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लोकसभा और राज्यसभा टीवी डिबेट

शासन व्यवस्था

NIA संशोधन विधेयक

  • 20 Jul 2019
  • 15 min read

संदर्भ

लोकसभा और राज्यसभा में चर्चा के बाद राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (संशोधन) विधेयक, 2019 (National Investigation Agency-NIA) पारित हो गया और राष्ट्रपति से अनुमोदित होने के बाद जल्द ही कानून का रूप ले लेगा। इस संशोधन विधेयक में NIA को भारत से बाहर अपराध के संबंध में मामले को दर्ज कर जाँच करने का प्रावधान किया गया है। इस विधेयक से NIA की जाँच का दायरा बढ़ाया जा सकेगा और यह विदेशों में भी भारतीय तथा भारतीय परिसंपत्तियों से जुड़े मामलों की जाँच कर सकेगी, साथ ही NIA को मानव तस्करी और साइबर अपराध से जुड़े विषयों की जाँच का अधिकार देने का प्रावधान भी विधेयक में किया गया है।

1. सूचीबद्ध अपराध (Scheduled Offences)

इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों की एक सूची बनाई गई है जिन पर NIA जाँच कर सकती है और मुकदमा चला सकती है। इस सूची में परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 (Atomic Energy Act) और गैर-कानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम, 1967 (Unlawful Activities Prevention Act) जैसे अधिनियमों के तहत सूचीबद्ध अपराध शामिल हैं।

यह अधिनियम NIA को निम्नलिखित अपराधों की जाँच करने की अनुमति देता है:

  • मानव तस्करी
  • जाली मुद्रा या बैंक नोटों से संबंधित अपराध
  • प्रतिबंधित हथियारों का निर्माण या बिक्री
  • साइबर आतंकवाद
  • विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 (Explosive Substances Act) के तहत अपराध

2. NIA का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction of the NIA)

  • NIA के अधिकारियों के पास पूरे देश में उपरोक्त अपराधों की जाँच करने के संबंध में अन्य पुलिस अधिकारियों के समान ही शक्तियाँ प्राप्त हैं।
  • NIA के पास भारत के बाहर घटित ऐसे सूचीबद्ध अपराधों की जाँच करने की शक्ति होगी, जो अंतर्राष्ट्रीय संधियों और अन्य देशों के घरेलू कानूनों के अधीन है।
  • केंद्र सरकार, NIA को भारत में घटित सूचीबद्ध अपराध के मामलों की जाँच के सीधे निर्देश दे सकेगी।
  • सूचीबद्ध अपराधों के मामले नई दिल्ली की विशेष अदालत के अधिकार क्षेत्र में आ जाएंगे।

3. विशेष न्यायालय (Special Courts)

  • यह अधिनियम सूचीबद्ध अपराधों की सुनवाई हेतु केंद्र सरकार को विशेष न्यायालयों का गठन करने की अनुमति देता है।
  • साथ ही इस विधेयक में यह भी कहा गया है कि केंद्र सरकार सूचीबद्ध अपराधों के संबंध में मुकदमा चलाने के लिये सत्र न्यायालय को विशेष न्यायालयों के रूप में नामित कर सकती है।
  • यदि केंद्र सरकार किसी सत्र न्यायालय को विशेष न्यायालय के रूप में नामित करना चाहती है तो पहले उसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेना आवश्यक है, जिसके तहत सत्र न्यायालय कार्यरत होता है।
  • यदि किसी क्षेत्र के लिये एक से अधिक विशेष न्यायालय नामित किये जाते हैं, तो वरिष्ठतम न्यायाधीश इन न्यायालयों के मध्य मामलों का वितरण करेगा।
  • इसके अलावा राज्य सरकारें भी सूचीबद्ध अपराधों की सुनवाई हेतु विशेष न्यायालयों के रूप में सत्र न्यायालयों को नामित कर सकती हैं।

संयुक्त जाँच की व्यवस्था

हाल ही में श्रीलंका में आतंकी हमला हुआ जिसमें भारतीय लोग भी मारे गए, बांग्लादेश में हुए आतंकी हमले में तथा अफगानिस्तान में समय-असमय होने वाले आतंकी हमलों में भी भारतीय लोग मारे जाते हैं। लेकिन देश से बाहर जाँच करने का अधिकार अब तक NIA के पास नहीं था। इस संशोधन द्वारा एजेंसी को यह अधिकार मिल जाएगा और इसके माध्यम से जिन देशों के साथ भारत की संधियाँ या समझौते हैं, वहाँ की सरकार की सहमति से ऐसी घटनाओं की संयुक्त जाँच करना संभव हो जाएगा।

NIA क्या है?

यह देश में आतंकवाद का मुकाबला करने के लिये भारत सरकार द्वारा गठित एक संघीय जाँच एजेंसी है। यह केंद्रीय आतंकवाद विरोधी कानून प्रवर्तन एजेंसी के रूप में कार्य करती है। इसे राज्यों से विशेष अनुमति लिये बिना राज्यों में आतंक संबंधी अपराधों से निपटने के लिये अधिकृत किया गया है। NIA 31 दिसंबर, 2008 को संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय जाँच एजेंसी अधिनियम, 2008 के लागू होने के साथ अस्तित्व में आई थी।

दरअसल, वर्ष 2008 में मुंबई पर हुए भीषण आतंकी हमले के बाद आतंकवाद का मुकाबला करने के लिये एक केंद्रीय एजेंसी की ज़रूरत महसूस की गई और NIA का गठन हुआ। आतंकी हमलों की घटनाओं, आतंकवाद के वित्तपोषण एवं आतंक संबंधित अन्य अपराधों का अन्वेषण करने के लिये गठित NIA के संस्थापक महानिदेशक राधा विनोद राजू थे।

  • NIA के प्रमुख उद्देश्य
  • राष्ट्रीय जाँच एजेंसी का लक्ष्य एक ऐसी बेहतरीन जाँच व्यवस्था बनाना है जो सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर आधारित हो।
  • NIA का उद्देश्य उच्च स्तर पर प्रशिक्षित, साझेदारी उन्मुख कार्यबल बनाकर आतंकवाद और राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा संबंधी अन्य जाँचों में उत्कृष्टता के मानक स्थापित करना है।
  • NIA का उद्देश्य मौजूदा और संभावित आतंकवादी समूहों/व्यक्तियों पर लगाम लगाना है।
  • इसके अलावा आतंकवाद से जुड़ी सूचनाओं/जानकारियों का डेटाबेस विकसित करना भी इसके उद्देश्यों में शामिल है।

NIA के प्रमुख लक्ष्य

  • NIA को सौंपे गए सभी मामलों जाँच करने के लिये जाँच के नवीनतम वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करना और उच्च मानक स्थापित करने के लिये अनुसूचित अपराधों की गहराई से पेशेवराना जाँच करना।
  • प्रभावी और शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित करना।
  • पूर्णतः पेशेवर, परिणामोन्मुखी संगठन के रूप में काम करना, भारत के संविधान के तहत प्रचलित कानूनों को प्रमुखता देते हुए मानवाधिकारों की सुरक्षा और व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करना।
  • नियमित अभ्यास और सर्वोत्तम प्रथाओं एवं प्रक्रियाओं के माध्यम से एक पेशेवर कार्यबल विकसित करना।
  • सौंपे गए कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हुए वैज्ञानिक रुझान और प्रगतिशील भावना प्रदर्शित करना।
  • एजेंसी की गतिविधियों के हर क्षेत्र में आधुनिक तरीकों और नवीनतम प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करना।
  • NIA अधिनियम के कानूनी प्रावधानों का अनुपालन करने के दौरान राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों तथा अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ पेशेवर और सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाए रखना।
  • आतंकवादी मामलों की जाँच में सभी राज्यों और अन्य जाँच एजेंसियों की सहायता करना।
  • आतंकवाद से संबंधित सभी सूचनाओं का डेटाबेस बनाना और राज्यों तथा अन्य एजेंसियों के साथ उपलब्ध डेटाबेस को साझा करना।
  • अन्य देशों में आतंकवाद से संबंधित कानूनों का अध्ययन और विश्लेषण करना तथा नियमित रूप से भारत में मौजूदा कानूनों की पर्याप्तता का मूल्यांकन करना और आवश्यकतानुसार परिवर्तनों के लिये प्रस्ताव पेश करना।

एक समय में आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1987 आतंकवाद और संगठित अपराध के मामलों में इस्तेमाल होने वाला मुख्य कानून था। इसके बाद टाडा और पोटा जैसे विवादास्पद कानून आए और अब राष्ट्रीय जाँच एजेंसी कानून। इन सभी कानूनों के साथ जो बात समान रही, वह है इनका दुरुपयोग होने की आशंका।

आतंकवाद पर लगाम कसने के लिये बने थे टाडा और पोटा कानून

आतंकवाद की रोकथाम के लिये आतंकवादी एवं विध्वंसकारी गतिविधियाँ निरोधक कानून (Terrorist And Disruptive Act-TADA) 1985 से 1995 के बीच लागू था। इसे सर्वप्रथम अध्यादेश के ज़रिये लागू किया गया था। पंजाब में बढ़ते आतंकवाद के चलते सुरक्षा बलों को विशेषाधिकार देने के लिये इसे कानून बना दिया गया था। शुरुआत में इसे लागू किये जाने के केवल दो वर्षों तक पंजाब और उसके सीमावर्ती राज्यों में जारी रहना था, लेकिन बाद में टाडा को और अधिक कठोर और व्यापक बनाते हुए इसकी अवधि को वर्ष 1987 और वर्ष 1993 में बढ़ाया गया। इस कानून ने आतंकवाद से लड़ने के लिये शासनात्मक सत्ता की शक्तियों में वृद्धि की तथा टाडा मामलों के संदिग्ध अपराधियों के मुकदमों के लिये विशेष मनोनीत न्यायालयों को बनाने हेतु प्रावधान बनाए।

टाडा में आतंकवाद की परिभाषा, संदिग्धों की गिरफ्तारी, ज़मानत, रिमांड इत्यादि के संबंध में विशेष प्रावधान किये गए थे। इसका एक विवादास्पद प्रावधान जाँच से पहले की रिमांड अवधि को एक साल के लिये बढ़ाने को लेकर था। इसकी परिधि में गिरफ्तार लोगों के लिये ज़मानत को मुश्किल बना दिया गया था।

इस कानून के प्रावधान का महत्त्वपूर्ण पक्ष पुलिस के सामने इकबालिया ज़ुर्म को जाँच के दौरान साक्ष्य के तौर पर मान लेना था। इस कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, लेकिन न्यायालय ने इसे संवैधानिक रूप से सही ठहराया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उक्त विधि की कार्यपद्धति की समीक्षा करते हुए सुझाव दिया कि इसे रद्द कर दिया जाना चाहिये क्योंकि इसमें ऐसे कठोर प्रावधान किये गए थे, जिसमें गंभीर रूप से प्रामाणिक कानूनी मानकों से समझौता किया गया था। तमाम विरोधों के बीच टाडा कानून वर्ष 1995 में खत्म हो गया।

टाडा तो खत्म हो गया, लेकिन आतंकवाद और उग्रवाद जस-का-तस बना रहा। ऐसे में कंधार विमान अपहरण तथा संसद पर हुए आतंकी हमले के मद्देनज़र टाडा जैसे कड़े कानून की ज़रूरत फिर महसूस हुई और अप्रैल 2002 में आतंकवादी गतिविधि रोकथाम कानून (Prevention of Terrorism Act) बनाया गया। इस कानून में भी कड़े प्रावधान किये गए थे। इसके तहत ऐसी कोई भी कार्रवाई जिसमें हथियारों या विस्फोटक का इस्तेमाल हुआ हो अथवा जिसमें किसी की मौत हो जाए या कोई घायल हो जाए आतंकवादी कार्रवाई मानी जाती थी। इनके अलावा ऐसी कोई भी गतिविधि जिससे किसी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा हो या सरकारी सेवाओं में बाधा आई हो या फिर उससे देश की एकता और अखंडता को खतरा हो, वह भी इसी श्रेणी में आती थी। पोटा के तहत गिरफ्तारी केवल शक के आधार पर की जा सकती थी। इस कानून में पुलिस को यह भी अधिकार दिया गया था कि वह बिना वारंट के किसी की भी तलाशी ले सकती थी और टेलीफोन तथा अन्य संचार सुविधाओं पर नज़र रखने का प्रावधान भी इस कानून में था। वर्ष 2004 में केंद्र में नई सरकार आने के बाद पोटा कानून को निरस्त कर दिया गया।

NIA ने देश को सुरक्षित स्‍थान बनाने और वैश्विक आतंकवाद के हमलों से भारत की रक्षा करने में महत्‍वपूर्ण भू‍मिका निभाई है और लगातार आतंकवाद से उत्‍पन्‍न खतरे पर अंकुश लगाने के कार्य में लगा हुआ है। NIA ने हाल ही में पड़ोसी देश और विदेश में तीसरे देशों में मौजूद उनके साथियों द्वारा कश्‍मीर घाटी में आतंकवादियों को सहायता पहुँचाने के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। अब सरकार ने जाँच में NIA को पूर्ण स्‍वायत्तता देने तथा इसे और प्रभावी बनाने के लिये कानून में संशोधन किया है।

अभ्यास प्रश्न: “आतंकवाद सभ्‍य समाज के लिये अभिशाप और दुनियाभर के लोकतंत्रों में विकास के प्रयासों में बाधक है।” तर्क सहित कथन का विश्लेषण कीजिये।

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