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Mains Marathon

  • 05 Aug 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    दिवस- 44: “नैतिक विदेश नीति दया नहीं, बल्कि न्याय का विषय है।” जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के परिप्रेक्ष्य में, कम विकसित देशों (LDC) के प्रति विकसित राष्ट्रों की नैतिक ज़िम्मेदारी का विश्लेषण कीजिये। (150 शब्द)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण 

    • नैतिक विदेश नीति का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
    • जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में विकसित देशों की नैतिक ज़िम्मेदारी का विश्लेषण कीजिये।
    • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    न्याय पर आधारित नैतिक विदेश नीति यह माँग करती है कि राष्ट्र उदारता से नहीं, बल्कि वैश्विक निष्पक्षता की भावना से कार्य करें। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, जो संकट असमान रूप से विकसित देशों द्वारा उत्पन्न किया गया है, लेकिन सबसे अधिक प्रभावित अल्पविकसित देश (LDC) हैं, न्याय की माँग नैतिक रूप से अनिवार्य हो जाती है। यह जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के आह्वान में परिलक्षित होता है।

    मुख्य भाग: 

    ऐतिहासिक उत्सर्जन और जलवायु अन्याय

    • औद्योगिक क्रांति के बाद से विकसित देश ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में प्रमुख योगदानकर्त्ता रहे हैं।
    • इसके विपरीत, अल्प विकसित देश वैश्विक उत्सर्जन में 4% से भी कम योगदान देते हैं, लेकिन जलवायु प्रभावों (जैसे, बांग्लादेश में बाढ़, साहेल में अनावृष्टि) के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
    • UNFCCC के अंतर्गत साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR) का सिद्धांत विकसित देशों से अधिक जवाबदेही की मांग करता है।
    • यह रॉल्सियन नैतिकता के अनुरूप है, जहाँ न्याय उन लोगों के लिये मुआवजे की मांग करता है जो व्यवस्थित रूप से वंचित हैं।

    जलवायु वित्त में नैतिक दायित्व

    • पेरिस समझौते के तहत प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता जलवायु न्याय का प्रतीक है।
    • प्रमुख नैतिक विफलताओं में शामिल हैं:
      • वित्तपोषण की कमी और वितरण में देरी।
      • अल्पविकसित देशों (LDC) के लिये जटिल पहुँच तंत्र
      • हरित जलवायु कोष (GCF) अल्पविकसित देशों (LDC) की सहायता के लिये बनाया गया है, लेकिन यह प्राय: नौकरशाही संबंधी बाधाओं से ग्रस्त रहता है।

    प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में नैतिक उत्तरदायित्व

    • सौर ऊर्जा, कार्बन कैप्चर और जलवायु-प्रतिरोधी बीज जैसी स्वच्छ प्रौद्योगिकियाँ प्राय: पेटेंट-संरक्षित व महंगी होती हैं।
    • विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत TRIPS समझौता आवश्यक हरित प्रौद्योगिकियों तक किफायती पहुँच में बाधा डालता है।
    • नैतिक विदेश नीति की माँगें हैं:
      • जलवायु प्रौद्योगिकियों के लिये पेटेंट छूट।
      • ओपन-सोर्स इनोवेशन प्लेटफॉर्म।
      • दक्षिण-दक्षिण सहयोग उत्तरी वित्तपोषण द्वारा समर्थित हैं।

    निष्कर्ष:

    अंतर्राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई का मार्गदर्शन दया से नहीं, बल्कि न्याय से होना चाहिये। ऐतिहासिक प्रदूषक और तकनीकी क्षेत्र में अग्रणी होने के नाते, विकसित देशों की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि जलवायु वित्त तथा हरित प्रौद्योगिकी अल्प विकसित देशों (LDC) तक पहुँच सके। तभी नैतिक विदेश नीति बयानबाजी से आगे बढ़कर व्यवहार में वैश्विक समानता की सेवा कर सकती है।

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