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पश्चिमी घाट के लिये दिशा-निर्देश

  • 21 Aug 2018
  • 15 min read

संदर्भ

हाल ही के केरल की भयावह बाढ़ ने वर्ष 2011 की उस रिपोर्ट पर ध्यानाकर्षित किया है, जिसका संबंध पश्चिमी घाटों से है। उल्लेखनीय है कि यह अरब सागर तट से संलग्न पारिस्थितिकी और जैव विविधता को संरक्षित करने के लिये सिफारिशों का एक सेट है। दरअसल, इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले मुख्य लेखक, पुणे स्थित पारिस्थितिक विज्ञानी माधव गाडगिल ने सार्वजनिक रूप से तर्क दिया है कि संबंधित राज्य सरकारों द्वारा यदि रिपोर्ट के सुझावों को लागू किया गया होता तो, केरल में आपदा का स्तर उतना गंभीर नहीं होता। इस लेख के माध्यम से हम गाडगिल की रिपोर्ट की कुछ मुख्य सिफारिशों की चर्चा के साथ ही, इसकी तुलना कस्तूरीरंगन की रिपोर्ट से भी करेंगे।

गाडगिल समिति की स्थापना के कारण

  • फरवरी 2010 में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की अध्यक्षता में तमिलनाडु के कोटागिरी में एक सार्वजनिक बैठक हुई जो मुख्य रूप से पश्चिमी घाट समूह से जुड़े लोगों द्वारा आयोजित की गई थी।
  • इस बैठक में वक्ताओं ने निर्माण, खनन, उद्योग, अचल संपत्ति और जलविद्युत से पारिस्थितिक तंत्र को होने वाले नुक्सान की ओर इशारा किया।
  • बैठक के बाद जयराम रमेश ने गाडगिल के नेतृत्त्व में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की स्थापना की।
  • इस पैनल को पश्चिमी घाटों की पारिस्थितिकी और जैव विविधता का आकलन करने के लिये कहा गया था तथा समुद्र तट से संलग्न गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के साथ 1500 किमी. तक फैली पूरी श्रृंखला को संरक्षित और पुनर्जीवित करने के उपाय सुझाए गए थे। 

गाडगिल समिति ने  क्या कहा?

  • इसने पारिस्थितिक प्रबंधन के प्रयोजन के लिये पश्चिमी घाट की सीमाओं को परिभाषित किया।
  • यह सीमा कुल क्षेत्र का 1,29,037 वर्ग किमी.था, जो उत्तर से दक्षिण तक 1.490 किमी. में विस्तृत है।
  • इस सीमा की अधिकतम चौड़ाई तमिलनाडु में 210 किमी. और न्यूनतम चौड़ाई महाराष्ट्र में 48 किमी. है। उल्लेखनीय है कि इसने प्रस्तावित किया कि इस पूरे क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESZ ) के रूप में नामित किया जाए।
  • साथ ही इस क्षेत्र के भीतर छोटे क्षेत्रों को उनकी मौजूदा स्थिति और खतरे की प्रकृति के आधार पर पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्रों (ESZ ) को I, II या III के रूप में पहचाना जाना था।
  • समीति ने इस क्षेत्र को लगभग 2,200 ग्रिड में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा, जिसमें से 75 प्रतिशत ESZ I या II के तहत या वन्यजीव अभ्यारण्य या प्राकृतिक उद्यानों के माध्यम से पहले से ही संरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत आते हैं।

प्रमुख अनुशंसाएँ:
गाडगिल समिति की प्रमुख अनुशंसाएँ निम्नलिखित हैं :

  • इस पूरे क्षेत्र में आनुवंशिक रूप से संशोधित खेती पर प्रतिबंध लगया जाना चाहिये।
  • तीन साल में प्लास्टिक बैग का चरणबद्ध निपटान होना चाहिये।
  • किसी नए विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना की अनुमति नहीं होनी चाहिये।
  • सार्वजनिक भूमि के निजी भूमि में रूपांतरण पर प्रतिबंध और ESZ I या II में गैर-वन प्रयोजनों के लिये वन भूमि को नुकसान पहुँचाये जाने पर प्रतिबंध।
  • ESZ I के तहत किसी नए बांध को बनाये जाने की अनुमति नहीं होनी चाहिये।
  • ESZ I में किसी नए थर्मल पावर प्लांट या बड़े पैमाने पर पवन ऊर्जा परियोजनाओं को अनुमति नहीं दी जानी चाहिये।
  • ESZ I या II क्षेत्रों में किसी नए प्रदूषणकारी उद्योग की स्थापना तथा रेलवे लाइन या प्रमुख सड़कों 
  • को बनाये जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये।
  • इन क्षेत्रों में पर्यटन को लेकर सख्त विनियमन होना चाहिये।
  • बांधों, खानों, पर्यटन, आवास जैसी सभी नई परियोजनाओं के लिये संचयी प्रभाव मूल्यांकन होना चाहिये।
  • इसके अलावा समिति ने इस क्षेत्र में इन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिये एक पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण बनाए जाने का प्रस्ताव भी दिया।

बाद में कस्तूरीरंगन समिति की आवश्यकता क्यों पड़ी?

  • पश्चिमी घाट के पर्यावरण को लेकर सरकार ने पहले माधव गाडगिल समिति गठित की।
  • इस समिति ने 2011 के मध्य तक रिपोर्ट तैयार कर उसे सरकार को सौंप दिया था, लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने लंबे समय तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की और न ही इसे सार्वजनिक चर्चा के लिये जारी किया। 
  • अंत में न्यायालय ने इन सिफारिशों पर काम करने के लिये सरकार को दिशा-निर्देश जारी किये।
  • तब सरकार ने आगे की दिशा तय करने के लिये कस्तूरीरंगन समिति का गठन किया, जिसने अप्रैल, 2013 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी।
  • प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले नौ सदस्यीय समूह का गठन केरल सहित कई राज्यों के विरोध को देखते हुए पर्यावरण मंत्रालय ने किया था।
  • उन राज्यों ने माधव गाडगिल समिति की उस रिपोर्ट का विरोध किया था जिसने पश्चिमी घाटों को पारिस्थितिकी के लिये पूरी तरह संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया था और सीमित खनन एवं अन्य विकास गतिविधियों का पक्ष लिया था।

गाडगिल समिति और कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट में तीन मुख्य अंतर हैं:

  • पहला अंतर उस क्षेत्र के दायरे का है, जिसे पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड: इको-सेंसिटिव ज़ोन) के तौर पर संरक्षित किया जाना है।
  • गाडगिल समिति ने तो पूरे पश्चिमी घाट को ही ईएसजेड के तौर पर चिह्नित किया है। लेकिन इसने संरक्षित क्षेत्र के लिये तीन श्रेणियाँ बनाई हैं, जिसमें सूचीबद्घ गतिविधियों को पारिस्थितिकीय समृद्घि और भू-उपयोग के अनुसार अनुमति दी जाएगी।
  • लेकिन कस्तूरीरंगन समिति ने इसके लिये अलग तरीका अपनाया। इसने रबर जैसी नकदी फसलों, कृषि क्षेत्रों के अवशिष्टों को ईएसजेड क्षेत्र में निपटान को हटा दिया।
  • ऐसा इसलिये किया गया क्योंकि गाडगिल समिति की तुलना में इस समिति के पास रिमोट सेंसिंग तकनीक के उपयोग की सुविधा उपलब्ध थी।
  • साथ ही इसने सांस्कृतिक  ताने-बाने और प्राकृतिक परिदृश्य के बीच अंतर को स्पष्ट किया। 
  • कस्तूरीरंगन समिति ने ईएसजेड के तहत पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत हिस्से को चिह्नित किया है, जो 60,000 हेक्टेयर का है और यह गाडगिल समिति के प्रस्तावित 1,37,000 हेक्टेयर से कम है।
  • संरक्षित क्षेत्र में चलाई जाने वाली गतिविधियों की अनुमति की सूची दोनों के बीच अंतर का दूसरा बिंदु है।
  • इस मामले में गाडगिल समिति की सिफारिशें काफी व्यापक हैं, जिसमें कृषि क्षेत्रों में कीटनाशकों और जीन संवर्द्धित बीजों के उपयोग पर प्रतिबंध  से लेकर पनबिजली परियोजनाओं को हतोत्साहित करना और वृक्षारोपण की बजाय  प्राकृतिक वानिकी को प्रोत्साहन देने जैसी सिफारिशें शामिल हैं, लेकिन कस्तूरीरंगन समिति ने इस सूची को अधिक महत्त्व नहीं दिया।
  • उसने पहले से ही  संरक्षित श्रेणी से भूमि के काफी बड़े हिस्से को हटा दिया। उसने ईएसजेड में बड़ी परियोजनाओं और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली  गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान किया।
  • इसमें सभी प्रकार के खनन और उत्खनन, लाल-श्रेणी (Red Category) वाले उद्योग, जिसमें तापीय विद्युत संयंत्र भी शामिल हैं, के अलावा 20,000 वर्ग मीटर के क्षेत्र के सभी बड़ी इमारतों के निर्माण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है।
  • पनबिजली परियोजनाओं के बारे में भी समिति ने नदियों में पर्याप्त जल प्रवाह और परियोजनाओं में अंतराल की कठिन शर्त तय की है।
  • असहमति का तीसरा बिंदु शासन के ढाँचें का है। गाडगिल समिति ने एक राष्ट्रीय प्राधिकरण की सिफारिश की है, जिसमें राज्य और ज़िला स्तर पर भी प्रतिनिधि हों।
  • वहीं, कस्तूरीरंगन समिति ने पर्यावरणीय मंज़ूरी के वर्तमान ढाँचे को ही मज़बूत करने और एक अत्याधुनिक निगरानी एजेंसी बनाने की सिफारिश की है।

पर्यावरण मंत्रालय ने कस्तूरीरंगन समिति द्वारा की गई सभी प्रमुख सिफारिशें स्वीकार कर लीं: 

  • पश्चिमी घाट में प्रेरणास्पद हरित संवृद्धि के लिये वित्तीय व्यवस्था।
  • निर्णय लेने में स्थानीय समुदायों की सहभागिता और संलग्नता।
  • पश्चिमी घाटों के लिये डाटा निगरानी प्रणाली ।
  • निगरानी केंद्र की स्थापना।

अंत में क्या तय किया गया?

  • पिछले सालपर्यावरण मंत्रालय ने पश्चिमी घाटों में ईएसए के रूप में 56,285 वर्ग किमी के क्षेत्र को अधिसूचित किया था। यह क्षेत्र कस्तूरीरंगन समिति द्वारा अनुशंसित 59,940 वर्ग किलोमीटर से थोड़ा कम था
  • गौरतलब है कि विशेष रूप से केरल में कस्तूरीरंगन समिति ने ईएसए के हिस्से के रूप में 13,108 वर्ग किमी के क्षेत्र का प्रस्ताव दिया था।
  • बाद में केरल सरकार के आग्रह पर इसे 9,993.7 वर्ग किमी तक सीमित किया गया था।

क्या गाडगिल रिपोर्ट के कार्यान्वयन से केरल में बाढ़ के प्रभाव को कम किया जा सकता था?

  • केरल की आपदा अनिवार्य रूप से चरम वर्षा का परिणाम है और वर्ष 2013 के उत्तराखंड की बाढ़ के बाद से इस तरह के चरम वर्षा की घटनाओं ने हर साल भारत में एक आपदा जैसी स्थिति को जन्म दिया है।
  • उल्लेखनीय है कि गाडगिल रिपोर्ट वर्ष 2011 में सौंपी गई थी। भले ही राज्य सरकारों ने तत्काल सिफारिशों को गंभीरता से लागू करना शुरू कर दिया हो, फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि कौन सी गतिविधियाँ शुरू हुई हैं और कौन सी नहीं।
  • हमें पिछली त्रासदियों से सबक सीखने की आवश्यकता है और स्थायी तथा दीर्घकालिक विकास के माध्यम से आपदाग्रस्त इलाकों के लचीलेपन में वृद्धि करने के लिये गाडगिल रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक प्रक्रियाओं में न्यूनतम हस्तक्षेप करना होगा।
  • यहाँ तक कि उत्तराखंड आपदा में भी अनियंत्रित निर्माण, बड़े जलविद्युत संयंत्रों और वनों की कटाई का मूल्यांकन विनाश के पैमाने की सही जानकारी प्राप्त करने के लिये किया गया था।

निष्कर्ष

  • संपूर्ण विश्व में अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि पर्यावरण और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और उन्हें एक-दूसरे के प्रतियोगी नहीं बल्कि पूरक के रूप में देखने की आवश्यकता है अन्यथा जलवायु परिवर्तन की दहलीज तक पहुँच चुकी मानव सभ्यता के लिये यह एक दिन बर्बादी का सबसे बड़ा कारण होगा।
  • भारत जैसे विशाल देश के विभिन्न हिस्सों की पारिस्थितिकी में अत्यधिक भिन्नता है। पश्चिमी घाट की इन सभी क्षेत्रों में अपनी एक विशिष्ट पहचान है।
  • पश्चिमी घाट की जैव विविधता को बनाए रखने के लिये वन एवं वन्य जीवों की रक्षा ज़रूरी है। चूँकि स्वयं मानव का विकास विभिन्न चरणों में विभिन्न प्राणी जगत से होते हुए आगे बढ़ा है, अतः हमारे शरीर की रचना में इनके अंश निहित हैं।
  • दरअसल, पर्यावरण एवं जैव विविधता में कमी के कारण आए दिन हमें नई-नई बीमारियों के बारे में सुनने को मिलता है क्योंकि ऐसे रोगों के प्रतिरोधक अंश हमें इन जीवों एवं वनस्पतियों से प्राप्त होते हैं।
  • इसलिये विकास के नाम पर पर्यावरण एवं जैव विविधता के साथ खिलवाड़ मानव सभ्यता को विनाश की ओर ले जाने वाला साबित होगा।
  • अतः हमें अपनी ज़रूरतों और उपलब्ध संसाधनों के मध्य सामंजस्य बैठाना होगा और साथ ही, सरकारों को इस बात को समझना होगा।
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