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जलवायु परिवर्तन कृषि को कैसे प्रभावित करता है?

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक मुद्दे के रूप में उभर कर आया है। जलवायु परिवर्तन कोई एक देश या राष्ट्र से संबंधित अवधारणा नहीं है अपितु यह एक वैश्विक अवधारणा है जो समस्त पृथ्वी के लिए चिंता का कारण बनती जा रही है। देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन से भारत सहित पूरी दुनिया में बाढ़, सूखा, कृषि संकट एवं खाद्य सुरक्षा, बीमारियां, प्रवासन आदि का खतरा बढ़ा है। लेकिन चूंकि भारत का एक बड़ा तबका (लगभग 60 प्रतिशत आबादी) आज भी कृषि पर निर्भर है, और इसके प्रभाव के प्रति सुभेद्य है इसलिए कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखना बहुत जरूरी हो जाता है।

ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 के अनुसार, भारत जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित दस शीर्ष देशों में शामिल है। जलवायु की बदलती परिस्थितियां कृषि को सबसे अधिक प्रभावित कर रहीं हैं क्योंकि लम्बे समय में ये मौसमी कारक जैसे तापमान, वर्षा, आर्द्रता आदि पर निर्भर करती है। अतः इस लेख में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि जलवायु परिवर्तन कृषि को कैसे प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन कृषि को कई प्रकार से प्रभावित कर सकता है जैसे-

उत्पादन में कमी

ग्लोबल वार्मिंग के कारण विश्व कृषि इस सदी में गंभीर गिरावट का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (IPCC) के अनुसार, वैश्विक कृषि पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव नकारात्मक होगा। हालांकि कुछ फसल इससे लाभान्वित भी होंगी किन्तु फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक होगा। भारत में 2010-2039 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 4.5 प्रतिशत से 9 प्रतिशत के बीच उत्पादन के गिरने की संभावना है। एक शोध के अनुसार, यदि वातावरण का औसत तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो इससे गेहूं का उत्पादन 17 प्रतिशत तक कम हो सकता है। इसी प्रकार 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से धान का उत्पादन भी 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम होने की संभावना है।

कृषि योग्य परिस्थितियों में कमी

जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान के उच्च अक्षांश की और खिसकने से निम्न अक्षांश प्रदेशों में कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारत के जल स्रोत तथा भंडार तेजी से सिकुड़ रहे हैं जिससे किसानों को परम्परागत सिंचाई के तरीके छोङकर पानी की खपत कम करने वाले आधुनिक तरीके एवं फसल अपनानी होंगी। ग्लेशियर के पिघलने से कई बड़ी नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में दीर्घावधिक रूप से कमी आ सकती है जिससे कृषि एवं सिंचाई में जलाभाव से गुजरना पड़ सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रदूषण, भू-क्षरण और सूखा पड़ने से पृथ्वी के तीन चौथाई भूमि क्षेत्र की गुणवत्ता कम हो गई है।

औसत तापमान में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कई दशकों में तापमान में वृद्धि हुई है। औद्योगीकरण के प्रारंभ से अब तक पृथ्वी के तापमान में लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। कुछ पौधे ऐसे होते हैं जिन्हें एक विशेष तापमान की आवश्यकता होती है। वायुमंडल के तापमान बढ़ने पर उनके उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैसे गेंहू, सरसो, जौ और आलू आदि इन फसलों को कम तापमान की आवश्यकता होती है जबकि तापमान का बढ़ना इनके लिए हानिकारक होता है। इसी प्रकार अधिक तापमान बढ़ने से मक्का, ज्वार और धान आदि फसलों का क्षरण हो सकता है क्योंकि अधिक तापमान के कारण इन फसलों में दाना नहीं बनता अथवा कम बनता है। इस प्रकार तापमान की वृद्धि इन फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

वर्षा के पैटर्न में बदलाव

भारत का दो तिहाई कृषि क्षेत्र वर्षा पर निर्भर है और कृषि की उत्पादकता वर्षा एवं इसकी मात्रा पर निर्भर करती है। वर्षा की मात्रा व तरीकों में परिवर्तन से मृदा क्षरण और मिट्टी की नमी पर प्रभाव पड़ता है। जलवायु के कारण तापमान में वृद्धि से वर्षा में कमी होती है जिससे मिट्टी में नमी समाप्त होती जाती है। इसके अतिरिक्त तापमान में कमी व वृद्धि होने का प्रभाव वर्षा पर पड़ता है जिस कारण भूमि में अपक्षय और सूखे की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव कुछ वर्षों से गहन रूप से प्रभावित कर रहे हैं। मध्य भारत 2050 तक शीत वर्षा में 10 से 20 प्रतिशत तक कमी अनुभव करेगा। पश्चिमी अर्धमरुस्थलीय क्षेत्र द्वारा सामान्य वर्षा की अपेक्षा अधिक वर्षा प्राप्त करने की संभावना है। इसी प्रकार मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि एवं वर्षा में कमी से चाय की फसल में कमी हो सकती है।

कार्बन डाइऑक्साइड में वृद्धि

कार्बन डाइऑक्साइड गैस वैश्विक तापन में लगभग 60 प्रतिशत की भागीदारी करती है। कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि से व तापमान में वृद्धि से पेड़-पौधों तथा कृषि पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। पिछले 30-50 वर्षों के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगभग 450 पीपीएम (प्वाइंट्स पर मिलियन) तक पहुँच गयी है। हालांकि कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि कुछ फसलों जैसे गेहूं तथा चावल के लिए लाभदायक है क्योंकि ये प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को तीव्र करती है और वाष्पीकरण के द्वारा होने वाली हानियों को कम करती है। परन्तु इसके बावजूद कुछ मुख्य खाद्यान्न फसलों जैसे गेंहू की उपज में काफी गिरावट आई है जिसका कारण कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि ही है अर्थात तापमान में वृद्धि।

कीट एवं रोगों में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन के कारण कीटों और रोगाणुओं में वृद्धि होती है। गर्म जलवायु में कीट-पतंगों की प्रजनन क्षमता बढ़ जाती है जिससे कीटों की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है और इसका कृषि पर काफी दुष्प्रभाव पड़ता है। साथ ही कीटों और रोगाणुओं को नियंत्रित करने की कीटनाशकों का प्रयोग भी कहीं ना कहीं कृषि फसल के लिए नुकसानदायक ही होता है।

हालांकि कुछ अधिक सूखा-सहिष्णु फसलों को जलवायु परिवर्तन से लाभ हुआ है। ज्वार की पैदावार, जिसका खाद्यान्न के रूप में प्रयोग दुनिया में विकासशील देश के अधिकांश लोग करते हैं, 1970 के दशक के बाद पश्चिमी, दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में लगभग 0.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उप सहारा अफ्रीका में 0.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। किन्तु यदि कुछ फसलों को छोड़ दिया जाए तो, कुल फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव नकारात्मक ही पड़ता है।

कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के उपाय

खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुमानुसार, 2050 तक विश्व की जनसंख्या लगभग 9 अरब हो जाएगी। जिससे खाद्यान्न की आपूर्ति और मांग के बीच अंतर को कम करने के लिए मौजूदा खाद्यान्न उत्पादन को दोगुने करने की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए भारत जैसे कृषि प्रधान देशों को अभी से नये उपाय करने होंगे। हमारी कृषि व्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाने के अनेक उपाय हैं। जिन्हें अपनाकर कुछ हद तक कृषि पर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। साथ ही पर्यावरण मैत्री तरीकों का प्रयोग करके कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल किया जा सकता है। कुछ प्रमुख उपाय निम्न प्रकार हैं:

वर्षा जल के उचित प्रबंधन द्वारा

वातावरण के तापमान में वृद्धि के साथ साथ फसलों में सिंचाई की अधिक आवश्यकता पड़ती है। ऐसी स्थिति में जमीन का संरक्षण व वर्षा जल को एकत्रित करके सिंचाई हेतु प्रयोग में लाना एक उपयोगी कदम साबित हो सकता है। वाटर शेड प्रबंधन के माध्यम से हम वर्षा जल को संचित करके सिंचाई के रूप में उपयोग कर सकते हैं। इससे एक ओर हमें सिंचाई में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर भू-जल पुनर्भरण में भी सहायक सिद्ध होगा।

जैविक एवं मिश्रित कृषि

रासायनिक खेती से हरित गैसों में वृद्धि होती है जो वैश्विक तापन में सहायक होती हैं। इसके अलावा रासायनिक खाद व कीटनाशकों के प्रयोग से जहाँ एक ओर मृदा की उत्पादकता घटती है वहीं दूसरी ओर मानव स्वास्थ्य को भी भोजन के माध्यम से नुकसान पहुँचाती है। अतः इसलिए जैविक कृषि की तकनीकों पर अधिक जोर देना चाहिए। एकल कृषि के स्थान पर मिश्रित (समग्रित) कृषि लाभदायक होती है। मिश्रित कृषि में विविध फसलों का उत्पादन किया जाता है। जिससे उत्पादकता के साथ साथ जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना नगण्य हो जाती है।

फसल उत्पादन में नई तकनीकों का विकास

जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को ध्यान में रखते हुए ऐसे बीज और नई किस्मों का विकास किया जाए जो नये मौसम के अनुकूल हो। हमें फसलों के प्रारूप तथा उनके बीज बोने के समय में भी परिवर्तन करना होगा। ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा जो अधिक तापमान, सूखे तथा बाढ़ जैसी संकटमय परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम हों। पारम्परिक ज्ञान तथा नई तकनीकों के समन्वयन और समावेशन द्वारा मिश्रित खेती तथा इंटरक्रोपिंग करके जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटा जा सकता है।

जलवायु स्मार्ट कृषि (क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर)

देश में जलवायु स्मार्ट कृषि (Climate smart Agriculture-CSA) विकसित करने की ठोस पहल की गयी है जिसके लिए राष्ट्रीय परियोजना भी लागू की गई है। दरअसल जलवायु स्मार्ट कृषि जलवायु परिवर्तन की तीन परस्पर चुनौतियों से निपटने की कोशिश करती है; उत्पादकता और आय बढाना, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होना तथा कम उत्सर्जन करने में योगदान करना। उदाहरण के लिए, यदि सिंचाई की बात करें तो जल के उचित इस्तेमाल के लिए सूक्ष्म सिंचाई (माइक्रो इरिगेशन) को लोकप्रिय बनाना। जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन होना यह दर्शाता है कृषि को जलवायु परिवर्तन सहन करने हेतु सक्षम बनाना। जलवायु परिवर्तन के अनुमानित प्रभावों से कृषि क्षेत्रों की पहचान करनी होगी। इसके साथ ही इस प्रकार नीतियों का माहौल तैयार करना जिससे स्थानीय व राष्ट्रीय संस्थानों तक सफल क्रियान्वयन हो।

इसी दिशा में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास:

भारत में सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के प्रति स्वयं को अनुकूलित करने तथा सतत विकास मार्ग के द्वारा आर्थिक और पर्यावरणीय लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने का प्रयास किया गया है। इसी से प्रेरित होकर प्रधानमन्त्री ने 2008 में जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना जारी की। जलवायु परिवर्तन पर निर्मित आठ राष्ट्रीय एक्शन प्लान में से एक(राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन) कृषि क्षेत्र पर भी केंद्रित है।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (National Mission for Sustainable Agriculture-NMSA)

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन वर्ष 2008 में शुरू किया गया। यह मिशन ‘अनुकूलन’ पर आधारित है। इस मिशन द्वारा भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक प्रभावी एवं अनुकूल बनाने हेतु कार्यनीति बनाई गई। इस मिशन के उद्देश्यों में कुछ प्रमुख बातों पर ध्यान दिया गया है जैसे, कृषि से अधिक उत्पादन प्राप्त करना, टिकाऊ खेती पर जोर देना, प्राकृतिक जल-स्रोतों व मृदा संरक्षण पर ध्यान देना, फसल व क्षेत्रानुसार पोषक प्रबंधन करना, भूमि-जल गुणवत्ता बनाए रखना तथा शुष्क कृषि को बढ़ावा देना इत्यादि। इसके साथ ही वैकल्पिक कृषि पद्धति को भी अपनाया जाएगा और इसके तहत जोखिम प्रबंधन,कृषि संबंधी ज्ञान सूचना व प्रौद्योगिकी पर विशेष बल दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, मिशन को परम्परागत ज्ञान और अभ्यास प्रणालियों, सूचना प्रौद्योगिकी, भू-क्षेत्रीय और जैव प्रौद्योगिकियों के सम्मिलन व एकीकरण से सहायता मिलेगी।

जलवायु अनुरूप कृषि पर राष्ट्रीय पहल (National Innovations in Climate Resilient Agriculture: NICRA)

यह राष्ट्रीय पहल, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ( ICAR) का एक नेटवर्क प्रोजेक्ट है जोकि फरवरी 2011 में आया था। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य रणनीतिक अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन द्वारा जलवायु परिवर्तन एवं जलवायु सुभेद्यता के प्रति भारतीय कृषि की सहन क्षमता को बढ़ाना है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को उच्च प्राथमिकता पर रखा है। इस प्रोजेक्ट के अन्तर्गत निम्न 4 अवयव आते हैं-

1. रणनीतिक अनुसंधान (Strategic Research)
2. प्रौद्योगिकी प्रतिपादन ( Technology Demonstration)
3. प्रायोजित एवं प्रतियोगी अनुदान (Sponsored and Competitive grants)
4. क्षमता निर्माण (Capacity Building)

इसके प्रमुख बिन्दुओं में भारतीय कृषि (फसल, पशु इत्यादि) को जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति सक्षम बनाना, जलवायु सह्य कृषि अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों व दूसरे हितधारको की क्षमता का विकास करना तथा किसानों को वर्तमान जलवायु खतरे के अनुकूलन हेतु प्रौद्योगिकी पैकेज का प्रदर्शन कर दिखाने का उद्देश्य रखा गया है।

अतः कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन वैश्विक और भारतीय कृषि व्यवस्था पर वृहद स्तर पर प्रभाव डालता है। ऊपर दिये गए सुझावों व तकनीकों को अपनाकर कृषि व्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है। ऐसा करना वर्तमान समय की आवश्यकता है अन्यथा भविष्य में इसके घातक परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। इसी दिशा में अर्थात भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल और सक्षम बनाने में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास भी सराहनीय हैं। इस प्रकार कृषि को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए हमें मिल-जुलकर पर्यावरण मैत्री तरीकों को अहमियत देनी होगी ताकि हम अपने प्राकृतिक संसाधन को बचा सकें और कृषि व्यवस्था को अनुकूलनीय बना सकें।

  आशू सैनी  

आशू सैनी, उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले से हैं। इन्होंने स्नातक बी.एस.सी (गणित) विषय से और परास्नातक एम.ए (इतिहास) विषय से किया है। इन्होंने इतिहास विषय से तीन बार यू.जी.सी. नेट की परीक्षा पास की है। वर्तमान में इतिहास विषय में रिसर्च स्कॉलर (पी.एच-डी) हैं। पढ़ना, लिखना, सामजिक मुद्दों पर विचार-विमर्श करना और संगीत सुनना इनकी रुचि के विषय हैं। इनके कई लेख दैनिक जागरण और जनसत्ता में प्रकाशित हो चुके हैं।

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