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भारतीय अर्थव्यवस्था

विद्युत अधिनियम मसौदा बिल 2020

  • 29 Apr 2020
  • 17 min read

संदर्भ: 

हाल ही में केंद्र सरकार ने देश के विद्युत क्षेत्र में बड़े सुधार करने के उद्देश्य से ‘विद्युत अधिनियम (संशोधन) विधेयक, 2020’ के मसौदे को मंजूरी दे दी है। इस मसौदे में शामिल सुधारों में सब्सिडी वितरण हेतु ‘प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण’ (Direct Benefit Transfer- DBT) की प्रणाली का प्रयोग, विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) की वैधता, लागत आधारित दर, विद्युत अनुबंध प्रवर्तन प्राधिकरण की स्थापना और नियामकीय व्यवस्था को मजबूत बनाना आदि प्रमुख हैं। साथ ही इस मसौदे में विद्युत अधिनियम के प्रावधानों और आयोग के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु अधिनियम में जुर्माने से जुड़ी धाराओं में आवश्यक संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।

 

पृष्ठभूमि : 

  • वर्ष 1980 के बाद से भारतीय कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र में बिजली की खपत में लगातार वृद्धि हुई है। 
  • वर्तमान में कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में प्रदान की जाने वाली बिजली पर बड़ी मात्रा में सब्सिडी दी जाती है। 
  • विद्युत सब्सिडी के कारण प्रतिवर्ष सरकार को लगभग 80,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त आर्थिक भार वहन करना पड़ता है। 
  • वर्ष 2003 में केंद्र सरकार द्वारा लागू ‘विद्युत अधिनियम, 2003’ के माध्यम से भारतीय विद्युत् क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करने के प्रयास किये गए। 
  • पिछले कई वर्षों से समस्याओं के समाधान के अभाव में भारतीय विद्युत क्षेत्र लगातार घाटे में रहने के साथ ही उपभोक्ताओं की ज़रूरतों के अनुरूप सेवाएँ उपलब्ध कराने में असफल रहा है।     
  • केंद्रीय सरकार वर्ष 2014 से अब तक ‘विद्युत अधिनियम (संशोधन) विधेयक’ के संदर्भ में चार मसौदे प्रस्तुत कर चुकी है।
  • वर्ष 2014 के मसौदे के तहत उपभोक्ताओं को मोबाईल सेवाओं की तरह अपने विद्युत सेवा प्रदाता को बदलने का विकल्प दिया गया था।
  • ‘विद्युत अधिनियम (संशोधन) विधेयक’ का दूसरा और तीसरा मसौदा क्रमशः वर्ष 2018 और वर्ष 2019 में प्रस्तुत किया गया था।

विद्युत क्षेत्र की वर्तमान समस्याएँ:  

  • अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि कार्य में विद्युत आपूर्ति के लिये मीटर (Electricity Meter) न होने के कारण ऐसे क्षेत्रों में विद्युत खपत के संदर्भ में विस्तृत आँकड़ों की अनुपलब्धता एक बड़ी समस्या है।
  • कृषि में विद्युत सब्सिडी के कारण राज्य सरकारों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है और यह आर्थिक दबाव विद्युत क्षेत्र के विकास की सबसे बड़ी बाधा रही है, साथ ही वितरक कंपनियों को समय पर भुगतान न मिलने के कारण कंपनियों की स्थिति खराब हुई है।  
  • बेहतर तकनीक एवं उपकरणों के नवीनीकरण के न होने के कारण उत्पादन केंद्रों से उपभोक्ताओं तक विद्युत् वितरण के दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा की हानि एक बड़ी समस्या है।    
  • सरकार पर सब्सिडी के दबाव को कम करने के लिये क्रॉस-सब्सिडी (Cross Subsidy) जैसी नीतियों को अपनाने से औद्योगिक क्षेत्र पर नकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं।   

क्रॉस-सब्सिडी (Cross Subsidy): किसी एक वर्ग या समूह को कम दरों पर सेवाएँ या उत्पाद उपलब्ध करने के लिये किसी दूसरे समूह से अधिक/अतरिक्त शुल्क वसूल करने की प्रक्रिया क्रॉस सब्सिडी कहलाती है। भारत में कृषि क्षेत्र या कुछ अन्य वर्गों को कम दरों पर बिजली उपलब्ध कराने के लिये औद्योगिक क्षेत्र को दी जाने वाली बिजली पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है।

प्रस्तावित सुधार:  

1. लागत आधारित दर और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण:

  • सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, नियामक विद्युत उत्पादन और उसके वितरण की लागत के आधार पर विद्युत दरों का निर्धारण करेंगे, नियामकों द्वारा निर्धारित दरों में सब्सिडी को शामिल नहीं किया जाएगा। 
  • किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से सीधे उनके खाते में सब्सिडी प्रदान की जाएगी।  

2. नियामकीय व्यवस्था को मजबूत बनाना:

  • अपीलीय न्यायाधिकरण को मज़बूत बनाना:  इस मसौदे में अध्यक्ष के अतिरिक्त अपीलीय न्यायाधिकरण की क्षमता को 7 सदस्यों तक बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। जिससे मामलों के त्वरित निस्तारण हेतु कई पीठों की स्थापना की जा सके, साथ ही न्यायाधिकरण के फैसलों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिये इसे और अधिक सशक्त बनाने का प्रस्ताव भी  किया गया है।
  • कई चयन समितियों की व्यवस्था खत्म: 
    • वर्तमान विद्युत अधिनियम के तहत केंद्रीय और राज्य आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिये कई चयन समितियों का गठन करना पड़ता है।
    • इस मसौदे में केंद्र और राज्य आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों की नियुक्ति हेतु एक चयन समिति की व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है। 
    • साथ ही केंद्र और राज्य विद्युत विनियामक आयोगों के अध्यक्षों और अन्य सदस्यों की नियुक्ति हेतु सामान पात्रता मानदंडों को स्थापित करने का प्रस्ताव किया गया है।
  • जुर्माना: इस मसौदे में विद्युत अधिनियम के प्रावधानों और आयोग के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दंडात्मक कार्रवाई के रूप में अधिक जुर्माना लगाए जाने हेतु विद्युत अधिनियम की धारा 142 और 146 में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।

3. विद्युत अनुबंध प्रवर्तन प्राधिकरण की स्थापना (Electricity Contract Enforcement Authority): 

  • इस मसौदे में उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक ‘केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण’ की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है। 
  • इस प्राधिकरण के पास विद्युत उत्पादन और वितरण से जुड़ी हुई कंपनियों के बीच बिजली की खरीद, बिक्री या हस्तांतरण से संबंधित अनुबंधों की लागू करने के लिये दीवानी अदालत (Civil Court) के बराबर अधिकार होंगे।

4. अक्षय ऊर्जा और पनबिजली: 

  • केंद्र सरकार ने देश में ऊर्जा के अक्षय स्रोतों से बिजली के उत्पादन के आवश्यक क्षमता विकास और प्रोत्साहन के लिये एक राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा नीति’ (National Renewable Energy Policy) के निर्माण का प्रस्ताव किया है। 
  • इस मसौदे में आयोग को विद्युत वितरकों द्वारा अनिवार्य रूप से अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बिजली की खरीद की एक न्यूनतम मात्रा निर्धारित करने का प्रस्ताव किया गया है। साथ ही अक्षय ऊर्जा स्रोतों से न्यूनतम बिजली खरीदने की बाध्यता न पूरी करने पर जुर्माना लगाने का प्रस्ताव भी किया गया है। 

5. सीमा पार विद्युत व्यापार: इसके तहत मसौदे में भारत तथा अन्य देशों के बीच बिजली व्यापार को बढ़ावा देने तथा इसे और अधिक आसान बनाने के लिये आवश्यक प्रावधानों को प्रस्तावित किया गया है। 

6. फ्रेंचाइजी और उप- वितरण लाइसेंस:  

  • केंद्र सरकार ने इस मसौदे में राज्यों में विद्युत वितरण कंपनियों को किसी क्षेत्र विशेष में विद्युत् वितरण के लिये फ्रेंचाइजी और उप- वितरण कंपनियों को जोड़ने का अधिकार देने का प्रस्ताव किया है। 

मसौदे में शामिल प्रस्तावों के लाभ: 

  • ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और सामान्य उपभोक्ताओं के लिये बिजली उपलब्ध कराने के लिये अलग-अलग सप्लाई लाइनों के न होने से राज्य सरकारों को वितरण कंपनियों को अधिक सब्सिडी देने पर विवश होना पड़ा है।
  • विद्युत सब्सिडी के भुगतान हेतु ‘प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण’ की प्रक्रिया अपनाने से किसान या अन्य पात्र लोगों को सहायता सुनिश्चित करने के साथ ही सरकार के आर्थिक बोझ को कम करने में मदद मिलेगी।
  • कृषि क्षेत्र में उपभोगताओं के लिये मीटर अनिवार्य करने से किसानों को बिजली और जल के अनियंत्रित दोहन के संदर्भ में जागरूक किया जा सकेगा साथ ही बिजली चोरी की घटनाओं को नियंत्रित कर बिजली खपत की बेहतर निगरानी की जा सकेगी।  
  • विश्व बैंक (World Bank) के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 में G-20 समूह में देशों की जीडीपी विकास दर में वृद्धि का सीधा संबंध उनकी विद्युत खपत में देखा गया था, भारत इस सूची में विद्युत खपत और जीडीपी वृद्धि दर के मामले में सबसे निचले स्थान पर रहा।   
  • पिछले कुछ वर्षों में वैश्वीकरण और देश में विदेशी कंपनियों के आने से औद्योगिक क्षेत्र की स्थानीय इकाइयों पर प्रतिस्पर्द्धा का दबाव बढ़ा है, ऐसे में क्रॉस सब्सिडी को कम करने से औद्योगिक क्षेत्र पर पड़ने वाले वाले अतिरिक्त दबाव को कम किया जा सकेगा।    
  • देश के कई क्षेत्रों में वर्तमान ज़रूरतों के अनुसार विद्युत विभाग में  नवीनीकरण न होने या अन्य कारणों से से एक बड़े क्षेत्र को सेवाएँ उपलब्ध कराना एक चुनौती है। ऐसे में फ्रेंचाइजी और ‘उप- वितरक लाइसेंस’ देने के माध्यम से निजी क्षेत्र को जोड़कर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।  
  • देश के विद्युत क्षेत्र के विकास के संदर्भ में एक मज़बूत राष्ट्रीय नीति और राज्यों के बीच परस्पर समन्वय का अभाव कई केंद्रीय योजनाओं की असफलता और इस क्षेत्र के विकास में एक बड़ी बाधा रहा है। उदाहरण के लिये- वर्ष 2015 में केंद्र सरकार द्वारा लागू ‘उदय’ {उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (Ujwal DISCOM Assurance Yojana-UDAY)} जहाँ कुछ राज्यों में सफल रही वहीं कुछ अन्य राज्यों में वित्तीय अनुशासन के भाव में इस योजना के बावज़ूद विद्युत् क्षेत्र के घाटे में वृद्धि देखने को मिली।   
  • ऐसे में ‘केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण’ की स्थापना के माध्यम से विद्युत क्षेत्र में योजनाओं के क्रियान्वयन और उनकी बेहतर निगरानी में सहायता प्राप्त होगी।

चुनौतियाँ 

  • कृषि क्षेत्र में विद्युत सब्सिडी के लिये प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की प्रक्रिया अपनाने से उपभोक्ताओं को सब्सिडी मिलने से पहले सामान्य (महँगी) दरों पर बिल देना होगा, कई छोटे किसानों के लिये यह एक समस्या का कारण बन सकती है। 
  • किसी तकनीकी खराबी या अन्य कारणों से सही समय पर सब्सिडी का भुगतान न होने पर उपभोक्ताओं पर दबाव बढ़ेगा।
  • ‘केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण’ की स्थापना से राज्य विद्युत नियामक आयोग की शक्तियों में कमी आएगी ऐसे में राज्य सरकारों को इस मुद्दे पर सहमत करना कठिन होगा।
  • वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था पर COVID-19 के प्रभाव के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों में सरकारी सहायता की मांग बढ़ी है, ऐसे में विद्युत क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा देने से सरकार को विरोध का सामना करना पड़ सकता है।     

आगे की राह: 

  • वर्तमान समय में कृषि और औद्योगिक क्षेत्र के विकास को सुनिश्चित करने के लिये आसान दरों पर बिजली की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना बहुत ही आवश्यक है।  
  • वितरक कंपनियों के लिये कृषि क्षेत्र में विद्युत वितरण को किफायती बनाने और कंपनियों के घाटे को कम करने हेतु किसानों को मीटर और ‘प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण’ के बारे में जागरूक किया जाना चाहिये।
  • कृषि के लिये अलग फीडर और सोलर पंप के माध्यम से अत्यधिक विद्युत खपत के दबाव को कम किया जा सकता है।
  • विद्युत वितरण के दौरान होने वाली विद्युत हानि ‘ट्रांसमिशन लॉस’ (Transmission Loss) को कम करने के लिये आवश्यक तकनीकी बदलाव किये जाने चाहिये।   
  • विद्युत क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिये केंद्र व राज्य सरकारों तथा सभी राजनीतिक दलों एवं अन्य हितधारकों के बीच एक सकारात्मक राजनीतिक संवाद का होना बहुत ही आवश्यक है।     

अभ्यास प्रश्न: पिछले कई वर्षों से भारतीय विद्युत क्षेत्र राज्य सरकारों के लिये एक बड़े वित्तीय घाटे का कारण बना रहा है। भारतीय विद्युत क्षेत्र के संकट के कारणों की समीक्षा करते हुए इसके समाधान के विकल्पों की चर्चा कीजिये।

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