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अप्रैल 2019

  • 17 May 2019
  • 14 min read

PRS की प्रमुख विशेषताएँ

वित्त

रेगुलेटरी सैंडबॉक्स पर RBI का ड्राफ्ट फ्रेमवर्क

RBI ने रेगुलेटरी सैंडबॉक्स पर लोगों से फीडबैक लेने के लिये एक ड्राफ्ट फ्रेमवर्क जारी किया। RBI ने वर्ष 2016 में एक इंटर रेगुलेटरी वर्किंग ग्रुप बनाया था ताकि वित्तीय तकनीकी क्षेत्र के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की समीक्षा की जा सके। उस ग्रुप ने रेगुलेटरी सैंडबॉक्स के फ्रेमवर्क का सुझाव दिया था।

  • सैंडबॉक्स एक ऐसा वातावरण प्रदान करता है जिसमें बाज़ार के प्रतिभागियों को ग्राहकों के साथ एक नियंत्रित वातावरण में नए उत्पादों, सेवाओं या बिज़नेस मॉडल्स को टेस्ट करने का मौका मिलता है। सैंडबॉक्स का उद्देश्य ऐसे विनियम तैयार करना है जो कि कम लागत के वित्तीय उत्पादों को सुविधाजनक तरीके से उपलब्ध कराएँ। ड्राफ्ट फ्रेमवर्क की मुख्य बातों में निम्नलिखित शामिल हैं:
  • योग्यता (Eligibility): सैंडबॉक्स निम्नलिखित स्थितियों में नए प्रयोगों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है:
    • जहाँ गवर्निंग रेगुलेशन नहीं हैं।
    • विनियमों में छूट देने से नए प्रयोग करना आसान हो।
    • नए प्रयोग से वित्तीय सेवाओं की डिलीवरी सुविधाजनक हो सकती हो।
  • इसके मद्देनज़र ड्राफ्ट फ्रेमवर्क ने नए उत्पादों, सेवाओं और तकनीकों की सांकेतिक सूची चिन्हित की जिन्हें सैंडबॉक्स में टेस्ट किया जा सकता है। इनमे रिटेल पेमेंट्स, मनी ट्रांसफर सेवाएँ , मोबाइल तकनीक आवेदक, डेटा विश्लेषक, वित्तीय सलाहकार सेवाएँ, वित्तीय समावेशन और साइबर सुरक्षा उत्पाद शामिल हैं।
  • ड्राफ्ट फ्रेमवर्क में कहा गया कि सैंडबॉक्स में उसी फिनटेक कंपनी को शामिल किया जाएगा, जो कि भारत में निगमित और पंजीकृत हो और स्टार्टअप के मानदंडों को पूरा करती हो। इसके अतिरिक्त एंटिटी (Entity) का शुद्ध मूल्य उसकी हालिया ऑडिटेड बैलेंस शीट में कम-से-कम पचास लाख रुपए हो। उल्लेखनीय है कि एंटिटी को स्टार्टअप माना जाता है, अगर

(i) वह अधिकतम सात वर्ष पहले पंजीकृत हुई हो।

(ii) किसी वित्तीय वर्ष में उसका टर्नओवर 25 करोड़ रुपए से अधिक न हो।

(iii) वह उत्पादों, प्रक्रियाओं या सेवाओं में नए प्रयोग, विकास या सुधार के लिये कार्य कर रही हो।

  • समय-सीमा: सैंडबॉक्स की प्रक्रिया 26 हफ्तों में पूरी होगी और इसके पाँच चरण होंगे। इन चरणों में उत्पादों की शुरुआती स्क्रीनिंग, टेस्ट डिजाइन, आवेदन का आकलन, टेस्टिंग और मूल्यांकन शामिल है। इसके कार्यान्वयन पर RBI की फिनटेक यूनिट निगरानी रखेगी।

गैर-निवासियों का मुनाफा निर्धारित करने पर CBDT की रिपोर्ट

केंद्रीय प्रत्यक्ष कराधान बोर्ड (CBDT) ने भारत में गैर-निवासियों के कराधान के लिये मुनाफा निर्धारित करने से संबंधित एक रिपोर्ट पर टिप्पणियाँ आमंत्रित की हैं। गैर- निवासियों में निम्नलिखित शामिल हैं:

(i) भारत में एक वर्ष में 182 से कम दिनों तक रहने वाले व्यक्ति।

(ii) कंपनी एक्ट, 1956 में पंजीकृत न होने वाली कंपनियाँ या ऐसी कंपनियाँ जिनका मुख्य और व्यावसायिक फैसले लेने वाला मैनेजमेंट भारत से बाहर स्थित है।

(iii) ऐसी फर्म्स या संस्थाएँ जिनका मैनेजमेंट पूरी तरह भारत से बाहर स्थित है।

इनकम टैक्स एक्ट 1961 के अनुसार, गैर निवासियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे भारत में अपने कामकाज से प्राप्त या अर्जित होने वाली आय पर इनकम टैक्स चुकाएंगे। ऐसे कामकाज के लिये अलग से प्रबंधित एकाउंट्स या टर्नओवर के एक निश्चित प्रतिशत या एसेसिंग ऑफिसर के विवेक के आधार पर इस आय की गणना की जाती है।

CBDT ने गैर निवासियों के कामकाज में मुनाफे के निर्धारण के लिये एक कार्य-पद्धति की समीक्षा की। कमेटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • विवेकाधीन शक्तियाँ: समिति की रिपोर्ट के अनुसार, एसेसिंग ऑफिसर को गैर-निवासियों की आय के निर्धारण में बहुत अधिक विवेकाधीन शक्तियाँ प्राप्त हैं। ऑफिसर मुनाफे के निर्धारण के लिये अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करते हैं जिससे अनिश्चितता और कर विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है। यह सुझाव दिया गया कि इसके लिये एक एकसमान/यूनिफॉर्म नियम या वस्तुनिष्ठ तरीके का इस्तेमाल किया जाए।
  • मुनाफे का निर्धारण: कमेटी ने थ्री फैक्टर मेथड (Three Factor Method) का सुझाव दिया जिसमें मुनाफे के निर्धारण के लिये बिक्री, कर्मचारी और एसेट्स का प्रयोग किया जाए और हर फैक्टर को बराबर का वेटेज़ दिया जाए। इन्हीं तीन फैक्टर्स का इस्तेमाल करके भारत से प्राप्त मुनाफे का अनुमान लगाकर एक ऑपरेशन का मुनाफा निकाला जाना चाहिये। भारत से प्राप्त होने वाले मुनाफे की गणना राजस्व के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में की जानी चाहिये: (i) विश्वव्यापी ऑपरेशनल प्रॉफिट मार्जिन या (ii) दो प्रतिशत, इनमें से जो भी अधिक हो, उसी का इस्तेमाल किया जाना चाहिये।
  • यूज़र्स: कमेटी ने कहा कि किसी ऑपरेशन के यूज़र्स के ज़रिये भी मुनाफे का आकलन किया जाना चाहिये, खासकर जिन मामलों में यूज़र्स मुनाफे में व्यापक योगदान देते हों, जैसे- डिजिटल कंपनियाँ। यह सुझाव दिया गया कि निम्न और मध्यम दर्जे के यूज़र इन्टेंसिटी बिज़नेस मॉडल (User Intensity business Model) में यूज़र्स को 10% का वेटेज़ दिया जाए और बाकी तीन फैक्टर्स को 30% प्रत्येक पर वेटेज़ दिया जाए। उच्च दर्जे के यूज़र इन्टेंसिटी बिज़नेस मॉडल में यूज़र्स को 20% का वेटेज़ दिया जाए और बिक्री को 30% तथा कर्मचारी एवं एसेट्स में से प्रत्येक को 25% का वेटेज़ दिया जाए।

फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स को म्यूनिसिपल बॉण्ड में निवेश की अनुमति

फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) अब म्यूनिसिपल बॉण्ड में निवेश कर सकेंगे। यह स्टेट डेवलपमेंट लोन्स में FPI निवेश हेतु निर्धारित सीमा के अधीन होगा।

  • म्युनिसिपल बॉण्ड नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद् या नगर निगम द्वारा जारी की जाने वाली ऋण प्रतिभूतियाँ हैं। स्टेट डेवलपमेंट लोन्स में निवेश की वर्तमान सीमा बकाया स्टॉक प्रतिभूतियों/सिक्योरिटीज़ का 2% है।
  • इस पहल का उद्देश्य भारत में डेब्ट इंस्ट्रूमेंट्स तक गैर-निवासी निवेशकों की पहुँच को बढ़ाना है।

आवासीय और शहरी मामले

राष्ट्रीय शहरी योजना फ्रेमवर्क का ड्राफ्ट जारी

आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने राष्ट्रीय शहरी योजना फ्रेमवर्क (NUPF), 2018 का ड्राफ्ट जारी किया। NUPF को दो आधार पर तैयार किया गया है:

(i) शहरी योजना के 10 मुख्य फिलॉसोफिकल सिद्धांत

(ii) फिर इन सिद्धांतों को शहरी स्थान और प्रबंधन के 10 फंक्शनल एरियाज़ में लागू करना। यह फ्रेमवर्क निम्नलिखित क्षेत्रों के संबंध में सुझाव देता है:

  • शहरी योजना (City Planning): मास्टर प्लान को गतिशील होना चाहिये और उनके साथ रणनीतिक, कार्रवाई केंद्रित योजना होनी चाहिये। साथ में उनका बजट संलग्न होना चाहिये। इन योजनाओं को भूमि उपयोग, परिवहन, इंफ्रास्ट्रक्चर सेवा प्रावधान और आर्थिक विकास से जुड़ी एजेंसियों के साथ समन्वय और चर्चा के बाद तैयार किया जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त योजना का प्रारूप तैयार करते समय सभी की भागीदारी होनी चाहिये और इसमें अलग-अलग तरह के लोगों के विचार शामिल होने चाहिये जिनमें महिलाएँ, युवा और प्रवासी लोग शामिल हैं।
  • शहरों में वित्त(Urban Financing): राज्यों को शहरों के लिये मानदंड निर्धारित करने चाहिये ताकि शहर अपने राजस्व से अपनी व्यय संबंधी ज़रूरतें पूरी कर सकें और पूंजीगत कार्यों के लिये न्यूनतम राशि निर्धारित कर सकें। जहाँ सेवाओं को मापा जा सकता हो और लाभार्थियों को चिन्हित किया जा सकता हो, वहाँ यूज़र चार्जेज़ का आकलन किया जाना चाहिये और उन्हें जमा किया जाना चाहिये।
  • शहरी शासन: वर्तमान में निगम स्तर पर मेयर, कमिश्नर और काउंसिल की भूमिकाएँ बिखरी हुई और अस्पष्ट हैं। ड्राफ्ट फ्रेमवर्क में उन्हें संहिताबद्ध (Codify) करने का सुझाव दिया गया है ताकि निगम स्तर पर उनके कार्य तय और स्पष्ट हो जाएँ।
  • परिवहन: सभी शहरों में यूनिफाइड मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी बनाई जानी चाहिये जो एक व्यापक दृष्टिकोण से लैस हो। इसके अतिरिक्त एक ऐसी अथॉरिटी भी होनी चाहिये जोकि ट्रैफिक फ्लो प्लानिंग (Traffic Flow Planning) के संबंध में फैसले ले। वर्तमान में यह मामला ट्रैफिक पुलिस के नियंत्रण में है।
  • हाउसिंग: प्रधानमंत्री आवास योजना के दिशा-निर्देशों के आधार पर तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय के सहयोग से एनयूपीएफ के अंतर्गत राष्ट्रीय हाउसिंग स्टॉक तैयार किया जाना चाहिये। रेंटल हाउसिंग की सुविधा और उसके प्रबंधन के लिये सरकारी नीतियाँ बनाई जानी चाहिये।

गृह मामले

मंत्रालय ने नियंत्रण रेखा के ज़रिये व्यापार को स्थगित किया

गृह मामलों के मंत्रालय ने 19 अप्रैल, 2019 से जम्मू और कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) पर होने वाले व्यापार को स्थगित करने के आदेश जारी किये।

  • उल्लेखनीय है कि जम्मू और कश्मीर के बारामूला और पुंछ ज़िलों में दो ट्रेड फेसिलिटेशन सेंटर्स (Trade Facilitation Centrs) के ज़रिये LoC के आस-पास के स्थानीय निवासियों के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान किया जाता था।
  • केंद्र सरकार को मिली रिपोर्ट्स के आधार पर यह फैसला लिया गया कि गैर-कानूनी हथियारों और मादक पदार्थों को लाने के लिये इन व्यापार मार्गों का दुरुपयोग किया जा रहा है।

अरुणाचल प्रदेश के चार थाना क्षेत्रों से अफस्पा हटाया गया

गृह मामलों के मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के चार थाना क्षेत्रों से सशस्त्र सेना (विशेष अधिकार) एक्ट, 1958 (AFSPA) हटा लिया है। ये चार थाना क्षेत्र हैं:

(i) पश्चिम कामेंग ज़िले के बालेमू और भालुकपोंग

(ii) पूर्वी कामेंग ज़िले का सेइजोसा

(iii) पापुमपारे ज़िले का बालीजान।

अब यह अधिनियम अरुणाचल प्रदेश के तीन ज़िलों और राज्य के चार थाना क्षेत्रों के क्षेत्राधिकार में लागू है।

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