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विद्युत चुंबकीय आयन साइक्लोट्रॉन तरंगें

  • 19 Apr 2023
  • 6 min read

वैज्ञानिकों ने भारतीय अंटार्कटिक स्टेशन मैत्री में ऐसी विद्युत चुंबकीय (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक)  आयन साइक्लोट्रॉन (EMIC) तरंगों की पहचान की है, जो प्लाज़्मा तरंगों का ही एक रूप है और इनकी विशेषताओं का अध्ययन किया है।

  • ये तरंगें ऐसे किलर इलेक्ट्रॉनों (इलेक्ट्रॉनों की गति प्रकाश की गति के करीब होती हैं, जो पृथ्वी ग्रह की विकिरण पट्टी बेल्ट का निर्माण करती हैं) की वर्षा/अवक्षेपण (Precipitation) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जो अंतरिक्ष-जनित हमारी प्रौद्योगिकी/उपकरणों के लिये हानिकारक हैं।
  • यह अध्ययन निम्न कक्षाओं में स्थापित उपग्रहों पर विकिरण पट्टी/रेडिएशन बेल्ट में ऊर्जावान कणों के प्रभाव को समझने में सहायक बन सकता है।

विद्युत चुंबकीय आवेश साइक्लोट्रॉन तरंगें:

  • EMIC तरंगें पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर में पाई जाने वाली सूक्ष्म विद्युत चुंबकीय उत्सर्जन हैं।
  • ये तरंगें भूमध्यरेखीय अक्षांशों में उत्पन्न होती हैं और चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के साथ उच्च अक्षांश आयनमंडल तक फैली होती हैं।
  • अंतरिक्ष के साथ-साथ भू-आधारित मैग्नेटोमीटर दोनों में उनके बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 

मैग्नेटोस्फीयर:

  • मैग्नेटोस्फीयर वह गुहा है जिसमें पृथ्वी स्थित है और सूर्य के प्रभाव से सुरक्षित रहती है।
  • यह पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और सौर पवन के बीच परस्पर क्रिया से निर्मित होता है, जो सूर्य से प्रवाहित होने वाले आवेशित कणों, मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनों एवं प्रोटॉन की एक सतत् धारा है।
    • पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र उसके बाह्य कोर में पिघले हुए लोहे की गति से उत्पन्न होता है।

मैग्नेटोमीटर:

  • मैग्नेटोमीटर एक वैज्ञानिक उपकरण है जिसका उपयोग चुंबकीय क्षेत्र की शक्ति और दिशा को मापने हेतु किया जाता है।
  • इसका उपयोग पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र, साथ ही अन्य खगोलीय पिंडों, जैसे ग्रहों, चंद्रमाओं, सितारों एवं आकाशगंगाओं के चुंबकीय क्षेत्रों का अध्ययन करने हेतु किया जा सकता है।
  • मैग्नेटोमीटर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन या चुंबकत्त्व के सिद्धांतों के आधार पर काम करते हैं।

प्लाज़्मा तरंगें:  

  • परिचय:  
    • प्लाज़्मा तरंगें एक प्रकार की विद्युत चुंबकीय तरंगें हैं जो प्लाज़्मा के माध्यम से प्रसारित होती हैं, जो पदार्थ की एक अवस्था है।
      • प्लाज़्मा तब बनता है जब एक गैस को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है या मज़बूत विद्युत क्षेत्रों के अधीन किया जाता है जिससे इसके परमाणु आयनित हो जाते हैं, जिसका अर्थ है कि वह इलेक्ट्रॉनों को खो देते हैं या प्राप्त कर लेते हैं और आवेशित कण बन जाते हैं। 
    • दृश्यमान ब्रह्मांड में 99 प्रतिशत से अधिक पदार्थ में प्लाज़्मा होता है। 
      • हमारा सूर्य, सौर हवा, ग्रहों के बीच का माध्यम, पृथ्वी के निकट क्षेत्र, मैग्नेटोस्फीयर और हमारे वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में सभी प्लाज़्मा शामिल हैं।
  • अनुप्रयोग:  
    • खगोल भौतिकी, अंतरिक्ष विज्ञान, प्लाज़्मा भौतिकी और संचार प्रौद्योगिकी सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्लाज़्मा तरंगों के महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग हैं। 
      • उदाहरण के लिये वह औरोरा की पीढ़ी में शामिल है।
    • प्लाज़्मा तरंगों का अध्ययन हमें उन क्षेत्रों के बारे में भी जानकारी प्रदान करता है जो हमारे लिये दुर्गम हैं, विभिन्न क्षेत्रों में द्रव्यमान और ऊर्जा का परिवहन करते हैं, कैसे वे आवेशित कणों के साथ परस्पर क्रिया करते हैं तथा पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर की समग्र गतिशीलता को नियंत्रित करते हैं

पदार्थ की अन्य अवस्थाएँ:  

  • विषय:  
    • पदार्थ की अवस्थाएँ विभिन्न भौतिक रूप हैं जिनमें पदार्थ अपने अद्वितीय गुणों जैसे- आकार, आयतन और कण व्यवस्था के आधार पर मौजूद हो सकते हैं।
    • पदार्थ की तीन सबसे अधिक ज्ञात अवस्थाएँ ठोस, तरल और गैस हैं।
      • इसके अतिरिक्त प्लाज़्मा और बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट के रूप में ज्ञात पदार्थ की दो कम सामान्य अवस्थाएँ हैं।
  • बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट: यह पदार्थ की एक अवस्था है जो पूर्ण शून्य के करीब बहुत कम तापमान पर होती है। इसकी भविष्यवाणी पहली बार 1920 के दशक में अल्बर्ट आइंस्टीन और भारतीय भौतिक विज्ञानी सत्येंद्र नाथ बोस ने की थी।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा,विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. प्रो. सत्येंद्र नाथ बोस द्वारा किये गए 'बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी' के कार्य पर चर्चा कीजिये और कैसे इसने भौतिकी के क्षेत्र में क्रांति ला दी। चर्चा कीजिये।  (2018) 

स्रोत: पी. आई. बी.

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