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झारखंड

सरहुल उत्सव 2026

  • 24 Mar 2026
  • 12 min read

चर्चा में क्यों?

सरहुल एक प्राचीन जनजातीय त्योहार है जो मुख्य रूप से झारखंड में मनाया जाता है, जो प्रकृति की पूजा और वसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है। सरहुल शब्द का शाब्दिक अर्थ है, 'साल के वृक्ष की पूजा', जो जनजातीय विश्वास में देवी 'सरना माँ' के निवास स्थान के रूप में केंद्रीय महत्त्व रखता है।

मुख्य बिंदु:

  • सांस्कृतिक महत्त्व: यह त्योहार उरांव, मुंडा और हो जैसे समुदायों के लिये जनजातीय नव वर्ष का प्रतीक है, जो नवीनीकरण, समृद्धि तथा मनुष्य एवं प्रकृति के बीच के बंधन को दर्शाता है।
    • वर्ष 2026 में सरहुल मार्च में मनाया गया (21 और 22 मार्च तक विस्तृत क्षेत्रीय अवकाश), जो हिंदू कैलेंडर के चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि (तीसरे दिन) के साथ मेल खाता है।
  • धार्मिक अनुष्ठान: पारंपरिक अनुष्ठानों में गाँव का पुजारी (पाहन) प्रकृति की पूजा करता है, जिसमें देवी-देवताओं और पूर्वजों को सखुआ (साल) के फूल, फल, मुर्गे और चावल की शराब (हंडिया) अर्पित की जाती है।
    • यह साल (सखुआ) के वृक्ष का सम्मान करता है, जो जनतीय विश्वास प्रणालियों का केंद्र है।
    • मिट्टी के बर्तनों में पानी के स्तर का अवलोकन करके आने वाले वर्ष के लिये वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता है।
    • स्थानीय लोग धरती माता की पूजा 'सीता' के रूप में करते हैं तथा अच्छी फसल, समृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिये प्रार्थना करते हैं।
  • महत्त्व: सरहुल प्रकृति के साथ सद्भाव के जनजातीय आदर्श को दर्शाता है, वसंत के आगमन का जश्न मनाता है और झारखंड में सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, एकता तथा पर्यावरणीय श्रद्धा के लिये एक मंच के रूप में कार्य करता है।

और पढ़ें: साल का वृक्ष, सरहुल उत्सव

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