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ग्रीष्म लहर से निपटने हेतु उपाय

  • 14 May 2022
  • 17 min read

यह एडिटोरियल 11/05/2022 को ‘हिंदू बिजनेसलाइन’ में प्रकाशित “Long-Term Plan Needed to Combat Heat Waves” लेख पर आधारित है। इसमें ग्रीष्म लहरों के हानिकारक प्रभावों की चर्चा की गई है और इससे निपटने हेतु दीर्घकालिक रणनीतियों का सुझाव दिया गया है।

संदर्भ

भारत लगातार जारी ग्रीष्म लहरों (Heat Waves) के चपेट में है। अप्रैल 2022 में उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में तापमान पिछले 122 वर्षों में सर्वाधिक उच्च स्तर पर दर्ज किया गया।

  • ग्रीष्म लहर भारत के लिये कोई नई परिघटना नहीं है, लेकिन इस वर्ष उल्लेखनीय यह है कि उसका समयपूर्व आगमन हुआ है और देश के उत्तर-पश्चिमी से दक्षिण-पूर्वी हिस्सों तक उसका व्यापक स्थानिक प्रसार रहा है।
  • यह उपयुक्त समय है कि देश को ग्रीष्म लहरों और संबद्ध चरम मौसमी घटनाओं से निपटने के लिये ठोस योजनाओं का निर्माण करना चाहिये। ग्रीष्म लहरों के जानलेवा प्रभावों को कम करने के लिये पूर्व-चेतावनी प्रणाली, हीट-प्रूफ शेल्टर और व्यापक रूप से वृक्षारोपण महत्त्वपूर्ण है।

ग्रीष्म लहरें क्या हैं और इसकी उत्पत्ति के क्या कारण हैं?

  • ग्रीष्म लहर असामान्य रूप से उच्च तापमान की अवधि है जो भारत के उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण-मध्य भागों में ग्रीष्मकाल के दौरान उत्पन्न होती है। यह वायु के तापमान की वह स्थिति है जिसके संपर्क में आना मानव शरीर के लिये घातक हो जाता है।
  • भारत मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department- IMD) उस स्थिति को ग्रीष्म लहर के रूप में वर्गीकृत करता है जब मैदानी इलाकों में तापमान कम से कम 40℃ (और पहाड़ी क्षेत्रों में कम से कम 30℃) तक पहुँच जाए और यह सामान्य तापमान से कम से कम 5-6℃ की वृद्धि को इंगित करता हो।
  • भीषण गर्मी का आसन्न कारण वर्षा-युक्त पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) या उष्णकटिबंधीय तूफान की अनुपस्थिति है जो उत्तर भारत में भूमध्यसागर से वर्षा लाते हैं।
    • भारत में पहले से ही गर्म शहरों में ग्लोबल वार्मिंग और जनसंख्या वृद्धि का संयोजन बढ़ते हुए ‘हीट एक्सपोज़र’ का प्राथमिक चालक है।
    • ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (UHI) शहरों के भीतर भी तापमान की वृद्धि करता है, जिसकी त्वरा ग्रीष्म लहरों के दौरान और बढ़ जाती है।
      • यह स्थिति तब बनती है जब जब शहर प्राकृतिक भूमि आवरण को फुटपाथ, इमारतों और अन्य ठोस सतहों के घने सांद्रता से प्रतिस्थापित कर देते हैं जो गर्मी को अवशोषित करते हैं और देर तक बनाए रखते हैं।

भारत में ग्रीष्म लहरों की तीव्रता कितनी बढ़ गई है?

  • मई-जून के माह में भारत में ग्रीष्म लहरों की उपस्थिति एक सामान्य घटना है, लेकिन देश के कई हिस्सों में धीरे-धीरे बढ़ते अधिकतम तापमान के कारण वर्ष 2022 में ग्रीष्म लहरों की समय-पूर्व उत्पत्ति की स्थिति बनी।
  • IMD के अनुसार भारत में ग्रीष्म लहर दिवसों (heatwave days) की संख्या वर्ष 1981-1990 के 413 से बढ़कर वर्ष 2011-2020 में 600 हो गई है।
    • ग्रीष्म लहर दिवसों की संख्या में यह तेज़ वृद्धि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के कारण घटित हुई है।
  • ग्रीष्म लहरों के कारण जान गँवाने वाले लोगों की संख्या भी वर्ष 1981-1990 में 5,457 से बढ़कर वर्ष 2011-2020 में 11,555 हो गई है। वर्ष 1967 से अब तक पूरे भारत में ग्रीष्म लहरों के कारण 39,815 लोगों की मौत हो चुकी है।

ग्रीष्म लहरों की तीव्रता का राज्य-विशिष्ट परिदृश्य

  • भू-जलवायु और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण सबसे अधिक मौतें उत्तर प्रदेश (6,745) में हुई हैं; इसके बाद आंध्र प्रदेश (5,088), बिहार (3,364), महाराष्ट्र (2,974), पंजाब (2,720), मध्य प्रदेश (2,607), पश्चिम बंगाल (2,570), ओडिशा (2,406), गुजरात (2,049), राजस्थान (1,951), तमिलनाडु (1,443), हरियाणा (1,116), तेलंगाना (1,067), दिल्ली (996), झारखंड ( 855), कर्नाटक (560), असम (348) आदि राज्यों का स्थान है, जबकि शेष 12 राज्यों में 954 लोग मौत के शिकार हुए।
  • महाराष्ट्र स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इस साल भीषण गर्मी ने राज्य में 25 लोगों की जान ले ली है।

ये ग्रीष्म लहरें कितनी हानिकारक हैं?

  • मानव मृत्यु दर: बढ़ते तापमान, जन जागरूकता कार्यक्रमों की कमी और अपर्याप्त दीर्घकालिक शमन उपायों के कारण ग्रीष्म लहरों से मृत्यु की स्थिति बनती है।
    • टाटा सेंटर फॉर डेवलपमेंट और शिकागो विश्वविद्यालय की वर्ष 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2100 तक जलवायु परिवर्तन से प्रेरित अत्यधिक ताप के कारण सालाना5 मिलियन से अधिक लोगों के मरने की संभावना होगी।
    • बढ़ी हुई गर्मी से मधुमेह और परिसंचरण एवं श्वसन संबंधी रोगों के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि होगी।
  • अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: ग्रीष्म लहरों की लगातार घटनाएँ अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। उदाहरण के लिये, कार्य दिवसों के नुकसान के कारण गरीब और सीमांत किसानों की आजीविका नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है। ग्रीष्म लहरों का इन श्रमिकों की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
    • वर्ष 2019 की ILO रिपोर्ट के अनुसार भारत ने वर्ष 1995 में ‘हीट स्ट्रेस’ (heat stress) के कारण लगभग3% कार्य घंटे गंवाए थे और वर्ष 2030 में इससे 5.8% कार्य घंटे गंवा देने की संभावना है।
      • रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2030 में हीट स्ट्रेस के कारण कृषि और निर्माण क्षेत्र दोनों में से प्रत्येक में04% कार्य घंटों का नुकसान हो सकता है।
  • फसल की क्षति और खाद्य असुरक्षा: अत्यधिक गर्मी और सूखे की घटनाओं से फसल उत्पादन का नुकसान हो रहा है और वृक्ष सूख रहे हैं।
    • चरम गर्मी से प्रेरित श्रम उत्पादकता हानि से खाद्य उत्पादन को अचानक लगने वाले झटके से स्वास्थ्य एवं खाद्य उत्पादन के लिये जोखिम और अधिक गंभीर हो जाएँगे।
    • ये परस्पर प्रभाव खाद्य कीमतों में वृद्धि करेंगे, घरेलू आय को कम कर देंगे और विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कुपोषण और जलवायु संबंधी मौतों को बढ़ावा देंगे।
  • श्रमिकों पर प्रभाव: वर्ष 2030 में कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों से संलग्न श्रमिक गंभीर रूप से प्रभावित होंगे क्योंकि भारत की एक बड़ी आबादी अपनी आजीविका के लिये इन क्षेत्रों पर निर्भर है।
    • भारत के लिये इस पर विचार करना भी उचित होगा कि अनिश्चित श्रम बाज़ार स्थिति वाले देशों और क्षेत्रों को इस तरह की चरम गर्मी के साथ उच्च उत्पादकता हानियों का सामना करना पड़ सकता है।
      • समग्र रूप से भारत में हीट स्ट्रेस के कारण वर्ष 2030 में लगभग 34 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियों का नुकसान हो सकता है।
  • कमज़ोर वर्गों पर विशेष प्रभाव: जलवायु विज्ञान समुदाय ने वृहत साक्ष्यों के साथ दावा किया है कि ग्रीनहाउस गैसों और एरोसोल के उत्सर्जन में वैश्विक स्तर पर उल्लेखनीय कटौती नहीं की जाएगी तो ग्रीष्म लहर जैसी चरम घटनाओं के भविष्य में और अधिक तीव्र, आवर्ती और दीर्घावधिक होने की ही संभावना है।
    • यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि भारत में ग्रीष्म लहर की घटनाओं (जैसी स्थिति अभी है) में हज़ारों कमज़ोर और गरीब लोगों को प्रभावित करने की क्षमता है, जबकि जलवायु संकट में उन्होंने सबसे कम योगदान किया है।

ग्रीष्म लहर प्रभाव शमन रणनीति के मामले में भारत की स्थिति

  • ऐसी आपदाओं से निपटने के लिये वर्ष 2015 से पहले कोई राष्ट्रस्तरीय ‘हीटवेव एक्शन प्लान’ मौजूद नहीं था।
    • क्षेत्रीय स्तर पर अहमदाबाद नगर निगम (AMC) ने वर्ष 2010 में विनाशकारी ग्रीष्म लहरों से हुई मौतों के बाद वर्ष 2013 में पहला हीट एक्शन प्लान तैयार किया था।
  • वर्ष 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority- NDMA) ने ग्रीष्म लहरों के प्रभाव को कम करने हेतु राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख रणनीति तैयार करने के लिये व्यापक दिशानिर्देश जारी किये थे।
  • हालाँकि चरम मौसम संबंधी आघातों के शमन और उनके प्रति अनुकूलन के लिये कुछ निवारक उपाय किये गए हैं, लेकिन इस तरह की पहलें ग्रीष्म लहरों से लोगों की मौतों को रोकने के लिये अपर्याप्त ही साबित हुई हैं क्योंकि निवारक उपायों, शमन और तैयारी कार्यों को लागू करना जटिल बना हुआ है।

ग्रीष्म लहरों के प्रभावों को कम करने के लिये भारत को कौन-सी दीर्घकालिक रणनीतियाँ अपनाने की आवश्यकता है?

  • हीटवेव एक्शन प्लान’: ग्रीष्म लहरों के प्रतिकूल प्रभाव से संकेत मिलता है कि ‘हीटवेव ज़ोन’ में ग्रीष्म लहरों के प्रभाव को कम करने हेतु प्रभावी आपदा अनुकूलन रणनीतियों और अधिक सुदृढ़ आपदा प्रबंधन नीतियों की आवश्यकता है।
    • चूँकि ग्रीष्म लहरों के कारण होने वाली मौतों को रोका जा सकता है, इसलिये सरकार को मानव जीवन, पशुधन और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिये दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार करने को प्राथमिकता देनी चाहिये।
    • समय की आवश्यकता है कि ‘आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिये सेंडाई फ्रेमवर्क 2015-30’ (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction 2015-30) का प्रभावी कार्यान्वयन किया जाए जिसमें राज्य प्रमुख भूमिका निभाए और अन्य हितधारकों के साथ ज़िम्मेदारी साझा करे।
  • पूर्व-चेतावनी प्रणाली: बेहतर पूर्व-चेतावनी प्रणाली की स्थापना के साथ ग्रीष्म लहरों से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। यह प्रणाली ग्रीष्म लहर संबंधी खतरों की सूचना देने, विभिन्न निवारक उपायों की सिफारिश करने और आपदा प्रभावों को कम करने की दिशा में उल्लेखनीय योगदान कर सकती है।
    • प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया के माध्यम से जन जागरूकता के प्रसार, ग्रीष्मकाल के दौरान हीट-प्रूफ आश्रय सुविधाएँ उपलब्ध कराने, सार्वजनिक पेयजल तक आसान पहुँच सुनिश्चित करने और शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक वनीकरण से ग्रीष्म लहर से होने वाली मौतों को कम करने में मदद मिलेगी।
  • ग्रीष्म लहर को प्राकृतिक आपदा घोषित करना: ग्रीष्म लहर को प्रमुख आपदा घोषित करना समय की मांग है। भारत को जन जागरूकता के निर्माण में, विशेष रूप से व्यक्तियों और स्थानीय समुदाय द्वारा स्वयं की देखभाल कर सकने के संदर्भ में, अभी भी लंबा रास्ता तय करना है।
    • इसके अलावा, स्कूलों में गर्मी छुट्टी की घोषणा अथवा घरों में आवश्यक शीतलन हेतु प्रबंधों अथवा घर से बाहर रह सकने (यदि बाहर रहना अपरिहार्य ही हो) की अधिकतम समय सीमा आदि के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किये जाने की आवश्यकता है।
  • स्थानीय स्तर पर तैयारी: ग्रीष्म लहर बाढ़ के बाद भारत की दूसरी सबसे घातक आपदा है। ग्रीष्म लहर को प्राकृतिक आपदा घोषित किये जाने से राज्य और ज़िला प्रशासन को क्षेत्रीय स्तर पर हीटवेव एक्शन प्लान तैयार करने में मदद मिलेगी।
    • यह प्रत्यास्थी अवसंरचना के निर्माण, पूर्व-चेतावनी अवसंरचना के विकास और जन जागरूकता के सृजन में सहायता करेगा।
    • ग्रीष्म लहर के कारण मौत का शिकार हुए लोगों के संबंध में आयु, लिंग और व्यवसाय के आधार पर ज़िला-स्तरीय डेटाबेस तैयार करना भी महत्त्वपूर्ण है।
  • UHIs को कम करने के लियेपैसिव कूलिंग’: पैसिव कूलिंग प्रौद्योगिकी—जो प्राकृतिक रूप से हवादार इमारतों के निर्माण में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली रणनीति है, आवासीय और वाणिज्यिक भवनों के लिये अर्बन हीट आइलैंड की समस्या को संबोधित करने हेतु एक बेहद उपयोगी विकल्प हो सकती है।
    • IPCC की AR6 रिपोर्ट में प्राचीन भारतीय भवन डिज़ाइनों का हवाला दिया गया है जहाँ इस प्रौद्योगिकी का उपयोग किया गया है। इसे ग्लोबल वार्मिंग के संदर्भ में आधुनिक भवनों के अनुकूल बनाया जा सकता है।
  • डार्क रूफ्सको प्रतिस्थापित करना: ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरों के अत्यधिक गर्म होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि वे गहरे रंग की छतों, सड़कों और पार्किंग स्थलों से ढके हुए हैं जो गर्मी को अवशोषित करते हैं और उन्हें देर तक बनाए रखते हैं।
    • दीर्घकालिक समाधानों में से एक यह होगा कि गहरे रंग की इन सतहों को हल्के रंग के और अधिक हल्का और परावर्तक सामग्री से प्रतिस्थापित किया जाए; यह अपेक्षाकृत शीतल वातावरण का निर्माण करेगा।

अभ्यास प्रश्न: ‘‘बाढ़ के बाद ग्रीष्म लहर भारत की दूसरी सबसे घातक आपदा है और इसे प्राकृतिक आपदा घोषित करना समय की आवश्यकता बन गई है।’’ चरम ग्रीष्म लहरों के प्रभावों को कम करने के लिये कुछ दीर्घकालिक उपायों के सुझाव दीजिये।

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