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भारत-नेपाल संबंधों में उभरती चुनौतियाँ (Indo-Nepal Relations)

  • 10 Nov 2018
  • 15 min read

संदर्भ

हाल ही में भारत के लिये स्थिति उस समय असहज हो गई जब भारत में आयोजित हुए सैन्य अभ्यास MILEX-18  में नेपाल ने अचानक शामिल होने से इनकार कर दिया। पुणे में हुए इस अभ्यास में बिम्सटेक देशों को आमंत्रित किया गया था जिसमें नेपाल का शामिल होना पहले से ही तय था। लेकिन, आखिरी वक्त में नेपाल ने अपने सैनिक भेजने से इनकार कर भारत को अचंभित कर दिया।

प्रमुख मुद्दा

  • भारत को दोहरा झटका तब लगा जब नेपाल ने चीन के साथ Sagarmatha Friendship नामक सैन्य-अभ्यास के दूसरे चरण में शामिल होने के लिये हामी भर दी। इसे चीनी जादूकहा जाए या नेपाल की कूटनीतिक चाल कि पिछले कुछ वर्षों से लगातार भारत सरकार को परेशान करने की कोशिश हो रही है। बात चाहे नेपाली संविधान की करें या हाल के वर्षों में हुए मधेसी आंदोलन की, इन सभी के कारण भारत से नेपाल की दूरियाँ बढ़ी ही हैं।
  • हालाँकि, भारत इन सभी कोशिशों को नेपाल की चीन से बढ़ती नजदीकी के रूप में देख रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने रिश्ते पर ‘चीनी चालभारी पड़ रही है? या फिर यह मान लिया जाए कि हालिया दिनों में नेपाल जरूरत से ज्यादा महत्त्वाकांक्षी बन गया है और भारत उसकी आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा।
  • मधेसी आंदोलन के दौरान भारत पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप इसी का दूसरा पहलू हो सकता है। फिर सवाल यह भी है कि क्या इसे चीन द्वारा भारत को दक्षिण एशिया में परेशान करने की कोशिशों का नतीजा समझा जाए या फिर यह मान लिया जाए कि नेपाल में दशकों से जारी राजनीतिक अस्थिरता ही इस बिगड़ते संबंध की अहम कड़ी है?
  • एक ऐसे समय में जब नेपाल और भारत के बीच कूटनीतिक रस्साकशी चल रही है और दूसरे पड़ोसी देश भी भारत को आँख दिखा रहे हैं, तब क्या नए सिरे से भारत को अपने विदेश नीति की समीक्षा करने की जरूरत है? जाहिर है, कूटनीतिक नजरिए से भारत के लिये ये सवाल बेहद अहम हैं।

नेपाल के रुख में आए इस बदलाव के कारण

  • भारत-नेपाल संबंधों में मतभेद हाल के वर्षों में ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। जब 2015 में नेपाल के संविधान मसौदे को लेकर मधेसियों ने आंदोलन किया था, तब भारत-नेपाल सीमा कई दिनों तक ठप रही थी।
  • नतीजतन, नेपाल ने अपनी कुछ महत्त्वपूर्ण सीमा चौकियों पर भारत द्वारा आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया था।
  • लिहाजा, कुछ महीनों तक दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा। इसके बाद फरवरी 2016 में नेपाली प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने भारत का दौरा किया और भारत के साथ बेहतर संबंधों की प्रतिबद्धता दोहराई।
  • इस दौर में भारत-नेपाल के बीच द्विपक्षीय शिखर बैठक के बाद 9 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए और ऐसा लगा कि शायद दोनों देशों के बीच तनाव का दौर खत्म हो गया।
  • लेकिन, तभी नेपाल और चीन दोनों एक-दूसरे में दिलचस्पी दिखाने लगे। फिर नेपाल में राजनीतिक उठा-पटक के बाद सत्ता बदली और आखिरकार के.पी. शर्मा ओली फिर से प्रधानमंत्री बन गए।
  • इसी वर्ष जून में ओली जब चीन गए तब दोनों देशों के बीच 14 मुद्दों पर समझौते हुए। व्यापार को बढ़ावा देने के लिये चीन-तिब्बत रेल लिंक समझौता सबसे महत्त्वपूर्ण रहा। इसके अलावा देखा जाए तो, चीन भारी निवेश कर नेपाल में बुनियादी ढाँचा, मसलन- सड़क, बिजली आदि परियोजनाओं पर पहले से ही काम कर रहा है।
  • हाल ही में नेपाल को कई चीनी बंदरगाहों को उपयोग करने की भी अनुमति मिल गई है। यही कारण है कि नेपाल में चीन का दबदबा लगातार बढ़ रहा है और भारत का प्रभाव कम होता दिख रहा है।
  • लिहाजा, यह कहना गलत नहीं होगा कि नेपाल सरकार की महत्त्वाकांक्षा ही भारत-नेपाल रिश्ते में खटास की मुख्य वजह है।

क्या इस बिगड़ते रिश्ते में भारत की भी कोई भूमिका है?

  • दरअसल, भारत-नेपाल संबंधों में बढ़ते मतभेद के कारण एकतरफा नहीं हैं। दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट तब आई जब सितंबर, 2015 में नेपाली संविधान अस्तित्व में आया। लेकिन, भारत द्वारा नेपाली संविधान का उस रूप में स्वागत नहीं किया गया जिस रूप में नेपाल को आशा थी।
  • इसी तरह नवंबर, 2015  जेनेवा में भारतीय प्रतिनिधित्व द्वारा नेपाल में राजनीतिक फेर-बदल को प्रभावित करने के लिये मानवाधिकार परिषद् के मंच का कठोरतापूर्वक उपयोग किया गया, जबकि इससे पहले तक नेपाल के आंतरिक मुद्दों को लेकर भारत द्वारा कभी भी खुलकर कोई टिप्पणी नहीं गई थी।
  • इसी क्रम में भारतीय वार्ताकारों द्वारा नेपाली कांग्रेस पर मुख्यधारा में शामिल CPN यानी Communist Party of Nepal का साथ छोड़कर पुष्प कमल दहल की माओवादी पार्टी के साथ गठबंधन बनाने का दबाव भी डाला गया।
  • इससे इतर, पहले भारत का रुख मधेसियों को नेपाल में नागरिकता का अधिकार दिलाना था। पर, बदलते समय के साथ-साथ भारत ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए अपने कदम वापस खींच लिए। गौरतलब है कि नेपाल में मधेसियों की आबादी सवा करोड़ से भी ज्यादा है।
  • इनमें लाखों मधेसियों ने 2015 में नागरिकता को लेकर व्यापक आंदोलन चलाया था। इसके अलावा, 2008 में भारत और नेपाल के बीच जब शांति प्रकिया का दौर चला, तब नेपाल में एक नए संविधान-मसौदे पर कार्य शुरू हुआ।
  • इस दौरान लगभग सभी नेपाली प्रधानमंत्रियों ने भारत का दौरा किया। कुछ तो एक बार से भी अधिक भारत दौरे पर आए। लेकिन, भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा रिश्ते में गर्मजोशी नहीं दिखाई गई।
  • भारत के इस रवैये से समझा गया कि नेपाल नई दिल्ली की विदेश नीति प्राथमिकताओं में नहीं है। ये कुछ ऐसे पहलू हैं जिनकी वजह से भारत-नेपाल संबंधों में तल्खी बढ़ती चली गई।
  • हालाँकि, इस दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने एक-दूसरे देश का दौरा किया और रिश्ते सुधारने की पहल जरूर हुई  लेकिन, चीन की चरफ नेपाल के बढ़ते रुझान की वजह से भारत-नेपाल में मतभेद बढ़ते चले गए।

नेपाल भारत के लिये महत्त्वपूर्ण क्यों है?

  • पड़ोसी देश किस तरह भारत की मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं में है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पीएम नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में सभी पड़ोसी देशों को आमंत्रित किया गया था।
  • नेपाल की अहमियत इस वजह से भी ज्यादा है कि पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद ‘पहले पड़ोस की नीति’ के मद्देनजर नेपाल उनके शुरुआती विदेशी दौरों में से एक था। जबकि इससे पहले आखिरी बार 1997 में नेपाल के साथ भारत की कोई द्विपक्षीय वार्ता हुई थी।
  • हालाँकि, 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नेपाल की यात्रा की थी। लेकिन, वह यात्रा द्विपक्षीय नहीं थी बल्कि सार्क देशों का शिखर सम्मेलन था।
  • मौजूदा सरकार ने नेपाल सरकार के साथ कई महत्त्वपूर्ण समझौते भी किए हैं। कृषि, रेलवे संबंध और अंतर्देशीय जलमार्ग विकास सहित कई द्विपक्षीय समझौतों पर सहमति बनी है।
  • इनमें बिहार के रक्सौल और काठमांडू के बीच सामरिक रेलवे लिंक का निर्माण किया जाएगा, ताकि लोगों के बीच संपर्क तथा बड़े पैमाने पर माल के आवागमन को सुविधाजनक बनाया जा सके। इसके अलावा मोतिहारी से नेपाल के अमेलखगंज तक दोनों देशों के बीच आयल पाइपलाइन बिछाने पर भी हाल ही में सहमति बनी है।
  • इसके अलावा अगर बात करें तो, हम सभी जानते हैं कि नेपाल-भारत रिश्ते सदियों पुराने हैं। दोनों देशों में भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक कारणों से जुड़ाव है।
  • नेपाल का दक्षिण क्षेत्र भारत की उत्तरी सीमा से सटा है। भारत और नेपाल के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता माना जाता है। बिहार और पूर्वी-उत्तर प्रदेश के साथ नेपाल के मधेसी समुदाय का सांस्कृतिक एवं नृजातीय संबंध रहा है।
  • दोनों देशों की सीमाओं से यातायात पर कभी कोई विशेष प्रतिबंध नहीं रहा। सामाजिक और आर्थिक विनिमय बिना किसी गतिरोध के चलता रहता है। भारत-नेपाल की सीमा खुली हुई है और आवागमन के लिये किसी पासपोर्ट या वीजा की जरूरत नहीं पड़ती है। यह उदाहरण कई मायनों में भारत-नेपाल की नजदीकि को दर्शाता है।

आगे की राह 

  • दरअसल, नेपाल द्वारा बार-बार भारत की उपेक्षा करने के पीछे कई कारक काम कर रहे हैं। नेपाल में चीन का बढ़ता हस्तक्षेप, नेपाल की आंतरिक राजनीति और भारत की पड़ोस-नीति की समस्या कुछ ऐसे पहलू हैं जो दोनों देशों में मतभेद के कारण बन रहे हैं। जहाँ तक चीन का सवाल है तो, उसने पिछले कुछ समय से नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव में अपनी सक्रियता बढ़ाई है। वह पाकिस्तान सहित सभी सार्क देशों को आर्थिक सहायता का लालच देकर अपने प्रभाव में लाना चाहता है। नेपाल में चीन द्वारा भारी निवेश इसी का दूसरा पहलू है।
  • अगर नेपाल की आंतरिक राजनीति की बात करें तो, वहाँ पिछले 10 सालों में 10 बार सत्ता परिवर्तन हो चुका है। जाहिर है, नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता उसकी विदेश नीति को संभलने नहीं दे रही। वहां एक सशक्त और मजबूत नेता की सख्त जरूरत है जो पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते को बेहतर कर सके।
  • इससे इतर, भारत को अपनी विदेश नीति की समीक्षा करने की भी जरूरत है। भारत को नेपाल के प्रति अपनी नीति दूरदर्शी बनानी होगी। जिस तरह से नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है, उससे भारत को अपने पड़ोस में आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करने से पहले रणनीतिक लाभ–हानि पर विचार करना होगा।
  • सबसे पहले तो भारत को अपने खिलाफ बने चीन-नेपाल-पाकिस्तान गठजोड़ की काट ढूंढ़नी होगी जो दक्षिण एशिया में भारत के लिये सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
  • सच तो यह है कि भारत और चीन के साथ नेपाल एक आजाद सौदागर की तरह व्यवहार कर रहा है और चीनी निवेश के सामने भारत की चमक फीकी पड़ रही है। लिहाजा, भारत को कूटनीतिक सुझबूझ का परिचय देने होगा।
  • बात चाहे बिम्सटेक देशों की हो या सार्क देशों की, भारत से हमेशा उम्मीद की जाती है कि वह एक नेतृत्त्वकर्ता की तरह काम करे। लेकिन, भारत इस उम्मीद पर खरा नहीं उतर पा रहा है।
  • मिसाल के तौर पर लंबे समय तक, भारत ने म्याँमार के अराकान तट पर सड़क और रेल कनेक्शन और एक नए बंदरगाह के निर्माण की बात कही थी। लेकिन, वादों को पूरा करने के लिये कोई गंभीर पहल नहीं की गई।
  • इस तरह के वादों की देरी से भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बिगाड़ रहा है और चीन इसी मौके का फायदा उठाते हुए भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है।
  • लिहाजा, भारत को चाहिए कि वह रक्सौल-काठमांडू रेल लिंक परियोजना को तय समय में पूरा करने की तत्परता दिखाए। क्योंकि, विकास परियोजनाओं के माध्यम चीन भारत के पड़ोसी देशों में पहुँच स्थापित कर भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ना चाहता।
  • बहरहाल, भारत को गंभीर और सुलझे प्रयासों के जरिए नेपाल सहित अपने सभी पड़ोसियों को साधने की जरूरत है। ताकि चीन द्वारा पड़ोसी देशों में घुसकर भारत के लिये खतरा उत्पन्न करने की मंशा को नाकाम किया जा सके।
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