यों में यह भी पाया गया कि रिटर्निंग अधिकारी ने अंतिम परिणाम की गणना करते समय फॉर्म-20 पर भी 429 पोस्टल बैलेट को रद्द करने संबंधी कार्य को नहीं दर्शाया था। 

पोस्टल बैलेट 

  • ऐसा व्यक्ति किसी शासकीय सेवा में कार्यरत होने के कारण अथवा दिव्यांग या वरिष्ठ नागरिक होने के कारण मतदान केंद्र तक पहुँचने में असमर्थ हैं। उन लोगों को डाकपत्र के माध्यम से मताधिकार का प्रयोग करने की सुविधा देना ही पोस्टल बैलेट (Postal Ballot) कहलाता है।
  • रिटर्निंग अधिकारी द्वारा निरस्त किये गए पोस्टल बैलेट (429) की संख्या जीत के अंतर (327) से अधिक होने के कारण निश्चित रूप से यह सिद्ध होता है कि रिटर्निंग अधिकारी के निर्णय से चुनाव की शुचिता व परिणाम प्रभावित हुआ।
  • उपरोक्त कारणों के आधार पर गुजरात उच्च न्यायालय ने चूड़ास्मा का निर्वाचन जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 (1) (घ) (iv) के तहत शून्य घोषित कर दिया।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 

  • चुनावों का वास्तविक आयोजन कराने संबंधी सभी मामले जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (People’s Representative Act),1951 के प्रावधानों के तहत आते हैं। 
  • इस कानून की धारा 169 के तहत निर्वाचन आयोग के परामर्श से केंद्र सरकार ने निर्वाचक पंजीकरण नियम 1961 बनाए हैं। 
  • इस कानून और नियमों में सभी चरणों में चुनाव आयोजित कराने, चुनाव कराने की अधिसूचना के मुद्दे, नामांकन पत्र दाखिल करने, नामांकन पत्रों की जाँच, उम्मीदवार द्वारा नाम वापस लेना, चुनाव कराना, मतगणना और घोषित परिणाम के आधार पर सदनों के गठन के लिये विस्तृत प्रावधान किये गए हैं।   

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 


भारतीय अर्थव्यवस्था

बैंकों द्वारा ऋण भुगतान पर पुनः अधिस्थगन की मांग

प्रीलिम्स के लिये: 

गैर निष्पादित संपत्तियाँ, COVID-19.

मेंस के लिये:

बैंकिंग क्षेत्र पर COVID-19 का प्रभाव 

चर्चा में क्यों:  

हाल ही में देश में COVID-19 के प्रसार को रोकने हेतु लॉकडाउन को 31 मई, 2020 तक बढ़ाए जाने के बाद कई बैंकों ने एक बार पुनः ऋण भुगतान पर 90 दिनों का अतिरिक्त अधिस्थगन (Moratorium) लगाए जाने की मांग की है।

प्रमुख बिंदु:  

  • हाल ही में ‘भारतीय रिज़र्व बैंक’ (Reserve Bank of India-RBI) के शीर्ष अधिकारियों और बैंकों तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (Non-Banking Financial Company- NBFC) के प्रमुखों की एक बैठक में ऋण भुगतान पर अस्थायी स्थगन को 31 अगस्त, 2020 तक बढ़ाए जाने की मांग की गई है।
  • कई बैंकों और NBFCs ने वर्तमान आर्थिक संकट से उबरने के लिये एक ऋण पुनर्गठन योजना (Loan Restructuring Scheme) लागू किये जाने की मांग की है।  
  • साथ ही बैंकों ने तनावग्रस्त संपत्तियों को ‘गैर निष्पादित संपत्तियों’ (Non-Performing Assets-NPA) के रूप में चिन्हित करने की अवधि को 90 दिनों से बढ़ाकर 180 दिन करने की मांग की है। 
  • गौरतलब है कि COVID-19 के कारण उत्पन्न हुई आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए 27 मार्च, 2020 को RBI ने बैंकों द्वारा दिये गए ऋण के भुगतान पर 90 दिनों (1 मार्च से 31 मई तक) के अस्थायी स्थगन की घोषणा की थी।

ऋण भुगतान पर स्थगन की मांग का कारण:  

  • वर्तमान में देशभर में लागू लॉकडाउन के कारण देश के अधिकांश उद्योगों और व्यवसायों की आय में भारी गिरावट देखी गई है।
  • हालाँकि हाल ही में सरकार द्वारा कई क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों और यातायात को शुरू करने की अनुमति दी गई है परंतु लॉकडाउन के दौरान औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला के प्रभावित होने और बेरोज़गारी के बढ़ने से अधिकांश उद्योग मई माह में पूर्ण रूप से अपना उत्पादन नहीं शुरू कर सकेंगे।
  • लॉकडाउन और अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के कारण पहले से ही बैंकों की गैर-निष्पादित संपत्तियों में वृद्धि देखी गई है।      

चुनौतियाँ: 

  • लॉकडाउन को 31 मई तक बढ़ाए जाने के बाद यदि RBI ऋण भुगतान में छूट को तीन माह के लिये आगे बढ़ाता है तो इसका अर्थ होगा कि कंपनियों को 31 अगस्त तक बैंकों को कोई भुगतान नहीं करना होगा।
  • परंतु इस छूट के साथ सितंबर माह में कंपनियों द्वारा अपनी देनदारी की पूरी राशि को एक साथ चुका पाने की संभावनाएँ भी बहुत कम हैं, ऐसी स्थिति में वर्तमान नियमों के तहत इन कंपनियों के खाते NPA की श्रेणी में आ जाएंगे।   
  • रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) के अनुसार, वर्तमान वित्तीय वर्ष में NPAs में 150-200 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि का अनुमान है। 
  • लॉकडाउन के कारण बैंकों द्वारा दिये गए ऋण पर वसूली और उनके निस्तारण में  गिरावट आएगी, जिसके परिणामस्वरूप NPA के मामलों में वृद्धि देखने को मिल सकती है। 
  • वर्तमान में बैंकों के लिये RBI द्वारा 7 जून, 2019 को जारी परिपत्र (June 7 Circular) के कड़े नियम भी एक बड़ी समस्या हैं, जिसके अनुसार बैंकों के लिये तनाव ग्रस्त परिसंपत्तियों की पहचान कर 30 दिनों के अंदर डिफाॅल्ट की समीक्षा शुरू करना अनिवार्य है।   

NPAs से निपटने हेतु RBI के दिशा-निर्देश:

  • RBI के निर्देशों के अनुसार, ऐसे सभी ऋण जो अतिदेय (Overdue) हों पर अभी NPA न हुए हो और उनके लिये अधिस्थगन की मंज़ूरी दी गई हो, के लिये बैंकों को 10% की प्रोविज़निंग की व्यवस्था करनी चाहिये।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, हालाँकि इन प्रयासों के माध्यम से वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान नए NPAs की प्रोविज़निंग की जा सकती है परंतु ऋण भुगतान पर अधिस्थगन की अवधि के बाद परिसंपत्तियों की गुणवत्ता का प्रबंधन बैंकों के लिये महत्त्वपूर्ण विषय होगा।  

समाधान: 

  • वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए RBI द्वारा बैंकों को मौजूदा ऋणों के व्यापक पुनर्गठन और ऋण के संबंध में 90 दिन के मानक के पुनर्वर्गीकरण (Reclassification) हेतु कुछ छूट दी जानी चाहिये। 
  • विशेषज्ञों के अनुसार, RBI को यह स्पष्ट करना चाहिये कि कार्यशील पूंजी पर बढ़ा हुआ ऋण COVID से जुड़े ऋण (COVID Debt) की श्रेणी में आता है या नहीं। 

निष्कर्ष: COVID-19 कारण देश में खुदरा क्षेत्र के साथ औद्योगिक क्षेत्र में भी वित्तीय तरलता में काफी कमी आई है। RBI द्वारा मार्च 2020 में ऋण भुगतान पर अधिस्थगन की घोषणा के बाद बैंकों में इस छूट का लाभ लेने वालों में खुदरा क्षेत्र और कृषि ऋण जैसे छोटे ऋण धारकों की संख्या अधिक थी। विशेषज्ञों के अनुसार लॉकडाउन के बढ़ने और औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला के प्रभावित होने के कारण औद्योगिक क्षेत्र के ऋण भुगतान में गिरावट आएगी और वर्तमान के कड़े नियमों के कारण यह आर्थिक चुनौती और भी जटिल हो सकती है। अतः वर्तमान परिस्थिति में RBI को उद्योगों और बैंकिंग क्षेत्र के हितों को ध्यान में रखते हुए ऋण भुगतान की बाध्यताओं और NPA से जुड़े नियमों में कुछ छूट देने पर विचार करना चाहिये।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

गेहूं की नवीन किस्म तथा फसल अवशिष्ट समस्या

प्रीलिम्स के लिये:

गेहूं की बौने जीन आधारित फसल

मेन्स के लिये:

फसल अवशेष तथा प्रदूषण की समस्या 

चर्चा में क्यों?

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग’ (Department of Science and Technology) के एक स्वायत्तशासी संस्थान ‘अगरकर अनुसंधान संस्थान’ (Agharkar Research Institute- ARI) पुणे के वैज्ञानिकों द्वारा गेहूं में दो ‘वैकल्पिक बौने जीनों’ (Alternative Dwarfing Genes)- Rht14 एवं Rht18 की मैपिंग की गई है।

प्रमुख बिंदु:

  • जीन मैपिंग किसी जीन के स्थान तथा जीनों के बीच की दूरी की पहचान करने के तरीकों का वर्णन करता है।
  • नवीन मैपिंग किये गए जीन गेहूं के बीजों के बेहतर नवांकुर (Seedling Vigour) तथा लंबी अवधि तक कोलोप्टाइल (Coleoptiles) के रूप में अर्थात नवांकुरों की खरपतवारों से रक्षा करने के रूप में कार्य करते हैं। 

बौना जीन (Dwarfing Genes) :

  • बौने जीनों का उपयोग कई दशकों से पादप प्रजनन में किया जा रहा है। गेहूं और चावल की बौनी किस्मों के निर्माण से बौने जीन ने हरित क्रांति में बहुत योगदान दिया है। प्रारंभिक ‘बौने जीन आधारित’ बीज किस्मों को अर्द्ध-बौने जीन के रूप में भी जाना जाता है।  
  • यह DNA का एक भाग होता है जिसमें आवश्यक क्षारों का अनुक्रम DNA के समान ही होता है। जब इस प्रकार के जीनों को फसलों में अंतरण किया जाता है तो ये फसलें लंबाई में कम परंतु अधिक उत्पादन देने वाली होती हैं।

वैकल्पिक बौना जीन (Alternative Dwarfing Genes):

  • हरित क्रांति के बाद से एकल स्रोत आधारित बौने जीन की किस्मों के उपयोग से फसलों से कई महत्त्वपूर्ण जीनों का क्षरण हो गया है, अत: अर्द्ध बौने जीन आधारित फसलों के स्थान पर नवीन बौने जीन आधारित फसलों की किस्मों के निर्माण की दिशा में वैज्ञानिक कार्य कर रहे हैं।

जेनेटिक मार्कर (Genetic Marker):

  • जेनेटिक मार्कर एक गुणसूत्र पर स्थित निश्चित जीन अथवा DNAअनुक्रम को बताता है, जिसका उपयोग प्रजातियों की पहचान करने के लिये किया जा सकता है। 

शोध कार्य:

  • ARI के वैज्ञानिकों ने शुष्क क्षेत्रों में उगाए जाने वाले डुरम (Durum) गेहूं में गुणसूत्र 6A पर ‘बौने जीनों’ की मैपिंग की है। गेहूं की अच्छी गुणवत्ता की किस्म को बौने जीन का उपयोग करके ‘डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल’ आधारित मार्कर (DNA-based Markers) विधि के आधार पर विकसित किया गया।
  • DNA आधारित मार्कर तकनीक, गेहूं प्रजनकों (Breeders) को ‘वैकल्पिक बौने जीन’ के वाहक गेहूं किस्म का चयन करने में सहायता करेंगे।
  • वैज्ञानिकों द्वारा DNA आधारित मार्करों का उपयोग  कर इन जीनों को भारतीय गेहूं की किस्मों में अंतरण करने का प्रयास किया जा रहा है।

गेहूं की नवीन किस्म की विशेषताएँ:

  • जीनों के अंतरण के आधार पर बनाई जाने वाली गेहूं की किस्म चावल के अवशिष्टों युक्त एवं शुष्क मृदा में भी बुवाई के लिये उपयुक्त होगी।
  • इन वैकल्पिक बौने जीनों का प्रयोग कर विकसित गेहूं की किस्म के निर्माण से चावल के फसल अवशेष को जलाने को आवश्यकता नहीं होगी। 
    • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि गेहूं की फसल की बुवाई से पूर्व किसानों द्वारा चावल के अवशेषों को जलाया जाता है, जो दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।
  • इन गेहूं के बीजों की  बुवाई अधिक गहराई तक की जा सकती है ताकि शुष्क मृदा में भी ये फसल अवशिष्ट नमी का उपयोग कर सके।

क्यों थी शोध की आवश्यकता:

  • वर्तमान में गेहूं की केवल अर्द्ध बौनी (Semi-Dwarf Wheat) किस्में उपलब्ध हैं। गेहूं की इन किस्मों का निर्माण हरित क्रांति के दौरान किया गया था।
  • इन अर्द्ध बौनी गेहूं की किस्मों में Rht1  युग्म विकल्पी (Allele) (किसी दिये गए जीन का भिन्न रूप) होते हैं, जो केवल उच्च उर्वरता वाली तथा सिंचित भूमि में ही अधिकतम उपज देती हैं। 
  • इन फसलों की कोलोप्टाइल क्षमता (नवांकुरों की खरपतवारों से रक्षा) कम होती है। इस कारण गेहूं की ये अर्द्ध बौनी किस्में शुष्क वातावरण में गहरी बुवाई स्थितियों के अधिक अनुकूल नहीं हैं।

शोध का महत्त्व:

  • नवीन गेहूं के उपयोग से बहुमूल्य जल संसाधनों की बचत होगी और किसानों के लिये खेती की लागत कम हो जाएगी। गेहूं की इन किस्मों को शुष्क-मृदा में भी उगाया जा सकता है। 

आगे की राह:

  • चावल फसल के अवशेषों को जलाना पर्यावरण, मृदा तथा मानव स्वास्थ्य सभी के लिये काफी नुकसानदायक है। इसलिये गेहूं सुधार कार्यक्रमों में विकल्पी बौना जीनों को शामिल किये जाने की आवश्यकता है।
  • भारतीय गेहूं किस्मों में Rht1  के केवल दो ड्वार्फिंग ऐलेल की ही प्रधानता है, इसलिये भारत में उगाए जाने वाले गेहूं में बौने जीनों के आनुवंशिक आधार को और अधिक विविधीकृत करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: 

  • गेहूं की ‘बौने जीन’ आधारित किस्म के निर्माण से फसल अवशिष्ट जलाने की समस्या का समाधान संभव है यदि नवीन गेहूं की किस्मों को  किसानों को कम आर्थिक लागत के साथ उपलब्ध कराया जाए।  

स्रोत: पीआईबी


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

वस्त्र समिति

प्रीलिम्स के लिये

वस्त्र समिति, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण

मेन्स के लिये

COVID-19 से मुकाबले में बुनियादी अवसंरचना की कमी से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

वस्त्र समिति, मुंबई भी अब स्वास्थ्य कर्मियों और अन्य COVID-19 योद्धाओं के लिये आवश्यक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (Personal Protective Equipment-PPE) के परीक्षण और प्रमाणन का कार्य करेगी। 

प्रमुख बिंदु

  • हाल ही में वस्त्र मंत्रालय द्वारा वस्त्र समिति (Textiles Committee) को व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) का परीक्षण करने और उसे प्रमाणित करने के लिये 9वीं अनुमोदित प्रयोगशाला के रूप में शामिल किया है। 
  • वस्त्र समिति, मुंबई के अतिरिक्त अन्य आठ प्रयोगशालाएँ निम्न प्रकार हैं: (1) दक्षिण भारत वस्त्र अनुसंधान संघ (The South India Textile Research Association- SITRA), कोयंबटूर, तमिलनाडु (2) DRDO- परमाणु चिकित्सा और संबद्ध विज्ञान संस्थान, (DRDO-Institute of Nuclear Medicine & Allied Sciences) नई दिल्ली (3) हैवी व्हीकल फैक्ट्री, (Heavy Vehicle Factory) अवार्डी, चेन्नई (4) स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री, (Small Arms Factory) कानपुर, उत्तर प्रदेश, (5) आयुध कारखाना, (Ordnance Factory) कानपुर, उत्तर प्रदेश (6) आयुध कारखाना (Ordnance Factory), मुरादनगर, उत्तर प्रदेश (7) आयुध कारखाना, (Ordnance Factory) अंबरनाथ, महाराष्ट्र और (8) मेटल एंड स्टील फैक्टरी, (Metal & Steel Factory) ईशापोर, पश्चिम बंगाल।
  • उक्त सभी प्रयोगशालाओं को ‘नेशनल एक्रीडिएशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज़’ (National Accreditation Board for Testing & Calibration Laboratories- NABL) द्वारा मान्यता प्रदान की गई है।

महत्त्व

  • ध्यातव्य है मौजूदा समय में विभिन्न चुनौतियों के अतिरिक्त भारत को प्रतिष्ठित घरेलू विनिर्माताओं की अनुपलब्धता और चीन से उपकरणों का आयात करने में होने वाली लगातार देरी जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।
  • इसके अतिरिक्त दुनिया भर में ऐसे उपकरणों की तेज़ी से बढ़ती मांग के कारण चीन की अवसरवादी कंपनियों द्वारा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी की जा रही है, जिसके कारण सरकार को इन उपकरणों के लिये अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है। 
  • ऐसे में इन चुनौतियों का घरेलू समाधान करना आवश्यक है। वस्त्र समिति के अधीन मुंबई में मान्यता प्राप्त PPE जाँच सुविधा शुरू करने से सरकारों और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) निर्माताओं को अपने उत्पाद की गुणवत्ता की समयबद्ध जाँच का आश्वासन मिलेगा।

वस्त्र समिति (Textiles Committee) 

  • वस्त्र समिति (Textiles Committee) की स्थापना वर्ष 1963 में संसद के एक अधिनियम के माध्यम से वैधानिक निकाय के रूप में की गई थी, जो कि भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में आती है।
  • वस्त्र समिति का मुख्य कार्य वस्‍त्रों तथा वस्‍त्र मशीनरी की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है, किंतु वस्‍त्र समिति अधिनियम, 1963 की धारा 4 के वस्त्र समिति को निम्नलिखित कार्य भी सौंपे गए हैं-
    • वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीय और आर्थिक अनुसंधान करना और इस कार्य हेतु अन्य लोगों को प्रोत्साहित करना;
    • वस्‍त्रों, वस्‍त्र मशीनरी तथा पैकिंग सामग्री के लिये मानक विनिर्देश स्‍थापित करना;
    • वस्‍त्रों तथा वस्‍त्र मशीनरी के परीक्षण हेतु प्रयोगशालाऍं स्‍थापित करना;
    • वस्‍त्रों के निर्यात को बढ़ावा देना;
    • विषय से संबंधित आँकड़े जुटाना;
    • केंद्र सरकार को वस्‍त्रों तथा वस्‍त्र मशीनरी आदि से संबंधित विषयों पर परामर्श देना। 
  • वस्‍त्र समिति का मुख्‍यालय मुंबई में है। प्रमुख वस्‍त्र विनिर्माता/निर्यात केंद्रों पर इसके 29 अन्‍य कार्यालय हैं।

व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) और भारत

  • व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) एक प्रकार का चिकित्सीय उपकरण होता है, जिसे आमतौर पर मेडिकल पेशेवरों द्वारा प्रयोग किया जाता है।
  • यह न केवल डॉक्टरों, नर्सों जैसे चिकित्सा पेशेवरों की सुरक्षा करता है, बल्कि घातक बीमारी के प्रसार को रोकने में भी मदद करता है।
  • अब तक हुए अनुसंधानों के अनुसार, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कोरोना वायरस (COVID-19) के संक्रमण के प्रसार को कम करने में काफी मददगार साबित हुआ है।
  • ध्यातव्य है कि भारत थोड़े ही समय में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता बन गया है। 
  • COVID-19 संक्रमण से बचाव के लिये आवश्यक PPE के उत्पादन में चीन विश्व का अग्रणी देश बना हुआ है।

स्रोत: पी.आई.बी.


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

अल्ज़ाइमर रोग और ट्रोजन हॉर्स

प्रीलिम्स के लिये:

अल्ज़ाइमर रोग

मेन्स के लिये:

अल्ज़ाइमर रोग से निपटने हेतु शोधकर्त्ताओं द्वारा किये गए प्रयास 

चर्चा में क्यों?

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गुवाहाटी (Indian Institute of Technology, Guwahati- IITG) के शोधकर्त्ताओं द्वारा विकसित ‘ट्रोजन हॉर्स’ (Trojan Horse) विधि अल्ज़ाइमर रोग संबंधी स्मृति ह्रास को रोकने में मददगार साबित हो सकती है।

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि ‘ट्रोजन हॉर्स’ विधि (ट्रोजन पेप्टाइड्स का उपयोग) की मदद से मस्तिष्क में न्यूरोटॉक्सिक मॉलिक्यूल (Neurotoxic Molecules) के संचय को रोका जा सकता है। 
  • ट्रोजन पेप्टाइड्स (Trojan Peptides) का उपयोग एक कम वोल्टेज वाले विद्युत क्षेत्र के रूप में किया जाता है जो मस्तिष्क में ‘एमीलॉइड प्लेक्स’ (Amyloid Plaques) के एकत्रीकरण को रोकता है। 
  • मस्तिष्क में एमीलॉइड-बीटा पेप्टाइड्स (Amyloid-beta Peptides) के संचय के कारण अल्ज़ाइमर रोग होता है। 
  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, बाहरी विद्युत या चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग कर एमीलॉइड-बीटा पेप्टाइड्स के संचय को रोका जा सकता है जिसके कारण अल्ज़ाइमर रोग से पीड़ित होने की संभावना कम हो जाती है।
  • एमीलॉइड-बीटा पेप्टाइड्स ‘एमीलॉइड प्लेक्स’ के ही समान होता है जो एक निश्चित अवधि के बाद धमनियों को अवरुद्ध कर रक्त की आपूर्ति को प्रभावित करता है। परिणामस्वरूप एमीलॉइड-बीटा पेप्टाइड्स (Amyloid Beta Peptides) के संचय से अल्ज़ाइमर रोग होता है। इससे हृदय संबंधी रोग भी उत्पन्न होते हैं।

कार्यप्रणाली:

  • ट्रोजन पेप्टाइड शरीर में मौजूद पेप्टाइड की तरह ही होता है किंतु जब यह शरीर में मौजूद अन्य पेप्टाइड्स के साथ मिश्रित होता है, तो इसका कार्य एकत्रीकरण के विपरीत हो जाता है।
  • ट्रोजन पेप्टाइड के इंजेक्शन के माध्यम से तंत्रिका कोशिकाओं के नष्ट होने की दर को 17-35% तक कम किया जा सकता है। इस विधि से अल्ज़ाइमर रोग को लगभग 10 वर्ष तक रोका जा सकता है।

अल्ज़ाइमर रोग 

  • अल्ज़ाइमर रोग एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर (Neurological Disorder) है जो मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं को नष्ट करता है। 
  • इसके कारण रोगी की शारीरिक और मानसिक स्थिति कमज़ोर हो जाती है उसे कुछ भी याद नहीं रहता है, उसकी निर्णय लेने की क्षमता घट जाती है, स्वभाव में लगातार परिवर्तन होता रहता है, आदि। 
  • प्रारंभ में ये लक्षण कम मात्रा में होते हैं लेकिन समय रहते इसका उपचार न कराया जाए तो यह गंभीर और असाध्य हो जाता है। 
  • 55-60 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों में अल्ज़ाइमर, डिमेंशिया (dementia) का प्रमुख कारण है। डिमेंशिया रोग मानसिक रोगों का एक समूह होता है जिसमें व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता घट जाती हैं। 
  • यह रोग मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार की टैंगल्स (Tangles) नामक प्रोटीन निर्माण के कारण होता है। 
  • उम्र बढ़ने के साथ साथ इसका खतरा और बढ़ जाता है लेकिन कभी-कभी दुर्लभ आनुवंशिक परिवर्तनों के कारण इसके लक्षण 30 वर्ष की आयु के लोगो में भी देखने को मिल जाते है। 
  • अल्ज़ाइमर एक असाध्य रोग है क्योंकि इसमें मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाएँ मृत हो जाती हैं, जो पुनः जीवित नहीं हो सकती हैं। 
  • यू.एस. डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेज़ के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अल्ज़ाइमर होने का खतरा दोगुना होता है।
  • अल्ज़ाइमर रोग का इलाज भारत के लिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और चीन के बाद भारत इस रोग से सबसे ज्यादा पीड़ित है।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

अनुबंध कृषि

प्रीलिम्स के लिये:

अनुबंध कृषि

मेन्स के लिये:

अनुबंध कृषि से होने वाले लाभ तथा इससे उत्पन्न होने वाली संभावित चुनौतियाँ 

चर्चा में क्यों?

ओडिशा सरकार द्वारा COVID-19 से उत्पन्न समस्याओं से निपटने हेतु एक अध्यादेश लाया गया है। यह अध्यादेश निवेशकों और किसानों को अनुबंध कृषि (Contract Farming) की अनुमति देता है।

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि ओडिशा सरकार द्वारा अनुबंध कृषि हेतु एक ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एंड सर्विसेज़’ (Contract Farming and Services) समिति भी बनाई जाएगी। 
  • यह समिति सरकार को अनुबंध कृषि हेतु प्रचार करने और किसानों की दक्षता में सुधार लाने के लिये सुझाव देगी, साथ ही अनुबंध कृषि से संबंधित मुद्दों की समीक्षा भी करेगी। 
  • अध्यादेश का उद्देश्य किसानों और निवेशकों दोनों को पारस्परिक रूप से लाभ देना और कुशल अनुबंध कृषि प्रणाली विकसित करना है।
  • निवेशकों द्वारा किसानों को दिया जाने वाला ऋण या अग्रिम धनराशि को उपज बेचकर चुकाया जा सकता है।
  • इस अध्यादेश में भूमि अधिकार हस्तांतरण संबंधी प्रावधान प्रदत्त नहीं है। 
  • अनुबंध कृषि (Contract Farming):
    • अनुबंध कृषि खरीदार और किसानों के मध्य हुआ एक ऐसा समझौता है, जिसमें इसके तहत किये जाने वाले कृषि उत्पादन की प्रमुख शर्तों को परिभाषित किया जाता है।
    • इसमें कृषि उत्पादों और विपणन के लिये कुछ मानक स्थापित किये जाते हैं। 
    • इसके तहत किसान किसी विशेष कृषि उत्पाद की उपयुक्त मात्रा खरीदारों को देने के लिये सहमति व्यक्त करते हैं और खरीदार उस उत्पाद को खरीदने के लिये अपनी स्वीकृति देता है। 
  • अनुबंध कृषि के लाभ:
    • यह छोटे स्तर के किसानों को प्रतिस्पर्द्धा बना देता है। इसमें आने वाली लागत को कम करने के लिये छोटे किसान तकनीकी, ऋण, विज्ञापन चैनलों और सूचना प्रणालियों की सहायता लेते हैं।
    • इस प्रकार उनके उत्पाद के लिये उन्हें आसानी से बाज़ार मिल जाता है, जिससे बाज़ार में जाकर किये जाने वाले लेन-देन और अनावश्यक खर्च कम हो जाता है।
    • अनुबंध कृषि से उपज की गुणवत्ता बनी रहती है।
    • कृषि प्रसंस्करण स्तरों के मामले में यह कृषि उत्पाद की निरंतर आपूर्ति को सुनिश्चित करता है और इसकी लागत भी कम होती है।
    • कृषि उत्पाद के लिये मूल्य का निर्धारण उत्पादक और फर्मों के मध्य वार्ता द्वारा किया जाता है।
    • किसान नियमों और शर्तों के तहत निर्धारित मूल्यों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में प्रवेश करते हैं।
  • अनुबंध कृषि की चुनौतियाँ:
    • अनुबंध कृषि की आलोचना प्रायः यह कहकर की जाती है कि यह फर्मों और बड़े किसानों के पक्ष में होती है और छोटे किसानों की क्षमता को नज़रअंदाज़ कर देती है।
    • इसके लिये किये गए समझौते प्रायः अनौपचारिक होते हैं, यहाँ तक कि लिखित अनुबंधों को भी अदालतों में लंबे समय तक खींचा जाता है।
    • इसमें खरीदार एक होता है, जबकि विक्रेता अनेक।
    • पुरुषों की तुलना में महिलाओं की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में भागीदारी अपेक्षाकृत कम है, जो समावेशी विकास के सिद्धांत के प्रतिकूल है।
    • अनुबंध कृषि में किसानों के समक्ष समय पर भुगतान की समस्या, कंपनियों और किसानों के बीच विवाद, किसानों का शोषण आदि जैसी चुनौतियाँ भी देखने को मिलती हैं। 

आगे की राह:

  • अनुबंध कृषि भी उन कई उपायों में से एक है, जो किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है,  किंतु किसानों को उनकी पैदावार का न्यायसंगत मूल्य दिलाने व कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने हेतु सरकार को अनुबंध कृषि जैसे तरीकों का सधे हुए कदमों से प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है। 
  • सरकार को किसानों के शोषण को रोकने हेतु विशेषज्ञों की मदद से निरंतर ज़मीनी स्तर पर अध्ययन करते रहना चाहिये जिससे किसानों के हित में मौजूदा कानून को संशोधित किया जा सके।
  • अनुबंध कृषि को बढ़ावा देने हेतु आयातित तकनीक या मशीनों पर अत्यधिक छूट देने का प्रावधान किया जाना चाहिये।
  • किसानों और कंपनियों से विवाद की स्थिति में शीघ्रता से मामलों का निपटारा किया जाना चाहिये। 

स्रोत: द हिंदू


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 22 मई, 2020

आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना

हाल ही में भारत सरकार की प्रमुख स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (Ayushman Bharat Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana) ने 1 करोड़ लोगों के उपचार का आँकड़ा प्राप्त कर लिया है। इस योजना के तहत 21,565 सरकारी और निजी पैनलबद्ध अस्पतालों के माध्यम से 13,412 करोड़ रुपए की लागत से उपचार उपलब्ध कराया गया है। इस अवसर पर आयोजित वेबिनार में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा कि ‘आयुष्मान भारत योजना आगामी समय में आने वाली स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से निपटने में मानवीय दृष्टिकोण के साथ एक पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाती रहेगी।’ ध्यातव्य है कि वर्ष 2018 में शुभारंभ के बाद से ही आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना भारत सरकार की प्रमुख स्वास्थ्य बीमा योजना बनी हुई है। इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार को प्रति वर्ष दिये जा रहे 5 लाख रुपए के स्वास्थ्य कवर के माध्यम से गरीब और वंचित भारतीयों को अस्पताल में किफायती स्वास्थ्य उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। इसका उद्देश्य देश में 10.74 करोड़ से अधिक गरीबों और संवेदनशील परिवारों के लिये वित्तीय जोखिम से सुरक्षा सुनिश्चित करना है। साथ ही भारत सरकार आयुष्मान भारत योजना के सभी लाभार्थियों को मुफ्त COVID-19 जाँच और उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है। इस अवसर पर डॉ. हर्ष वर्धन ने व्हाट्सएप (Whatsapp) पर ‘आस्क आयुष्मान’ (Ask Ayushman) चैट बोट का शुभारंभ किया, जो 24X7 काम करने वाला AI-सक्षम सहायक है। यह आयुष्मान भारत योजना के लाभ, विशेषताओं, ई-कार्ड बनवाने की प्रक्रिया, नज़दीक में स्थित पैनलबद्ध अस्पतालों, फीडबैक और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया जैसी जानकारियाँ उपलब्ध कराता है।

रेपो रेट में कटौती

हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) ने रेपो रेट (Repo Rate) में 0.4 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की है। RBI की घोषणा के साथ ही रेपो रेट अब 4.40 प्रतिशत से घटकर 4.0 प्रतिशत पर पहुँच गया है। RBI के गवर्नर शक्तिकांत दास के अनुसार, बीते 2 महीने में लॉकडाउन के कारण घरेलू आर्थिक गतिविधियाँ काफी बुरी तरह प्रभावित हुई है।’ ज्ञात हो कि शीर्ष 6 औद्योगीकृत राज्यों के अनुसार, औद्योगिक उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा रेड अथवा ऑरेंज ज़ोन में है। साथ ही विभिन्न आर्थिक संकेतक मार्च 2020 में शहरी तथा ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मांग कम होने का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं। ऐसे में RBI के इस निर्णय को मौजूदा आर्थिक स्थिति में मांग को बढ़ाने के लिये एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ध्यातव्य है कि वाणिज्यिक बैंक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये RBI से अल्पकालिक ऋण लेते हैं और इस ऋण पर RBI को उन्हें जिस दर से ब्याज देना पड़ता है, उसे रेपो रेट कहते हैं। रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिये रिज़र्व बैंक से कर्ज़ लेना सस्ता हो जाता है और तभी बैंक ब्याज दरों में भी कटौती करते हैं, ताकि अधिक-से-अधिक रकम ऋण के तौर पर दी जा सके। 

ओवरसीज़ सिटीज़नशिप ऑफ इंडिया

केंद्र सरकार ने हाल ही में विदेश में फंसे ओवरसीज़ सिटीज़नशिप ऑफ इंडिया (Overseas Citizen of India-OCI) कार्डधारकों की कुछ श्रेणियों को देश में आने की अनुमति दे दी है। गृह मंत्रालय द्वारा इस संबंध में जारी आदेश के अनुसार, OCI कार्डधारक पारिवारिक आपात स्थिति में वापस भारत लौट सकते हैं। इसी के साथ ही ऐसे OCI कार्डधारकों को भी वापस भारत लौटने की अनुमति होगी, जिसमें पति अथवा पत्नी में से कोई एक OCI कार्डधारक है और एक भारत का निवासी है। नाबालिग बच्चों को भी अपने OCI कार्डधारक माता-पिता के साथ भारत लौटने की इजाज़त होगी। ऐसे OCI कार्डधारक छात्रों को भी भारत आने की अनुमति दी गई है, जो कानूनी रूप से नाबालिग नहीं हैं, किंतु उनके माता पिता भारत में रहते हैं। ओवरसीज़ सिटीज़न ऑफ इंडिया या OCI की श्रेणी को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में शुरू किया गया था। गृह मंत्रालय OCI को एक ऐसे विदेशी व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद भारत का नागरिक था; या उस तारीख पर भारत का नागरिक बनने योग्य था; या 15 अगस्त, 1947 के बाद भारत का हिस्सा बने किसी क्षेत्र से संबंधित था, या ऐसे व्यक्ति का बच्चा या पोता, जो अन्य उक्त मानदंडों पूरे करता हो।

एश्ले कूपर

आठ बार के ग्रैंड स्लैम टेनिस चैंपियन एश्ले कूपर (Ashley Cooper) का 83 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। ध्यातव्य है कि पूर्व ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी और विंबलडन खिताबधारक एश्ले कूपर 1950 के दशक में चार ग्रैंड स्लैम एकल खिताब और चार ग्रैंड स्लैम युगल खिताब के साथ ऑस्ट्रेलियाई पुरुष टेनिस के स्वर्ण युग का हिस्सा थे। एश्ले कूपर ने अपने 33 वर्षीय लंबे कैरियर में कुल 13 बार अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का फाइनल खेला और उसमें से अधिकांश में जीत हासिल की। एश्ले कूपर अपने कैरियर के दौरान वर्ष 1957 से वर्ष 1958 के दौरान दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी के स्थान पर रहे। एश्ले कूपर का जन्म 15 सितंबर, 1936 को ऑस्ट्रेलियाई के मेलबॉर्न (Melbourne) शहर में हुआ था। एश्ले कूपर को वर्ष 2007 में टेनिस में उनके अमूल्य योगदान के लिये ऑस्ट्रेलियाई के सर्वोच्च सम्मान से भी सम्मानित किया गया था।


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