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अनुसूचित जाति एवं जनजाति: कल्याणकारी योजनाएं एवं संरक्षण

मानव सभ्यता के विकासक्रम में कुछ समूह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बतौर अन्य समूहों के एवज में पिछड़ जाते हैं। उनके पिछड़ने का कारण स्थान, जाति और लिंग विशेष तौर पर अड़े हाथों आता है। मसलन जैविकी सिद्धांत के अनुसार स्त्रियों का पिछड़ापन लिंग को माना गया। वहीं जनजातियों के पिछड़ेपन का मुख्य कारण स्थान अथवा अवस्थितिकी को माना गया, कुछ समूह जिनकी पहचान जाति विशेष तौर पर की गई उनके पिछड़ेपन या वंचना का कारण सामाजिक पदक्रम को माना गया। लेकिन यह सिद्धांत अंतिम निष्कर्ष को नहीं व्याख्यायित अथवा सत्यापित करता। सिद्धांत में समय और शोध के साथ परिवर्तन और परिष्करण भी होता रहता है।

‘अनुसूचित जाति और जनजाति: कल्याणकारी योजनाएं और संरक्षण’ पर विस्तार करने से पहले हमें यह चिह्नित करना होगा कि आखिर अनुसूचित जाति और जनजाति किसे कहते हैं, भारतीय संविधान में इनके लिए क्या प्रावधान हैं और इनकी क्या परिभाषा हैं, इनकी अपनी पहचान के मानक क्या है अन्य समुदायों से यह कैसे अलग-थलग हैं, इनकी विशेषताएं क्या हैं, इनके बीच क्या-क्या समानताएं और विभिन्नताएं हैं?

अनुसूचित जनजाति और जाति का अध्ययन मानवशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के महत्व का रहा है तो ऐसे में यह देखना जरूरी हो जाता है कि इन विषयों में क्या कुछ लिखा और पढ़ा गया। जहाँ तक अनुसूचित जनजाति के प्रश्न और पहचान का सवाल हैं तो मानवशास्त्री मजूमदार लिखते हैं कि-“एक जनजाति परिवारों अथवा परिवारों के समूह का संग्रह है जिसका एक सामान्य नाम, एक सामान्य भू-भाग, एक सामान्य भाषा और विवाह, वृत्ति या व्यवसाय के प्रति कुछ निषेध का पालन, उनमें परस्पर आदान-प्रदान एवं दायित्वों की पारस्परिकता की एक सुनिश्चित व्यवस्था विकसित हो गई।” वहीं 1991 की जनगणना आदिवासियों के बारे में बतलाती है कि-“ ये अपने सीमित संसाधनों से केवल जीवित रहना ही सीख सके हैं और आज भी विज्ञान की इस चकाचौंध व सभ्यता की होड से अपरिचित हैं। ऐसे ही अपरिचित लोगों का उल्लेख भारतीय संविधान में अनुसूचित आदिम-जाति या जनजाति के अंतर्गत किया जाता हैं।”

ऐसे में जो मुख्य विशेषताएं और विभिन्नताएं जनजातियों के बारे में निकल कर आती हैं वे कुछ इस प्रकार हो सकती हैं- प्रत्येक जनजाति की एक भाषा अथवा बोली होती है, उसके समूह का अपना एक नाम होता है, उनका एक निश्चित भू-भाग होता है, एक संस्कृति होती है, परिवारों का एक समूह होता है, नातेदारी की एक व्यवस्था, अपना एक राजनीतिक संगठन, आर्थिक आत्मनिर्भरता, अंतर्विवाही व्यवस्था और एक सामान्य निषेध। इसी आधार पर हम जनजातियों विश्लेषण और पहचान करते हैं।

भारत में प्रजातीय अध्ययन की शुरुवात 1890 ई. से सर् हरवर्ट रिजले ने किया। जिनकी किताब का नाम दी पीपल्स ऑफ इंडिया (The peoples of India) जोकि 1915 ई. में प्रकाशित हुई। जे. एच. हट्टन ने भारत में मुख्यतः तीन प्रकार के जनजातीय परिवार का वर्णन किया। पहली नीग्रिटो- जिसे सबसे प्राचीन कहा और इनका स्थान आज का दक्षिण भारत बताया। दूसरी प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड-जिसे आज का मध्य भारत जिसमें गौड़ आदि जनजाति आती हैं और तीसरी मंगोलायड- जिसे आज के ब्रह्मपुत्र के आस-पास रहने वाली जनजाति बताया।

आजादी के बाद 1950 ई.में जनजातियों की संवैधानिक पहचान की गई, उस समय 212 समूहों अथवा परिवार को जनजाति का दर्जा दिया गया। अनुच्छेद 342 में प्रावधान करके राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि वह समय-समय पर सार्वजनिक सूचना के द्वारा जनजातियों को सूचीबद्ध करें और 342(1) में लिखा गया-“अनुसूचित जनजातियाँ वे जनजातियाँ अथवा जनजातीय समुदाय या उनका कोई हिस्सा या इन जनजातियों का कोई समूह जिन्हे राष्ट्रपति द्वारा सार्वजनिक सूचना द्वारा 342(1) के तहत रखा गया है।” वहीं अनुच्छेद 366(25) में लिखा गया- “ऐसी जनजातियां या आदिवासी समूह या ऐसी जनजातियां या जनजातीय समुदाय के हिस्से या समूह हैं जिन्हें संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति माना जाता है”

अनुसूचित जनजातियों को लेकर जो आज डेटा उपलब्ध हैं उसके अनुसार देश की कुल आबादी का 8.14%, देश के कुल क्षेत्रफल के 15% पर निवास, आबादी का 52% गरीबी रेखा से नीचे, 54% आदिवासियों की संचार और परिवहन तक आज भी कोई पहुँच नहीं है। लगभग 42% कामगार जिनमें से 55% किसान और 33% कृषि श्रमिक हैं। प्राप्त डेटा के अनुसार ही 87% कामगार प्राथमिक क्षेत्र से जुड़े हैं। वहीं अनुसूचित जनजातियों की साक्षरता दर 29.60% है और अनुसूचित जनजातियों की तीन-चौथाई महिलाएं अशिक्षित हैं। मिजोरम में अनुसूचित जनजातियों का प्रतिशत सबसे अधिक है लगभग 95% तक।

अनुसूचित जाति – जिस तरह अनुसूचित जनजातियों के लिए अंग्रेजी में ‘ट्राइब्स’(Tribes) का प्रचलन है जिसकी समानता हिन्दी शब्द ‘कुटुंब’ से की जाती है लेकिन राजनीति में इसका आशय ‘अविकसित समाज’ से माना गया ठीक उसी तरह जाति के लिए अंग्रेजी शब्द ‘कास्ट(Cast)’ का हिन्दी रूपांतरण जाति है जिसका विस्तारित अर्थ “लोग अपने पैतृक व्यवसाय को परिवर्तित नहीं करते हैं। इस प्रकार जूते बनाने वाले लोग एक ही प्रकार(जाति) के हैं।” लेकिन मार्क्सवादी राजनीति विज्ञान में जाति का अर्थ राष्ट्र अथवा राज्य से समझा जाता है। इसीलिए अगर भारतीय सामाजिक परिदृश्य में अंग्रेजी के कास्ट के ऐतिहासिक तुलना पर जाएंगे तो अनेक भिन्नताएं उभर आएंगी क्योंकि यूरोप के पैतृक पेशे में जिस तरह परिवर्तन हुआ वैसे भारत में नहीं हुआ और न ही भारतीय और यूरोपीय समाज में जाति के अनेक पहलुओं में उतनी गहरे स्तर की कोई विशेष समानता ही थी। मजूमदार और मदन ने कहा- “हिन्दू सामाजिक संरचना की सबसे चर्चित विशेषता जाति की संस्था है या इसे अधिकतर जाति व्यवस्था कहा जाता है। विश्व के अन्य हिस्सों में भी जाति पायी जाती है लेकिन भारत में जिस प्रकार जाति व्यवस्था पायी जाती है। वह कुछ अनूठी विशेषताओं द्वारा जानी जाती है, न कि उन विशेषताओं द्वारा जोकि अन्यत्र संरचनाओं में विद्यमान है।” सभी को पता है प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था वर्णों में विभाजित थी जिसके अपने कार्य-कारण थे, ठीक इसी तरह भारतीय समाज में जाति का एक पदक्रम बना वैसे तो पहले यह लचीला था, क्योंकि जाति पेशे से ही बनी लेकिन जब यह लचीली नहीं रह गई तो कठोर और व्यवस्थित हो गई, समय के साथ इसमें परिवर्तन होना लगभग खत्म ही हो गया और एक समय के बाद जाकर जाति को पैतृक माना जाने लगा तो इस तरह जाति का आधुनिक रूप आया, लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी जातियों के पिछड़ेपन का एक ही कारण और निर्धारक है। जाति के पदक्रम में आप ऊपर से जैसे जैसे नीचे जाओगे पिछड़ेपन का कारण बदलता और अधिक अथवा अनेक होता जाएगा जैसे कि जाति के पदक्रम में ऊपर से थोड़ा नीचे जाओगे तो सिर्फ राजनीतिक आधार पर पिछड़ापन दिखेगा, उससे और नीचे जाओगे तो आर्थिक-राजनीतिक आधार पर जाति में पिछड़ापन दिख जाएगा और इससे भी नीचे जाओगे तो राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अनेक स्तर पर आपको पिछड़ी जाति मिलेगी। इस तरह अनुसूचित जाति जिसका हम इधर अध्ययन कर रहें हैं वह न सिर्फ आर्थिक आधार पर पिछड़ी अथवा वंचित है बल्कि उसके वंचना का कारण राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक भी हो सकता है।

जाति की विशेषता, विश्लेषण और पहचान के लिए समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवासन ने कुछ मुख्य बिंदु बतलाएं जिनमें से संस्तरण अथवा पदक्रम, अंतःविवाह तथा अनुलोम विवाह, व्यावसायिक सम्बद्धता, भोजन और जलपान पर प्रतिबंध, प्रथा/भाषा और पहनावे का भेद, संस्कार एवं अन्य विशेषाधिकार तथा निर्योग्यताएं, जाति संगठन, जाति गतिशीलता आदि।

अनुसूचित जातियों के लिए जो संवैधानिक उपबंध किया गया है वह कुछ इस प्रकार है- अनुच्छेद 341(2) में लिखा गया कि “संसद विधि द्वारा, किसी जाति, मूलवंश या जनजाति को अथवा किसी जाति, मूलवंश या जनजाति के भाग या उनमें के समूह खंड(1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अनुसूचित जातियों की सूची में सम्मिलित कर सकेगी या उनमें से अपवर्जित कर सकेगी, किन्तु जैसा ऊपर कहा गया है उसके सिवाय उक्त खंड के अधीन जारी की गई अधिसूचना में किसी पश्चातवर्ती अधिसूचना द्वारा परिवर्तन नहीं किया जाएगा” इस तरह भारतीय संविधान का 341 अनुच्छेद अनुसूचित जातियों से संबंधित है।

अगर डेटा की बात किया जाए तो भारत में लगभग 16.6% अनुसूचित जातियों की जनसंख्या है, 2011 की जनगणना के अनुसार सबसे अधिक पंजाब राज्य में लगभग 32% है। 1950 में संविधान लागू होने के समय 1108 जातियों की पहचान की गई थी।

संवैधानिक संरक्षण- अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए भारतीय संविधान में अनेक प्रावधान और प्रवर्तन किए गए हैं जैसे कि अनुच्छेद 338 के तहत एक ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग’ जिसका काम अनुसूचित जाति के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हित अथवा सुरक्षा प्रदान करना ठीक इसी तरह अनुसूचित जनजातियों के लिए एक ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग’ की स्थापना जिसका प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338A में किया गया है। यह दोनों आयोग एक संवैधानिक आयोग हैं जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद में उपबंधित या वर्णित है इसी को मद्देनजर रखते हुए पहला अनुसूचित जाति आयोग भारतीय संविधान संशोधन 89 के तहत 2004 में सूरज भान की अध्यक्षता में गठित किया गया और अनुसूचित जनजाति आयोग के प्रथम अध्यक्ष कुँवर सिंह बनाए गए।

अन्य संरक्षण और सुरक्षात्मक उपबंध में ‘नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम-1955’(The protection of civil right act-1955) और ‘अनुसूचित जाति और जनजाति(अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989’ (Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities)act-1989) प्रमुख हैं। नागरिक संरक्षण अधिकार अधिनियम जिसे पहले अस्पृश्यता(अपराध) अधिनियम भी कहा गया। जिसे स्वतंत्र भारत में अस्पृश्यता खत्म करने और अस्पृश्यता को असंवैधानिक घोषित करने के लिया लाया गया और इस एक्ट के द्वारा अस्पृश्यता को अपराध करार दिया गया और इसका प्रचार-प्रसार करने वालों को दंड का भागीदार भी माना जायेगा। वहीं अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार) निवारण अधिनियम अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्यों के विरुद्ध किए गए अपराधों के निवारण के लिए लाया गया, यह अधिनियम ऐसे अपराधों के संबंध में मुकदमा चलाने, पीड़ित व्यक्तियों को राहत और पुनर्वास का प्रावधान भी करता है।

इसके साथ ही साथ भारतीय संविधान के अन्य अनुच्छेद में भी अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए सुरक्षात्मक और संरक्षणात्मक उपाय अथवा उपबंध किए गए हैं- अनुच्छेद-15 जो भेदभाव को व्याख्यायित करता है और भेदभाव से संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद-17 अस्पृश्यता को खत्म करने की बात करता है। अनुच्छेद-46 अनुसूचित जातियों और समाज के कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को समर्थन देने और सभी प्रकार के अन्याय और शोषण से मुक्ति की वकालत। अनुच्छेद-343 पंचायत और नगरपालिका चुनाव में आबादी के अनुपात में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण की संवैधानिक सुरक्षा देता है। अनुच्छेद-330 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए लोकसभा की सीटों में आरक्षण का प्रबंध। अनुच्छेद-332 में राज्य की विधानसभाओं की सीटों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान करता है। अनुच्छेद-335 में संघ और राज्य की सेवाओं और नियुक्तियों अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों का ध्यान रखा जाएगा।

इसके साथ ही साथ हाथ से मैला साफ करने और सिर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने के लिए सन् 2003 में The Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation act-2013 बनाया गया। जिसमें हाथ से मैला साफ करने और सिर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म कर दिया गया।

क्योंकि अनुसूचित जनजाति में अलगाव की भावना प्रबल होती है। वे अपने स्थान, भाषा, संस्कृति आदि को लेकर संवेदनशील रहती हैं ऐसे में उनकी इस विशेषता को मद्देनजर रखते हुए भारत सरकार कुछ क्षेत्र के भ्रमण और खोजी गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित कर देती है या फिर कुछ विशेष नियम और विनियम के तहत सहमति देती है जैसे कि उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्सों में घूमने के लिए आपको सरकार से स्वीकृति की जरूरत होती है और कुछ प्रदेश या स्थान को घूमने की लगभग मनाही ही है जैसे सेंट-स्टेनली द्वीप समूह पर। यह सब नियम और निर्धारण जनजातियों के प्राकृतिक अधिकार, उनकी संवेदनशीलता और सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं।

अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए संघ और राज्य स्तर पर अनेक कल्याणकारी योजनाएं संचालित हैं फिर चाहे वे शैक्षिक सुविधा मुहैया कराती हो अथवा फिर आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहायता।

विशेष केंद्रीय सहायता और अनुदान- केन्द्रीय सरकार अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत सहायता तथा अनुदान कृषि, बागवानी, लघु-सिंचाई, मृदा-संरक्षण, पशुपालन, वन, सहकारिता, मत्स्य, गाँव और लघु उद्योग के लिए उपलब्ध कराती है।

आदिम जनजातीय समूह विकास योजना- 17 राज्यों और एक संघ शासित प्रदेश को मिलकर 75% आदिवासी समूह के लिए 1998-1999 में केंद्रीय क्षेत्र योजना शुरू की गई। इसमें आवास, बुनियादी ढांचे का विकास, शिक्षा स्वास्थ्य, भूमि-विकास, कृषि-विकास, पशुपालन, सामाजिक सुरक्षा, बीमा आदि को सम्मिलित किया गया।

2007 और 2008 के दौरान ‘संरक्षण एवं विकास योजना’ तैयार किया गया। इसमें राज्य सरकार तथा गैर-सरकारी संगठनों के बीच प्रयास और तालमेल की परिकल्पना की गई।

जनजातीय अनुसंधान संस्थान- इस योजना के तहत 14 अनुसंधान संस्थान स्थापित किए गए। ये संस्थान राज्य सरकार को योजना संबंधी जानकारी, अनुसंधान, मूल्यांकन, आंकड़ों का संग्रहण, प्रशिक्षण, संगोष्टी और कार्यशाला का आयोजन और सहायता करना।

अन्य योजनाओं और सहायता में, शिक्षा में आरक्षण, छात्रवृत्ति, सेवा व पदों में आरक्षण, आयु में छूट, शुल्क में रियायत, अनुभव संबंधी अर्हता में छूट, पदोन्नति में रियायतें, प्रक्रियात्मक संरक्षण, आवासीय सुविधा, स्वैक्षिक संगठनों को सहायता आदि

इस तरह आजादी के बाद भारत के दो प्रमुख आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांकृतिक वंचित और पिछड़े समुदाय को जिसकी कुल-मिलाकर आबादी लगभग 25% के आस-पास है देश के विकास और मुख्यधारा में सम्मिलित करना बहुत जरूरी हो गया, क्योंकि यह आर्थिकी की परिभाषा में राष्ट्र की जनसंख्या या लोगों का समूह भर नहीं है अपितु यह राष्ट्र की पूंजी भी है जिसको सम्मिलित किए बिना न तो राष्ट्र विकास के तरफ कदम ही रखा सकता है और न ही संवैधानिक उपबंधों के तहत समानता को प्राप्त किया सकता है, इसीलिए आजादी के बाद यह जरूरी हो गया कि देश की एक एक चौथाई जनसमूह के पिछड़ेपन और वंचना को दूर करके एक बेहतर राष्ट्र की कसौटी पर खरा उतरा जाए जिसमें भारतीय संविधान के उपबंध न सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजातियों को अवसर की समानता देते हैं अपितु उनके लिए संविधान में अनेक सामाजिक,सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रावधान कर सुरक्षा भी प्रदान करते हैं।

  दीपक कुमार  

दीपक कुमार मूलत: उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले से हैं। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक एवं परास्नातक की पढ़ाई की है। वर्तमान में ये दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। ये विभिन्न विषयों पर लेखन कार्य करते हैं।

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