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क्यों हड़प्पा से भी ख़ास है महाजनों का शहर धौलावीरा ?

  • 05 Aug, 2021

27 जुलाई, 2021 को गुजरात में स्थित धौलावीरा को यूनेस्को द्वारा भारत का 40वाँ विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया। प्राचीन इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिये तो यह एक जाना पहचाना नाम है लेकिन जिनका संबंध इतिहास से बहुत गहराई से न हो, उनके लिये ‘धौलावीरा’ वर्तमान में सुर्खियाँ बटोरने वाली कोई सूचना भर हो सकती है। हालाँकि सामान्य रूप से यह नाम सुनने के पश्चात यदि हम अपनी स्मृतियों पर ज़ोर डालें तो हमें याद आता है कि धौलावीरा के बारे में हमने बचपन में इतिहास की किताबों में पढ़ा था। स्मृति पर थोड़ा और ज़ोर डालने पर हमें याद आता है कि धौलावीरा विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं में से एक हड़प्पा सभ्यता अर्थात सिन्धु घाटी सभ्यता का एक पुरास्थल है। लेकिन धौलावीरा का महत्त्व इन बुनियादी तथ्यों से कहीं अधिक व्यापक है। धौलावीरा के महत्त्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह भारत में हड़प्पा सभ्यता का पहला ऐसा पुरास्थल है जिसे यह दर्ज़ा दिया गया है। इसके पूर्व सिन्धु घाटी सभ्यता के एक ही पुरास्थल ‘मोहनजोदड़ो’ को ही विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया था किन्तु वर्तमान में यह पाकिस्तान के  सिंध प्रांत में है। यही नहीं सिन्धु घाटी सभ्यता का सबसे चर्चित और सबसे पहले खोजे गए पुरास्थल ‘हड़प्पा’ को भी विश्व विरासत स्थल का तमगा मिलना अभी बाकी है।

धौलावीरा कच्छ के महान रण में रेत के समुंदर के बीचो-बीच खादिर बेट द्वीप पर मनसर और मनहर नामक दो जलधाराओं के बीच स्थित है। ऐसा आकलन है कि आज से 5000 वर्ष पूर्व रण का जलस्तर इतना ऊँचा था कि समुद्री नाव तट से चलते हुए सीधा इस स्थल तक पहुँच जाते थे। कर्क रेखा के निकट स्थित होने के कारण इसका भूगोल और भी रोचक हो जाता है। यहाँ से कुछ मील आगे जाने पर हम भारत-पाकिस्तान सीमा पर भी पहुँच जाते हैं।

धौलावीरा भारत में राखीगढ़ी के पश्चात् सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा पुरास्थल है। सम्पूर्ण विश्व को इसके बारे में पता तो 60 के दशक में ही चल गया था जब पुरातत्वविद् जगपति जोशी द्वारा इसकी खोज की गई किंतु इस स्थल की व्यापक खुदाई 1990 में आर.एस. बिस्ट द्वारा करवाई गई जिसके पश्चात् ही हमें ज्ञात हुआ कि आज से लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व यह भारत के सबसे व्यस्ततम महानगरों में से एक था। यह एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। यही कारण है कि एक इतिहासकार ने इसे ‘महाजनों का शहर’ कहा है। अन्य हड़प्पाई नगरों के विपरीत यह नगर तीन भागों में विभाजित था- दुर्ग (गढ़ी), मध्य नगर तथा निचला नगर। इसके अतिरिक्त इसके चहारदीवारी के चारों ओर भी कुछ बस्तियों के अवशेष मिले हैं, जिसे उपनगर कहा गया है। धौलावीरा में बेहतर नगर नियोजन तथा बेहतर जल निकासी तथा सीवेज व्यवस्था जैसी विशेषताएँ तो हैं ही किंतु जो चीज़ इसे अन्य पुरास्थलों की तुलना में विशेष स्थान दिलवाती है वह है इसकी बेहतर जल संचयन अथवा जल प्रबंधन की व्यवस्था। यह क्षेत्र अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र में आता था जहाँ वर्षा की मात्रा औसत से कम होती थी किंतु फिर भी इनकी वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक के कारण इतने बड़े नगर के लिये पानी की कमी नहीं पड़ती थी। यहाँ पर पत्थरों की सहायता से वर्षा के पानी के संचयन के लिये जलाशयों (Reservoires) की एक श्रृंखला बनाई गई थी।

धौलावीरा से दस अक्षरों वाला एक सूचना पट्ट भी मिला है जो सिंधु घाटी सभ्यता में प्राप्त सभी अभिलेखों में सबसे बड़ा है। पुरातत्वविद् तथा धौलावीरा के उत्खननकर्ता आर.एस. बिष्ट ने इसे ‘दुनिया के सर्वाधिक पुराने अर्थात् पहले साइन बोर्ड’ की संज्ञा दी है। इस साइन बोर्ड पर क्या लिखा है इसका पता तो अभी नहीं चल पाया है क्योंकि इस पर अंकित भावचित्रात्मक लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

धौलावीरा जैसे पुरास्थल हमारी पुरातन सभ्यता को जानने के साधन हैं। हम अपनी सभ्यता संस्कृति के बारे में जितना जानते हैं उससे भी कहीं अधिक जानकारी अभी बाहर आना बाकी है। यूनेस्कों द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा मिलने से इन पुरास्थलों को अंतर्राष्ट्रीय पहचान भी मिलेगी तथा अपने प्राचीन गौरव को जानने की आम-जन की अभिलाषा भी तीव्र होगी।

Rohit-Nandan-Mishra

[रोहित नंदन मिश्रा]

(लेखक दृष्टि आईएएस में वरिष्ठ कंटेंट संपादक हैं)

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