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शासन व्यवस्था

भारत में कुपोषण

  • 23 Jul 2019
  • 17 min read

इस Editorial में The Hindu, Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण शामिल है। इस आलेख में भारत में कुपोषण की समस्या, इसके प्रभाव एवं उपायों की चर्चा की गई है तथा आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की नई साझा रिपोर्ट ‘खाद्य एवं पोषण सुरक्षा विश्लेषण, भारत 2019’ (Food and Nutrition Security Analysis, India, 2019) ने भारत के एक बड़े हिस्से में बाल भुखमरी और कुपोषण की स्थिति को उजागर किया है। इससे समृद्धि की ओर आगे कदम बढ़ाते देश की आकांक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे उस राष्ट्र व समाज के चरित्र को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं जो स्वतंत्रता के सत्तर वर्षों बाद भी अपने लाखों निर्धन व वंचित लोगों की आबादी के लिये भूख एवं पोषण जैसी मूलभूत ज़रूरतों को भी पूर्ण नहीं कर पा रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि तीव्र आर्थिक विकास, निर्धनता के घटते स्तर, निर्यात के लिये पर्याप्त खाद्य और सरकारी कार्यक्रमों की बहुलता के बावजूद क्यों निर्धनतम लोगों में कुपोषण का उच्चतम स्तर बना हुआ है?

निर्धनता और कुपोषण का जाल

रिपोर्ट बताती है कि समाज का निर्धनतम तबका निर्धनता और कुपोषण के जाल में फँसा हुआ है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही स्थिति बनी हुई है। भूख और कुपोषण की शिकार महिलाओं के बच्चे स्टंटिंग व अल्प वज़न के शिकार होते हैं और वे कभी भी पूर्ण मानव क्षमता प्राप्त कर सकने में अक्षम होते हैं। शिशुओं में कुपोषण के प्रभाव महज़ शारीरिक ही नहीं होते, बल्कि पोषण से वंचित शिशु के मस्तिष्क का कभी पूर्ण विकास नहीं हो पहुंच पाता। लांसेट (Lancet) के एक अध्ययन में पाया गया कि अल्पपोषण नवजात के संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है। संज्ञानात्मक विकास के माध्यम से ही कोई शिशु अपने विकास के क्रम में सूचना प्रसंस्करण, अवधारणात्मक कौशल, भाषा की समझ एवं अन्य ज़रुरी कौशल सीखता है, इसके अतिरिक्त अल्पपोषण नवजात के शारीरिक विकास को भी प्रभावित करता है जिससे शिशु में विकलांगता के लक्षण प्रदर्शित होने लगते है जो उसकी गतिशीलता को भी प्रभावित कर सकता है। साथ ही इससे विद्यालय में बच्चे की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है और परिणामस्वरूप उसे आजीवन निर्धनता व अवसरहीन भविष्य की ओर धकेल दिया जाता है। लांसेट के एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि ये अल्पपोषित बच्चे प्रायः विद्यालयों में निम्न स्तरीय शैक्षणिक प्रदर्शन करते हैं और परिणामस्वरूप भविष्य में निम्न आय, उच्च प्रजनन दर तथा अपने बच्चों की अनुपयुक्त देखभाल के साथ निर्धनता के अंतर-पीढ़ीगत संचरण (Intergenerational Transmission of Poverty) के भागी बनते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आज के निर्धन भूखे बच्चे ही कल के भूखे, बेरोजगार और अल्पशिक्षित वयस्क आबादी का निर्माण करेंगे।

सरकार की रिपोर्ट से प्राप्त निष्कर्षों में कुछ भी आश्चर्यजनक प्रतीत नहीं होता। पिछले पाँच वर्षों के विभिन्न अध्ययनों से यह खुलासा हुआ है कि अपने सर्वाधिक निस्सहाय नागरिकों को उनकी बाल आयु के वर्षो में पर्याप्त पोषण सुनिश्चित कर सकने में देश विफल रहा है। भारत लंबे समय से विश्व में सर्वाधिक कुपोषित बच्चों का देश बना है। हालाँकि कुपोषण के स्तर को कम करने में कुछ प्रगति भी हुई है। गंभीर कुपोषण के शिकार बच्चों का अनुपात वर्ष 2005-06 के 48 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2015-16 में 38.4 प्रतिशत हो गया। इस अवधि में अल्प वज़न के शिकार बच्चों का प्रतिशत 42.5 प्रतिशत से घटकर 35.7 प्रतिशत हो गया। साथ ही शिशुओं में रक्ताल्पता (एनीमिया) की स्थिति 69.5 प्रतिशत से घटकर 58.5 प्रतिशत रह गई किंतु इसे अत्यंत सीमित प्रगति ही मान सकते हैं।

एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य

सरकार के राष्ट्रीय पोषण मिशन (National Nutrition Mission- NNM), जिसका नया नाम ‘पोषण अभियान’ कर दिया गया है, का लक्ष्य स्टंटिंग (कुपोषण की एक माप जिसे आयु के अनुरूप छोटे कद के रूप में परिभाषित किया गया है) में प्रतिवर्ष 2 प्रतिशत की कमी के साथ वर्ष 2022 तक आबादी में स्टंटिंग के शिकार बच्चों का अनुपात 25 प्रतिशत तक नीचे लाना है। किंतु इस सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिये भी भारत को अपनी वर्तमान गति को दोगुना करना होगा, तब जाकर भारत उपर्युक्त लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।

पोषण अभियान की कार्यकारी समिति की हाल की बैठकों के विवरणों एवं रिपोर्टों में ऐसे तथ्य दृष्टिगत नहीं होते जिनके आधार पर इस अभियान के लक्ष्यों को वर्ष 2022 तक पूर्ण किया जा सके। अभियान के आरंभ के एक वर्ष बाद राज्य व केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा उन्हें आवंटित धन का मात्र 16 प्रतिशत ही उपयोग किया जा सका था। अभियान के अंतर्गत इस वर्ष के मार्च माह तक प्रत्येक राज्य के एक ज़िले में फोर्टिफाइड (ऐसे खाद्यान जिसमें विभिन्न तकनीकों का उपयोग करके उसकी पोषकता में वृद्धि की जाती है) चावल और दूध उपलब्ध कराया जाना था। लेकिन हाल में संपन्न हुई बैठक में यह बात उजागर हुई है कि ऐसे कार्यक्रम की शुरुआत भी नहीं हो सकी है तथा सार्वजनिक वितरण के प्रभारी अधिकारी अभी भी इसके लिये सक्षम नहीं हैं। माताओं व शिशुओं तक सेवाओं के वितरण में आँगनवाड़ी केंद्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। लेकिन बिहार और ओडिशा सहित अन्य राज्य जिनमें कुपोषित बच्चों की बड़ी संख्या विद्यमान है, आँगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना और कार्यकर्ताओं की नियुक्ति में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। स्टंटिंग और अल्प वज़न के शिकार बच्चों का उच्चतम स्तर झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र राज्य में पाया जाता है और बाल पोषण की त्रासदी को समाप्त करने की कुंजी इन कुछ चुनिंदा राज्यों के हाथ में है।

कुपोषण सामाजिक और आर्थिक बहिष्करण के सदियों पुराने प्रतिरूप या पैटर्न का ही प्रतिबिंब है। भारत में व्याप्त कथित सामाजिक गैर-बराबरी ने आर्थिक असमानता को बढ़ाया है। भारत में मुख्य रूप से वही वर्ग कुपोषण एवं वंचना का शिकार है जो ऐतिहासिक गैर-बराबरी का सामना करता रहा है। उदाहरण के लिये अनुसूचित जनजातियों (ST) व अनुसूचित जातियों (SC) के 40 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग के शिकार हैं। अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के भी लगभग 40 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग से पीड़ित हैं। बाल आयु में पोषण की कमी इनके शारीरिक व मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती है और ये हमेशा के लिये समाज के हाशिये में धकेले जाने को अभिशप्त होते हैं। परिणामतः कुपोषण और निर्धनता का यह दुश्चक्र चलता रहता है।

ध्यान देने योग्य है कि स्टंटिंग और कुपोषण की शुरुआत बच्चे से नहीं बल्कि गर्भवती माता से होती है। भारत में प्रायः महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक बने रहने को विवश किया गया है। सामाजिक एवं आर्थिक निर्णयों में महिलाओं की नगण्य भागीदारी अप्रत्यक्ष रूप से उनके स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। महिलाओं से संबंधित शारीरिक मुद्दे उनको अन्य निर्योग्यता के साथ अधिक सुभेद्य बना देते हैं। इसके दुष्प्रभाव किशोरावस्था से ही इंगित होने लगते हैं। कुपोषण व एनीमिया की शिकार किशोरी भविष्य में एक कुपोषित व एनीमिया की शिकार गर्भवती माता बनने की सहज प्रवृत्ति रखती है और उससे उत्पन्न बच्चों में स्टंटिंग की अधिक संभावना होती है।

खाद्य तक पहुँच की समस्या

जैसा अमर्त्य सेन ने कहा है कि अकाल की उत्पत्ति खाद्य के अभाव से नहीं होती बल्कि खाद्य तक अपर्याप्त पहुंच के कारण होती है। निर्धनों व वंचितों के लिये खाद्य तक पहुँचने का मार्ग सामाजिक, प्रशासनिक और आर्थिक बाधाओं के कारण अवरुद्ध रहता है। राज्य, ज़िला और स्थानीय स्तर पर अक्षम या उदासीन सरकारें निर्धनों व वंचितों को दोयम दर्जे के नागरिकों के रूप में देखती हैं तथा उन्हें भुखमरी और निर्धनता से बाहर निकालने के प्रयास नहीं करतीं। इसका सीधा असर फिर गर्भवती माताओं व शिशुओं की पोषण स्थिति पर पड़ता है।

भारत में कुपोषण को कम करने के लिये उपाय

कुपोषण किसी भी देश या समाज के लिये मौजूदा समय में सबसे बड़ी समस्या समझी जा रही है। कुपोषण की प्रकृति अपने आप में गंभीर है तथा इसकी समाप्ति किसी देश के विकास और समरसता को बनाए रखने के लिये ज़रूरी है। कुपोषण निर्धनता एवं असमानता के कभी न समाप्त होने वाले दुश्चक्र को जन्म देता है। ऐसी स्थिति में क़ानूनी अवसर की समानता भी लोगों को समान रूप से संसाधनों तक पहुँचने में सक्षम नहीं बना सकती है। एक शिशु जिसका संज्ञानात्मक विकास उचित रूप से न हो सका हो वह स्कूल से लेकर अपने जीवन के विभिन्न पड़ाव में अन्य सक्षम लोगों से प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकेगा। यह स्थिति पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहेगी जब तक कि विभिन्न प्रयासों द्वारा इस स्थिति से बाहर नहीं निकाला जाता। कुपोषण से निपटने के लिये निम्नलिखित प्रयास किये जा सकते हैं-

  • महिला सश्क्त्तीकरण एवं उनके स्वास्थ्य पर ज़ोर: महिलाएँ प्रायः किसी भी समाज की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं, इसके बावज़ूद वे विभिन्न कारणों के चलते वंचना से पीड़ित होती हैं। यह स्थिति जीवन पर्यंत बनी रहती है। कुपोषण की समाप्ति के लिये महिलाओं का सशक्त होना एवं स्वस्थ होना आवश्यक है। इसके लिये आँगनबाड़ी केंद्रों को अधिक सक्षम बनाया जाना चाहिये, साथ ही महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये महिलाओं पर केंद्रित सरकारी योजनाएँ तथा आरक्षण जैसे सकारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि किसी भी स्वस्थ परिवार के लिये महिला का शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है।
  • सरकारी तंत्र का लोगों की ओर सकारात्मक रुझान: भारत में व्यापक भौगोलिक विविधता विद्यमान है। इसके चलते लोगों की स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएँ भी भिन्न-भिन्न हैं। ऐसे में केंद्रीय योजनाओं का निर्माण राज्यों एवं स्थानीय स्तर पर उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिये। इसके अतिरिक्त सरकारी मशीनरी का भी लोगों के प्रति संवेदनशील होना आवश्यक है ताकि विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में नौकरशाही रुकावट नहीं बल्कि जन कल्याण का दूत बन सके।
  • भोजन की धारणीयता एवं पोषकता में वृद्धि करके: एक अनुमान के अनुसार भारत में 40 प्रतिशत खाद्यान्न किसी-न-किसी रूप में बिना उपयोग के बर्बाद हो जाता है। यह खाद्यान्न भारत में भूख की समस्या को समाप्त कर सकता है। भारत में ऐसी नीति और विचार को आचरण में लाने की आवश्यकता है जो लोगों को भोजन की बर्बादी के प्रति संवेदनशील बनाए, ताकि भोजन का धारणीय उपयोग संभव हो सके।
  • फोर्टिफाइड खाद्यान्न को प्रोत्साहित करके: भारत में कुपोषण को समाप्त करने में फोर्टिफाइड खाद्यान्न महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। फोर्टिफाइड चावल को सरकार पहले ही प्रोत्साहन दे रही है, सरकार द्वारा ऐसे ही अन्य प्रयास किये जाने की आवश्यकता है, क्योंकि इससे कम मूल्य पर वंचित एवं कुपोषित आबादी को ज़रूरी पोषक पदार्थ उपलब्ध हो सकते हैं।

निष्कर्ष

भारत को अगले पाँच वर्ष में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदलने के सरकार के लक्ष्य पर बहुत अधिक ध्यान दिया जा रहा है। इस पर पर्याप्त बहस हो सकती है कि क्या सरकार इस लक्ष्य की प्राप्ति में सफल होगी। लेकिन ऐसी आकांक्षा एक बड़ी वास्तविकता की अनदेखी करती ही नज़र आ रही है। समाज का बड़ा हिस्सा जो देश की जनसंख्या का पाँचवा भाग है एक निर्धनतम हिस्से का निर्माण करता है और यह अभी भी उस आधुनिक अर्थव्यवस्था के स्पर्श से वंचित है जिसका लाभ आबादी के अन्य हिस्से उठा रहे हैं। देश का एक हिस्सा 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में जी रहा है और आधुनिक दौर की सभी वस्तुओं का उपभोग करने में सक्षम है। भारत में ही एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसे अपनी भूख मिटाने के लिये भोजन भी उचित मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। किसी देश में उपस्थित आर्थिक एवं पोषण क्षेत्र में व्याप्त असमानता उस देश के समग्र विकास में बाधक बन सकती है।

प्रश्न: भारत में कुपोषण की स्थिति में पिछले वर्षों में काफी सुधार आया है किंतु भारत अभी भी उन देशों में शामिल है जहाँ विश्व के सबसे अधिक कुपोषित बच्चे निवास करते हैं। भारत में कुपोषण की स्थिति पर प्रकाश डालिये तथा इसको रोकने के उपाय भी बताइये।

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