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उत्तर प्रदेश स्टेट पी.सी.एस.

  • 21 Feb 2026
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उत्तर प्रदेश ने राज्य डेटा सेंटर प्राधिकरण की स्थापना की

चर्चा में क्यों?

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य डेटा सेंटर प्राधिकरण (State Data Centre Authority) की स्थापना की घोषणा की है। इसके साथ ही, राज्य को डेटा सेंटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और उभरती प्रौद्योगिकियों के लिये भारत के प्रमुख केंद्रों (Hubs) में से एक के रूप में स्थापित करने हेतु महत्त्वपूर्ण नीतिगत पहलों का अनावरण किया है।

मुख्य बिंदु: 

  • राज्य डेटा सेंटर प्राधिकरण: उत्तर प्रदेश सरकार ने डेटा शासन को सुदृढ़ करने, विभिन्न विभागों के डेटा का एकीकरण करने तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को समर्थन देने के लिये राज्य डेटा सेंटर प्राधिकरण की स्थापना की है।
    • उत्तर प्रदेश का लक्ष्य वर्ष 2030 तक लगभग 5 गीगावॉट (GW) की डेटा सेंटर क्षमता विकसित करना है, जिससे वह भारत के अग्रणी डेटा अवसंरचना केंद्रों में शामिल हो सके।
  • बजटीय प्रावधान: राज्य डेटा सेंटर प्राधिकरण की स्थापना और उसके प्रभावी संचालन हेतु ₹100 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जिससे संस्थागत डेटा शासन को मज़बूती मिलेगी।
  • डेटा-आधारित शासन: नया प्राधिकरण और विकसित की जा रही डेटा अवसंरचना, सुरक्षित डेटा भंडारण, रियल-टाइम डेटा की उपलब्धता तथा पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण के माध्यम से बेहतर योजना निर्माण और सेवा वितरण को सक्षम बनाकर डिजिटल शासन को सशक्त बनाएगी।
  • उभरता प्रौद्योगिकी तंत्र: यह पहल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल स्टार्टअप्स से जुड़ी राज्य की अन्य पहलों को पूरक बनाती है, जिससे उत्तर प्रदेश की समग्र डिजिटल अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलती है।
    • डेटा अवसंरचना, सहायक क्लस्टरों एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विकास से राज्य में तकनीकी क्षेत्रों में नए रोज़गार के अवसर सृजित होने और निवेश आकर्षित होने की संभावना है।
  • महत्त्व: यह पहल डिजिटल शासन को सुदृढ़ करती है, डेटा-आधारित निर्णय-निर्माण को प्रोत्साहित करती है और उत्तर प्रदेश को भारत के प्रमुख डेटा एवं प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में स्थापित करने में सहायक है।

और पढ़ें: डेटा सेंटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), यूपी बजट, उभरती प्रौद्योगिकी


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उत्तर भारत की पहली सेमीकंडक्टर इकाई उत्तर प्रदेश में

चर्चा में क्यों?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में उत्तर भारत की पहली सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई की आधारशिला रखने और नमो भारत रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) कॉरिडोर तथा मेरठ मेट्रो सहित प्रमुख बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं का उद्घाटन करने के लिये तैयार हैं।

मुख्य बिंदु: 

  • अपनी तरह की पहली परियोजना: प्रधानमंत्री फरवरी 2026 में गौतम बुद्ध नगर में एक सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई की आधारशिला रखेंगे। 
    • यह राज्य को एक उच्च-तकनीकी विनिर्माण केंद्र (High-Tech Manufacturing Hub) के रूप में विकसित करने और भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • निवेश: यह सेमीकंडक्टर विनिर्माण सुविधा HCL और Foxconn के बीच एक संयुक्त उद्यम है, जिसमें लगभग ₹3,700 करोड़ का अनुमानित निवेश शामिल है।
    • इस परियोजना से घरेलू चिप उत्पादन क्षमता बढ़ने, रोज़गार सृजन होने और इलेक्ट्रॉनिक्स पारितंत्र में सहायक उद्योगों को आकर्षित करने की उम्मीद है।
  • नमो भारत कॉरिडोर: फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री 82 किमी लंबे नमो भारत RRTS कॉरिडोर के शेष खंडों का उद्घाटन करेंगे, जो दिल्ली के सराय काले खॉं को मेरठ के मोदीपुरम से जोड़ेगा।
  • मेरठ मेट्रो की शुरुआत: 13 स्टेशनों वाले 23 किमी लंबे मेरठ मेट्रो कॉरिडोर का भी उद्घाटन किया जाएगा, जिससे मेरठ में शहरी परिवहन में सुधार होगा और इसे क्षेत्रीय पारगमन प्रणाली के साथ एकीकृत किया जाएगा।
  • व्यापक प्रभाव: यह रैपिड रेल कॉरिडोर जो व्यापक क्षेत्रीय पारगमन नेटवर्क का हिस्सा है, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के प्रमुख आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक समूहों को सेवा प्रदान करेगा, जिससे आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा तथा तीव्र एवं आधुनिक यात्रा के विकल्प उपलब्ध होंगे

और पढ़ें: सेमीकंडक्टर विनिर्माण इकाई, RRTS


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पहला स्वदेशी कैडेट प्रशिक्षण जहाज़ ‘कृष्णा’ चेन्नई में लॉन्च किया गया

चर्चा में क्यों?

भारतीय नौसेना ने फरवरी 2026 में चेन्नई के कट्टुपल्ली स्थित L&T शिपयार्ड में अपना पहला स्वदेश निर्मित और डिज़ाइन किया गया कैडेट प्रशिक्षण जहाज़ (CTS) 'कृष्णा' लॉन्च किया।

मुख्य बिंदु: 

  • प्रथम स्वदेशी CTS: 'कृष्णा', रक्षा मंत्रालय के साथ हस्ताक्षरित एक अनुबंध के तहत लार्सन एंड टुब्रो (L&T) द्वारा भारतीय नौसेना के लिये निर्मित किये जा रहे तीन कैडेट प्रशिक्षण जहाजों में से पहला है।
    • 'कृष्णा' पूरी तरह से सुसज्जित एक पाल-प्रशिक्षण और मोटर चालित जहाज़ है, जो प्रशिक्षण के उद्देश्य से 150 कैडेटों तथा अधिकारियों को रखने में सक्षम है।
    • इस जहाज़ का नाम कृष्णा नदी के नाम पर रखा गया है, जो भारत की सबसे लंबी नदियों में से एक है।
  • लॉन्च समारोह: इस कैडेट प्रशिक्षण जहाज़ का उद्घाटन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान की पत्नी, अनुपमा चौहान द्वारा किया गया।
  • रणनीतिक महत्त्व: यह आधुनिक नौसैनिक अभियानों और समुद्री जीवन से परिचित अच्छी तरह से प्रशिक्षित अधिकारियों को तैयार करके भारत की 'ब्लू-वॉटर' (Blue-water) नौसैनिक क्षमताओं को बढ़ाता है।
    • इस जहाज़ में आधुनिक नेविगेशन (नौवहन), संचार और सुरक्षा प्रणालियाँ मौजूद हैं, जो कैडेटों को अत्याधुनिक समुद्री तकनीक का व्यावहारिक अनुभव प्रदान करती हैं।
  • डिज़ाइन और निर्माण: इस पोत को पूरी तरह से स्वदेशी रूप से डिज़ाइन और निर्मित किया गया है तथा इसे 2026 के अंत तक भारतीय नौसेना को सौंपे जाने की उम्मीद है।
  • आत्मनिर्भर भारत: यह परियोजना स्वदेशी रक्षा जहाज़ निर्माण क्षमताओं को बढ़ावा देकर 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहल को सुदृढ़ करती है।

और पढ़ें: कृष्णा नदी, मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत


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यूरोपियन यूनियन ने खोला भारत में अपना पहला ‘लीगल गेटवे’ ऑफिस

चर्चा में क्यों?

यूरोपीय संघ (EU) ने नई दिल्ली में अपने पहले 'यूरोपीय लीगल गेटवे ऑफिस' का उद्घाटन किया। यह भारत और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच भारतीय छात्रों, शोधकर्त्ताओं और पेशेवरों विशेष रूप से सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) क्षेत्र में कानूनी तथा पारदर्शी आवाजाही को सुविधाजनक बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

मुख्य बिंदु: 

  • अपनी तरह का पहला कार्यालय: भारत में 'यूरोपीय लीगल गेटवे ऑफिस' किसी भी साझेदार देश में यूरोपीय संघ (EU) द्वारा खोली गई इस तरह की पहली सुविधा है।
    • यह कार्यालय यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देशों में कार्य, अध्ययन और अनुसंधान के अवसरों हेतु वैध आवागमन के माध्यम पर स्पष्ट तथा विश्वसनीय जानकारी प्रदान करने के लिये एक 'वन-स्टॉप हब' के रूप में कार्य करता है।
  • मुख्य फोकस: इस पहल का उद्देश्य भारतीय ICT छात्रों, पेशेवरों और शोधकर्त्ताओं को पात्रता मानदंड, कौशल एवं योग्यता आवश्यकताओं तथा पूरे यूरोपीय संघ में उपलब्ध अवसरों के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करना है। 
    • यह 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में अपनाए गए 'भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक एजेंडा' के तहत व्यापक सहयोग का हिस्सा है।
  • परिचालन संरचना: लीगल गेटवे ऑफिस तीन परस्पर जुड़े घटकों के माध्यम से कार्य करेगा:
    • भारत में एक गेटवे ऑफिस
    • यूरोपीय संघ में एक सपोर्ट ऑफिस
    • एक डिजिटल टूल, जो आवाजाही और वीज़ा प्रक्रियाओं पर केंद्रीय सूचना केंद्र के रूप में कार्य करेगा।
  • रणनीतिक महत्त्व: इस पहल से प्रवासन और गतिशीलता पर भारत-यूरोपीय संघ के सहयोग के गहराने, शिक्षा एवं रोज़गार के क्षेत्र में संबंध मज़बूत होने तथा दोनों क्षेत्रों की प्रतिभाओं एवं अर्थव्यवस्थाओं के लिये पारस्परिक रूप से लाभकारी अवसर उत्पन्न होने की उम्मीद है।
  • अर्थव्यवस्था और कौशल: यह कार्यालय विशेष रूप से डिजिटल, वैज्ञानिक और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में भारत के विशाल एवं कुशल कार्यबल तथा वैश्विक प्रतिभा पूल में इसके योगदान की मान्यता को दर्शाता है; साथ ही, यह यूरोपीय नियोक्ताओं व् संस्थानों को भारतीय प्रतिभाओं के साथ जुड़ने में भी सहायता प्रदान करता है।

और पढ़ें: यूरोपीय संघ, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT)


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केरल ने ज्वारीय बाढ़ को ‘राज्य-विशिष्ट आपदा’ घोषित किया

चर्चा में क्यों?

जलवायु-संवेदनशील नीति की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए, केरल सरकार ने हाल ही में 'ज्वारीय बाढ़' (उच्च ज्वार के दौरान समुद्र का स्थानीय इलाकों में प्रवेश) को 'राज्य-विशिष्ट आपदा' घोषित किया है।

मुख्य बिंदु: 

  • ज्वारीय बाढ़: इसे 'सनी डे फ्लडिंग' या 'नुइसेंस फ्लडिंग' (Nuisance Flooding) के रूप में भी जाना जाता है। यह तब होती है जब तूफान या भारी बारिश की अनुपस्थिति में भी उच्च ज्वार के दौरान समुद्र का स्तर स्थानीय सीमा से ऊपर बढ़ जाता है।
  • केरल का संदर्भ: एर्नाकुलम (कोच्चि), अलाप्पुझा और त्रिशूर जैसे ज़िलों में, समुद्र का पानी बैकवाटर और जल-निकासी प्रणालियों के माध्यम से दिन में दो बार घरों तथा दुकानों में प्रवेश करता है, जिससे पुरानी (क्रोनिक) जलभराव की समस्या उत्पन्न होती है।
  • इसे ‘आपदा’ का दर्जा क्यों?: ऐतिहासिक रूप से, आपदा राहत केवल चक्रवात या भूस्खलन जैसी ‘आकस्मिक’ घटनाओं के लिये आरक्षित थी। केरल का यह बदलाव कई महत्त्वपूर्ण कारकों पर आधारित है:
    • बारंबारता और तीव्रता: जलवायु परिवर्तन और समुद्र के स्तर में वृद्धि (SLR) के कारण उच्च ज्वार अब स्थानीय इलाकों में काफी अंदर तक पहुँच रहे हैं।
      • जो कभी एक मामूली असुविधा थी, वह अब जीवन और संपत्ति के लिये दैनिक खतरा बन गई है।
    • ‘धीमी गति’ का संकट: सुनामी के विपरीत, ज्वारीय बाढ़ एक धीमी गति से आने वाली आपदा है। समय के साथ, यह घरों की नींव को नष्ट कर देती है, फर्नीचर खराब कर देती है और कृषि भूमि को लवणीय (खारी) बना देती है।
    • नीतिगत कमी को दूर करना: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत, मानक राहत कोष का उपयोग ‘नियमित’ ज्वारीय घटनाओं के लिये नहीं किया जा सकता था।
      • इसे 'राज्य-विशिष्ट' घोषित करके, सरकार अब घर की मरम्मत और आजीविका के नुकसान के लिये वित्तीय सहायता प्रदान कर सकती है।
  • आपदा प्रबंधन के लिये महत्त्व: यह परिभाषा को ‘आकस्मिक आघात’ से हटाकर ‘संचयी हानि’ की ओर ले जाता है, जो आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिये 'सेंडाई फ्रेमवर्क' के अनुरूप है।
    • तटीय भारत के लिये मिसाल: अन्य संवेदनशील राज्य (जैसे ओडिशा, पश्चिम बंगाल) भी इसका अनुसरण कर सकते हैं क्योंकि समुद्र का बढ़ता स्तर पूरी 7,500 किमी लंबी भारतीय तटरेखा के लिये खतरा उत्पन्न कर रहा है।

और पढ़ें: आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेंडाई फ्रेमवर्क


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