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भारतीय राजनीति

छठी अनुसूची में लद्दाख: स्थानीय मांगों को मानना

  • 12 Feb 2024
  • 23 min read

यह एडिटोरियल 06/02/2024 को ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित “Listen to Ladakh” लेख पर आधारित है। इसमें लद्दाख में हाल के विरोध प्रदर्शनों के पीछे अंतर्निहित कारणों की पड़ताल की गई है, जहाँ अलग राज्य के दर्जे और छठी अनुसूची में शामिल किये जाने की मांग की जा रही है।

प्रिलिम्स के लिये:

लद्दाख, छठी अनुसूची, रेशम मार्ग, पैंगोंग त्सो, केंद्रशासित प्रदेश, स्वायत्त जिला परिषदें (ADCs)

मेन्स के लिये:

लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग के पीछे तर्क, लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने के खिलाफ तर्क।

हाल के दिनों में लद्दाख में राज्य का दर्जा और संविधान में अपनी पहचान बनाए रखने को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारी मांग कर रहे हैं कि लद्दाख का राज्य का दर्जा पुनर्बहाल किया जाए। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में लद्दाख को विधानसभा-रहित केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया था। उनकी यह भी मांग है कि लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत एक जनजातीय क्षेत्र के रूप में मान्यता दी जाए, साथ ही लेह और कारगिल दोनों ज़िलों के लिये संसदीय सीट स्थापित की जाए तथा स्थानीय लोगों को नौकरी में आरक्षण दिया जाए।

लद्दाख भारत के लिये किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है?

  • भू-राजनीतिक महत्त्व: लद्दाख को ‘दर्रों की भूमि’ (Land of Passes/La-passes/dakh-land) के रूप में भी जाना जाता है। दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पूर्वी एशिया के चौराहे पर लद्दाख की रणनीतिक अवस्थिति इसे अत्यधिक भू-राजनीतिक महत्त्व प्रदान करती है।
  • रणनीतिक महत्त्व: यह भारत और इसके पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान सहित) के बीच एक बफ़र ज़ोन के रूप में कार्य करता है। लद्दाख क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान के साथ जारी सीमा विवाद भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा में इसके महत्त्व को रेखांकित करते हैं।
    • भारतीय सशस्त्र बल बाहरी खतरों का मुकाबला करने और भारत की सीमाओं की सुरक्षा के लिये लद्दाख में एक प्रबल उपस्थिति बनाए रखते हैं।
  • पर्यटन क्षमता: ‘लामा लैंड’ या ‘लिटिल तिब्बत’ के नाम से लोकप्रिय लद्दाख लगभग 9,000 फीट से 25,170 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। ट्रैकिंग और पर्वतारोहण से लेकर विभिन्न मठों की बौद्ध यात्राओं तक, लद्दाख में पर्यटन के लिये बहुत कुछ है।
  • आर्थिक महत्त्व: लद्दाख में, विशेष रूप से पर्यटन, कृषि एवं नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में, विशाल अप्रयुक्त आर्थिक क्षमता मौजूद है।
    • पैंगोंग और त्सो मोरीरी जैसी स्वच्छ झीलों एवं पहाड़ों के साथ यह क्षेत्र लुभावने भूदृश्य रखता है जो रोमांच और शांति की इच्छा रखने वाले पर्यटकों को आकर्षित करता है।
  • पर्यावरणीय महत्त्व: लद्दाख की उपजाऊ घाटियाँ और नदी बेसिन जैविक खेती एवं बागवानी सहित कृषि विकास के वृहत अवसर प्रदान करती हैं। इसके अतिरिक्त, लद्दाख की प्रचुर धूप और पवन संसाधन इसे सौर एवं पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विकास के लिये अनुकूल बनाते हैं, जो भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों में योगदान कर सकते हैं।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: लद्दाख की भूमि प्राचीन रेशम मार्ग (Silk Route) पर स्थित है जो अतीत में संस्कृति, धर्म, दर्शन, व्यापार एवं वाणिज्य के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
    • यह क्षेत्र विविध जातीय समुदायों का घर है, जिनमें लद्दाखी, तिब्बती और बाल्टी लोग शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट परंपराएँ एवं रीति-रिवाज हैं।
      • हेमिस, थिकसे और दिस्कित के सदियों पुराने मठ आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में कार्य करते हैं, जिन्होंने प्राचीन बौद्ध शिक्षाओं और अभ्यासों को आज भी संरक्षित कर रखा है।

छठी अनुसूची में शामिल करने की लद्दाख की मांग के पक्ष में कौन-से तर्क मौजूद हैं?

  • प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना: वर्ष 2019 में जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को बिना विधानसभा के केंद्रशासित प्रदेश के रूप में निर्दिष्ट किया गया था। इस परिवर्तन के कारण निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में स्थानीय स्वायत्तता और प्रतिनिधित्व की हानि के बारे में चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
    • इससे पूर्व की स्थिति से तुलना की जाने लगी है, जहाँ लद्दाख जम्मू-कश्मीर विधानसभा में चार और विधान परिषद में दो सदस्य रखता था।
    • जब लद्दाख पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य का अंग था, तब क्षेत्र पर शासन करने वाली निर्वाचित संस्था ‘लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद’ (Ladakh Autonomous Hill Development Council- LAHDC) को उल्लेखनीय स्वायत्तता प्राप्त थी।
    • लेकिन अब जब यह क्षेत्र केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष शासन के अधीन है, लद्दाखी नेताओं का कहना है कि LAHDC को बेहद सीमित कर दिया गया है, जिससे राजनीतिक स्वत्व-हरण (political dispossession) की भावना पैदा हो रही है।
      • प्रतिनिधित्व की कमी से इस भय का संचार हो रहा है कि अब बाहरी लोग लद्दाख के लिये निर्णय लिया करेंगे।
  • लोक भागीदारी का अभाव: जम्मू-कश्मीर राज्य के एक अंग के रूप में लद्दाख को अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A के तहत विशेष दर्जे का विशेषाधिकार प्राप्त था। अब अशक्तीकरण की भावना बढ़ रही है, क्योंकि नौकरियों, भूमि, संस्कृति और पहचान के लिये सुरक्षा उपायों के अभाव के कारण असुरक्षा बढ़ गई है। विधायी निकाय की कमी का अर्थ है कि निर्णयन प्रक्रिया अब सार्वजनिक भागीदारी से नौकरशाही प्रक्रियाओं की ओर स्थानांतरित हो गई है।
  • लद्दाख का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र: उच्च तुंगता वाले मरुस्थलों, ग्लेशियरों और अल्पाइन घास मैदानों से चिह्नित लद्दाख का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र जैव विविधता का ‘हॉटस्पॉट’ है और कई दुर्लभ एवं लुप्तप्राय प्रजातियों के लिये एक महत्त्वपूर्ण पर्यावास के रूप में कार्य करता है।
    • जलवायु कार्यकर्ताओं ने हिमनद पारिस्थितिकी में खनन के संबंध में चिंता व्यक्त की है।
    • लद्दाख के लोगों को भी है कि यदि उद्योग स्थापित किये जाएँगे तो ऐसे प्रत्येक उद्योग लाखों लोगों को क्षेत्र में लेकर आएँगे और लद्दाख का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र इतने सारे लोगों का बोझ नहीं उठा सकेगा।
    • लद्दाख के भीतर जल संसाधनों का सावधानीपूर्वक प्रबंधन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह न केवल लद्दाखियों की आजीविका एवं लद्दाख के पारिस्थितिकी तंत्र के लिये बल्कि संपूर्ण नदी प्रणाली के स्वास्थ्य के लिये भी महत्त्वपूर्ण है।
  • संवेदनशील सीमा क्षेत्र: लद्दाख की नाजुक स्थिति चीन एवं पाकिस्तान दोनों के साथ लगती सीमाओं के कारण और जटिल हो जाती है। पूर्वी लद्दाख में चीन के PLA के साथ जारी सैन्य गतिरोध के साथ ही भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में तनाव बढ़ाने के पाकिस्तान के लगातार प्रयासों से एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा चुनौती उत्पन्न होती है।
  • सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण: छठी अनुसूची में शामिल होने से लद्दाख की अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक रीति-रिवाजों की रक्षा के लिये कानूनी सुरक्षा उपाय उपलब्ध होंगे। छठी अनुसूची जनजातीय समुदायों को शासन में कुछ हद तक स्वायत्तता प्रदान करती है, जिससे वे अपने कार्यों एवं संसाधनों का प्रबंधन स्वयं करने में सक्षम होते हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक विकास: आलोचकों का तर्क है कि युवा कार्यबल के लिये रोज़गार के अवसर पैदा करने के मामले में केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन का प्रदर्शन उल्लेखनीय रूप से कमज़ोर रहा है।
    • केंद्रशासित प्रदेश की स्थापना को चार वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन प्रदेश में लोक सेवा आयोग स्थापित नहीं किये जाने से युवाओं में आक्रोश है।
    • लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश के भीतर एक व्यापक रोज़गार नीति का अभाव एक गंभीर मुद्दा है जो स्थिति को और जटिल बनाता है।
    • छठी अनुसूची के तहत दी गई स्वायत्तता स्थानीय रूप से प्रासंगिक विकास पहलों के सूत्रीकरण एवं कार्यान्वयन को सुगम बना सकती है, जिससे सामाजिक-आर्थिक परिणामों में सुधार हो सकता है।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाना: छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त परिषदों की स्थापना से ज़मीनी स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाएँ सशक्त होंगी और समावेशी शासन एवं जवाबदेही को बढ़ावा मिलेगा।

छठी अनुसूची क्या है?

  • अनुच्छेद 244: अनुच्छेद 244 के तहत छठी अनुसूची स्वायत्त प्रशासनिक प्रभागों—स्वायत्त ज़िला परिषदों (Autonomous District Councils- ADCs)—के गठन का प्रावधान करती है, जिनके पास राज्य के भीतर कुछ विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक स्वायत्तता होती है।
  • वर्तमान स्थिति: छठी अनुसूची में चार पूर्वोत्तर राज्यों—असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिये विशेष प्रावधान किये गए हैं।

  • स्वायत्त ज़िले (Autonomous Districts): इन चार राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िलों के रूप में गठित किया गया है। राज्यपाल के पास स्वायत्त ज़िलों को सुगठित एवं पुनर्गठित करने का अधिकार है।
  • ज़िला परिषद (District Council): प्रत्येक स्वायत्त ज़िले में एक ज़िला परिषद होती है जिसमें 30 सदस्य होते हैं। इनमें से 4 राज्यपाल द्वारा नामित होते हैं और शेष 26 वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं।
  • परिषद की शक्तियाँ: ज़िला और क्षेत्रीय परिषदें अपने अधिकार क्षेत्र के तहत क्षेत्रों का प्रशासन करती हैं।
    • वे कुछ निर्दिष्ट मामलों—जैसे भूमि, जंगल, नहर का पानी, झूम खेती, ग्राम प्रशासन, संपत्ति उत्तराधिकार, विवाह एवं तलाक, सामाजिक रीति-रिवाज आदि पर कानून बना सकती हैं। लेकिन ऐसे सभी कानूनों के लिये राज्यपाल की सहमति की आवश्यकता होती है।
    • वे जनजातियों के बीच मुकदमों की सुनवाई के लिये ग्राम परिषदों या अदालतों का गठन कर सकती हैं। वे उनसे अपील भी सुनती हैं। इन मुकदमों और मामलों पर उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।
    • ज़िला परिषद ज़िले में प्राथमिक विद्यालयों, औषधालयों, बाज़ारों, घाटों, मत्स्य पालन, सड़कों आदि की स्थापना, निर्माण या प्रबंधन कर सकती है।
    • उन्हें भू-राजस्व के आकलन एवं संग्रहण करने और कुछ निर्दिष्ट कर लगाने का अधिकार भी दिया गया है।

लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने के विरुद्ध कौन-से तर्क मौजूद हैं?

  • कानूनी और प्रशासनिक बाधाएँ: गृह मंत्रालय ने लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने के लिये संविधान में संशोधन संबंधी संभावित चुनौतियों को उजागर किया है और कहा है कि इस तरह के कदम के लिये संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी।
    • मंत्रालय के अनुसार, संविधान में स्पष्ट रूप से छठी अनुसूची पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिये आरक्षित है, जबकि देश के अन्य हिस्सों के जनजातीय क्षेत्र पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं।
  • निर्णय लेने में संभावित देरी: कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि छठी अनुसूची में लद्दाख को शामिल करने से क्षेत्र की शासन संरचना में जटिलताएँ बढ़ सकती हैं, जिससे संभावित रूप से प्रशासनिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं और निर्णयन प्रक्रियाओं में देरी हो सकती है।
  • समावेशन के प्रयास पहले से ही जारी: केंद्र सरकार ने हाल ही में एक संसदीय स्थायी समिति को सूचित किया कि जनजातीय आबादी को छठी अनुसूची के तहत शामिल करने का उद्देश्य उनके समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास को सुनिश्चित करना है, जिसका लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन पहले से ही ध्यान रख रहा है और लद्दाख की समग्र विकासात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पर्याप्त धन प्रदान किया जा रहा है ।
  • आरक्षण में वृद्धि: राज्यसभा में हाल ही में प्रस्तुत की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, लद्दाख प्रशासन ने हाल ही में सीधी भर्ती में अनुसूचित जनजातियों के लिये आरक्षण को 10% से बढ़ाकर 45% कर दिया है, जिससे जनजातीय आबादी को उनके विकास में पर्याप्त मदद मिलेगी।
  • आर्थिक विकास में बाधा: केंद्रशासित प्रदेश होने के रूप में लद्दाख में सड़कों, हवाई पट्टियों और संचार नेटवर्क सहित अवसंरचना के विकास में केंद्रित निवेश की अनुमति मिलती है। आलोचकों का तर्क है कि छठी अनुसूची में शामिल किये जाने से भूमि उपयोग, संसाधन दोहन और निवेश के अवसरों पर नियंत्रण के कारण लद्दाख के आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
  • कमान की स्पष्ट शृंखला: चूँकि लद्दाख प्रत्यक्ष रूप से केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल (लेफ्टिनेंट गवर्नर) द्वारा शासित होता है, इसलिये इस क्षेत्र में सुरक्षा अभियानों के लिये कमान की एक स्पष्ट शृंखला मौजूद है। इससे चीनी घुसपैठ का जवाब देने में सेना, अर्द्धसैनिक बलों और स्थानीय प्रशासन के बीच प्रभावी समन्वय की सुविधा प्राप्त होती है।
    • केंद्रशासित प्रदेश के रूप में लद्दाख की स्थिति इस क्षेत्र पर भारत की संप्रभुता को सुदृढ़ करती है और सीमा विवादों पर चीन के साथ वार्ता में इसकी राजनयिक स्थिति को प्रबल करती है।

आगे की राह

  • सार्थक संवाद: सरकार को विरोध प्रदर्शन में शामिल हितधारकों—जिसमें लद्दाख के स्थानीय समुदायों, राजनीतिक संगठनों और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं, के साथ सार्थक संवाद शुरू करना चाहिये।
    • इस संवाद का उद्देश्य छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को प्रेरित करने वाली अंतर्निहित शिकायतों, आकांक्षाओं एवं चिंताओं को समझना होना चाहिये।
  • व्यवहार्यता का आकलन: लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की व्यवहार्यता एवं निहितार्थ का आकलन करने के लिये एक गहन मूल्यांकन किया जाना चाहिये।
    • इस मूल्यांकन में कानूनी, प्रशासनिक, सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक कारकों के साथ-साथ क्षेत्र में शासन, विकास एवं सुरक्षा पर इसके संभावित प्रभावों पर भी विचार किया जाना चाहिये।
  • लोगों का भरोसा जीतना: लोगों का भरोसा जीतने के लिये, सरकारी निर्णय और वादे एक निर्धारित समय सीमा के भीतर मूर्त होने चाहिये।
    • छठी अनुसूची में शामिल किये जाने की लद्दाख की मांग को संबोधित करने की प्रक्रिया उभरती परिस्थितियों के अनुसार पुनरावृत्तीय एवं उत्तरदायी होनी चाहिये।
  • स्थानीय शासन को बेहतर बनाना: सरकार को क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक विकास एवं सांस्कृतिक संरक्षण को बढ़ावा देने के लिये समावेशी स्थानीय शासन, अधिक स्वायत्तता एवं लक्षित नीति हस्तक्षेप हेतु बेहतर प्रयास सुनिश्चित करना चाहिये।
  • संवेदनशील नीति निर्माण: भारत के नीति निर्माताओं को लद्दाख के लिये अपनी नीतियों का मसौदा तैयार करते समय इसकी भौगोलिक स्थिति, नाजुक पर्यावरण, संसाधन क्षमता एवं लोगों की आकांक्षाओं पर विचार करना चाहिये। ऐसे रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण भूभाग में इसका पूरा लाभ उठाने के लिये इन सभी पहलुओं को सामंजस्य में रखना अत्यंत आवश्यक है।
  • क्रमिक और चरणबद्ध दृष्टिकोण: मुद्दे की जटिलता और इसमें शामिल विविध हितों को देखते हुए, छठी अनुसूची के तहत लद्दाख की स्थिति पर कोई भी निर्णय क्रमिक एवं चरणबद्ध दृष्टिकोण के माध्यम से लिया जाना चाहिये।
    • इसके पूर्णरूपेण कार्यान्वयन से पहले विभिन्न विकल्पों की व्यवहार्यता एवं प्रभावशीलता का परीक्षण करने के लिये पायलट परियोजनाओं, प्रयोग या चरणबद्ध कार्यान्वयन रणनीतियों को आजमाना शामिल हो सकता है।

निष्कर्ष:

लद्दाख में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व भारत की सुरक्षा रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक होना चाहिये। सरकार लद्दाख के लोगों को निर्णय लेने की प्रक्रियाओं, विशेष रूप से सुरक्षा एवं शासन से संबंधित प्रक्रियाओं में प्रतिनिधित्व देना सुनिश्चित कर, क्षेत्र के हितों की रक्षा करने और सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान करने के प्रयासों में स्थानीय स्वामित्व एवं भागीदारी को बढ़ा सकती है।

अभ्यास प्रश्न: भारत की विकास रणनीति में लद्दाख को पर्याप्त लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व सौपना शामिल होना चाहिये। टिप्पणी कीजिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. संविधान के निम्नलिखित में से किस प्रावधान का भारत की शिक्षा पर प्रभाव पड़ता है? (2012)

  1. राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत 
  2.  ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय निकाय 
  3.  पाँचवीं अनुसूची 
  4.  छठी अनुसूची 
  5.  सातवीं अनुसूची

निम्नलिखित कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3, 4 और  5
(c) केवल 1, 2 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर- (d)


मेन्स:

प्रश्न. क्या कारण है कि भारत में जनजातियों को ‘अनुसूचित जनजातियाँ’ कहा जाता है? भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित उनके उत्थान के लिये प्रमुख प्रावधानों को सूचित कीजिये। (2016)

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एसएमएस अलर्ट
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