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भारत और सेमीकंडक्टर उद्योग

  • 18 May 2022
  • 12 min read

चर्चा में क्यों?

भारत सेमीकंडक्टर डिज़ाइन, निर्माण और प्रौद्योगिकी विकास का वैश्विक केंद्र बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। हालाँकि सेमीकंडक्टर चिप्स की कमी ने सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला में कमज़ोरियों को उजागर किया है और घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है।

सेमीकंडक्टर चिप्स क्या हैं?

  • सेमीकंडक्टर चिप्स के बारे में: अर्द्धचालक ऐसी सामग्री है जिसमें चालकता सुचालक और कुचालक के बीच होती है। वे शुद्ध तत्त्व सिलिकॉन या जर्मेनियम या गैलियम, आर्सेनाइड या कैडमियम सेलेनाइड के यौगिक हो सकते हैं।
  • सेमीकंडक्टर चिप्स का महत्त्व: वे बुनियादी निर्माण खंड हैं जो सभी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी उत्पादों के दिल और मस्तिष्क के रूप में कार्य करते हैं।
    • ये चिप्स अब समकालीन ऑटोमोबाइल, घरेलू गैजेट्स और ECG मशीनों जैसे आवश्यक चिकित्सा उपकरणों का एक अभिन्न अंग हैं।
  • मांग में हालिया वृद्धि: कोविड-19 महामारी ने दैनिक आर्थिक और आवश्यक गतिविधियों के बड़े हिस्से को ऑनलाइन या कम-से-कम उन्हें डिजिटल रूप से सक्षम करने के लिये लोगों के जीवन में चिप-संचालित कंप्यूटर एवं स्मार्टफोन की केंद्रीयता पर प्रकाश डाला है।
    • इसकी कमी व्यापक प्रभाव डाल सकती है।

अर्द्धचालक का क्या महत्त्व है?

  • एयरोस्पेस, ऑटोमोबाइल, संचार, स्वच्छ ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी और चिकित्सा उपकरणों आदि सहित अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों के लिये अर्द्धचालक आवश्यक हैं।
  • इन महत्त्वपूर्ण घटकों की मांग ने आपूर्ति को पीछे छोड़ दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर चिप की कमी पैदा हो गई है और इसके परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में विकास एवं नौकरियों में कमी आई है।
  • दिसंबर 2021 में केंद्र सरकार ने भारत में विभिन्न अर्द्धचालक वस्तुओं के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिये उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत 76,000 करोड़ रुपए की मंज़ूरी दी।
  • सेमीकंडक्टर्स और डिस्प्ले आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की नींव हैं जो औद्योगिकरण 4.0 के तहत डिजिटल परिवर्तन के अगले चरण को चला रहे हैं।

सेमीकंडक्टर उद्योग को बढ़ावा देने की आवश्यकता क्यों है?

  • सेमीकंडक्टर चिप्स आधुनिक सूचना युग की जीवनदायिनी हैं। वे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को हमारे जीवन को सरल बनाने वाली क्रियाओं की गणना और नियंत्रण करने में सक्षम बनाते हैं।
  • ये सेमीकंडक्टर चिप्स आईसीटी (सूचना और संचार प्रौद्योगिकी) के विकास के चालक हैं।
  • उनका उपयोग संचार, बिजली पारेषण आदि जैसे महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में किया जाता है, जिनका राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता है।
  • सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले इकोसिस्टम के विकास का वैश्विक मूल्य शृंखला के साथ गहन एकीकरण सहित अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में गुणक प्रभाव पड़ेगा।
  • दुनिया में ऐसे देश बहुत कम हैं जो इन चिप्स का निर्माण करते हैं।
  • इस उद्योग में संयुक्त राज्य अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान और नीदरलैंड का प्रभुत्व है।
  • जर्मनी आईसीटी का एक उभरता हुआ उत्पादक भी है।

सेमीकंडक्टर बाज़ार में भारत की स्थिति:

  • भारत वर्तमान में सभी चिप्स का आयात करता है और वर्ष 2025 तक इस बाज़ार के 24 अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। हालाँकि सेमीकंडक्टर चिप्स के घरेलू निर्माण के लिये भारत ने हाल ही में कई पहलें शुरू की हैं:
    • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'अर्द्धचालक और डिस्प्ले विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र' के विकास का समर्थन करने के लिये 76,000 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की है।
    • नतीजतन डिज़ाइन कंपनियों को चिप्स डिज़ाइन करने के लिये प्रोत्साहन हेतु एक महत्त्वपूर्ण राशि प्रदान की जाएगी।
    • भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों और अर्द्धचालकों के निर्माण के लिये इलेक्ट्रॉनिक घटकों एवं अर्द्धचालकों (एसपीईसीएस) के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना भी शुरू की है।
    • वर्ष 2021 में MeitY ने सेमीकंडक्टर डिज़ाइन में शामिल कम-से-कम 20 घरेलू कंपनियों का पोषण करने और अगले 5 वर्षों में 1500 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार हासिल करने की सुविधा के लिये डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (डीएलआई) योजना भी शुरू की।
    • भारत में अर्द्धचालकों का उपयोग वर्ष 2026 तक 80 बिलियन अमेरिकी डॉलर और वर्ष 2030 तक 110 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार करने की उम्मीद है।

चुनौतियाँ

  • उच्च निवेश की आवश्यकता: अर्द्धचालक और डिस्प्ले निर्माण एक बहुत ही जटिल और प्रौद्योगिकी-गहन क्षेत्र है, जिसमें भारी पूंजी निवेश, उच्च जोखिम, लंबी भुगतान अवधि तथा प्रौद्योगिकी में तेज़ी से बदलाव शामिल है, जिसके लिये महत्त्वपूर्ण व निरंतर निवेश की आवश्यकता होती है।
  • सरकार से न्यूनतम वित्तीय सहायता: जब कोई सेमीकंडक्टर उद्योग के विभिन्न उप-क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमता स्थापित करने के लिये आमतौर पर आवश्यक निवेश के पैमाने पर विचार करता है तो उसे मिलने वाला परिकल्पित राजकोषीय समर्थन का स्तर बहुत कम है।
  • क्षमता निर्माण की कमी: भारत में चिप डिज़ाइन की एक अच्छी प्रतिभा है लेकिन इसने कभी भी चिप फैब क्षमता का निर्माण नहीं किया। इसरो और डीआरडीओ के पास अपने-अपने फैब फाउंड्री हैं लेकिन वे मुख्य रूप से अपनी आवश्यकताओं के लिये हैं तथा नवीनतम फैब फाउंड्री की तुलना में परिष्कृत भी नहीं हैं।
    • भारत में केवल एक पुराना फैब है जो पंजाब के मोहाली में स्थित है।
  • बेहद महँगा फैब सेटअप: एक अर्द्धचालक निर्माण सुविधा (या फैब) की लागत एक अरब डॉलर के गुणकों में हो सकती है, यहाँ तक कि अपेक्षाकृत छोटे पैमाने पर  स्थापित करने के पर भी नवीनतम तकनीक से एक या दो पीढ़ी से पिछड़ जाता है।
  • संसाधन अक्षम क्षेत्र: चिप फैब हेतु लाखों लीटर स्वच्छ पानी, एक अत्यंत स्थिर बिजली आपूर्ति, बहुत सारी भूमि और अत्यधिक कुशल कार्यबल की आवश्यकता होती है।

आगे की राह

  • एक प्रमुख उत्पादक बनने की आवश्यकता: भारत को एक विश्वसनीय, बहुपक्षीय अर्द्धचालक पारिस्थितिकी तंत्र में एक प्रमुख उत्पादक बनने का लक्ष्य रखना चाहिये।
    • बहुपक्षीय अर्द्धचालक पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिये अनुकूल व्यापार नीतियाँ महत्त्वपूर्ण हैं।
  • सभी तत्त्वों के लिये पर्याप्त वित्तीय सहायता: भारत की प्रतिभा और अनुभव को ध्यान में रखते हुए यह बेहतर उपाय हो सकता है यदि नया मिशन कम-से-कम अभी के लिये चिप बनाने वाली शृंखला के अन्य हिस्सों, जिसमें डिज़ाइन केंद्र, परीक्षण सुविधाएँ, पैकेजिंग आदि को वित्तीय सहायता प्रदान करने से जुड़ा हो।
  • आत्मनिर्भरता को अधिकतम करना: भविष्य के चिप उत्पादन से जुड़ी योजना केवल एक बार के लिये नहीं होनी चाहिये बल्कि इसके लिये डिज़ाइन से निर्माण तक तथा पैकिंग और परीक्षण के लिये एक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना चाहिये।
    • भारत को इस क्षेत्र में अनुसंधान और विकास में भी सुधार करना चाहिये जहाँ वर्तमान में इसकी कमी है।
  • कनेक्टिविटी और क्षमता संबंधी उपाय: भारत को चिप बनाने और डिज़ाइनिंग उद्योग में अपनी पहचान बनाने के लिये कई कारकों को एक साथ लाने की ज़रूरत है।
    • भारत सरकार को चिप निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिये भारत में संबंधित उद्योगों को जोड़ने की तत्काल आवश्यकता है। साथ ही राष्ट्रीय क्षमता को बढ़ाने की ज़रूरत है।
  • उच्च निवेश की आवश्यकता: अर्द्धचालक और डिस्प्ले निर्माण एक बहुत ही जटिल व प्रौद्योगिकी-गहन क्षेत्र है जिसमें भारी पूंजी निवेश, उच्च जोखिम, लंबी अवधि एवं भुगतान अवधि और प्रौद्योगिकी में तेज़ी से बदलाव शामिल है, जिसके लिये महत्त्वपूर्ण और निरंतर निवेश की आवश्यकता होती है।
  • महत्त्वपूर्ण घटक के निर्माण को प्रोत्साहन देना: चिप के तीन घटक होते हैं:
    •  हार्डवेयर (कच्चा माल)
    •  डिज़ाइन
    •  फेब्रिकेशन
  • डिज़ाइन ही वह घटक है जो मूल्यवर्द्धन करता है और अगर भारत इस क्षमता का उपयोग करने में सक्षम है तो दुनिया में कोई भी देश इसे हरा नहीं सकता है।

निष्कर्ष

चूँकि अर्द्धचालकों की आवश्यकता के साथ-साथ इसकी वैश्विक मांग भी है, जिसे भारत पूरा कर सकता है, लेकिन इसके लिये मौजूदा क्षमताओं के निर्माण की आवश्यकता होगी। मजबूत नीति तंत्र और पारिस्थितिकी तंत्र को स्थापित करना होगा। उद्योग एवं सरकार को मिलकर काम करना भी ज़रूरी है।

 पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQ):

प्रश्न. लेज़र प्रिंटर में निम्न में से किस प्रकार के लेज़र का प्रयोग किया जाता है?  (वर्ष 2008)

(A) डाई लेज़र
(B) गैस लेज़र
(C) सेमीकंडक्टर लेज़र
(D) एक्सीमर लेज़र

 उत्तर: (C)

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