हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स

शासन व्यवस्था

भारत में स्वच्छता प्रणाली की स्थिति

  • 01 May 2021
  • 12 min read

यह लेख 29/04/2021 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित "The Dirty Truth" पर आधारित है। इसमें चर्चा की गई है कि महामारी ने कैसे भारत की पहले से ही विकृत सफाई व्यवस्था को और अधिक खराब कर दिया है तथा इसमें सुधार हेतु कौन से उपाय किये जा सकते हैं।

कोविड-19 महामारी ने भारत की निराशाजनक स्वच्छता प्रणाली को उजागर किया है। ग्रामीण भारत में नवनिर्मित "शुष्क शौचालय" और "हैंगिंग शौचालय" 2020-21 के लॉकडाउन का ही परिणाम हैं।

मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 (Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act)  के रूप में रोज़गार के निषेध और शुष्क शौचालयों पर सख्त प्रतिबंध के बावजूद केवल महामारी के दौरान ही लगभग 46,000 नए शुष्क शौचालय बनाए गए हैं।

इन अवैध शौचालयों के निर्माण का प्राथमिक कारण यह है कि सेनेटरी शौचालय बीमारी का सबब बन गए हैं।

कोविड-19 की दूसरी लहर के कारण फिर से लगाए जा रहे लॉकडाउन ने भारत में स्वच्छता संघर्ष को इतना बढ़ा दिया है कि लोग सार्वजनिक शौचालयों के उपयोग से भी डर रहे हैं।

भारत में स्वच्छता प्रणाली का वर्तमान परिदृश्य

  • राज्य-वार स्थिति: उत्तर प्रदेश में निर्माण स्थलों के पास मानव मल-मूत्र से भरे छोटे-छोटे गड्ढे भारत में एक बार फिर से खुले में शौच के पैटर्न में वृद्धि को उजागर करते हैं।
  • पश्चिम बंगाल में, केंद्र में "छोटे छिद्र वाले आधार" के रूप में अधिक शौचालयों का निर्माण किया जाता है, जिन्हें हैंगिंग शौचालयों के रूप में जाना जाता है। इनका निर्माण उन परिवारों द्वारा किया जाता है जो सैनिटरी शौचालयों का उपयोग नहीं करना चाहते हैं क्योंकि वे हमेशा मल मूत्र आदि से भरे होते हैं।
  • दिल्ली में, गाजीपुर, भलस्वा और ओखला लैंडफिल का विस्तार आस-पास के समुदायों के लिये खुले में शौच हेतु एक बड़ा मैदान है।
  • तमिलनाडु में, स्थानीय लोगों द्वारा दावा किया जाता है कि अप्रयुक्त शौचालय अक्सर जंगली जानवरों और सांपों का निवास बन जाते हैं, यही स्थिति गोवा में भी है।
  • मध्य प्रदेश और राजस्थान के गाँवों में शौचालय निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग किये जाने के कारण ये शौचालय लोगों की मौत का कारण बन रहे हैं।
  • मिज़ोरम में, अनोखे "ट्री हाउस" शौचालयों का प्रचलन है जो हैंगिंग शौचालयों की तरह हैं, लेकिन इनकी ऊँचाई तीन गुना अधिक होती है।

ग्रामीण भारत में शौचालय: कोविड -19 के कारण ग्रामीण भारत में स्वच्छ शौचालयों के उपयोग में गिरावट आई है।

  • वर्तमान में, ग्रामीण भारत में छह लाख से अधिक शौचालय ऐसे हैं जहाँ पानी की भारी कमी है।
  • लगभग 1,20,000 शौचालयों में पानी की आपूर्ति नहीं है और हज़ारों शौचालय ऐसे हैं जिन्हें कमज़ोर छतों, टूटे हुए दरवाज़ों, पानी के खराब पाइपों आदि के कारण पूरी तरह से त्याग दिया गया है।

खुले में शौच: ग्रामीण भारत में यह भी देखा गया है कि जैसे ही शौचालय का उपयोग एक समस्या बन जाता है खुले में शौच करने की प्रवृत्ति में चार गुना बढ़ जाती है। खुले में शौच के अधिकांश स्थान कचरा स्थलों और स्थानीय जल निकायों के निकट होते है।

  • इन कचरा स्थलों पर बड़ी संख्या में प्रयुक्त मास्क, पीपीई किट और अपशिष्ट भी होते हैं।
  • इस महामारी ने भारत के स्वच्छता कर्मचारियों को मलमूत्र और संक्रमित COVID-19 गियर (उपकरण/औज़ार/कपड़े आदि) से भरे प्लास्टिक बैग को भी दूर के इलाकों में सामुदायिक शौचालयों आस-पास छोड़ने के लिये मज़बूर कर दिया है।

मैनुअल स्कैवेंजिंग: राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (National Commission of Safai Karamcharis- NCSK) के अनुसार, वर्ष 2013 और 2018 में किये गए सर्वेक्षणों के बाद यह पाया गया कि कुल 53,598 (अकेले उत्तर प्रदेश में 29,923) लोग मैनुअल स्कैवेंजिंग में लगे हुए थे।

  • तमिलनाडु में मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण सबसे अधिक मौतें दर्ज की गईं।
  • गुजरात में ऐसे मामले सबसे अधिक देखे गए जहाँ मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण हुई मौतों के लिये मुआवजा राशि का भुगतान नहीं किया गया था, इस क्रम में गुजरात के बाद महाराष्ट्र का स्थान था।

बायोमेडिकल अपशिष्ट का उत्पादन: नवंबर 2020 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अप्रैल और नवंबर के बीच लगभग 33,000 टन कोविड -19 बायोमेडिकल अपशिष्ट उत्पन्न किया।

  • महामारी से पहले, भारत में नियमित बायोमेडिकल कचरे का उत्पादन 610 मीट्रिक टन प्रति दिन था, लेकिन अब इसका उत्पादन 765.5 मीट्रिक टन प्रति दिन हो गया है।
  • शीर्ष 10 अपशिष्ट उत्पादकों जिसमें उत्तर प्रदेश और दिल्ली भी शामिल हैं, में महाराष्ट्र ने बायोमेडिकल अपशिष्ट का सर्वाधिक उत्पादन किया। 

लिंग आधारित स्वच्छता असुरक्षा: स्वच्छता सुविधाओं की कमी या अनुपलब्धता के बारे में महिलाओं को कुछ असुरक्षा जैसे कुछ विषम बोझों का सामना करना पड़ता है।

  • शौचालय सुविधा की तलाश करते समय या खुले में शौच के लिये जाते समय महिलाएँ अपने जीवन के प्रति खतरे का सामना करती हैं और असुरक्षित महसूस करती हैं।
  • परिणामस्वरूप शौचालय का उपयोग करने के लिये घर से बाहर निकलने की आवश्यकता को कम करने हेतु वे भोजन और पानी का उपभोग कम करती हैं।

उठाए जा सकने योग्य कदम:

  • शौचालयों की स्थिति का पुनर्मूल्यांकन: ग्रामीण भारत यहाँ तक कि सेनेटरी शौचालयों में असिंचित जल स्रोतों पर निर्भरता भारत में शौचालय निर्माण की स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता को दर्शाती है।
    • रख-रखाव प्रणालियों की भी तुरंत जाँच किये जाने की आवश्यकता है जो 5 साल पहले निर्मित शौचालयों की स्थिति का पुन: सर्वेक्षण करके किया जा सकता है।
  • स्वच्छता संबंधी श्रम में सुधार: हर एक कदम पर स्वच्छता व्यवहार और भारत में स्वच्छता संबंधी श्रम में सुधारों के आकलन के साथ-साथ स्वच्छता प्रणाली और पानी की व्यवस्था को एक साथ लाने की जरूरत है।
    • मैनुअल स्केवेंजिंग को पूरी तरह से समाप्त करने और मैला ढोने की प्रथा का प्रक्रियाबद्ध बनाने और इसके कारण होने वाली मौतों पर अंकुश लगाने के लिये मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध और उनका पुनर्वास (संशोधन) विधेयक, 2020 को लागू किया जाना चाहिये।
  • शुष्क शौचालय और हैंगिंग शौचालय का उन्मूलन: शुष्क शौचालय तथा हैंगिंग शौचालय दोनों का उपयोग अपने आस-पास के समुदायों को कोविड -19 से परे अन्य बीमारियों के उच्च जोखिम में डालता है। इसीलिये इनके निर्माण और उपयोग दोनों को समाप्त करने की आवश्यकता है।
  • बायोमेडिकल अपशिष्ट प्रबंधन: कोविड-19 कचरे को परिभाषित करना, विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट उत्पादकों की पहचान करना और पीपीई उपयोग से संबंधित जागरूकता के लिये बड़े पैमाने पर अभियान शुरू करना अनिवार्य हो गया है।
    • शहरी स्थानीय निकायों को अलग-अलग प्रकार के अपशिष्ट हेतु अलग-अलग कूड़ेदान उपलब्ध लाराने चाहिये और नागरिकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये ताकि कि वे स्रोत से अपशिष्ट के उत्पादन के समय ही उसे अलग-अलग कर सकें।
    • सरकार को उचित निगरानी रणनीतियों के साथ जैव चिकित्सा/बायोमेडिकल उपचार इकाइयों की क्षमता में भी वृद्धि करनी चाहिये और सभी हितधारकों जैसे डॉक्टर, नवोन्मेषक/इनोवेटर्स तथा चिकित्सा वस्तु एवं उपकरण निर्माताओं के साथ मिलकर अपशिष्ट के बोझ को कम करने की योजना बनानी चाहिये।
  • व्यवहार परिवर्तन सुनिश्चित करना: सूचना, शिक्षा और संचार के माध्यम से विशेष रूप से महिलाओं के लिये शौचालय एवं अन्य स्वच्छता सुविधाओं के प्रति जनता के व्यवहार में परिवर्तन करना आवश्यक हो गया है।

निष्कर्ष:

COVID-19 महामारी के समय में शौचालय की परंपराओं ने भारत की स्वच्छता प्रणाली में विद्यमान कुछ प्रमुख खामियों को उजागर किया है, जहाँ मौजूदा अवसंरचनाओं पर ध्यान दिए जाने के बजाय नई अवसंरचनाओं के निर्माण पर अधिक ज़ोर दिया जाता है।

सरकार को खुले में शौच की समस्या, मैनुअल स्कैवेंजिंग और महिलाओं के लिये शौचालय एवं स्वच्छता सुविधाओं की कमी से सख्ती से निपटना चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: "खुले में शौच से मुक्त भारत की धारणा केवल एक व्यक्ति के प्रयास से पूरी नहीं होगी बल्कि इसके लिये सरकार और जनता के सहयोगात्मक दृष्टिकोण एवं कल्याणकारी नीतियों के साथ-साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव लाने की आवश्यकता है"। चर्चा कीजिये।

एसएमएस अलर्ट
 

नोट्स देखने या बनाने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

नोट्स देखने या बनाने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close

प्रोग्रेस सूची देखने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close

आर्टिकल्स को बुकमार्क करने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close