प्रारंभिक परीक्षा
मज़दूरी संहिता, 2019
- 04 Feb 2026
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सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने राज्यों से आग्रह किया है कि वे “उचित व्यवस्था और तंत्र” विकसित करें और घरेलू कामगारों को न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 तथा मज़दूरी संहिता अधिनियम, 2019 के तहत कानूनी संरक्षण और लाभों के दायरे में लाने पर अंतिम निर्णय लें।
मज़दूरी संहिता अधिनियम, 2019 क्या है?
- परिचय: मज़दूरी संहिता अधिनियम, 2019 एक महत्त्वपूर्ण श्रम सुधार है, जिसका उद्देश्य उचित मज़दूरी, सामाजिक न्याय, अनुपालन में सुगमता और रोज़गार सृजन सुनिश्चित करना है। इसके तहत वेतन से संबंधित कई कानूनों को समेकित कर पूरे भारत में एक समान तथा एकीकृत कानूनी ढाँचा स्थापित किया गया है।
- यह एकल पंजीकरण, एकल लाइसेंस तथा एकल रिटर्न की व्यवस्था को प्रोत्साहित करता है। इसके परिणामस्वरूप नियमों की संख्या 163 से घटकर 58, प्रपत्र 20 से घटकर 6 और रजिस्टर 24 से घटकर केवल 2 रह गए हैं।
- उत्पत्ति: इनका अधिनियमन द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग (2002) की सिफारिशों के आधार पर किया गया है, ताकि 29 कानूनों को चार कार्यात्मक संहिताओं में समेकित किया जा सके, जो इस प्रकार हैं: मज़दूरी संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020।
- यह चार मौजूदा कानूनों को समाहित करता है, अर्थात मज़दूरी भुगतान अधिनियम, 1936, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948, बोनस भुगतान अधिनियम, 1965, और समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976।
- उद्देश्य: इसका लक्ष्य श्रमिकों के संरक्षण और नियोक्ताओं के लिये अनुपालन की सुगमता के बीच संतुलन स्थापित करना है, ताकि सम्मानजनक रोज़गार के माध्यम से आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दिया जा सके।
- श्रमिक के पक्ष में सुधार एवं मुख्य प्रावधान:
- न्यूनतम मज़दूरी का सार्वभौमीकरण (धारा 5): इसके अंतर्गत संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के सभी श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी का वैधानिक अधिकार प्रदान किया गया है, जिससे कवरेज लगभग 30% से बढ़कर 100% तक हो जाता है।
- राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन की शुरुआत (धारा 9): इसके अंतर्गत केंद्र सरकार को जीवन स्तर के आधार पर एक आधारभूत न्यूनतम वेतन निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है; राज्य सरकारें इससे कम वेतन तय नहीं कर सकतीं।
- न्यूनतम वेतन का निर्धारण: कौशल, भौगोलिक क्षेत्र और कार्य के आधार पर उपयुक्त सरकार द्वारा दरें तय की जाएँगी तथा सामान्यतः प्रत्येक 5 वर्ष में पुनरीक्षित की जाएँगी।
- वेतन भुगतान की समयबद्ध सीमा (धारा 17): यह सभी कर्मचारियों पर बिना किसी वेतन सीमा के लागू होता है। वेतन भुगतान के लिये कड़ी समय-सीमा के प्रावधान हैं (जैसे– मासिक वेतन अगले माह की 7 तारीख तक; सेवा समाप्ति की स्थिति में 2 कार्य दिवसों के भीतर भुगतान)।
- काम के घंटों की जानकारी (धारा 13): कार्य को 48 घंटे प्रति सप्ताह और अधिकतम 12 घंटे प्रतिदिन (आराम की अवधि सहित) तक सीमित करता है।
- धारा 14 सामान्य वेतन दर के दो गुना की दर से ओवरटाइम के भुगतान को अनिवार्य बनाती है।
- भुगतान और रोज़गार का प्रमाण (धारा 50): इसके अंतर्गत असंगठित क्षेत्र सहित सभी श्रमिकों को वेतन पर्ची जारी करना अनिवार्य किया गया है।
- रोज़गार और अनुपालन संबंधी सुधार:
- अपराधों का गैर-अपराधीकरण और संयोजन (धारा 56): जिन मामलों में केवल जुर्माने से दंड देना प्रथम अपराध हो, उनमें कारावास जैसी आपराधिक सज़ाओं के स्थान पर दीवानी दंड (श्रेणीबद्ध मौद्रिक ज़ुर्माना) का प्रावधान किया गया है।
- इसमें ऐसी कंपाउंडिंग (समझौता-निपटान) व्यवस्था का प्रावधान किया गया है, जिसके अंतर्गत ऐसे अपराधों का निस्तारण अधिकतम जुर्माने की 50% राशि का भुगतान करके किया जा सकेगा।
- निरीक्षक-सह-सुविधादाता (धारा 51): ‘इंस्पेक्टर राज’ की जगह पारदर्शी, वेब-आधारित यादृच्छिक निरीक्षण प्रणाली और सहायक (फैसिलिटेटिव) भूमिका लागू की गई है।
- नियोक्ता की परिसंपत्तियों का संरक्षण (धारा 64): नियोक्ता की सरकारी जमा राशि/देयता को न्यायालयीय कुर्की से सुरक्षित रखता है, सिवाय उन देनदारियों के जो कर्मचारियों के प्रति हों।
- अपराधों का गैर-अपराधीकरण और संयोजन (धारा 56): जिन मामलों में केवल जुर्माने से दंड देना प्रथम अपराध हो, उनमें कारावास जैसी आपराधिक सज़ाओं के स्थान पर दीवानी दंड (श्रेणीबद्ध मौद्रिक ज़ुर्माना) का प्रावधान किया गया है।
- लैंगिक समावेशन और सामाजिक न्याय:
- लैंगिक भेदभाव का निषेध (धारा 3): समान या समान प्रकृति के कार्य के लिये भर्ती, मज़दूरी अथवा सेवा-शर्तों में लैगिंक (जिसमें ट्रांसजेंडर भी शामिल हैं) के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।
- सलाहकार बोर्डों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व (धारा 42): यह सुनिश्चित करता है कि केंद्रीय और राज्य सलाहकार बोर्डों के कम-से-कम एक-तिहाई सदस्य महिलाएँ हों। ये बोर्ड न्यूनतम मज़दूरी निर्धारण तथा महिलाओं के लिये रोज़गार के अवसर बढ़ाने पर परामर्श देते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. मज़दूरी संहिता, 2019 क्या है?
यह एक समेकित श्रम कानून है, जो पूरे भारत में सार्वभौमिक न्यूनतम मज़दूरी, उचित पारिश्रमिक तथा अनुपालन में आसानी सुनिश्चित करने के लिये मज़दूरी से संबंधित चार अधिनियमों को एकीकृत करता है।
2. मज़दूरी संहिता, 2019 के अंतर्गत किन कानूनों को समाहित किया गया है?
मज़दूरी भुगतान अधिनियम, 1936; न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948; बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 तथा समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976।
3. मज़दूरी संहिता के अंतर्गत नेशनल फ्लोर वेज क्या है?
धारा 9 के अंतर्गत केंद्र सरकार न्यूनतम जीवन स्तर से जुड़ा एक आधारभूत वेतन निर्धारित करती है, जिससे नीचे राज्य न्यूनतम मज़दूरी तय नहीं कर सकते।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. भारत में, निम्नलिखित में कौन एक, उन फैक्टरियों में जिनमें कामगार नियुक्त हैं, औद्योगिक विवादों, समापनों, छँटनी और कामबंदी के विषय में सूचनाओं को संकलित करता है? (2022)
(a) केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय
(b) उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग
(c) श्रम ब्यूरो
(d) राष्ट्रीय तकनीकी जनशक्ति सूचना प्रणाली
उत्तर:(c)
