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जीव विज्ञान और पर्यावरण

नमक-स्रावित करने वाली मैंग्रोव प्रजाति के जीनोम की डिकोडिंग

  • 23 Jul 2021
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

जीनोम अनुक्रम

मेन्स के लिये:

जैव विविधता के संदर्भ में अध्ययन का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में वैज्ञानिकों ने पहली बार अत्यधिक नमक-सहिष्णु और नमक-स्रावित करने वाली मैंग्रोव प्रजाति एविसेनिया मरीना (Avicennia Marina) के संदर्भ-ग्रेड के एक पूरे जीनोम अनुक्रम (Genome Sequence) की जानकारी प्रदान की है।

  • इस अध्ययन का नेतृत्व जैव प्रौद्योगिकी विभाग ( Department of Biotechnology- DBT) जीवन विज्ञान संस्थान, भुवनेश्वर द्वारा किया गया था।

प्रमुख बिंदु: 

एविसेनिया मरीना: 

  • एविसेनिया मरीना भारत में सभी मैंग्रोव संरचनाओं में पाई जाने वाली सबसे प्रमुख मैंग्रोव प्रजातियों में से एक है।
  •  यह एक नमक-स्रावित और असाधारण रूप से नमक-सहिष्णु मैंग्रोव प्रजाति है जो 75% समुद्री जल में भी बेहतर रूप से बढ़ती है तथा >250% समुद्री जल को सहन करती है। 
  • यह दुर्लभ पौधों की प्रजातियों में से है, जो जड़ों में नमक के प्रवेश को बाहर करने की असाधारण क्षमता के अलावा नमक ग्रंथियों के माध्यम से 40% नमक का उत्सर्जन कर सकती है।
  • इसे ग्रे मैंग्रोव या सफेद मैंग्रोव भी कहा जाता है।

अध्ययन का महत्त्व: 

  • यह अध्ययन इसलिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादकता सीमित पानी की उपलब्धता और मिट्टी एवं पानी के लवणीकरण जैसे अजैविक तनाव कारकों के कारण प्रभावित होती है। 
    • शुष्क क्षेत्रों में फसल उत्पादन हेतु जल की उपलब्धता एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है, जो विश्व के कुल भूमि क्षेत्र का 40 प्रतिशत है। 
    • विश्व स्तर पर लवणता 900 मिलियन हेक्टेयर (भारत में अनुमानित 6.73 मिलियन हेक्टेयर) है और इससे 27 बिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक नुकसान होने का अनुमान है।
  • अध्ययन में उत्पन्न जीनोमिक संसाधन शोधकर्त्ताओं के लिये तटीय क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण  फसल प्रजातियों की सूखी और लवणता सहिष्णु किस्मों के विकास के लिये पहचाने गए जीन की क्षमता का अध्ययन करने का मार्ग प्रशस्त करेंगे, जो भारत के 7,500 मीटर समुद्र तट और दो प्रमुख द्वीपों की व्यवस्था हेतु महत्त्वपूर्ण हैं।

मैंग्रोव:

  • ये छोटे पेड़ या झाड़ी होते हैं जो समुद्र तटों, नदियों के मुहानों पर स्थित ज्वारीय, दलदली भूमि पर पाए जाते हैं। मुख्यतः खारे पानी में इनका विकास होता है।
  • 'मैंग्रोव' शब्द संपूर्ण निवास स्थान या मैंग्रोव दलदल में पेड़ों और झाड़ियों को संदर्भित करता है।
  • मैंग्रोव फूल वाले पेड़ हैं, जो राइज़ोफोरेसी, एकेंथेसी, लिथ्रेसी, कॉम्ब्रेटेसी और अरेकेसी परिवारों से संबंधित हैं।

मैंग्रोव की विशेषताएँ:

  • लवणीय वातावरण: ये अत्यधिक प्रतिकूल वातावरण जैसे- उच्च नमक और कम ऑक्सीजन की स्थिति में जीवित रह सकते हैं।
  • कम ऑक्सीजन: किसी भी पौधे के भूमिगत ऊतक को श्वसन के लिये ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है लेकिन मैंग्रोव वातावरण में मिट्टी में ऑक्सीजन सीमित या शून्य होती है। इसलिये मैंग्रोव जड़ प्रणाली वातावरण से ऑक्सीजन को अवशोषित करती है।
    • इस उद्देश्य के लिये मैंग्रोव की विशेष जड़ें होती हैं जिन्हें ‘ब्रीदिंग रूट्स’ या ‘न्यूमेटोफोर्स’ कहा जाता है।
    • इन जड़ों में कई छिद्र होते हैं जिनके माध्यम से ऑक्सीजन भूमिगत ऊतकों में प्रवेश करती है।
  • रसीले पत्ते: मैंग्रोव रेगिस्तानी पौधों की तरह मोटे रसीले पत्तों में ताज़ा पानी जमा करते हैं।
    • पत्तियों पर ‘वैक्सी कोटिंग’ पानी को सील कर देता है और वाष्पीकरण को कम करता है।
  • विविपेरस: उनके बीज मूल वृक्ष से जुड़े रहते हुए अंकुरित होते हैं। एक बार अंकुरित होने के बाद वह प्रजनक के रूप में बढ़ता है।

खतरे: 

  • तटीय निर्माण: पिछले कुछ दशकों के दौरान सभी मैंग्रोव वनों का कम-से-कम एक तिहाई हिस्सा नष्ट हो गया है। झींगा खेतों, होटलों और अन्य संरचनाओं के निर्माण सहित तटीय विकास मैंग्रोव वनों के लिये प्राथमिक खतरा है।
    • कृषि भूमि और मानव बस्तियों के विस्तार के लिये प्रायः मैंग्रोव वनों को काटा जाता है।
  • अत्यधिक हार्वेस्टिंग: मैंग्रोव पेड़ों का उपयोग जलाऊ लकड़ी, निर्माण लकड़ी, लकड़ी का कोयला उत्पादन और पशुओं के चारे के लिये किया जाता है।
    • दुनिया के कुछ हिस्सों में मैंग्रोव वनों की अत्यधिक हार्वेस्टिंग की जा रही है, जो कि किसी भी दृष्टि से सतत् नहीं है।
  • अन्य: मैंग्रोव वनों और उनके पारिस्थितिकी तंत्र के लिये अन्य खतरों में- अत्यधिक मत्स्य पालन, प्रदूषण और समुद्र का बढ़ता स्तर आदि शामिल हैं।

कवरेज

  • वैश्विक: दुनिया के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मैंग्रोव 118 से अधिक देशों और क्षेत्रों में पाए जा सकते हैं।
    • एशिया में दुनिया के मैंग्रोव वनों का सबसे बड़ा कवरेज है, जिसके बाद अफ्रीका, उत्तरी एवं मध्य अमेरिका, ओशिनिया और दक्षिण अमेरिका का स्थान है।
    • दुनिया के लगभग 75% मैंग्रोव वन सिर्फ 15 देशों में पाए जाते हैं।
  • भारत: 
    • भारत वन स्थिति रिपोर्ट (India State of Forest Report), 2019 के अनुसार देश में मैंग्रोव आवरण 4,975 वर्ग किमी. है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.15% है।
      • देश में मैंग्रोव वनस्‍पति में वर्ष 2017 के आकलन की तुलना में कुल 54 वर्ग किमी. (1.10%) की वृद्धि हुई है।
    • गंगा, महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी नदियों के डेल्टा में मैंग्रोव वन पाए जाते हैं।
    • केरल के बैकवाटर में मैंग्रोव वन का उच्च घनत्व है।
    • पश्चिम बंगाल में सुंदरबन (Sundarban) विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है  जो यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) में शामिल है।
      • यह पश्चिम बंगाल में हुगली नदी से बांग्लादेश में बालेश्वर नदी तक फैला हुआ है।
    • ओडिशा में भितरकनिका मैंग्रोव प्रणाली भारत का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव वन है।
    • तमिलनाडु के पिचावरम में मैंग्रोव वनों से आच्छादित पानी का विशाल विस्तार है। यह कई जलीय पक्षी प्रजातियों का घर है।
    • पश्चिम बंगाल में भारत के मैंग्रोव कवर का 42.45% हिस्सा है, इसके बाद गुजरात में 23.66% और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में 12.39% है।

Ecosystem-Services

स्रोत: पी.आई.बी.

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