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मासिक धर्म अवकाश संबंधी नीति पर कर्नाटक उच्च न्यायालय

  • 17 Apr 2026
  • 14 min read

स्रोत: द हिंदू 

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को मासिक धर्म अवकाश संबंधी नीति को सख्ती से और ईमानदारी से लागू करने का निर्देश दिया है, जो मासिक धर्म स्वास्थ्य को गरिमा, समानता और मौलिक अधिकारों के मामले के रूप में सुदृढ़ करता है।

  • अनिवार्य कार्यान्वयन: राज्य को 18-52 वर्ष की आयु की महिला कर्मचारियों के लिये प्रति माह एक दिन का अवकाश देने वाली मासिक धर्म अवकाश (ML) संबंधी नीति को समान रूप से लागू करना चाहिये, जब तक कि कर्नाटक मासिक धर्म अवकाश और स्वच्छता विधेयक, 2025 औपचारिक रूप से अधिनियमित नहीं हो जाता।
    • न्यायालय ने ज़ोर दिया कि जागरूकता एवं सुगमकारी तंत्रों को संगठित प्रतिष्ठानों (जैसे– कारखाना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत पंजीकृत) से परे विस्तारित किया जाना चाहिये ताकि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, जैसे– दैनिक मज़दूरी करने वाले श्रमिकों को सक्रिय रूप से सम्मिलित किया जा सके।
    • उच्च न्यायालय ने माना कि महिलाओं के स्वास्थ्य और शारीरिक स्वायत्तता में जैविक अंतरों को पहचानना समता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता है।
      • इसके बजाय यह केवल "औपचारिक समानता" से परे वास्तविक समानता प्रदान करता है, जो महिलाओं की विशिष्ट जैविक आवश्यकताओं के कारण होने वाले "संरचनात्मक बहिष्कार" को संबोधित करता है।
  • जीवन और गरिमा का अधिकार: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने माना कि एक महिला का मासिक धर्म स्वास्थ्य अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार से अंतर्निहित रूप से जुड़ा हुआ है।
    • उच्च न्यायालय का यह रुख डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य (2026) में सर्वोच्च न्यायालय के महत्त्वपूर्ण निर्णय को प्रतिध्वनित करता है, जिसने आधिकारिक तौर पर मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता (MHH) को अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान की।

और पढ़ें: महिलाओं के लिये मासिक धर्म अवकाश का मुद्दा 

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