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यौन अपराध एवं त्वरित न्यायप्रणाली

  • 14 Aug 2021
  • 12 min read

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में भारत सरकार ने यौन अपराधों के पीड़ितों को तेज़ी से न्याय प्रदान करने के लिये दो वर्षों के लिये केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालयों (Fast Track Special Court- FTSC) को जारी रखने की मंज़ूरी दी है।

प्रमुख बिंदु

  • फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालयों की निरंतरता: 1023 फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालयों को जारी रखने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया है।
    • इनमें 389 अनन्य POCSO (Protection of Children from Sexual Offences- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) न्यायालय शामिल हैं, जो यौन अपराधों की शिकार नाबालिग बच्चियों से जुड़े मुकदमों में तेज़ी लाने और तत्काल राहत प्रदान करने के लिये हैं।
  • कुल परिव्यय: 2 अक्तूबर, 2019 को शुरू की गई योजना को निरंतर बनाए रखने में कुल 1,572 करोड़ रुपए से अधिक का परिव्यय शामिल है।
    • केंद्र द्वारा निर्भया कोष से 971 करोड़ रुपए प्रदान किये गए हैं तथा शेष राशि राज्यों द्वारा प्रदान किये जाने की उम्मीद है।
  • पहल का उद्देश्य: असहाय पीड़ितों को त्वरित न्याय प्रदान करने के अलावा फास्ट ट्रैक कोर्ट तंत्र यौन अपराधियों के लिये निवारक ढाँचे को मज़बूत करता है।

फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) के बारे में:

  • FTSC वे न्यायालय हैं,  जिनसे न्याय की त्वरित व्यवस्था सुनिश्चित करने की अपेक्षा की जाती है। नियमित अदालतों की तुलना में FTSC त्वरित परीक्षण करते हैं एवं यहाँ न्याय मिलने में कम समय लगता है।

पृष्ठभूमि:

  • फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTCs) की सिफारिश पहली बार ग्यारहवें वित्त आयोग ने वर्ष 2000 में की थी।
  • भारत सरकार ने सिफारिश का पालन करते हुए पाँच साल की अवधि के लिये विभिन्न राज्यों में 1,734 अतिरिक्त अदालतें बनाने के लिये 502.90 करोड़ रुपए की मंज़ूरी दी। 
  • वर्ष 2011 में केंद्र सरकार ने फास्ट ट्रैक कोर्ट को फंड देना बंद कर दिया था।
  • दिसंबर 2012 में दिल्ली गैंगरेप और हत्या के बाद केंद्र सरकार ने 'निर्भया फंड' की स्थापना की, किशोर न्याय अधिनियम में संशोधन किया और फास्ट-ट्रैक महिला न्यायालयों की स्थापना की।

फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों के लिये योजना:

  • वर्ष 2019 में सरकार ने भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत बलात्कार के लंबित मामलों और POCSO अधिनियम के तहत अपराधों के शीघ्र निपटान के लिये देश भर में 1,023 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतें (FTSCs) स्थापित करने की एक योजना को मंज़ूरी दी।

सरकार की अन्य पहल:

  • वर्ष 2018 में भारत सरकार ने नाबालिग बलात्कार पीड़ितों के मामलों में अपराधियों को अधिक कठोर दंड प्रदान करने देने के लिये आपराधिक कानूनों में संशोधन किया।
    • संशोधन में 12 वर्ष से कम उम्र की पीड़िताओं के मामलों में अपराधियों के लिये मृत्युदंड की सजा घोषित की।
    • अगर पीड़िता की उम्र 16 साल से कम एवं 12 वर्ष से अधिक हो तो अपराधियों के लिये आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया।

संबंधित मुद्दे

  • लंबित मामलों की बढ़ती संख्या: शीघ्र न्याय और निष्पक्ष सुनवाई एक नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालतों में लंबित मामले अधिक होने के कारण न्याय मिलने में बहुत अधिक समय लगता है।
    • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, वर्ष 2019 के अंत में बलात्कार के मामलों में लंबित मामलों की दर 89.5% और दोषसिद्धि दर 27.8% थी।
      • POCSO से संबंधित मामलों में वर्ष के अंत में 88.8% मामले लंबित थे और जिन मामलों का निपटारा किया गया, उनमें से 34.9% मामलों में दोष सिद्ध हुआ।
  • न्यायालयों का अप्रभावी कार्य: गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2020 तक 1023 फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्वीकृत संख्या में से केवल 597 अदालतें कार्य कर रही थीं, जिनमें से 321 POCSO अदालतें थीं।
    • निर्धारित समय-सीमा के अनुसार, POCSO अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों को 60 दिनों के भीतर हल करना आवश्यक है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है।
  • वकीलों और गवाहों से जुड़े मुद्दे: वकीलों को मामलों की देरी से सुनवाई के लिये भी दोषी ठहराया जाना चाहिये क्योंकि वे बार-बार और अनावश्यक स्थगन की मांग करते हैं तथा गवाह भी बार-बार अदालतों में आने के लिये अनिच्छुक पाए जाते हैं।
    • गवाहों की अनुपस्थिति के कारण देरी को स्थगन के मुख्य कारणों में से एक के रूप में देखा गया।
  • जनसंख्या अनुपात में कम न्यायाधीश: वर्तमान में ज़िला और मजिस्ट्रेट स्तर पर निचली न्यायपालिका में 20% पद खाली हैं। ये स्थायी रिक्तियाँ हैं जिन्हें भरा नहीं जा रहा है।
    • विशेष न्यायालयों का गठन कर रिक्त पदों को न भरने से न्यायालय का भार बढ़ जाता है।
    • साथ ही ये न्यायाधीश कमोबेश सेशन कोर्ट के न्यायाधीश होते हैं, जिन्हें फास्ट-ट्रैक कोर्ट की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी दी जाती है।

आगे की राह

  • न्यायपालिका और सरकार का सहयोगात्मक प्रयास: FTSC का उद्देश्य केवल उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों के प्रभावी समन्वय से ही पूरा किया जा सकता है।
    • दोनों को समान रूप से सतर्क रहना चाहिये ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अदालतों का गठन किया जाए, बुनियादी ढाँचा उपलब्ध कराया जाए और मामलों का यथासंभव शीघ्रता से निपटारा किया जाए।
  • न्याय में समानता: प्रत्येक आरोपी व्यक्ति को अंतिम अदालत तक अर्थात् ज़िला स्तरीय न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय तक स्वयं को निर्दोष साबित करने का प्रयास करने का अधिकार है।
    • न्यायिक व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना होगा कि पीड़िता को न्याय दिलाने की जल्दबाज़ी में वह आरोपी को न्याय से वंचित न करे।
  • गवाहों की सुरक्षा: गवाहों की सुरक्षा के लिये कानून बनाने की ज़रूरत है। गवाह को सुरक्षा प्रदान करने के लिये कड़े कानूनों की कमी आरोपी का सामना करते समय उसके मन में भय पैदा करती है।
    • गवाह को प्रदान की गई उचित सुरक्षा का अभाव उसे न्याय के शीघ्र वितरण के लिये कोई भी सहायता प्रदान करने से रोकता है।
  • न्यायाधीशों के क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना एवं तनाव कम करना: FTSC में समर्पित न्यायाधीश होने चाहिये ताकि मामलों की नियमित आधार पर सुनवाई हो सके।
    • अपने क्षेत्र/क्षेत्राधिकार के बारे में उचित ज्ञान रखने वाले पर्याप्त न्यायाधीश होने चाहिये।
    • एक दिन में एक न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित होने वाले मामलों की संख्या भी सीमित होनी चाहिये, जिससे उनकी कार्यशैली नकारात्मक रूप से प्रभावित न हो।
  • FTSC के लिये विशेष प्रक्रियाएँ: कानूनी प्रक्रिया को मज़बूत करने की ज़रूरत है। एक सामान्य अदालत और एक विशेष अदालत के लिये एक ही परीक्षण प्रक्रिया से न्याय में लगने वाले समय पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और लंबित मामलों में अधिक वृद्धि होगी। अतः प्रक्रियाओं में बदलाव की भी ज़रूरत है।
    • साथ ही निष्पक्ष सुनवाई के साथ समझौता किये बिना विशेष अदालतों के लिये एक आसान प्रक्रिया और तंत्र निर्धारित किया जाना चाहिये।
    • इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिये कि विशेष अदालतें एक विशेष प्रक्रिया लागू करें और मामलों की सुनवाई के लिये समय-सीमा भी कम करें।
  • ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में न्यायपालिका: ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में यौन अपराध अक्सर रिपोर्ट नहीं किये जाते हैं।
    • ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में तकनीकी, न्यायिक और कानूनी बुनियादी ढाँचे को बढ़ाना जहाँ न केवल मामलों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है बल्कि न्याय की स्थिति भी बदतर है।
  • पीड़ित के प्रति संवेदनशीलता: न केवल अदालतों में बल्कि घर में भी संवेदनशीलता को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। यौन अपराधों के निराकरण के लिये केवल फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाना ही रामबाण नहीं है; समाज को महिलाओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाना होगा।
    • समाज को संवेदनशील बनाने के अन्य तरीकों में ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों और सरकारी स्कूलों में यौन शिक्षा कक्षाएँ शुरू करना शामिल है।
    • वकीलों और पुलिस की ओर से भी संवेदनशीलता की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

  • 'यौन अपराध पीड़ितों को समयबद्ध न्याय' हमारे देश में न्याय प्रदान करने संबंधी प्रमुख चिंताओं में से एक है।
    • सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि न्याय मांगने वाले आम आदमी को एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट या एक टेबल से दूसरे टेबल तक घूमना ना पड़े।
    • इस प्रकार के फास्ट-ट्रैक तंत्र में ऐसी स्थिति की संभावना को कम करने की क्षमता होती है किंतु इसके लिये इस तरह के न्यायालयों का कार्यान्वयन प्रभावी बनाने की आवश्यकता होती है।

निवारक प्रभाव बेहतर करने के लिये कानूनों का समय पर संशोधन और उनका प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक है। यदि बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं एवं पीड़ित को न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं तो निवारक प्रभाव के बेहतर होने की संभावना नहीं है।

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