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02 Aug 2025
निबंध लेखन
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दिवस 42 -
प्रश्न. आनंद, बाह्य अव्यवस्था की अस्वीकृति का प्रयास है। (1200 शब्द)
प्रश्न. जब अधिगम यांत्रिक हो जाता है, तो चिंतन वैकल्पिक मात्र रह जाता है। (1200 शब्द)1. आनंद, बाह्य अव्यवस्था की अस्वीकृति का प्रयास है। (1200 शब्द)
परिचय:
वर्ष 2015 के नेपाल भूकंप के बाद, ढही हुई इमारतों के बीच, एक पत्रकार ने एक वृद्धा की तस्वीर खींची जो अपने पड़ोसियों के साथ एक अस्थायी तंबू में चाय बाँटते हुए मुस्कुरा रही थीं। जब उनसे पूछा गया कि सब कुछ खोने के बाद भी वह मुस्कुरा क्यों रही हैं, तो उन्होंने उत्तर दिया – “धरती ने मेरे घर को हिला दिया है, मेरा दिल नहीं।” उस क्षण उन्होंने निराशा की स्वाभाविक प्रवृत्ति को नकार दिया और अपने चारों ओर के अराजकता के बीच प्रसन्नता, जुड़ाव और आशा को चुना। उनकी मुस्कान कोई भोली प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि जीवन की अव्यवस्था के विरुद्ध एक सचेत प्रतिरोध थी: अव्यवस्था के विरुद्ध एक शांत विद्रोह !
मुख्य भाग:
उद्धरण की समझ
- प्रमुख शब्दों की परिभाषा:
- एंट्रॉपी/अराजकता/अव्यवस्था (Entropy): ऊष्मागतिकी में प्रयुक्त यह शब्द किसी प्रणाली में समय के साथ बढ़ती अव्यवस्था, अनियमितता या ह्रास को दर्शाता है।
- विद्रोह (Rebellion): किसी परस्थितिक या नैतिक व्यवस्था के विरुद्ध जानबूझकर किया गया प्रतिरोध।
- प्रसन्नता (Happiness): संतोष, अर्थ तथा मानसिक और सामाजिक कल्याण की अवस्था।
दार्शनिक और वैज्ञानिक आधार
- एंट्रॉपी और ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम:
- एंट्रॉपी का तात्पर्य है कि बाह्य ऊर्जा के बिना सभी प्रणालियाँ अव्यवस्था की ओर प्रवृत्त होती हैं।
- मानव जीवन में, एंट्रॉपी (अव्यवस्था) क्षय, पीड़ा, अनिश्चितता, निरर्थकता या उद्देश्यहीनता के रूप में प्रकट हो सकती है।
- प्रसन्नता की संकल्पना:
- दार्शनिक दृष्टिकोण: यूडेमोनिया (अरस्तू), उपयोगितावाद (बेंथम, मिल), स्टोइकिज़्म (एपिक्टीटस)।
- मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण: मास्लो का आवश्यकताओं का पदानुक्रम, सकारात्मक मनोविज्ञान (मार्टिन सेलिगमैन)।
- नैतिक दृष्टिकोण: कांट का कर्त्तव्य-निष्ठा सिद्धांत, निस्वार्थ कर्म के माध्यम से आंतरिक शांति प्राप्त करने की गांधी की अवधारणा।
मानव अनुभव में अव्यवस्था के विभिन्न आयाम:
- भावनात्मक अव्यवस्था:
- तनाव, चिंता और अवसाद जैसी स्थितियाँ अराजकता की स्वाभाविक परिणति हैं।
- प्रसन्नता इनका संतुलन बनाकर आशावाद और मानसिक दृढ़ता प्रदान करती है।
- सामाजिक अव्यवस्था:
- समाज में असमानता, संघर्ष और विघटन।
- करुणा और समावेशिता के माध्यम से प्रसन्नता समाज में सामंजस्य एवं एकता को बढ़ावा देती है।
- संज्ञानात्मक अव्यवस्था:
- भ्रम, ध्यानभंग और स्पष्टता की कमी।
- प्रसन्नता के माध्यम से मानसिक एकाग्रता और बौद्धिक सुसंगति पुनर्स्थापित होती है।
- नैतिक अव्यवस्था:
- भ्रष्टाचार, नैतिक उदासीनता और नैतिक सापेक्षवाद।
- नैतिक प्रसन्नता, सत्यनिष्ठा और चरित्र के माध्यम से नैतिक पतन का प्रतिरोध करती है।
प्रतिरोध के रूप में प्रसन्नता
- उद्देश्य और अर्थ की रचना:
- विक्टर फ्रैंकल: फ्रैंकल के अनुसार, पीड़ा (अव्यवस्था) के बीच भी मनुष्य अर्थ ढूँढ सकता है, जिससे सच्ची प्रसन्नता प्राप्त होती है।
- इस प्रकार प्रसन्नता एक नैतिक प्रतिरोध बन जाती है जो अराजकता के बीच अर्थ की खोज करती है।
- दृढ़ता और आंतरिक शक्ति:
- विद्रोह में साहस निहित होता है। कठिन परिस्थितियों में प्रसन्नता का चयन, जैसे: धैर्य, मानसिक दृढ़ता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता एक सचेत विद्रोह होता है।
- उदाहरण: कारावास के दौरान भी नेल्सन मंडेला द्वारा अपनी प्रसन्नता और क्षमा की भावना को बनाए रखना।
- क्षरण के विरुद्ध रचनात्मक कर्म:
- मानव की नवोन्मेष क्षमता, कला और दर्शन अव्यवस्था के विरुद्ध प्रसन्नता से प्रेरित प्रतिरोध के उपागम हैं।
- उदाहरण: रवींद्रनाथ टैगोर ने औपनिवेशिक पतन के दौरान कला का सृजन किया।
- सामाजिक सद्भाव के रूप में प्रतिक्रिया:
- परोपकार, सामुदायिक सेवा और नैतिक प्रशासन सामाजिक अव्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध हैं।
- उदाहरण: उपेक्षा की दुनिया में मदर टेरेसा की करुणा और सेवा।
- प्रशासनिक और शासकीय परिप्रेक्ष्य:
- लोक सेवा में, अव्यवस्था निम्नलिखित रूपों में हो सकती है:
- प्रशासनिक जड़ता, भ्रष्टाचार, अकार्यकुशलता।
- नागरिक असंतोष, विश्वास की कमी, तंत्र का क्षरण।
- प्रसन्नता को विद्रोह के रूप में अपनाने वाले लोकसेवक –
- पारदर्शिता और नागरिक-केंद्रित शासन को बढ़ावा देना।
- सहानुभूति, न्याय और सक्रिय समस्या समाधान की प्रवृत्ति।
- उदाहरण: IAS अधिकारी आर्मस्ट्रांग पेम ने एक दूरस्थ क्षेत्र में जनभागीदारी से एक सड़क का निर्माण किया।
- नैतिक प्रशासक नवाचार, सत्यनिष्ठा और जन-सेवा की भावना के माध्यम से पतन का विरोध करते हैं।
- लोक सेवा में, अव्यवस्था निम्नलिखित रूपों में हो सकती है:
नैतिक विचारकों का दृष्टिकोण:
- महात्मा गांधी:
- निःस्वार्थ सेवा और सत्य के माध्यम से आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त कर उन्होंने नैतिक एवं राजनीतिक अव्यवस्था का प्रतिकार किया।
- इमैनुएल कांट:
- नैतिक कर्त्तव्यों के पालन में ही सच्ची प्रसन्नता है, जो नैतिक उदासीनता के विरुद्ध विद्रोह है।
- दलाई लामा:
- पीड़ित विश्व के उपचार के लिये करुणा और परोपकार के रूप में आनंद की अनुशंसा करते हैं।
- अल्बर्ट कैमस:
- द मिथ ऑफ सिसिफस में प्रसन्नता को निरर्थकता के विरुद्ध परम विद्रोह के रूप में दर्शाया गया है।
प्रतिपक्ष: क्या प्रसन्नता सदैव विद्रोह ही होती है?
- सभी प्रसन्नता नैतिक नहीं होतीं; भोगवाद या पलायनवाद अव्यवस्था के ही सहयोगी हो सकते हैं।
- विद्रोह केवल आनंद में नहीं, बल्कि सार्थक, नैतिक रूप से सचेत प्रसन्नता में निहित है।
नैतिक विद्रोह के रूप में प्रसन्नता की रक्षा करना
- भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास:
- संघर्ष और तनाव में अव्यवस्था का प्रतिरोध करने में सहायता करता है।
- सचेतनता और आत्म-चिंतन:
- मानसिक भ्रम और आवेग के विरुद्ध संतुलन स्थापित करता है।
- संस्थागत नैतिकता:
- न्यायपूर्ण व्यवस्थाओं के माध्यम से प्रसन्नता, प्रशासनिक पतन का प्रतिरोध करता है।
- शिक्षा और मूल्यबोध:
- तर्कसंगतता और नैतिकता को बढ़ावा देता है, जो अव्यवस्था के विरुद्ध एक साधन है।
निष्कर्ष:
जैसा कि अल्बर्ट कामू ने लिखा था, “शीत ऋतु की गहराई में, मैंने जाना कि मेरे भीतर एक अजेय ग्रीष्म ऋतु थी।” एक ऐसे ब्रह्मांड में जहाँ अव्यवस्था अपरिहार्य है और जहाँ व्यवस्था अराजकता की ओर अग्रसर हो, वहाँ प्रसन्नता एक सचेत सृजनात्मक कर्म बन जाती है। यह एक नैतिक चयन है, जो अनिश्चितता के बीच अर्थ की संरचना करता है। यह जीवन की अव्यवस्था का खंडन नहीं, बल्कि उसके बावजूद आंतरिक सामंजस्य को व्यवस्थित करने का साहस है।
2. जब अधिगम यांत्रिक हो जाता है, तो चिंतन वैकल्पिक मात्र रह जाता है। (1200 शब्द)
परिचय:
रामेश्वरम् में, अपनी बाल्यावस्था के दौरान ए. पी. जे. अब्दुल कलाम एक बार विज्ञान की कक्षा में शामिल हुए जहाँ उनके शिक्षक, शिवसुब्रह्मण्यम अय्यर, पाठ्यपुस्तक से वायुगतिकी (Aerodynamics) समझा रहे थे। जब उन्होंने देखा कि छात्र इस अवधारणा को समझने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, तो उन्होंने पूरी कक्षा को समुद्र तट पर ले जाकर समुद्र की लहरों के ऊपर उड़ते समुद्री पक्षियों की ओर इशारा किया और बताया कि उनके पंख किस प्रकार 'लिफ्ट' करते हैं। कलाम ने बाद में अपनी आत्मकथा विंग्स ऑफ फायर में लिखा कि इस एक प्रसंग ने एक यांत्रिक (Mechanical) पाठ को एक जीवंत अनुभव में बदल दिया, जिससे उनके भीतर वायुगतिकी के प्रति आजीवन जिज्ञासा जागृत हुई और यह साबित किया कि “सच्चा ज्ञान तब शुरू होता है जब मन केवल याद करने के लिये नहीं, बल्कि सोचने के लिये सक्रिय होता है।”
मुख्य भाग:
मूल विचार की समझ
- यांत्रिक अधिगम: ऐसा अध्ययन जो केवल दोहराव पर आधारित हो, जिसमें समझ का अभाव हो।
- सोचने की प्रवृत्ति गौण हो जाती है: जब छात्र, बिना कोई प्रश्न पूछे केवल साँचों (Templates) या प्रामाणिकता (Authority) पर निर्भर रहते हैं।
- उदाहरण: मैकॉले का मिनट ऑफ एजुकेशन (1835) — इसने भारत में एक ऐसी शिक्षा-व्यवस्था तैयार की जो ‘लिपिकों’ का निर्माण करे, न कि रचनात्मक विचारकों का और यह परंपरा आज भी रट्टा आधारित अधिगम-प्रणालियों में दिखाई देती है।
ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टिकोण
- सुकरात की पद्धति (प्रश्नोत्तरी अर्थात् तर्क-वितर्क आधारित अधिगम) बनाम रटंत विद्या।
- रवींद्रनाथ टैगोर की समालोचना— विश्वभारती की स्थापना उन्होंने इसलिये की थी ताकि यांत्रिक अधिगम की प्रथा को तोड़ा जा सके और प्रकृति, कला एवं तर्क को शिक्षा में एकीकृत किया जाए।
- जॉन ड्यूई का दर्शन — अनुभवात्मक (Experiential) अधिगम ही समस्या-समाधान की क्षमता को बढ़ावा देता है।
- उदाहरण: नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में बहुविषयी संवाद और वाद-विवाद को प्रोत्साहन दिया जाता था, यह आधुनिक ‘क्रिटिकल पेडागॉजी’ से सदियों पहले की बात है।
यांत्रिक अधिगम के कारण
- परीक्षा-केंद्रित प्रणाली: प्रतियोगी कोचिंग संस्थान प्रायः मूलभूत तथ्यों को समझने की बजाय रटंत विद्या के अभ्यास पर केंद्रित होते हैं।
- अत्यधिक मानकीकरण: NCERT का एक समान पाठ्यक्रम समानता को बढ़ावा देता है, लेकिन अगर इसे यांत्रिक रूप से पढ़ाया जाए तो यह स्थानीय संदर्भगत समस्या-समाधान को हतोत्साहित कर सकता है।
- प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग: यदि तकनीक का प्रयोग उसके पीछे के तर्क को समझे बिना हो, तो उससे गहन समझ विकसित नहीं होती।
- शिक्षक प्रशिक्षण में कमियाँ: कई स्कूल जिज्ञासा जागृत करने के बजाय पाठ्यक्रम पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उदाहरण के लिये वैज्ञानिक प्रयोगों को छोड़ दिया जाता है ताकि तथाकथित ‘महत्त्वपूर्ण प्रश्नों’ पर ध्यान दिया जा सके।
परिणाम
- बौद्धिक निष्क्रियता: वर्ष 2016 में विमुद्रीकरण के दौरान भारत में फेक न्यूज़ का प्रसार हुआ, जहाँ कई लोगों ने बिना तथ्य-जाँच के व्हाट्सऐप फॉरवर्ड्स को सच मान लिया।
- नवाचार में ठहराव: भारत में STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) स्नातकों की संख्या अधिक है, फिर भी ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में वह अपेक्षाकृत छोटे देशों (जैसे: स्विट्ज़रलैंड) से पीछे है।
- लोकतंत्र के लिये खतरा: यांत्रिक रूप से शिक्षित नागरिकों को प्रोपेगैंडा का शिकार बनाना आसान होता है।
- कार्यबल में असंगति: इन्फोसिस जैसी कंपनियों को कई बार नये स्नातकों को पुनः प्रशिक्षित करना पड़ता है, क्योंकि उनमें समस्या-समाधान की वास्तविक क्षमता का अभाव होता है।
प्रतिवाद (Counterarguments)
- कुछ हद तक पुनरावृत्ति आवश्यक होती है, उदाहरण के लिये, शल्य चिकित्सकों को शल्य-क्रिया करने से पहले शरीर-रचना (Anatomy) का गहन अध्ययन करना ही पड़ता है।
- उदाहरण: शतरंज के खिलाड़ी पहले मानक ओपनिंग (यांत्रिक शिक्षा) सीखते हैं, फिर धीरे-धीरे अपनी रणनीतियों का आविष्कार विकसित करते हैं।
आगे की राह
- शैक्षणिक पद्धति में सुधार: फिनलैंड की जिज्ञासावर्द्धक पद्धति, जहाँ 16 वर्ष की उम्र तक कोई मानकीकृत परीक्षा नहीं होती — रचनात्मकता को बढ़ावा देती है।
- मूल्यांकन प्रणाली का पुनर्निर्माण: CBSE ने वर्ष 2024 से योग्यता-आधारित प्रश्न को अपनाया है जो विश्लेषणात्मक क्षमताओं का परीक्षण करते हैं।
- शिक्षकों का सशक्तीकरण: सिंगापुर का शिक्षक-प्रशिक्षण मॉडल, परियोजना-आधारित अधिगम को प्रोत्साहित करता है।
- तकनीक को उपकरण के रूप में प्रयोग करना: दिल्ली सरकार के विद्यालयों में AR/VR तकनीक के माध्यम से विज्ञान प्रयोगों का सजीव अनुभव।
- मूल्य-आधारित शिक्षा: गांधीजी की ‘नई तालीम’ — हस्तकला, नैतिकता और समालोचनात्मक चिंतन का एकीकरण।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप संरेखण: NEP- 2020 की अनुशंसाओं को लागू करना, जिसमें अनुभवात्मक अधिगम, बहुविषयी शिक्षा और समालोचनात्मक चिंतन की नींव पर शिक्षा को पुनर्गठित किया गया है। इसके लिये मूल्यांकन प्रणाली और शिक्षक-प्रशिक्षण को समानांतर रूप से विकसित करना आवश्यक है।
निष्कर्ष :
जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था — "हम ऐसी शिक्षा चाहते हैं जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य स्वयं अपने पैरों पर खड़ा हो सके।"
यांत्रिक अधिगम न तो चरित्र निर्माण करता है, न ही बौद्धिक क्षमता को विकसित करता है। वास्तविक शिक्षा वही है जो जिज्ञासा को जागृत करे, समालोचनात्मक चिंतन को पोषित करे और ऐसे स्वावलंबी नागरिकों का निर्माण करे जो विवेक एवं साहस के साथ राष्ट्र का भविष्य गढ़ सकें।
- प्रमुख शब्दों की परिभाषा: