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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

पश्चिम एशिया- शरणार्थी संकट

  • 21 Mar 2020
  • 17 min read

संदर्भ:

पिछले कुछ वर्षों में विश्वभर में शरणार्थियों की समस्या अब और अधिक गंभीर होती जा रही है। विशेष कर पश्चिम-एशिया में क्षेत्रीय अशांति एवं कई अन्य कारणों से यह संकट इस दशक की एक बड़ी मानवीय त्रासदी बन गया है। एक अनुमान के अनुसार, अब तक 80 हज़ार से अधिक शरणार्थी तुर्की की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं के रास्ते यूरोप के देशों में पहुँच चुके हैं। वर्तमान में शरणार्थियों की बढ़ती समस्या का प्रभाव इस संकट से प्रभावित देशों (पश्चिम एशिया एवं यूरोप) की स्थानीय एवं वैश्विक राजनीति पर भी देखा जा सकता है। हाल ही में तुर्की ने घोषणा की कि वह अब शरणार्थियों को अपनी सीमा के ज़रिये यूरोप जाने से नहीं रोकेगा, वहीं कई अन्य देशों ने शरणार्थियों के लिये अपनी सीमाओं को बंद करने की घोषणा की है जिससे इस समस्या के संदर्भ में अनिश्चितताएँ और भी बढ़ गई हैं।

  

मुख्य बिंदु:

  • पश्चिम-एशिया क्षेत्र में शरणार्थियों की समस्या और इसे लेकर देशों के बीच तनाव की स्थिति नई नहीं है, ध्यातव्य है कि वर्ष 2016 में इस क्षेत्र से बड़ी मात्रा में शरणार्थी तुर्की और ग्रीस से होते हुए यूरोप के कई देशों में पहुँचे थे।
  • उस समय भी तुर्की और यूरोप के देशों ने इस समस्या से मिलकर निपटने की आवश्यकता पर सहमति जाहिर की और एक ‘कोएलिशन ऑफ द विलिंग’ (Coalition of the Willing) बनाने की बात कही गई, जिससे पश्चिमी एशिया से आए हुए शरणार्थियों को यूरोप के अलग-अलग देशों में आश्रय दिया जा सके या अन्य आवश्यक समाधान किये जा सके।
  • हाल ही में सीरियाई सरकार ने देश के उत्तर-पश्चिम में स्थिति इदलिब (Idlib) प्रांत को विद्रोहियों के कब्ज़े से मुक्त करने के लिये हमले शुरू किये, इस दौरान सीरियाई सरकार और विद्रोहियों के साथ-साथ सीरिया और तुर्की की सेनाओं के बीच भी संघर्ष काफी बढ़ गया। 
  • इदलिब में उपजी संघर्ष की इस स्थिति के कारण इस क्षेत्र से यूरोप की तरफ जाने वाले शरणार्थियों की संख्या में एक बार पुनः वृद्धि देखने को मिली है।
  • उल्लेखनीय है कि वर्तमान में लगभग 36-37 लाख शरणार्थी पहले से ही तुर्की में रूके हुए हैं। एक अनुमान के अनुसार इदलिब प्रांत के हालिया संकट के कारण आने वाले दिनों में 9-10 लाख अतिरिक्त शरणार्थी तुर्की में आ सकते हैं।
  • इस स्थिति को देखते हुए तुर्की ने शरणार्थियों को ग्रीस (और आगे यूरोप के अन्य देशों) की तरफ जाने के लिये अपनी सीमाएँ खोलने का निर्णय लिया है।

सीरियाई संकट का एक संक्षिप्त परिचय:

  • सीरियाई संकट की शुरुआत वर्ष 2010-11 में शुरू हुए ‘अरब स्प्रिंग’ (Arab Spring) के दौरान हुई।
  • अफ्रीका के ट्यूनिशिया (Tunisia) में तानाशाही सरकार के खिलाफ शुरू हुआ यह विद्रोह धीरे-धीरे अफ्रीका और पश्चिम-एशिया के अन्य देशों में फैल गया।
  • वर्ष 2011 में सीरिया के कुछ क्षेत्रों में जनता ने बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर राष्ट्रपति बसर अल असद की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया।
  • सरकार द्वारा प्रदर्शन को रोकने के लिये अत्यधिक बल का प्रयोग किया गया जिससे यह प्रदर्शन और भी उग्र होकर देश के अन्य हिस्सों में भी फैल गया।
  • इस दौरान देश की आतंरिक अस्थिरता का लाभ उठाकर सीरिया में कई अन्य उग्र समूह (इस्लामिक स्टेट और तालिबान समर्थित समूह ‘जबात-अल-नुसरा’ आदि) भी अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिये इस युद्ध में शामिल हो गए।
  • वैश्विक हस्तक्षेप से सीरिया का आतंरिक संकट और अधिक जटिल हो गया। उदाहरण के लिये रूस ने विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध में सीरियाई सरकार का समर्थन किया वहीं अमेरिका इस्लामिक स्टेट से लड़ाई के दौरान कुर्दिश फौज का समर्थन कर रहा था। 
  • जबकि तुर्की समय-समय पर कुर्द समूहों पर हमले करता रहा है। (कुर्द पश्चिमी एशिया का एक जनजातीय समुदाय है। इस समुदाय के लोग सीरिया, तुर्की और ईरान जैसे देशों में अलग-अलग समूहों में निवास करते हैं। कुर्द समय-समय पर अपने लिये एक स्वतंत्र देश ‘कुर्दिस्तान’ की स्थापना मांग करते रहें हैं।) 
  • संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय (United Nations High Commissioner for Refugees-UNHCR) के अनुसार, सीरियाई संकट के कारण वर्ष 2011 से अब तक 56 लाख से अधिक लोग पलायन को विवश हुए हैं।
  • इस युद्ध में अब तक 3,70,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। वर्ष 2019 में सीरियाई युद्ध में लगभग 11,215 लोगों की मृत्यु हुई जो अब तक इस युद्ध में एक वर्ष में होने वाली मौतों का सबसे छोटा आँकड़ा है।

वर्तमान शरणार्थी समस्या: 

  • पिछले दिनों सीरियाई सरकार द्वारा विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इदलिब प्रांत में हमले तेज़ कर दिये गए। 
  • साथ ही तुर्की भी सीरियाई सीमा पर कई बार हमले कर चुका है, जहाँ वह दोनों देशों के बीच विद्रोहियों से मुक्त एक सेफ-जोन (Safe Zone) स्थापित करने की बात करता है।
  • सीरिया, तुर्की और विद्रोहियों के बीच इस जटिल और अनिश्चिततापूर्ण युद्ध के कारण इस क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग पलायन करने को विवश हुए हैं।     
  • तुर्की और सीरिया के सीमांत क्षेत्रों में अस्थाई शिविरों में रह रहे इन शरणार्थियों को भोजन और पीने के पानी तक के लिये संघर्ष करना पड़ता है, इसके अतिरिक्त किसी प्रशासनिक व्यवस्था के अभाव इन शिविरों में आपराधिक गतिविधियों में अत्यधिक वृद्धि हुई है।
  • वर्ष 2016 में तुर्की और यूरोपीय संघ के बीच हुए एक समझौते के तहत शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये यूरोपीय संघ द्वारा तुर्की को अन्य सहयोगों के साथ 6 बिलियन यूरो देने की सहमति बनी थी, परंतु यह समझौता पूर्णतया सफल नहीं रहा, जिसके कारण यह समस्या यथावत् बनी रही है।  
  • हाल के वर्षों में यूरोप के साथ पश्चिम के कई अन्य देशों के चुनावों में स्थानीय पहचान और राष्ट्रवादी विचारधारा का मुद्दा प्रमुख रहा है और इसका प्रभाव इन देशों द्वारा शरणार्थी मुद्दों पर लिये गए फैसलों में स्पष्ट दिखाई दिया है।   
  • शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये क्षेत्र के देशों में किसी सहमति या समायोजित योजना के अभाव में इस संकट से प्रभावित लोग निकटवर्ती देशों (तुर्की, ग्रीस आदि) में आश्रय लेने को विवश हुए हैं। 
  • एक ही शहर में बड़ी संख्या में शरणार्थियों के पहुँचने से स्थानीय लोगों और शरणार्थियों के बीच हिंसक संघर्ष तथा आपराधिक मामलों में वृद्धि हुई है। इन क्षेत्रों में अचानक आबादी के बढ़ जाने के कारण पुलिस, चिकित्सा और यातायात जैसी सुविधाओं पर दबाव बढ़ा है तथा स्थानीय प्रशासन के लिये भी इस स्थिति से निपटना एक बड़ी चुनौती बन गया है। उदाहरण के लिये ग्रीस के लेस्बोस (Lesbos) द्वीप पर हाल के दिनों में स्थानीय लोगों और शरणार्थियों के मध्य संघर्ष एक बड़ी समस्या बन गई है।

राजनीतिक हथियार के रूप में शरणार्थियों का प्रयोग:

विशेषज्ञों के अनुसार, रूस और तुर्की जैसे कुछ देशों ने वर्तमान सीरियाई संकट का इस्तेमाल वैश्विक राजनीति में अपनी पकड़ को मज़बूत बनाने के लिये किया है।

  • पिछले कुछ वर्षों में विश्विक राजनीति में रूस की पकड़ कमज़ोर हुई थी। वर्ष 2014 में क्रीमिया में रूसी हस्तक्षेप के बाद विश्व के अनेक देशों ने खुलकर रूस का विरोध किया और कई महत्त्वपूर्ण संगठनों, जैसे-G8 (वर्तमान G7), से रूस को बाहर होना पड़ा।
  • परंतु सीरियाई संकट में अपनी भूमिका के माध्यम से रूस वैश्विक राजनीति में पुनः अपना महत्त्व सिद्ध करने में सफल रहा है। साथ ही क्षेत्र के अन्य देशों (ईरान,लेबनान आदि) की समस्याओं में भी रूस का हस्तक्षेप बढ़ा है। 
  • रूस पर आरोप लगते रहें हैं कि वह नहीं चाहता कि सभी शरणार्थी यूरोप चले जाएँ, जिससे वह इन शरणार्थियों का इस्तेमाल यूरोपीय देशों से समझौतों के दौरान कर सके।
  • कुर्दों पर तुर्की के हिंसक हमलों के बाद विश्वभर में तुर्की का विरोध हुआ, साथ ही नाटो (NATO) समूह का सदस्य होने के बावजूद भी रूस से S-400 एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल प्रणाली खरीदने पर नाटो समूह में तुर्की की स्थिति कमज़ोर हुई है।
  • सीरियाई शरणार्थी संकट का प्रयोग कर तुर्की समय-समय पर विश्व के अन्य देशों व कई वैश्विक संगठनों (संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ आदि) पर दबाव बनाने का प्रयास करता रहा है।
  • तुर्की शरणार्थियों के माध्यम से सीरिया में यूरोपीय संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप की माँग करता है, जिससे सीरिया में रूस पर दबाव बनाया जा सके।
  • इसके अतिरिक्त पश्चिम के कई देशों और संपन्न माने जाने वाले स्कैंडिनेवियन देशों (डेनमार्क,स्वीडन आदि) में भी हाल के वर्षों में राष्ट्रवाद और शरणार्थियों जैसे मुद्दों स्थानीय चुनावों का प्रमुख विषय बन गए हैं।                

वर्तमान वैश्विक परिवेश का शरणार्थी संकट पर प्रभाव:

  • हाल के वर्षों में जर्मनी के साथ अन्य यूरोपीय देशों में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि की दर बहुत ही धीमी (लगभग 1% से भी कम) रही है, ऐसे में बड़ी संख्या में शरणार्थियों को आश्रय दे पाना इन देशों के लिये एक बड़ी चुनौती है।
  • फ्राँस और कई अन्य देशों में वर्तमान में चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन के कारण देश अन्य समस्याओं पर विशेष ध्यान नहीं दे पाएँगे। इसके अतिरिक्त हाल के वर्षों में यूरोप के देशों में पहुँचे अफ्रीकी शरणार्थियों और स्थानीय नागरिकों के बीच भाषा, संस्कृति आदि को लेकर समन्वय स्थापित कर पाना सरकारों के लिये एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। 
  • हाल के वर्षों में यूरोप के कई देशों में शरणार्थी विरोधी मुद्दों को लेकर कई विपक्षी पार्टियों ने मज़बूत जन समर्थन जुटाया है, ऐसे में इन देशों में शरणार्थियों को आश्रय देने पर सरकारों को भारी नागरिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
  • सीरियाई संकट से प्रभावित अधिकतर शरणार्थी तुर्की के बाद ग्रीस में पहुँचे हैं, ध्यातव्य है कि पिछले कई वर्षों से ग्रीस की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही  है, ऐसे में ग्रीस के लिये इन शरणार्थियों को आश्रय देना बहुत कठिन हो गया है।
  • इस मुद्दे से जुड़े हुए देशों के बीच का आपसी मतभेद इस समस्या के निवारण में एक बड़ी बाधा बना हुआ है। उदाहरण के लिये- तुर्की और रूस S-400 के मामले में एक तरफ हैं जबकि सीरिया में वे विरोधी हैं, साथ ही ऐसी ही स्थिति तुर्की-अमेरिका, रूस-अमेरिका और अन्य हितधारकों के बीच है।    
  • वर्तमान में विश्वभर में फैली COVID-19 महामारी ने पहले से ही जटिल शरणार्थी समस्या को और भी बढ़ा दिया है, COVID-19 के कारण ज़्यादातर  देशों ने अपनी सीमाएँ बंद कर दी हैं। शरणार्थी शिविरों में COVID-19 की पहुँच इस मानवीय त्रासदी की विभीषिका को और अधिक बढ़ा देगी।       

आगे की राह:

  • शरणार्थियों की समस्या के निवारण के लिये यह अति आवश्यक है कि क्षेत्र के सभी हितधारकों को अपने आपसी मतभेद को भूलकर सर्वसम्मति से एक समायोजित कार्ययोजना का निर्माण करना चाहिये।
  • सीरिया के राजनीतिक संकट के समाधान के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से हस्तक्षेप किया जा सकता है।
  • शरणार्थी शिविरों में मूलभूत सुविधाओं की पहुँच और शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये विश्विक सहयोग में वृद्धि की जानी चाहिये।

निष्कर्ष: वर्ष 2010-11 में ट्यूनीशिया में शुरू हुई ‘अरब स्प्रिंग’ (Arab Spring) की क्रांति के परिणामस्वरूप कई देशों में वर्षों की निरंकुश तानाशाही सरकारों का अंत हुआ, परंतु सीरिया के नागरिकों के लिये यह क्रांति एक अंतहीन आपदा का कारण बनी। पिछले 9 वर्षों में इस संकट के कारण 3.7 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हुई जबकि 56 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। पिछले लगभग एक दशक में भिन्न-भिन्न समूह अपने अलग मुद्दों/हितों के लिये सीरियाई युद्ध में शामिल हुए, जिसने इस संकट की अनिश्चितता और विभीषिका में अतिरिक्त वृद्धि की है। वर्तमान में यूरोपीय देशों के लिये आर्थिक संकट और COVID-19 की चुनौती के बीच अकेले इन शरणार्थियों की मदद कर पाना बहुत ही मुश्किल होगा, ऐसे में यह आवश्यक है कि विश्व के सभी देशों द्वारा मिलकर शीघ्र ही इस समस्या के समाधान हेतु कार्य किया जाए।             

अभ्यास प्रश्न: पश्चिमी एशिया के शरणार्थी संकट के कारणों और इनके समाधान के मार्ग में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिये।

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