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बाढ़-सूखा और नदी जोड़ो परियोजना

  • 18 Jul 2019
  • 18 min read

संदर्भ

मानसून का दौर चल रहा है और देश के विभिन्न भागों में वर्षा हो रही है...कहीं कम, तो कहीं औसत और कहीं इतनी अधिक कि जल प्लावन की स्थिति बन गई है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार आने वाले समय में देश के उत्तरी राज्यों में वर्षा होती रहेगी, लेकिन देखने में आया है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र के भीतरी हिस्से, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मानसून एक समान नहीं रहा है। दूसरी ओर उत्तर-पूर्व और बिहार में हर वर्ष की तरह बाढ़ जैसे हालात बने हुए हैं। मानसून की यह असमान चाल कृषि क्षेत्र के लिये चिंताजनक है और साथ ही देश के बड़े बांधों में जल संचयन की दृष्टि से भी कोई अच्छा संकेत नहीं है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में पानी रेलगाड़ी के माध्यम से पहुँचाया जा रहा है, तो असम स्थित काज़ीरंगा नेशनल पार्क लगभग पूरा ही बाढ़ में डूब गया है। इन हालातों में नदी-जोड़ो का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा

मानसून के सीज़न में हर वर्ष देश के कुछ हिस्से बाढ़ में डूब जाते है तो कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात बने रहते हैं। एक ही राज्य के भीतर ऐसी स्थिति देखने को मिल जाती है। बिहार तथा महाराष्ट्र इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहाँ हर साल यही मंज़र देखने को मिलता है। उत्तर-पूर्व में असम और त्रिपुरा में हर वर्ष ब्रह्मपुत्र नदी तबाही मचाती है, तो दक्षिण में वर्षा का असमान वितरण देखने को मिलता है। बिहार में आने वाली बाढ़ के लिये नेपाल से छोड़े गए पानी को कारण माना जाता है। कारण चाहे कुछ भी रहे हों, मानसून की इस बेरुखी और वर्षा के असमान वितरण की वज़ह से ही नदी जोड़ो का मुद्दा चर्चा में आ जाता है।

जब यह सवाल उठता है कि क्या नदियों को जोड़ने से सूखे और बाढ़ का प्रभाव कम होगा? तो इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का सीधा जवाब होता है...हाँ, ऐसा होगा। परियोजना के गुण-दोषों पर बहस के बावजूद जल संसाधन मंत्रालय (अब जल शक्ति मंत्रालय) नदी-जोड़ो परियोजनाओं को लेकर बेहद सकारात्मक रवैया रखता है। मंत्रालय की ओर से कई बार संसद में यह कहा जा चुका है कि देश में जल प्रबंधन हेतु नदियों को आपस में जोड़ना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसी के मद्देनज़र जल-अधिशेष (Surplus Water) वाले बेसिन से जल की कमी वाले बेसिन में पानी स्थानांतरित करने के लिये अगस्त 1980 में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) तैयार की गई थी। NPP के तहत नदी-जोड़ो परियोजनाओं को इस तरह तैयार किया जाता है कि नदियों का बहुत कम पानी बिना उपयोग किये समुद्र में जाए तथा साथ ही कुछ हद तक बाढ़ और सूखे के प्रभाव को भी कम किया जा सके।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan-NPP)

देश की कुछ नदियों में आवश्यकता से अधिक पानी रहता है तथा अधिकांश नदियाँ ऐसी हैं जो बरसात के मौसम के अलावा वर्षभर सूखी रहती हैं या उनमें पानी की मात्रा बेहद कम रहती है। ब्रह्मपुत्र जैसी जिन नदियों में पानी अधिक रहता है, उनसे लगातार बाढ़ आने का खतरा बना रहता है। राष्ट्रीय नदी-जोड़ो परियोजना (NRLP) जल अधिशेष वाली नदी घाटी (जहाँ बाढ़ की स्थिति रहती है) से जल की कमी वाली नदी घाटी (जहाँ जल के अभाव या सूखे की स्थिति रहती है) में अंतर-घाटी जल अंतरण परियोजनाओं के माध्यम से जल के हस्तांतरण की परिकल्पना करती है। इसी को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) के रूप में जाना जाता है।

इसके तहत राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी नामक स्वायत्त संगठन का गठन किया गया। कुल मिलाकर परस्पर जोड़ने के लिये 30 नदियों की पहचान की गई थी। इनमें से 14 नदियाँ हिमालय क्षेत्र की थीं और 16 प्रायद्वीप का हिस्सा थीं। वर्ष 1980 में जो अनुमान लगाया गया था, उसके अनुसार इन संपर्क योजनाओं पर पाँच खरब रुपए की लागत आने की संभावना थी। इन योजनाओं से ढाई करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में सतही जल से सिंचाई होने का अनुमान लगाया गया था। साथ ही भू-जल स्तर में वृद्धि से एक करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होने का अनुमान गया था। इसके अलावा चार करोड़ किलोवाट विद्युत उत्पादन की संभावना व्यक्त की गई थी। पानी का अधिकांश बहाव गुरुत्व शक्ति के आधार पर होता, पम्पिंग के जरिये केवल 400 फीट पानी उठाना (Lift) पड़ता। लेकिन कई वज़हों से इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने में लंबा समय लग गया और परियोजना की गतिविधियाँ पृठभूमि में चली गईं।

नदी जोड़ो की अवधारणा

  • नदियों की धारा को मोड़ने यानी नदियों को जोड़ने का विचार कोई नया नहीं है। वर्ष 1858 में एक ब्रिटिश सैन्य इंजीनियर आर्थर थॉमस कॉटन ने बड़ी नदियों को नहरों के माध्यम से जोड़ने का प्रस्ताव दिया था ताकि ईस्ट इंडिया कंपनी को बंदरगाहों की सुविधा प्राप्त हो सके और दक्षिण-पूर्वी प्रांतों में बार-बार पड़ने वाले सूखे से निपटा जा सके।
  • तीन सरकारों में लगातार सिंचाई और बिजली मंत्री रह चुके कनूरी लक्ष्मण राव ने वर्ष 1972 में 2640 किमी. लंबी महत्त्वाकांक्षी नहर का प्रस्ताव दिया था, ताकि मॉनसून में पटना के करीब गंगा में आने वाली बाढ़ के पानी को दक्षिण में कावेरी तक पहुँचाया जा सके।
  • इसके दो साल बाद जल प्रबंधन विशेषज्ञ दिनशॉ जे. दस्तूर ने हिमालय और पश्चिमी घाटों में लंबी दूरी से सिंचाई के लिये आपस में जुड़ी हुई नहरों (Garland Canal) का एक तंत्र बनाने की सिफारिश की थी।

सर्वोच्च न्यायालय भी समर्थन में

27 फरवरी, 2012 को अपने एक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार, विशेषकर जल संसाधन मंत्रालय को जल संसाधन मंत्री की अध्यक्षता में नदियों को जोड़ने के कार्यक्रम के कार्यान्वयन हेतु एक समिति बनाने का निर्देश दिया था। इसके बाद केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री की अध्यक्षता में नदी-जोड़ो कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिये नदियों को जोड़ने हेतु विशेष समिति 23 सितंबर, 2014 को बनाई गई। यह विशेष समिति नदी-जोड़ो परियोजनाओं की रूपरेखा बनाते समय और उन्हें तैयार करते समय सभी हितधारकों के सुझावों तथा टिप्पणियों पर विचार करती है।

पक्ष में तर्क

  • भारत की मानसून आधारित कृषि अर्थव्यवस्था में मानसून की अनिश्चितता, मानसून आधिक्य या मानसून की कमी हर वर्ष बनी रहने वाली एक समस्या है। ऐसे में नदी-जोड़ो परियोजना द्वारा जलाधिक्य वाली नदियों के जल को जलाभाव वाले क्षेत्र की नदियों में लाया जा सकता है, जिससे सूखे व बाढ़ की स्थिति को टाला जा सकता है।
  • सिंचाई के लिये पर्याप्त पानी की उपलब्धता होने से कृषि पैदावार बढ़ेगी तथा इससे ग्रामीण गरीबी में भी कमी आएगी। इसके लिये बनाई जाने वाली नहरों का प्रयोग अंतर्देशीय परिवहन के लिये भी किया जा सकेगा।
  • नदी-जोड़ो परियोजना के समर्थक इसे पूरे देश के लिये लाभकारी मानते हैं, जिससे विविध उपयोगों के लिये पानी की उपलब्धता में वृद्धि होगी। एकीकृत ढंग से जल संसाधनों का विकास और इसके लिये लघु अवधि और दीर्घावधि के तमाम उपायों को अपनाया जाना समय की मांग है।
  • एक नदी घाटी से दूसरे नदी घाटी क्षेत्र में पानी पहुँचाने जैसी जल संसाधन परियोजनाएँ पानी की उपलब्धता के असंतुलन को दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं। जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रतिकूल प्रभावों के शमन में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

विरोध में तर्क

  • इस परियोजना को धरातल पर लाना आसान नहीं है क्योंकि इस परियोजना के तहत बनाए जाने वाली नहरों एवं जलाशयों के निर्माण से बड़ी मात्रा में निर्वनीकरण की स्थिति उत्पन्न होगी जो पर्यावरण व जैव-विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी।
  • साथ ही इससे बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन होगा जिनका पुनर्वास करना एक बड़ी चुनौती रहेगी। सबसे बड़ी बाधा इस परियोजना पर आने वाला अत्यधिक अनुमानित खर्च है, जिसकी व्यवस्था करना वर्तमान परिस्थितियों में सरकार के लिये संभव नहीं है।
  • जिन 30 नदियों का जिक्र NPP में किया गया है, उन्हें जोड़ने में आने वाली लागत वर्ष 1980 में 5 खरब रुपए आँकी गई थी। आज लगभग 40 वर्ष बाद इसकी सहज कल्पना की जा सकती है कि यह काम कितना अधिक खर्चीला है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, नदी जोड़ो परियोजना के प्रायद्वीपीय हिस्से पर ही अमल करना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि हिमालयी नदियों की परियोजनाओं पर अमल करने के लिये पड़ोसी देशों से सहमति और समझौते की ज़रूरत होगी, जबकि प्रायद्वीपीय हिस्से पर अमल के लिये केवल प्रभावित राज्यों और वहाँ के हितधारकों से ही परामर्श करना होगा।

वर्षा जल संचयन

यह देखते हुए कि नदी-जोड़ो परियोजना को व्यवहार्यता के धरातल पर उतारना आसान नहीं है, ऐसे में मानसून के मौसम में अन्य जल संग्रहण विधियों को अपनाकर बाढ़ व सूखे की स्थतियों से बचा जा सकता है। ऐसी ही एक तकनीक है वर्षा जल संचयन यानी रेन वाटर हार्वेस्टिंग। जल संचयन की इस प्रक्रिया के तहत वैज्ञानिक तरीके अपनाकर वर्षाजल को भविष्य के इस्तेमाल के लिये संचय किया जाता है। पानी के संग्रहण का यह तरीका काफी कम खर्चीला है। इसके लिये किसी विशेषज्ञता की ज़रूरत नहीं होती है तथा घरों की छतों पर या भूमिगत व्यवस्था कर वर्षाजल का संग्रह आसानी से किया जा सकता है। इस पद्धति में वर्षाजल संचयन के लिये अंडरग्राउंड वाटर टैंक का इस्तेमाल किया जाता है। इस पद्धति का इस्तेमाल गाँवों में भी सीमित स्तर पर घरेलू कार्य के लिये किया जा सकता है। वर्षाजल की गुणवत्ता अन्य सभी उपलब्ध जलस्रोतों से अच्छी होती है, अतः इस प्रक्रिया द्वारा संचयित जल का इस्तेमाल खाना बनाने अथवा पीने के लिये भी किया जा सकता है।

भूजल के दोहन हेतु संशोधित दिशा-निर्देश

राष्ट्रीय हरित अधिकरण के विभिन्न दिशा-निर्देशों का पालन करने और भूमिगत जल निकालने के संबंध में वर्तमान दिशा-निर्देशों में मौजूद विभिन्न कमियों को दूर करने के लिये केंद्रीय भूमिगत जल प्राधिकरण तथा संबद्ध मंत्रालय ने भूमिगत जल निकालने के लिये 12 दिसंबर, 2018 को संशोधित दिशा-निर्देश अधिसूचित किये थे, जो 1 जून, 2019 से प्रभावी हो गए।

जल संरक्षण शुल्क

इन संशोधित दिशा-निर्देशों का उद्देश्य देश में एक अधिक मजबूत भूमिगत जल नियामक तंत्र सुनिश्चित करना है। संशोधित दिशा-निर्देशों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता जल संरक्षण शुल्क की अवधारणा शुरू करना है। इस शुल्क का क्षेत्र की श्रेणी, उद्योग के प्रकार और भूमिगत जल निकालने की मात्रा के अनुसार अलग-अलग भुगतान करना होगा। जल संरक्षण शुल्क की उच्च दरों से उन इलाकों में नए उद्योगों को स्थापित करने से रोकने की कोशिश हो सकेगी जहाँ ज़मीन से अत्यधिक मात्रा में पानी निकाला जा चुका है। साथ ही यह उद्योगों द्वारा बड़ी मात्रा में भूमिगत जल निकालने के एक निवारक के रूप में काम करेगा। इस शुल्क से उद्योगों को पानी के इस्तेमाल के संबंध में उपाय करने और पैक किये हुए पीने के पानी की इकाईयों की वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकेगा।

अन्य प्रमुख प्रावधान

  • संशोधित दिशा-निर्देशों की अन्य प्रमुख विशेषताओं में उद्योगों द्वारा पुनर्चक्रण और शोधित सीवेज जल के इस्तेमाल, प्रदूषणकारी उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान करना, डिजिटल फ्लो मीटरों को लगाने की अनिवार्यता, उद्योगों द्वारा पानी का लेखा-जोखा रखने, कुछ विशेष उद्योगों को छोड़कर छत पर वर्षा के पानी को एकत्र करना अनिवार्य बनाना और प्रदूषणकारी उद्योगों/ परियोजनाओं के परिसरों में भूमिगत जल दूषित होने की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिये अपनाए जाने वाले उपायों को प्रोत्साहित करना शामिल है।
  • गौरतलब है कि भारत दुनिया में भूमिगत जल का सबसे बड़ा उपयोगकर्त्ता है जो हर वर्ष 253 बिलियन क्यूबिक मीटर भूमिगत जल निकालता है। यह दुनिया में ज़मीन से निकाले जाने वाले पानी का करीब 25 प्रतिशत है।

निष्कर्ष

नदी जोड़ो परियोजना एक बड़ी चुनौती तो है, साथ ही यह जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले जल संबंधी मुद्दों को हल करने का एक अवसर भी है। अतः इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है, लेकिन यह गंभीरता उस हद तक होनी चाहिये, जहाँ नुकसान कम और फायदे ज़्यादा हों। राजनीतिक कारणों से राज्य सरकारें अपने-अपने हितों से समझौता करने को तैयार नहीं होतीं। यही कारण है कि कई राज्यों के बीच पानी का झगड़ा अभी तक अनसुलझा ही है। वे दूसरे राज्यों को पानी देने को तैयार नहीं होते। सतलुज-यमुना और कावेरी जैसे जल विवाद तो शीर्ष न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बावज़ूद भी अनसुलझे पड़े हैं। इनमें से कई विवाद तो 50 वर्षों से भी अधिक समय से जारी हैं। यह देखते हुए कि नदियों में पानी की लगातार कमी होती जा रही है। शायद ही कोई राज्य अपने हिस्से का पानी किसी अन्य राज्य को देने को तैयार होगा।

अभ्यास प्रश्न: यदि सूखे व बाढ़ की आपदा से कुछ हद तक सुरक्षित करने का उपाय नदी-जोड़ो से संभव नहीं है, तो अन्य संभावित उपाय क्या हो सकते है?

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