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भारत में राज्यपाल और उपराज्यपाल की नियुक्ति

  • 06 Mar 2026
  • 79 min read

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के राज्यपालों और उपराज्यपालों की नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर फेरबदल की घोषणा की।

  • तमिलनाडु के पूर्व राज्यपाल आर.एन. रवि को पश्चिम बंगाल का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
  • तरनजीत सिंह संधू को दिल्ली का नया उपराज्यपाल (LG) नियुक्त किया गया है।

राज्यपाल की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया क्या है?

  • अनुच्छेद 153 (राज्यों के राज्यपाल): इसमें यह अनिवार्य किया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिये एक राज्यपाल होना चाहिये। 
  • वर्ष 1956 के 7वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने एक ही व्यक्ति द्वारा एक साथ कई राज्यों के लिये राज्यपाल की नियुक्ति को सुगम बनाया।

  • अनुच्छेद 154 (राज्य की कार्यकारी शक्ति): राज्य की कार्यकारी शक्ति आधिकारिक तौर पर राज्यपाल में निहित है। 

  • अनुच्छेद 155 (राज्यपाल की नियुक्ति): राज्यपाल की नियुक्ति प्रत्यक्ष रूप से भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। 
    • राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर वाले एक वारंट द्वारा औपचारिक रूप से की जाती है। यह प्रक्रिया राज्यपाल को केंद्र सरकार के नामित व्यक्ति के रूप में स्थापित करती है।
  • अनुच्छेद 156 (कार्यकाल): राज्यपाल भारत के राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यंत' पद धारण करते हैं।
    • संविधान में राज्यपाल को पद से हटाने के लिये कोई आधार निर्दिष्ट नहीं है। राष्ट्रपति किसी भी समय राज्यपाल को पद से हटा सकते हैं या उनका तबादला कर सकते हैं।
      • राष्ट्रपति की इच्छा के अधीन, राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल पदभार ग्रहण करने की तिथि से पाँच वर्ष का होता है। पाँच वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद भी राज्यपाल तब तक पद पर बने रहेंगे जब तक कि उनका उत्तराधिकारी औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण नहीं कर लेता।
      • राज्यपाल अपना इस्तीफा स्वहस्तलिखित पत्र के माध्यम से सीधे भारत के राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए दे सकता है।
  • अनुच्छेद 157 (नियुक्ति के लिये योग्यता): व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिये और उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी होनी चाहिये।
    • अनुच्छेद 158 (पद की शर्तें): राज्यपाल संसद के किसी भी सदन (राज्य परिषद या लोकसभा) या राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य नहीं हो सकता। 

    • यदि किसी मौजूदा सदस्य को नियुक्त किया जाता है, तो राज्यपाल का पदभार ग्रहण करने के दिन से ही कानूनी रूप से यह माना जाता है कि उन्होंने अपना पद खाली कर दिया है।
    • राज्यपाल को किसी भी अन्य लाभ का पद धारण करने से सख्ती से प्रतिबंधित किया गया है।
    • राज्यपाल को वह वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं जो भारत की संसद द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त, उन्हें बिना किराए के आधिकारिक आवास का अधिकार भी होता है।
      • जब कोई व्यक्ति दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में कार्य करता है, तो उसके वित्तीय भत्तों का बँटवारा संबंधित राज्यों के बीच राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निर्धारित अनुपात में किया जाता है।
      • इसके अलावा, राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान इन वेतन और भत्तों में कटौती नहीं की जा सकती है।
  • अनुच्छेद 159 (शपथ या प्रतिज्ञान): पद ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल को यह शपथ या प्रतिज्ञान लेना होता है कि वे अपने पद का निष्ठापूर्वक निर्वहन करेंगे, संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण एवं रक्षा करेंगे तथा राज्य की जनता की सेवा और कल्याण में स्वयं को समर्पित करेंगे।
    • यह शपथ संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा उनकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है।
  • स्थापित परंपराएँ:
    • बाहरी व्यक्ति का सिद्धांत (Outsider Rule): किसी राज्य का राज्यपाल सामान्यतः उस राज्य का निवासी नहीं होता, बल्कि दूसरे राज्य से नियुक्त किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य राज्यपाल की तटस्थता बनाए रखना और उन्हें स्थानीय राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखना है।
    • मुख्यमंत्री से परामर्श: नियुक्ति से पहले राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श किये जाने की अपेक्षा की जाती है, ताकि संवैधानिक व्यवस्था का सुचारु संचालन सुनिश्चित हो सके। हालाँकि व्यवहार में इस परंपरा का अक्सर पालन नहीं किया जाता है।

उपराज्यपाल की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया क्या है?

  • अनुच्छेद 239: राज्यपालों (जिनका प्रावधान संविधान के भाग VI में किया गया है) के विपरीत, केंद्रशासित प्रदेशों का प्रशासन संविधान के भाग VIII (अनुच्छेद 239 से 241) के अंतर्गत वर्णित है।
    • संविधान का अनुच्छेद 239 यह प्रावधान करता है कि प्रत्येक केंद्रशासित प्रदेश का प्रशासन भारत के राष्ट्रपति द्वारा उनके द्वारा नियुक्त एक ‘प्रशासक’ के माध्यम से किया जाएगा, जिसे राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किसी भी पदनाम से संबोधित किया जा सकता है।
  • पदनाम: राष्ट्रपति निम्नलिखित प्रशासक का पदनाम निर्दिष्ट करते हैं। 
    • पाँच केंद्रशासित प्रदेशों (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, पुडुचेरी, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह) में उन्हें उपराज्यपाल (LG) के रूप में नामित किया गया है।
    • चंडीगढ़, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में उन्हें केवल ‘प्रशासक’ कहा जाता है।
  • अनुच्छेद 239AA: यह विशेष रूप से निर्देश देता है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) के प्रशासक को 'उपराज्यपाल' (Lieutenant Governor) के रूप में नामित किया जाएगा।
  • नियुक्ति प्रक्रिया: उपराज्यपाल की नियुक्ति प्रत्यक्ष रूप से भारत के राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर (Warrant under hand and seal) के माध्यम से की जाती है।
    • चूँकि राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोग केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह (अनुच्छेद 74) पर करते हैं, इसलिये उपराज्यपाल का चयन और सिफारिश प्रभावी रूप से केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
  • कार्यकाल और पदच्युति: एक राज्य के राज्यपाल की तरह उपराज्यपाल राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यंत' पद धारण करते हैं।
    • संविधान में उपराज्यपाल को पद से हटाने के आधारों का उल्लेख नहीं है। केंद्र सरकार के पास राष्ट्रपति को किसी भी समय उपराज्यपाल का स्थानांतरण करने, उन्हें हटाने या उनसे इस्तीफा मांगने की सलाह देने का अधिकार है।

भारत में राज्यपाल चुने जाने के बजाय नियुक्त क्यों किये जाते हैं?

  • संघर्ष की रोकथाम: संविधान निर्माण के दौरान संविधान सभा ने एक निर्वाचित राज्यपाल (अमेरिकी मॉडल) के बजाय एक मनोनीत राज्यपाल (कनाडाई मॉडल) को चुना।
    • एक निर्वाचित राज्यपाल निर्वाचित मुख्यमंत्री से टकराव उत्पन्न कर सकता है, जिससे समानांतर शक्ति केंद्र और संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न हो सकता है।
  • नाममात्र प्रमुख: चूँकि राज्य एक संसदीय प्रणाली का पालन करता है जहाँ मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यपालक होता है, एक नाममात्र प्रमुख के लिये राज्यव्यापी चुनाव पर धन और ऊर्जा खर्च करना अनावश्यक समझा गया।
  • राष्ट्रीय एकता: एक मनोनीत राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है, जो राष्ट्रीय स्थिरता और एकीकरण सुनिश्चित करने में मदद करता है।
  • कार्यालय की तटस्थता का संरक्षण: एक निर्वाचित राज्यपाल को राज्यव्यापी चुनाव जीतने के लिये अनिवार्य रूप से किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ना होगा या पार्टी तंत्र पर निर्भर रहना होगा।
    • यह एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में कार्य करने की उसकी क्षमता से समझौता करेगा, विशेष रूप से राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे महत्त्वपूर्ण समय के दौरान।

राज्यपाल की नियुक्ति के संबंध में मुख्य सिफारिशें

  • सरकारिया आयोग (1983): नियुक्त व्यक्ति राज्य के बाहर का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होना चाहिये। वह राजनीति में सक्रिय नहीं होना चाहिये।
    • नियुक्ति करने से पहले राज्य के मुख्यमंत्री, भारत के उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष से परामर्श करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य बनाया जाना चाहिये।
    • सिफारिश की कि राज्यपालों को दुर्लभ और अपरिहार्य परिस्थितियों को छोड़कर, उनके पाँच वर्ष के कार्यकाल के पूरा होने से पहले नहीं हटाया जाना चाहिये।
  • पुंछी आयोग (2007):  संविधान से ‘राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत’ वाक्यांश को हटाने की सिफारिश।
    • सिफारिश की कि एक राज्यपाल को केवल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से निष्कासित किया जाना चाहिये (राष्ट्रपति के महाभियोग प्रक्रिया के समान)।
  • वेंकटचेलैया आयोग (2002): सिफारिश की कि राज्यपालों को सामान्यतः अपना पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा करना चाहिये और यदि पहले निष्कासित किया जाता है, तो केंद्र सरकार को संबंधित मुख्यमंत्री से परामर्श करना चाहिये

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. राज्यपाल की नियुक्ति और भूमिका से कौन-से संवैधानिक अनुच्छेद संबंधित हैं?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 153 से 159 राज्यपाल की नियुक्ति, शक्तियों, योग्यताओं और शपथ की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं।

2. भारत में किसी राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है?
अनुच्छेद 155 के तहत भारत का राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत वारंट के माध्यम से राज्यपाल की नियुक्ति करता है।

3. भारत में एक राज्यपाल का कार्यकाल कितना होता है?
अनुच्छेद 156 के अनुसार, राज्यपाल सामान्यतः पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा करता है, लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।

4. राज्यपाल की नियुक्ति में "बाहरी व्यक्ति का नियम" क्या है?
यह एक परंपरा है कि राजनीतिक तटस्थता बनाए रखने के लिये राज्यपाल की नियुक्ति संबंधित राज्य के बाहर से की जानी चाहिये।

5. राज्यपाल के निष्कासन के संबंध में क्या सुधार सुझाए गए हैं?
पुंछी आयोग (2007) ने "राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत" राज्यपाल के निष्कासन की सिफारिश की और राज्य विधानमंडल के एक प्रस्ताव के माध्यम से निष्कासन का सुझाव दिया।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. किसी राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में कोई दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी।
  2. किसी राज्य के राज्यपाल की परिलब्धियाँ और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किये जाएंगे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (c)

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी किसी राज्य के राज्यपाल को दी गई विवेकाधीन शक्तियाँ हैं? (2014)

  1. भारत के राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन अधिरोपित करने के लिये रिपोर्ट भेजना
  2. मंत्रियों की नियुक्ति करना
  3. राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कतिपय विधेयकों को भारत के राष्ट्रपति के विचार के लिये आरक्षित करना
  4. राज्य सरकार के कार्य संचालन के लिये नियम बनाना

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 1 और 3

(c) केवल 2, 3 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (b)

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