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जीव विज्ञान और पर्यावरण

मैंग्रोव वन

  • 28 Aug 2021
  • 13 min read

परिचय

  • एक मैंग्रोव एक छोटा पेड़ या झाड़ी है जो समुद्र तट के किनारे उगता है, इसकी जड़ें अक्सर पानी के नीचे नमकीन तलछट में होती हैं।
  • 'मैंग्रोव' शब्द दलदल में पेड़ों और झाड़ियों को संदर्भित करता है।
  • मैंग्रोव फूल वाले पेड़ हैं, जो राइजोफोरेसी, एकेंथेसी, लिथ्रेसी, कॉम्ब्रेटेसी और अरेकेसी परिवारों से संबंधित हैं।

मैंग्रोव की विशेषताएँ:

  • लवणीय वातावरण: वे अत्यधिक प्रतिकूल वातावरण, जैसे उच्च नमक और कम ऑक्सीजन की स्थिति, में भी जीवित रह सकते हैं।
  • कम ऑक्सीजन: किसी भी पौधे के भूमिगत ऊतक को श्वसन के लिये ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। लेकिन मैंग्रोव वातावरण में मिट्टी में ऑक्सीजन सीमित या शून्य होती है।
    • इसलिये मैंग्रोव जड़ प्रणाली वातावरण से ऑक्सीजन को अवशोषित करती है।
    • इस उद्देश्य के लिये मैंग्रोव की जड़ें आम पौधों से अलग होती हैं जिन्हें ब्रीदिंग रूट्स या न्यूमेटोफोर्स कहा जाता है।
    • इन जड़ों में कई छिद्र होते हैं जिनके माध्यम से ऑक्सीजन भूमिगत ऊतकों में प्रवेश करती है।
  • चरम स्थितियों में उत्तरजीविता: जड़ें पानी में डूबे रहने के कारण, मैंग्रोव के पेड़ गर्म, कीचड़युक्त, नमकीन परिस्थितियों में पनपते हैं, जिसमें दूसरे पौधों जीवित नहीं रह पाते हैं।
  • मोमयुक्त पत्ते: मैंग्रोव, रेगिस्तानी पौधों की तरह, मोटे पत्तों में ताजा पानी जमा करते हैं।
    • पत्तियों पर एक मोम का लेप जल को अपने अंदर अवशोषित रखता है और वाष्पीकरण को कम करता है।
  • विवियोपोरस: उनके बीज मूल वृक्ष से जुड़े रहते हुए अंकुरित होते हैं। एक बार अंकुरित होने के बाद अंकुर बढ़ने लगते है।
  • परिपक्व अंकुर पानी में गिर जाता है और किसी अलग स्थान पर पहुँच कर ठोस ज़मीन में जड़ें जमा लेता है।

भौगोलिक स्थिति:

  • मैंग्रोव केवल उष्णकटिबंधीय या उपोष्णकटिबंधीय अक्षांशों के भीतर आद्रतायुक्त तटरेखाओं के साथ पाए जाते हैं क्योंकि वे बेहद कम तापमान का सामना नहीं कर सकते हैं।
  • वे नमकीन मिट्टी में, समुद्र के तटों पर वहां भी जड़ें जमा सकते हैं जहाँ, ज्वार की पहुँच हो।।

कवर किया गया क्षेत्र

वैश्विक मैंग्रोव कवर:

  • दुनिया में कुल मैंग्रोव कवर 1,50,000 वर्ग किलोमीटर है।
  • एशिया में दुनिया भर में मैंग्रोव की सबसे बड़ी संख्या है।
  • दक्षिण एशिया में दुनिया के मैंग्रोव कवर का 6.8% हिस्सा शामिल है।
  • दक्षिण एशिया में कुल मैंग्रोव कवर में भारत का योगदान 45.8% है।

भारत में मैंग्रोव:

  • कवरेज़: भारत वन स्थिति रिपोर्ट, 2019 के अनुसार, भारत में मैंग्रोव कवर 4,975 वर्ग किमी. है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.15% है।
    • प्रतिशत के हिसाब से कुल मैंग्रोव कवर क्षेत्र पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक है। इसके बाद गुजरात और अंडमान निकोबार द्वीप समूह का स्थान है।
  • सबसे बड़ा मैंग्रोव वन: पश्चिम बंगाल में सुंदरवन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र हैं। यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध है।
    • यह वन रॉयल बंगाल टाइगर, गंगा डॉल्फिन और एस्टुअरीन मगरमच्छों का घर है।
  • भितरकनिका मैंग्रोव: भारत में दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव वन ओडिशा के भितरकनिका में स्थित है जो ब्राह्मणी और वैतरनी नदी के दो नदी डेल्टाओं द्वारा बनाया गया है।
    • यह भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण रामसर आर्द्रभूमि में से एक है।

गोदावरी-कृष्णा मैंग्रोव, आंध्र प्रदेश: गोदावरी-कृष्णा मैंग्रोव ओडिशा से तमिलनाडु तक फैले हुए हैं।
गंगा, महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी नदियों के डेल्टा में मैंग्रोव वन हैं।

  • केरल के बैकवाटर में मैंग्रोव वन का घनत्व उच्च है।
  • तमिलनाडु के पिचावरम में मैंग्रोव वनों से आच्छादित जल  विस्तृत क्षेत्र में फैला है। यह कई जलीय पक्षी प्रजातियों का घर है।
  • पश्चिम बंगाल में भारत के मैंग्रोव कवर का 42.45% हिस्सा है, इसके बाद गुजरात 23.66% और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह 12.39% हैं।

मैंग्रोव का महत्त्व

  • पारिस्थितिक स्थिरीकरण: पारिस्थितिक रूप से मैंग्रोव मिट्टी को उपजाऊ बनाने में एवं उसकी क्षमता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण हैं।
    • ये चक्रवातों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
    • वे भूमि संचय को बढ़ावा देने, मिट्टी के किनारों को ठीक करने, तेज़ हवाओं , ज्वार और तरंग ऊर्जा को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • मैंग्रोव और ज्वार: जड़ों का घनत्व पेड़ों को ज्वार में आने वाली दैनिक वृद्धि और कमी को सहने की क्षमता देती है।
    • अधिकांश मैंग्रोव में दिन में कम से कम दो बार बाढ़ आ जाती है।
  • तटीय स्थिरीकरण: मैंग्रोव वन समुद्री तट को स्थिर करते हैं। यह तूफानी लहरों, धाराओं और ज्वार से समुद्री कटाव को कम करते हैं।
  • जल शोधन: मैंग्रोव अपवाह से पोषक तत्वों को अवशोषित करके पानी की गुणवत्ता में सुधार करते हैं अन्यथा हानिकारक शैवाल तटों पर उग सकते हैं।
    • कोरल रीफ और समुद्री घास दोनों ही पानी को साफ और स्वस्थ रखने के लिये मैंग्रोव वनों की जल शोधन क्षमता पर निर्भर करते हैं।
  • ब्लू कार्बन का भंडारण: समुद्री वातावरण का 2% से भी कम हिस्सा मैंग्रोव का है, लेकिन 10-15% कार्बन अवशोषित करते हैं।
    • एक बार जब पत्ते और पुराने पेड़ मर जाते हैं तो वे समुद्र तल पर गिर जाते हैं और संग्रहीत कार्बन को अपने साथ मिट्टी में दबा लेते हैं।
    • इस दबे हुए कार्बन को "ब्लू कार्बन" के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह मैंग्रोव जंगलों, समुद्री घास और नमक के दलदल जैसे तटीय पारिस्थितिक तंत्र में पानी के नीचे जमा होता है।
  • जैव विविधता को बढ़ावा: मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र जैव विविधता को भी बढ़ावा देता है, जिसमें कुछ प्रजातियाँ मैंग्रोव वनों के लिये अद्वितीय हैं।
    • वे पक्षियों, मछलियों, अकशेरूकीय, स्तनधारियों और पौधों जैसे वन्यजीवों की एक विस्तृत श्रृंखला को आवास और आश्रय प्रदान करते हैं।

मैंग्रोव द्वारा सामना किए जाने वाले खतरे 

  • तटीय क्षेत्रों का व्यावसायीकरण: जलीय कृषि, तटीय विकास, चावल और ताड़ के तेल की खेती और औद्योगिक गतिविधियाँ तेज़ी से इन मैंग्रोव और उनके पारिस्थितिक तंत्र की जगह ले रही हैं।
    • यूनेस्को के अनुसार, बुनियादी ढाँचे के विकास, शहरीकरण और कृषि भूमि रूपांतरण के कारण वैश्विक वन आवरण के समग्र नुकसान की तुलना में मैंग्रोव तीन से पांच गुना तेज़ी से गायब हो रहे हैं।
    • पिछले 40 वर्षों में मैंग्रोव कवरेज आधे से कम हो गया है। 1% से भी कम उष्णकटिबंधीय वन मैंग्रोव हैं।
  • झींगा फार्म: मैंग्रोव वनों के कुल नुकसान का कम से कम 35% झींगा फार्मों के उद्भव से हुआ है।
    • झींगा की कृषि का उदय हाल के दशकों में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, जापान और चीन में झींगा के प्रति बढ़ते झुकाव की प्रतिक्रिया है।
  • तापमान संबंधित मुद्दे: कम समय में दस डिग्री का उतार-चढ़ाव पौधे को नुकसान पहुँचाने के लिये पर्याप्त होता है और कुछ घंटों के लिये भी बेहद कम तापमान कुछ मैंग्रोव प्रजातियों के लिये अत्यधिक खतरनाक या जानलेवा हो सकता है।
  • मिट्टी से संबंधित मुद्दे: जिस मिट्टी में मैंग्रोव की जड़ें होती हैं, वह पौधों के लिये एक चुनौती बन जाती है क्योंकि इसमें ऑक्सीजन की भारी कमी होती है।
    • अधिकांश पौधे आसपास की मिट्टी में मौजूद गैसों से आसानी से ऑक्सीजन ले सकते हैं, लेकिन मैंग्रोव जड़ों के लिये यह विकल्प नहीं होता है क्योंकि न केवल उनकी जड़ें भूमिगत होती हैं, बल्कि उनमें दिन में दो बार तक पानी भर जाता है।
  • अत्यधिक मानव हस्तक्षेप: पिछले कुछ समय से समुद्र के स्तर में परिवर्तनों के दौरान, मैंग्रोव ज़मीन की तरफ बढ़ गए हैं, लेकिन कई जगहों पर मानव विकास अब एक बाधा है जो मैंग्रोव के विस्तार सीमित करता है। मैंग्रोव अक्सर तेल रिसाव से भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं।

मैंग्रोव का संरक्षण

  • यूनेस्को नामित साइटें: बायोस्फीयर रिजर्व, विश्व धरोहर स्थलों और यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क में मैंग्रोव का समावेशन दुनिया भर में मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के  प्रबंधन और संरक्षण में सुधार करने में योगदान देता है।
    • इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर मैंग्रोव इकोसिस्टम (ISME): ISME एक गैर-सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना वर्ष 1990 में मैंग्रोव के अध्ययन, उनके संरक्षण, तर्कसंगत प्रबंधन और टिकाऊ उपयोग को बढ़ाने के उद्देश्य से की गई थी।
  • ब्लू कार्बन इनिशिएटिव: अंतर्राष्ट्रीय ब्लू कार्बन पहल तटीय और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण और पुनरुत्थान के माध्यम से जलवायु परिवर्तन को कम करने पर केंद्रित है।
    • यह कंजर्वेशन इंटरनेशनल (सीआई), IUCN, और इंटरगवर्नमेंटल ओशनोग्राफिक कमीशन-यूनेस्को (IOC-यूनेस्को) द्वारा समन्वित है।
  • मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिये अंतर्राष्ट्रीय दिवस: यूनेस्को 26 जुलाई को मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उनके स्थायी प्रबंधन और संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मैंग्रोव दिवस मनाता है।
  • भविष्य के लिये मैंग्रोव: IUCN और UNDP ने तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण हेतु निवेश को बढ़ावा देने के लिये एक अनूठी पहल विकसित की जिसे "भविष्य के लिये मैंग्रोव (MFF)" कहा जाता है।
    • सदस्य देशों में बांग्लादेश, कंबोडिया, भारत, इंडोनेशिया, मालदीव, म्याँमार, पाकिस्तान, सेशेल्स, श्रीलंका, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं।
  • राष्ट्रीय मैंग्रोव समिति: भारत सरकार ने वर्ष 1976 में एक राष्ट्रीय मैंग्रोव समिति की स्थापना की जो सरकार को मैंग्रोव के संरक्षण और विकास के बारे में सलाह देती है।
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