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कैसा है पूर्वोत्तर भारत का जीवन!

  • 18 Jan, 2021

कभी-कभी पूर्वाग्रह इतना सघन होता है कि हम किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति अनायास ही ऐसी कल्पना कर लेते हैं, जो ज़्यादातर बार गलत होती है। यह पूर्वाग्रह भाषा, धर्म या नस्ल से प्रेरित हो सकता है। भारत के उत्तर-पूर्व में निवास करने वाले लोगों के प्रति शेष भारतीयों के मन में कुछ-न-कुछ मात्रा में ऐसा पूर्वाग्रह रहता ही है। खान-पान से लेकर पहनावे और आचार-विचार तक के बारे में यह पूर्वाग्रह काम करता है। फिर जब हम उन्हें नज़दीक से जानते हैं तब पता चलता है कि हम कितने गलत होते हैं।

वह जून 2015 का समय था। भारतीय सेना ने म्याँमार में घुसकर NSCN-K के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक किया था और उग्रवादी गतिविधियों पर कुछ रोक लगी थी लेकिन डर का माहौल बना हुआ था। इसी बीच मेरे नाम से नवोदय विद्यालय में शिक्षक के तौर पर ‘जिसामी’ नामक गाँव के लिये नियुक्ति पत्र आ गया था। एक ऐसी जगह जिसके बारे में न कभी पढ़ा था न कभी सुना था। तमाम अंतर्विरोधों को झेलते हुए और अज्ञात के भय और अज्ञात की जिज्ञासा दोनों भाव से प्रेरित होकर मैंने यात्रा शुरू की और हिमालय की नगा पहाड़ियों की तरफ चल पड़ा। जिसामी यूँ तो भौगोलिक सीमाओं के तहत मणिपुर में था परंतु इसकी अधिकांश आबादी चकेसांग नगा समुदाय की थी, जो वहाँ जाने के बाद पता चला।

मैदानी भाग की तरह यहाँ यातायात के साधन उतने सुगम नहीं हैं। स्थिति यह है कि अगर  सुबह 5 बजे की गाड़ी छूट गई तो अगले दिन ही आपकी यात्रा संभव है। मैं भाग्यशाली था कि मुझे गाड़ी उसी दिन मिल गई और मेरे जीवन की पहली नौकरी की यात्रा शुरू हुई - उन रास्तों पर जहाँ एक तरफ पहाड़ दूसरी तरफ सैंकड़ो फीट गहरी खाई और साथ में मेरे जैसे 10 यात्री। हमारी यात्रा थोड़ी और आगे बढ़ी और मैं बार-बार हिंदी में पूछ रहा था कि जिसामी कब तक आएगा? वे लोग कह रहे थे - बस आ जाएगा! लगभग 12 घंटे की यात्रा करने के बाद मैं जिसामी गाँव पहुँचा। एक पहाड़ी पर बसा हिल स्टेशन था वह, बहुत खूबसूरत और बहुत शांत। मुझे वहाँ उतरकर पता चला कि वे लोग मुझे इंटेलिजेंस ब्यूरो का सदस्य समझ रहे थे और मैं उनसे डर रहा था! उसी समय मेरा एक भ्रम टूटा और सीख मिली कि संवादहीनता कितनी बड़ी गलतफहमी पैदा कर सकती है, और मैंने सोचा कि मुझे यहाँ रहना है तो यहाँ का होकर रहना होगा और यहाँ के लोगों के साथ संवाद स्थापित करना होगा।

नवोदय विद्यालय जिसामी, ज़िला उखरुल, मणिपुर जाने के लिये लगभग 800 मीटर पैदल चलकर, एक सीधी चढ़ाई द्वारा पहाड़ पर चढ़ना था। सामान नीचे बाज़ार में रखकर मैं जैसे-जैसे चढ़ता गया यह एहसास भी होता गया कि शीर्ष पर चढ़ने के लिये  बहुत मेहनत करनी पड़ती है ।

चिपके हुए गाल, चिपकी हुई नाक, गठीला शरीर और मेहनत की चमक आँखों में लिये मुस्कुराते हुए चेहरों के साथ कुछ लोगों ने अंग्रेज़ी भाषा में मेरा स्वागत किया और मैंने भी उसी अंदाज़ में उत्तर दिया। जुलाई का महीना था, हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। मैं अभी वहाँ के बाँस के बने छप्परनुमा घरों को देख ही रहा था कि एक व्यक्ति मेरे पास गरम पानी और कुछ बिस्किट लेकर आया। उसने बिस्किट देते हुए एक प्रश्न भी किया, "सर, आपके देस में भी ऐसा ठंडा पड़ता है?" मैं अभी चुप ही था कि प्रिंसिपल सर ने, जो दिल्ली में भी रहे थे और देश घूम चुके थे, कहा कि अपने देश से ही हैं! तब उस व्यक्ति ने, जिसका नाम जेम्स था, तुरंत  उत्तर दिया कि ‘हमको किया मआलूम! हम तो इस पहाड़ से बाहर कभी गया ही नहीं’। फिर मेरे सामने इतिहास जीवंत हो उठा जब परिवहन के साधनों के अभाव और यात्रा की असमर्थता ने लोगों को अपने गाँव को ही अपना देश मानने के लिये विवश किया था। मैं मन-ही-मन राष्ट्र और राष्ट्र राज्य की बात सोच रहा था, फिर यह ख़याल आया कि उससे कुछ बात करूँ। जेम्स से बातचीत के क्रम में उसकी नेकनीयती को समझ पाना कठिन न था।

वहाँ के लोग तो अमूमन शाम 7 से 8 के बीच ही सो जाते थे। इंटरनेट वहाँ पर 2g का था और कभी-कभी सरकार भी इंटरनेट बंद कर देती थी, रही सही कसर बारिश पूरी कर देती थी। जब कभी तेज़ बारिश होती थी 2 या 3 दिन बिजली नहीं आती थी इस वजह से लोग टेलीविज़न भी नहीं देख पाते थे, शायद इसलिये भी पहले सो जाते थे। अगर कोई  बीमार न हो तो दिन में शायद ही कोई सोता था। सबसे अच्छी बात तो यह थी कि सुबह उठने के बाद जब तक रात को सोने न जाए, हर व्यक्ति अपने काम में लगा रहता था। जिस उम्र में उत्तर भारत में तोंद शरीर की शोभा मानी जाती है उस उम्र में वे लोग अपने सीढ़ीदार खेतों में काम करते थे और वहाँ से सर पर डाली लगाए, हाथ में डंडा लिये फसल या फल लाया करते थे। सीढ़ीदार खेतों की रक्षा की ज़िम्मेदारी बुज़ुर्ग लोगों के हिस्से थी। युवाओं को अपनी ज़िंदगी की स्वतंत्रता दी जाती थी।  हालाँकि फसल कटाई और बुवाई के मौके पर पूरा कुनबा एकत्र होता था और स्थानीय लोग  अपनी बोली में सामूहिक गीत गाते हुए बड़ी आसानी से कोई भी कार्य पूरा कर लेते थे। वहाँ का जीवन भी उतना ही सामान्य है जितना शेष भारत का। भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नता के कारण जीवन-शैली में अंतर होना स्वाभाविक ही है। हम सबको ऐसे अंतर के प्रति सहज होना चाहिये क्योंकि हम सभी एक-दूसरे से थोड़ी बहुत भिन्नता रखते ही हैं।

[विवेक विशाल]

(लेखक जवाहर नवोदय विद्यालय, जिसामी के शिक्षक रहे हैं।)

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