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भारतीय अर्थव्यवस्था

बढ़ती मुद्रास्फीति

  • 13 May 2022
  • 11 min read

यह एडिटोरियल 12/05/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Control inflation by acting on liquidity” लेख पर आधारित है। इसमें बढ़ती मुद्रास्फीति की समस्या और इसे नियंत्रित करने के लिये किये जा सकने वाले उपायों के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा रेपो दर को 40 आधार अंक और नकद आरक्षित अनुपात (CRR) को 50 आधार अंक तक बढ़ाने की हालिया कार्रवाई देश में मुद्रास्फीति की गंभीर स्थिति की पहचान करती है और इसे दूर करने का संकल्प व्यक्त करती है।

  • लगभग सभी देशों में मुद्रास्फीति चिंताजनक स्तर पर है। संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थिति सबसे खराब है जहाँ उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति (Consumer Price Inflation) 8.56% के स्तर पर पहुँच गई है जैसा पिछले कई दशकों से नहीं हुआ था। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति95% के स्तर पर थी (मार्च 2022 की स्थिति)। आगामी माहों में इसके और बढ़ने का अनुमान किया गया है।
  • दूसरी ओर, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) मुद्रास्फीति अप्रैल 2021 से दोहरे अंकों में बनी रही है। वर्ष 2021-22 के लिये जीडीपी अंतर्निहित मूल्य अपस्फीतिकारक आधारित मुद्रास्फीति दर (GDP Implicit Price Deflator-based Inflation Rate) 9.6% है।
  • इस संदर्भ में मुद्रास्फीति की समस्या और इसे नियंत्रित करने के लिये किये जा सकने वाले उपायों पर विचार करना आवश्यक है।

भारत में हाल ही में बढ़ती मुद्रास्फीति के कारण क्या हैं?

  • भारत में मुद्रास्फीति को केवल लागत-प्रेरित (Cost-Push) नहीं माना जा सकता। तरलता (liquidity) की प्रचुरता भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है।
    • अप्रैल के मौद्रिक नीति वक्तव्य में5 लाख करोड़ रुपए तक के ‘लिक्विडिटी ओवरहैंग’ की बात कही गई थी ।
    • एक सीमा से आगे मुद्रास्फीति स्वयं विकास के लिये बाधक बन सकती है। बचत पर ब्याज की ऋणात्मक वास्तविक दरें वृद्धि के अनुकूल नहीं होती हैं। यदि हम मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना चाहते हैं तो जमा और ऋण पर ब्याज दर में सहवर्ती वृद्धि के साथ तरलता पर कार्रवाई करना बेहद आवश्यक है।
  • मार्च 2022 में मुद्रास्फीति की उच्च दर मुख्य रूप से कच्चे पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, खनिज तेल, मूल धातुओं आदि की कीमतों में वृद्धि के कारण थी जो रूस-यूक्रेन संघर्ष से वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आए व्यवधान से प्रेरित थी।
  • दूसरी ओर, खुदरा मुद्रास्फीति मुख्य रूप से ‘तेल एवं वसा’, सब्जियों और ‘मांस एवं मछली’ (प्रोटीन-समृद्ध उत्पादों) जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि के कारण बढ़ी।
    • CPI आँकड़े के अनुसार, मार्च माह में ‘तेल एवं वसा’ में मुद्रास्फीति बढ़कर79% हो गई क्योंकि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण उत्पन्न भू-राजनीतिक संकट ने खाद्य तेल की कीमतों को उच्च कर दिया।
    • यूक्रेन सूरजमुखी तेल का प्रमुख निर्यातक है। सब्जियों के मामले में मुद्रास्फीति मार्च में बढ़कर64 प्रतिशत हो गई, जबकि ‘मांस एवं मछली’ उत्पादों के मामले में फ़रवरी 2022 की तुलना में मूल्य वृद्धि की दर 9.63 रही।
  • दुनिया भर में पण्य/कमोडिटी की कीमतों में तेज़ वृद्धि भारत में मुद्रास्फीति की वृद्धि का एक प्रमुख कारण है। यह कुछ महत्त्वपूर्ण उपभोग्य सामग्रियों के लिये आयात लागत में वृद्धि कर रहा है, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ती जा रही है।

रेपो रेट और CRR

  • रेपो रेट RBI द्वारा तब लिया जाने वाला ब्याज है जब वाणिज्यिक बैंक केंद्रीय बैंक को अपनी प्रतिभूतियों को बेचकर उनसे उधार लेते हैं। अनिवार्यतः यह RBI द्वारा तब वसूला जाने वाला ब्याज है जब बैंक उनसे उधार लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वाणिज्यिक बैंक हमसे कार ऋण या गृह ऋण के लिये ब्याज लेते हैं।
  • नकद आरक्षित अनुपात (CRR) के अंतर्गत वाणिज्यिक बैंकों को केंद्रीय बैंक के पास जमा राशि की एक निश्चित न्यूनतम राशि आरक्षित रखनी होती है। बैंक की कुल जमाराशियों के मुकाबले भंडार में रखे जाने के लिये आवश्यक नकदी का प्रतिशत नकद आरक्षित अनुपात कहलाता है।

भारत में उच्च मुद्रास्फीति का प्रभाव 

  • रेपो दर:
    • इससे अपेक्षा रहती है कि बैंकिंग प्रणाली में ब्याज दरों में बढ़ोतरी होगी। घर, वाहन और अन्य व्यक्तिगत और कॉर्पोरेट ऋणों पर मासिक किस्त (EMIs) बढ़ने की संभावना रहती है।
    • जमा दरों, मुख्य रूप से निश्चित अवधि की दरों में भी वृद्धि होना तय होता है।
    • रेपो रेट में बढ़ोतरी से खपत और मांग पर असर पड़ सकता है।
  • CRR:
    • CRR में बढ़ोतरी से बैंकिंग प्रणाली से 87 हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान होगा। बैंकों के उधार देने योग्य संसाधन तदनुसार कम हो जाएँगे।
    • इसका अर्थ यह भी है कि फंड की लागत बढ़ जाएगी और बैंकों के शुद्ध ब्याज मार्जिन (Net interest margin- NIM) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
    • NIM एक बैंक या अन्य वित्तीय संस्थान द्वारा अर्जित ब्याज आय और अपने उधारदाताओं (उदाहरण के लिये, जमाकर्ताओं) को भुगतान किये जाने वाले ब्याज के बीच के अंतर की माप है जो ब्याज अर्जित करने वाली उनकी परिसंपत्ति के मान के सापेक्ष है।

बढ़ती मुद्रास्फीति से निपटने में चुनौतियाँ

  • मौजूदा परिदृश्य में यह तर्क दिया जाता है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी का कुछ हिस्सा सरकार वहन कर लेती है तो मुद्रास्फीति कम हो जाएगी। पेट्रोलियम उत्पादों पर शुल्क कम करने का एक सरल कारण यह हो सकता है कि आबादी के एक हिस्से को अत्यधिक बोझ से बचाया जाए। खाद्य कीमतों के मामले में भी यही दृष्टिकोण लागू होता है।
    • लेकिन यह मानना गलत होगा कि यह कोई जादू की छड़ी है जिससे मुद्रास्फीति को टाला जा सकता है। यदि सरकार द्वारा वहन किये जाने वाले अतिरिक्त बोझ (राजस्व की हानि के माध्यम से) को व्यय द्वारा प्रतिसंतुलित नहीं किया जाता है तो समग्र घाटा और बढ़ जाएगा।
    • उधार कार्यक्रम में वृद्धि होगी और अतिरिक्त तरलता सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है।
  • केंद्रीय बैंक ब्याज दरों का आदेश नहीं दे सकते। ब्याज दर में वृद्धि को रोकने के लिये तरलता को कम करने हेतु उचित कार्रवाई की जानी चाहिये। CRR में वृद्धि से इसी उद्देश्य की पूर्ति होगी। CRR में वृद्धि के अभाव में खुले बाज़ार परिचालनों को तरलता को सोखना होगा।
    • RBI गवर्नर ने अपने बयान में कहा भी था कि ‘‘तरलता की स्थिति को नीतिगत कार्रवाई और रुख के अनुरूप संशोधित करने की आवश्यकता है ताकि शेष अर्थव्यवस्था में उनका पूर्ण और कुशल संचरण सुनिश्चित हो सके।’’

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिये क्या किया जा सकता है?

  • ईंधन शुल्क में कटौती:
    • विशेषज्ञों के अनुसार शुल्क में कम से कम 5 रुपये प्रति लीटर की कटौती की जानी चाहिये।
    • यह मुद्रास्फीति को 15-20 bps तक कम कर सकता है।
    • इसका बिजली, परिवहन लागत पर तत्काल और द्वितीयक प्रभाव पड़ेगा।
    • तेल (इंडियन बास्केट) में 1% की वृद्धि WPI को 8 bps तक बढ़ा सकती है।
  • खाद्य कीमतें:
    • जमाखोरी की स्थिति में आपूर्ति पक्ष पर कार्रवाई की जानी चाहिये
    • दलहन, तिलहन पर आयात सीमा को सरल किया जाना चाहिये
  • शुल्क में और कटौती:
    • खाद्य तेल आयात के लिये शुल्क में और कटौती की आवश्यकता है। हालाँकि इसे25% से घटाकर 13.75% कर दिया गया था।
  • बफर स्टॉक:
    • यदि मुद्रास्फीति का विस्तार खाद्यान्न तक होता है तो बफर स्टॉक का उपयोग करने के लिये तैयार रहना चाहिये
    • WPI प्राथमिक खाद्य कीमतों में 1% की वृद्धि से CPI 48 bps तक बढ़ सकती है
  • अन्य उपाय:
    • तेज़ विकास पर बल: 10% अधिक औद्योगिक उत्पादन खुदरा मुद्रास्फीति को 40 bps तक कम कर सकता है
    • आपूर्ति बाधाओं को संबोधित करना
    • निम्न आय परिवारों पर बोझ कम करने के लिये आय सृजन क्षमता को बढ़ावा देना

अभ्यास प्रश्न: “भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा रेपो दर और नकद आरक्षित अनुपात (CRR) को बढ़ाने की हालिया कार्रवाई देश में मुद्रास्फीति की गंभीर स्थिति की पहचान करना है।’’ बढ़ती मुद्रास्फीति के कारणों की चर्चा कीजिये और इसे नियंत्रित कर सकने के उपाय सुझाइए।

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