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  • 26 Jul 2025 निबंध लेखन निबंध

    दिवस 36

    प्रश्न 1. जो सत्य है वह सदैव लोकप्रिय नहीं होता और जो लोकप्रिय है वह सदैव सत्य नहीं होता। (1200 शब्द)

    प्रश्न 2. भाग्य संयोग का विषय नहीं है; बल्कि यह चयन का परिणाम है। (1200 शब्द)

    1. जो सत्य है वह सदैव लोकप्रिय नहीं होता और जो लोकप्रिय है वह सदैव सत्य नहीं होता। (1200 शब्द)

    परिचय:

    “सत्य हमारी सहनशीलता के अनुसार नहीं बदलता।”

    फ्लैनेरी ओ’कॉन्नर का यह कथन इस बात की ओर इशारा करता है कि सत्य सदैव लोकप्रियता के साथ संगत नहीं होता। इतिहास और समाज में कई बार ऐसा हुआ है कि वैज्ञानिक खोजें, नैतिक क्रांतियाँ या असुविधाजनक तथ्य उस समय की आम राय के विरुद्ध रहे। दूसरी ओर, जो बातें भावनात्मक अपील, दोहराव या बहुमत के आधार पर लोकप्रिय हो जाती हैं, वे हमेशा नैतिक या सत्य नहीं होतीं। यह निबंध सत्य और लोकप्रियता के बीच के इस तनाव को विभिन्न पहलुओं से विश्लेषित करता है।

    मुख्य भाग:

    ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:

    • गैलीलियो बनाम चर्च: पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, यह वैज्ञानिक सत्य था, लेकिन चर्च ने इसे विधर्म ठहराया। इस सत्य को मान्यता मिलने में सदियाँ लग गईं।
    • भगत सिंह और क्रांतिकारी: ब्रिटिश राज के विरुद्ध उनका दृढ़ संघर्ष उस समय व्यापक समर्थन में नहीं था, पर आज उन्हें राष्ट्रनायक माना जाता है।
    • नेल्सन मंडेला: जिन्हें कभी अपराधी कहा गया, बाद में वे समानता के प्रतीक बन गये, लेकिन पूर्व में नस्लीय व्यवस्था में सत्य अस्वीकार्य था।

     सामाजिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य:

    • कदाचित् स्वीकृत बुराइयाँ: सती प्रथा और छुआछूत जैसी अमानवीय प्रथाएँ समाज में लोकप्रिय थीं, परंतु गहरे अन्यायपूर्ण थीं।
    • व्हिसलब्लोअर: एडवर्ड स्नोडन जैसे लोग लोकतंत्र की जवाबदेही के लिये सच सामने लाये, फिर भी उन्हें आलोचना और बहिष्कार झेलना पड़ा।
    • कैंसल कल्चर: जटिल सच्चाइयों को आसान धारणाओं में बदलकर सत्य बोलने वालों को भी निशाना बनाया जाता है।

    राजनीतिक परिप्रेक्ष्य:

    "राजनीति में मूर्खता कोई बाधा नहीं होती !" – नेपोलियन बोनापार्ट

    • लोकप्रिय बनाम साक्ष्य-आधारित नीतियाँ: जैसे किसान ऋण माफी केवल तात्कालिक वोट दिलाती है, पर दीर्घकालीन समाधान नहीं देती।
    • चुनावी कथाएँ: लोकप्रियता पाने के लिये नेताओं द्वारा वास्तविक संकटों (जैसे: राजकोषीय घाटा, जलवायु परिवर्तन) को छिपा दिया जाता है।

    मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक परिप्रेक्ष्य:

    • संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह: लोग तथ्यात्मक सत्यों (पुष्टिकरण पूर्वाग्रह) के बजाय परिचित मान्यताओं की ओर आकर्षित होते हैं।
    • सामाजिक दबाव: सामाजिक अस्वीकृति के डर से कई लोग सत्य का पक्ष लेने से बचते हैं यदि वह अलोकप्रिय हो, इसे "मौन-धारण का चक्र" कहा गया है।

    वैज्ञानिक और तकनीकी परिप्रेक्ष्य:

    • टीकाकरण में हिचकिचाहट: स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाणों के बावजूद, भय और अफवाहें व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गईं थीं, जिससे टीकाकरण प्रयासों में देरी हुई।
    • फ्लैट अर्थ थ्योरी: अभी भी ऑनलाइन लोगों को आकर्षित करता है, जो यह दर्शाता है कि वायरल लोकप्रियता तर्क और तथ्यों को किस प्रकार चुनौती दे सकती है।
    • AI-जनित गलत सूचना: तकनीक अब झूठ को पहले से कहीं अधिक तेज़ी से फैला सकती है, जिससे उन्हें अवांछित लोकप्रियता मिल रही है।

    मीडिया और सूचना का परिप्रेक्ष्य:

    • 'पोस्ट-ट्रुथ' युग: सोशल मीडिया एल्गोरिदम लाइक व शेयर को प्राथमिकता देते हैं, न कि सत्य को, जिसमें इको-चैम्बर्स झूठी लोकप्रिय मान्यताओं को और प्रबल करते हैं।
    • वायरल गलत सूचना: एक झूठा दावा, यदि बार-बार दोहराया जाए, तो निराधार होने के बावजूद 'सामान्य ज्ञान' बन जाता है, जिसे चुनावों या सांप्रदायिक तनावों के दौरान प्रायः देखा जाता है।

    नैतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य:

    “सत्य तुम्हें मुक्त करेगा, पर पहले यह तुम्हें कष्ट देगा !”जेम्स ए. गारफील्ड

    • नैतिक द्वंद्व: सत्य के लिये खड़े होना (भ्रष्टाचार को उजागर करने की तरह) प्रायः प्रतिक्रिया या व्यक्तिगत लागत का कारण बनता है। 
    • सुकरात का सिद्धांत: सुकरात ने तर्क और प्रश्नों के माध्यम से तत्कालीन समाज की लोकप्रिय मान्यताओं को चुनौती दी, किंतु युवाओं को 'भ्रष्ट' करने के आरोप में उन्हें मृत्युदंड दिया गया, यह एक ऐसा उदाहरण है जहाँ सत्य की निर्भीक अभिव्यक्ति को दंडित किया गया।

    आर्थिक परिप्रेक्ष्य:

    • संरक्षणवाद: दीर्घकालिक दृष्टि से हानिकारक होते हुए भी 'राष्ट्रवादी' नीतियों के नाम पर संरक्षणवाद लोकप्रिय रहता है।
    • सुधार प्रतिरोध: कर युक्तिकरण या सब्सिडी में कटौती जैसी सत्य नीतियों का विरोध होता है, भले ही वे आर्थिक रूप से मज़बूत हों।

    विपरीत दृष्टिकोण

    • लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में कई बार जनमत ही सत्य के आधार पर बनता है, जैसे: अनुभव, तर्क और सार्वजनिक विमर्श से उत्पन्न मत।
      • सत्य और लोकप्रियता का संयोजन भी संभव है, जब वैज्ञानिक जागरूकता, शिक्षा एवं पारदर्शिता बढ़ती है (उदाहरण के लिये रोगाणु सिद्धांत की स्वीकृति, जलवायु परिवर्तन)।
    • दासता उन्मूलन, महिलाओं के मताधिकार और नागरिक अधिकारों जैसे लोकप्रिय आंदोलनों को अंततः सत्य एवं जन समर्थन, दोनों द्वारा मान्यता मिली, जो अभिसरण को दर्शाता है।
    • जन सूचना के युग में, लोकप्रियता सत्य को प्रभावी ढंग से फैलाने के एक साधन के रूप में भी काम कर सकती है (उदाहरण के लिये जन स्वास्थ्य अभियान)।

    निष्कर्ष:

    “अगर आप अकेले भी हो, फिर भी सत्य, सत्य ही रहता है !" — महात्मा गांधी

    सत्य को स्वीकार करने के लिये साहस, समय और विवेक की आवश्यकता होती है। लोकप्रियता तात्कालिक और भावनात्मक हो सकती है, पर सत्य न्याय, तर्क एवं प्रमाण से टिकता है। किसी समाज की प्रगति के लिये, उसे असुविधाजनक सत्य को स्वीकार करने और आकर्षक झूठ पर सवाल उठाने की शक्ति विकसित करने की आवश्यकता होती है। ऐसा करके, हम न केवल तथ्यों को, बल्कि लोकतंत्र और तर्क की अखंडता को भी बनाए रखते हैं।


    2. भाग्य संयोग का विषय नहीं है; बल्कि यह चयन का परिणाम है।  (1200 शब्द)

    परिचय:

    “मैं अपने भाग्य का स्वामी हूँ, मैं अपनी आत्मा का सारथी हूँ।” – विलियम अर्नेस्ट हेनले

    भाग्य अर्थात् नियति का विचार प्राचीन भाग्यवाद से लेकर आधुनिक बुद्धिवाद तक विकसित हुआ है। जहाँ प्राचीन काल में भाग्य को पूर्वनिर्धारित माना जाता था, किंतु आधुनिक युग में यह विचार उभर कर आया है कि व्यक्ति स्वयं अपने निर्णयों और कर्मों के द्वारा अपना भविष्य गढ़ता है। यह कथन इस दर्शन को रेखांकित करता है कि नियति भाग्य या बाह्य शक्तियों द्वारा थोपी नहीं जाती, बल्कि व्यक्तियों, समाजों और राष्ट्रों द्वारा लिये गए विकल्पों द्वारा गढ़ी जाती है।

    मुख्य भाग:

    ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:

    • गाँधी का जन आंदोलनों का नेतृत्व करने का निर्णय: उन्होंने हिंसक विद्रोह के बजाय अहिंसा और सविनय अवज्ञा को चुना और यह एक निर्णायक विकल्प था जिसने भारत के भाग्य को आकार दिया।
    • नेल्सन मंडेला का प्रतिशोध के बजाय सुलह का विकल्प: इस निर्णय ने रंगभेद के बाद के दक्षिण अफ्रीका को एक शांतिपूर्ण लोकतंत्र के रूप में पुनर्निर्माण करने में सहायता की।
    • भारत का विभाजन: नेताओं की असहमति और निर्णयों की विफलता ने करोड़ों लोगों की नियति को प्रभावित किया, जो नेतृत्व के निर्णयों के महत्त्व को दर्शाता है।

    व्यक्तिगत दृष्टिकोण:

    "हमारी योग्यताओं से कहीं अधिक, हमारे चुनाव ही हमें हमारी वास्तविकता से अवगत कराते हैं।" - जे.के. रोलिंग

    • शिक्षा और कड़ी मेहनत: अनगिनत लोग दृढ़ संकल्प और जीवन बदल देने वाले विकल्पों (जैसे: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम) के चयन द्वारा गरीबी से सफलता की ओर बढ़े हैं।
    • अपराधी बनाम सुधारक: व्यक्तिगत विकल्पों और नैतिक दिशा-निर्देशों के आधार पर एक ही परिस्थितियाँ अलग-अलग नियति की ओर ले जा सकती हैं।
    • युवा और कॅरियर विकल्प: UPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवार अपने दैनिक निर्णयों और दृढ़ता के माध्यम से अपना भविष्य स्वयं तय करते हैं।

    सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण:

    • समाज सुधारक: राजा राम मोहन राय, अंबेडकर और अन्य लोगों ने अन्याय को स्वीकार करने के बजाय उसे चुनौती देना चुना, जिससे समाज की नियति बदली।
    • महिला सशक्तिकरण: जिन समाजों ने लड़कियों की शिक्षा में निवेश करने का विकल्प चुना, उन्हें बेहतर जनांकिकीय और विकासात्मक लाभ प्राप्त हुए।
    • नैतिक साहस: कठिन समय में भी, सुविधा के बजाय ईमानदारी को चुनना, व्यक्तिगत और सामूहिक नियति को दृढ़ करता है।

    आर्थिक और विकासपरक दृष्टिकोण:

    • पूर्वी एशियाई चमत्कार बनाम संसाधन-समृद्ध अफ्रीकी राष्ट्र: स्मार्ट नीतिगत विकल्पों और मानव पूंजी में निवेश ने पूर्वी एशिया को समृद्ध होने में सहायता की, जबकि संसाधन-समृद्ध राष्ट्रों को अकुशल शासन के कारण विफलता झेलनी पड़ी।
    • भारत के LPG सुधार (1991): एक सचेत नीतिगत बदलाव जिसने भारत की आर्थिक दिशा को स्थायी रूप से बदल दिया।
    • मेक इन इंडिया बनाम संरक्षणवाद: रणनीतिक आर्थिक विकल्प यह तय करते हैं कि कोई राष्ट्र विकास को अपनाएगा या ठहराव को।

    राजनीतिक और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण:

    • संवैधानिक संरचना: भारत के संविधान का निर्माण लोकतंत्र, बहुलवाद और सामाजिक न्याय को अपनाने का एक सचेत निर्णय था।
    • चुनावी निर्णय: लोकतंत्र में, नागरिकों के वोट नेतृत्व और नीति को आकार देते हैं, यह स्पष्ट रूप से सामूहिक चुनाव द्वारा नियति के निर्धारण का उदाहरण है।
    • लोकवाद बनाम प्रगतिशील शासन: अल्पकालिक चुनावी लाभों के बजाय दीर्घकालिक विकास को चुनना राष्ट्रीय नियति को आकार देने में परिपक्वता को दर्शाता है।

    दार्शनिक और नैतिक दृष्टिकोण:

    "मनुष्य और कुछ नहीं, बल्कि वह है जो वह स्वयं बनता है।" - जीन-पॉल सार्त्र

    • कर्म सिद्धांत बनाम स्वतंत्र इच्छा: भारतीय दर्शन जहाँ नियति (कर्म) का सम्मान करता है, वहीं यह पुरुषार्थ— सत्कर्म और प्रयास पर भी ज़ोर देता है।
    • वैराग्य और भगवद् गीता: भगवद्गीता और स्टोइक दर्शन हमें निष्काम कर्म की शिक्षा देते हैं, जहाँ परिणाम की चिंता नहीं, बल्कि कर्त्तव्यबोध को प्राथमिकता दी जाती है।

    तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

    • अंतरिक्ष अन्वेषण: संसाधनों की कमी के बावजूद ISRO में निवेश करने के भारत के निर्णय ने वैश्विक तकनीकी नेतृत्व में उसकी नियति बदल दी।
    • डिजिटल इंडिया: डिजिटल डिवाइड को न्यूनतम करने और नागरिकों को सशक्त बनाने के लिये एक नीति-संचालित विकल्प।
    • जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई: मानवता का भविष्य संवहनीयता और पर्यावरणीय नैतिकता के बारे में आज के विकल्पों पर निर्भर करता है।

    वैश्विक/अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

    • द्वितीय विश्व युद्ध उपरांत विकल्प: जर्मनी और जापान ने शांति, प्रौद्योगिकी में निवेश एवं मानव पूंजी को चुना, जिससे उनका पुनरुत्थान हुआ।
    • संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक सहयोग: कूटनीति में सामूहिक विकल्प राष्ट्रों के भाग्य को आकार देते हैं, जैसा कि जलवायु समझौतों, सतत् विकास लक्ष्यों आदि में देखा गया है।

     विपरीत दृष्टिकोण

    • नियंत्रण से परे परिस्थितियाँ: जन्म, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, जाति, लिंग, युद्ध या प्राकृतिक आपदाएँ, व्यक्ति के भाग्य को बहुत प्रभावित करती हैं, व्यक्तिगत पसंद की भूमिका को सीमित करती हैं।
    • कई मामलों में, ऐतिहासिक अन्याय और प्रणालीगत असमानताएँ व्यक्ति की ‘चयन की स्वतंत्रता’ को सीमित कर देती हैं।
    • संयोग और अनिश्चितता (उदाहरण के लिये एक शांतिपूर्ण देश में जन्म लेना बनाम संघर्ष क्षेत्र में जन्म लेना) जीवन के परिणामों को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    • प्रयास करने पर भी, परिणाम की गारंटी नहीं होती; वंशवाद, भाग्य या बाह्य घटनाओं के कारण योग्यता हमेशा विजयी नहीं होती, यह दर्शाता है कि भाग्य विकल्प और संयोग दोनों का मिश्रण हो सकता है।    

    निष्कर्ष:

    "भाग्य संयोग की बात नहीं है। यह चुनाव का विषय है। यह प्रतीक्षा करने की वस्तु नहीं है; यह प्राप्त करने की वस्तु है।" - विलियम जेनिंग्स ब्रायन

    हालाँकि परिस्थितियाँ हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया अवश्य होती है। भाग्य सितारों में नहीं लिखा होता, बल्कि उन छोटे-बड़े निर्णयों में अंकित होता है जो हम प्रतिदिन लेते हैं, एक व्यक्ति के रूप में, एक समाज के रूप में और एक सभ्यता के रूप में। परिवर्तन का मार्ग भाग्य के आगे झुकने में नहीं, बल्कि सोच-समझकर, नैतिक और साहसी विकल्पों को अपनाने में निहित है। सही चुनाव करके, हम न केवल अपने भविष्य को, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी आकार देते हैं।

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