दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स



शासन व्यवस्था

भारत की विकसित होती डिजिटल नियामक संरचना

  • 01 Apr 2026
  • 209 min read

यह एडिटोरियल 30/03/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘Meta, YouTube verdict’s message: Regulation must redesign the digital landscape itself’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के विकसित होते डिजिटल नियामक ढाँचे का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें डेटा गोपनीयता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) नैतिकता तथा 1 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था के शासन से संबंधित प्रणालीगत चुनौतियाँ सम्मिलित हैं।

प्रिलिम्स के लिये: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, आई.सी.ई.टी., डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचनामध्यस्थ दायित्व

मेन्स के लिये: भारत की डिजिटल नियामक संरचना, प्रमुख मुद्दे और उपाय।

भारत का डिजिटल परिदृश्य तीव्र गति से विकसित हुआ है, जहाँ 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्त्ता तथा 46 करोड़ से अधिक सोशल मीडिया उपयोगकर्त्ता विद्यमान हैं, जिनमें से लगभग एक-तिहाई अल्पवयस्क हैं, जिससे शासन संबंधी गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हो रही हैं। हाल ही में वैश्विक स्तर पर संपन्न जाँचों, जिनमें एक अमेरिकी न्यायालय द्वारा एल्गोरिदम-आधारित हानि के लिये प्रमुख प्लेटफॉर्मों को उत्तरदायी ठहराया जाना सम्मिलित है, ने सहभागिता-आधारित व्यावसायिक मॉडलों में अंतर्निहित जोखिमों को स्पष्ट रूप से उजागर किया है। भारत के संदर्भ में, साइबरबुलिंग, नींद में व्यवधान तथा आत्म-छवि में विकृति जैसी समस्याएँ विशेषतः युवाओं के मध्य तीव्र गति से परिलक्षित हो रही हैं। अतः जैसे-जैसे देश 1 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा में अग्रसर हो रहा है, नवाचार, उत्तरदायित्व तथा उपयोगकर्त्ता सुरक्षा के मध्य संतुलन स्थापित करना अनिवार्य हो जाता है।

भारत अपनी डिजिटल नियामक संरचना को किस प्रकार नया रूप दे रहा है? 

  • डेटा संप्रभुता और तकनीकी-कानूनी गोपनीयता ढाँचा: भारत एक कमज़ोर डेटा परिवेश से संक्रमण करते हुए नागरिक-केंद्रित गोपनीयता ढाँचे की दिशा में अग्रसर है, जो डिजिटल डेटा संप्रभुता को सुदृढ़ एवं संस्थागत रूप प्रदान करता है।
    • यह परिवर्तन डेटा न्यासियों (data fiduciaries) पर कठोर उत्तरदायित्व आरोपित करता है, साथ ही सभी डिजिटल नागरिकों के लिये सहमति प्रबंधन को मूलतः लोकतांत्रिक बनाता है।
    • भारत सरकार ने नवंबर 2025 में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) नियम, 2025 अधिसूचित किये, जो डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP अधिनियम) के पूर्ण क्रियान्वयन को चिह्नित करता है।
    • यह आधिकारिक रूप से पंजीकृत ‘सहमति प्रबंधक’ (Consent Managers) की व्यवस्था प्रस्तुत करता है तथा 72 घंटे के त्वरित डेटा उल्लंघन अधिसूचना प्रावधान के साथ-साथ अठारह वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्त्ताओं के लिये कठोर सत्यापन योग्य अभिभावकीय सहमति को अनिवार्य बनाता है।
  • एल्गोरिद्मिक उत्तरदायित्व एवं कृत्रिम सामग्री विनियमन: डिजिटल धोखाधड़ी पर नियंत्रण तथा सूचनात्मक अखंडता के संरक्षण हेतु राज्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के दुरुपयोग तथा डीपफेक के प्रसार के विरुद्ध सक्रिय नियामक हस्तक्षेप कर रहा है।
    • सामान्य सेफ-हार्बर सुरक्षा से हटकर नियामक अब प्रमुख तकनीकी प्लेटफ़ॉर्मों पर प्रत्यक्ष एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता तथा सामग्री अनुरेखण (traceability) को लागू कर रहे हैं।
    • फरवरी 2026 में अधिसूचित आईटी संशोधन नियम स्पष्ट रूप से ‘कृत्रिम रूप से उत्पन्न सूचना (SGI)’ को लक्षित करते हैं, जिसमें प्रमुख प्लेटफॉर्म-स्तरीय लेबलिंग को अनिवार्य किया गया है। 
    • संशोधित नियमों के अंतर्गत सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों को अब कुछ श्रेणियों की अवैध सामग्री हटाने के लिये केवल 2–3 घंटे का समय दिया गया है, जो पूर्व के 24–36 घंटे की अवधि की तुलना में उल्लेखनीय कमी है।
  • बिग टेक प्रभुत्व पर सक्रिय नियंत्रण: नियामक दृष्टिकोण ‘प्रतिक्रियात्मक’ (reactive) विरोधी मुकदमों से आगे बढ़कर ‘सक्रिय’ (ex-ante) विनियमन की ओर अग्रसर हो रहा है, जिससे ‘गेटकीपर’ प्लेटफ़ॉर्मों पर नियंत्रण स्थापित कर बाज़ार में प्रतिस्पर्द्धात्मकता सुनिश्चित की जा सके।
    • प्रणालीगत रूप से महत्त्वपूर्ण डिजिटल उद्यम (SSDE) की पहचान के माध्यम से भारत ‘स्व-पक्षपात (self-preferencing)’ तथा ‘एंटी-स्टियरिंग’ जैसी प्रथाओं पर नियंत्रण कर रहा है, जो पूर्व में स्थानीय स्टार्टअप्स को बाधित करती थीं।
    • डिजिटल प्रतिस्पर्द्धा कानून समिति की मार्च 2024 की रिपोर्ट में SSDE की पहचान हेतु ‘द्वैध परीक्षण (Dual Test)’ का प्रस्ताव किया गया है, जिसके अंतर्गत संस्थाओं को उच्च वित्तीय क्षमता तथा व्यापक उपयोगकर्त्ता आधार दोनों मानदंडों को पूरा करना आवश्यक है।
    • प्रतिस्पर्द्धा (संशोधन) अधिनियम, 2023 के अंतर्गत डील वैल्यू थ्रेशहोल्ड (DVT) प्रावधान के माध्यम से 2,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के विलय एवं अधिग्रहण सौदों को, भले ही वे पारंपरिक परिसंपत्ति या टर्नओवर सीमाओं से बाहर हों, नियामक समीक्षा के दायरे में लाया गया है।
  •  साइबर सुरक्षा दृष्टिकोण एवं महत्त्वपूर्ण अवसंरचना संरक्षण: भारत राज्य-प्रायोजित जासूसी से निपटने हेतु सक्रिय-रक्षा (active-defense) साइबर सुरक्षा दृष्टिकोण तथा शून्य-विश्वास (zero-trust) ढाँचों की ओर अग्रसर होकर अपनी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को सुदृढ़ कर रहा है।
    • यह सक्रिय संरचना सख्त घटना-रिपोर्टिंग प्रोटोकॉल को अनिवार्य बनाती है, जिससे महत्त्वपूर्ण सूचना तंत्र प्रणालीगत कमज़ोरियों के विरुद्ध सुदृढ़ बना रहे।
    • अद्यतन CERT-In दिशा-निर्देश कॉरपोरेट तथा सरकारी संस्थाओं के लिये महत्त्वपूर्ण साइबर उल्लंघनों की रिपोर्टिंग हेतु 6 घंटे की अनिवार्य समय-सीमा निर्धारित करते हैं।
    • इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा संदर्भ ढाँचा (NCRF) महत्त्वपूर्ण डिजिटल सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा के लिये अनिवार्य आधारभूत सुरक्षा मानक स्थापित करता है।
  • दूरसंचार सुधार एवं उपग्रह स्पेक्ट्रम का लोकतंत्रीकरण: राज्य राष्ट्रीय सुरक्षा पर सर्वोच्च संप्रभु नियंत्रण बनाए रखते हुए एक आधुनिक, निवेश-अनुकूल दूरसंचार क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिये पुरातन टेलीग्राफ-युग के नियमों को समाप्त कर रहा है।
    • ऐतिहासिक दूरसंचार अधिनियम सरकार को सार्वजनिक आपात स्थितियों में राज्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु दूरसंचार नेटवर्क को अस्थायी रूप से निलंबित या अवरोधित (intercept) करने की स्पष्ट शक्तियाँ प्रदान करता है।
    • इसके अतिरिक्त, भारत सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि उपग्रह स्पेक्ट्रम का आवंटन नीलामी प्रक्रिया के स्थान पर प्रशासनिक माध्यम से किया जाएगा, जिससे साझा स्पेक्ट्रम उपयोग संबंधी वैश्विक प्रथाओं के साथ सामंजस्य बना रहे।
  • फिनटेक शासन एवं एल्गोरिद्मिक ऋण सुरक्षा उपाय: वित्तीय नियामक डिजिटल ऋण प्लेटफ़ॉर्मों तथा कृत्रिम ऋण तंत्रों (synthetic credit mechanisms) के लिये कठोर सुरक्षा उपाय लागू कर प्रणालीगत जोखिमों को नियंत्रित कर रहे हैं।
    • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने मई 2025 में डिजिटल लेंडिंग दिशानिर्देश जारी किये, जिनमें विनियमित संस्थाओं, लेंडिंग सर्विस प्रोवाइडर्स (LSP) तथा डिजिटल लेंडिंग ऐप्स (DLA) के लिये वसूली पद्धतियों, डेटा गोपनीयता तथा शिकायत निवारण से संबंधित कड़े मानदंड निर्धारित किये गए।
    • प्राधिकरण अनधिकृत ऋण ऐप्स पर नियंत्रण हेतु इंटरनेट प्लेटफ़ॉर्मों के साथ कार्य कर रहे हैं। इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर ऐसे ऐप्स की सक्रिय निगरानी कर रहा है, जबकि नागरिक राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल या हेल्पलाइन 1930 के माध्यम से धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
      • इसके अतिरिक्त, RBI का ‘SACHET’ पोर्टल तथा राज्य स्तरीय समन्वय समितियाँ (SLCC) उपयोगकर्त्ताओं को अवैध जमा या ऋण गतिविधियों के विरुद्ध शिकायत दर्ज करने में सहायता प्रदान करती हैं।
  • सीमा पार तकनीकी कूटनीति एवं विश्वसनीय डेटा अंतरसंचालनीयता: भारत अपने विशाल जनसांख्यिकीय डेटा भंडार का रणनीतिक उपयोग करते हुए न्यायसंगत भू-राजनीतिक तकनीकी गठबंधनों के निर्माण हेतु सक्रिय कूटनीतिक प्रयास कर रहा है तथा कठोर डेटा अलगाववाद से हटकर विश्वसनीय द्विपक्षीय अंतरसंचालनीयता की दिशा में अग्रसर है।
    • यह राजनयिक ढाँचा एक ओर स्वदेशी तकनीकी हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, वहीं दूसरी ओर भू-राजनीतिक रूप से संरेखित रणनीतिक साझेदार देशों के साथ सशर्त सीमा-पार डेटा प्रवाह को भी सुगम बनाता है।
    • भारत-अमेरिका महत्त्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकी पहल (iCET) जैसे रणनीतिक तंत्र कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं के लिये संयुक्त नियामक संरचना को प्रत्यक्ष रूप से औपचारिक रूप प्रदान करते हैं।
  • शोषणकारी ‘रियल-मनी’ गेमिंग का उन्मूलन: भारत ने एक 'सामाजिक-हानि नियंत्रण मॉडल' को अंगीकृत किया है, जिसके अंतर्गत कमज़ोर जनसांख्यिकी को ऋण जाल से संरक्षण प्रदान करने हेतु इंटरैक्टिव मनोरंजन को सट्टा वित्तीय जोखिम से स्पष्ट एवं कठोर रूप से पृथक किया गया है।
    • राष्ट्रीय प्राधिकरण के अधीन निगरानी के केंद्रीकरण के माध्यम से राज्य, 'अनुमत खेलों' एवं अवैध जुए के मध्य स्पष्ट भेद स्थापित करता है, जिससे ऑफशोर सट्टेबाज़ी सिंडिकेट के वित्तीय चैनलों को प्रभावी रूप से अवरुद्ध किया जा सकता है।
    • सरकार द्वारा ई-स्पोर्ट्स एवं सोशल गेमिंग को प्रोत्साहित करते हुए एक सुरक्षित तथा जवाबदेह गेमिंग पारिस्थितिकी तंत्र सुनिश्चित करने के लिये ऑनलाइन गेमिंग संवर्द्धन एवं विनियमन अधिनियम, 2025 लागू किया गया है।
    • यह अधिनियम ऑनलाइन पैसे वाले खेलों (जिनमें संयोग, कौशल अथवा मिश्रित खेल सम्मिलित हैं) के साथ-साथ उनके विज्ञापन, प्रचार एवं वित्तीय लेनदेन पर पूर्ण प्रतिबंध आरोपित करता है तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत अवैध प्लेटफॉर्मों को अवरुद्ध करने का प्रावधान करता है।
  • नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का संस्थानीकरण (IndiaAI मिशन): भारत प्रतिबंधात्मक AI नीतियों से हटकर ‘सामाजिक-उद्देश्य ढाँचे’ को अपनाते हुए AI को ग्रामीण तथा भाषायी समावेशन हेतु सार्वजनिक संपदा के रूप में विकसित कर रहा है।
    • इसका प्रमुख लक्षित संप्रभु संगणन क्षमता का निर्माण करते हुए स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) के विकास में ‘विश्वास के सुरक्षा-मानक (Guardrails of Trust)’ को समाहित करना है।
    • उदाहरणार्थ, IndiaAI मिशन के अंतर्गत ‘भाषिणी’ प्लेटफ़ॉर्म को 22 से अधिक भाषाओं के लिये लागू किया जा चुका है। 
      • जनवरी 2026 तक भारत की राष्ट्रीय कंप्यूटिंग क्षमता 34,000 से अधिक GPU तक पहुँच गई है, जिससे ‘AI for All’ रणनीति को स्वास्थ्य तथा कृषि जैसे क्षेत्रों में बढ़ावा मिल रहा है।

भारत की डिजिटल नियामक संरचना से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • एल्गोरिदमिक अपारदर्शिता और ‘ब्लैक बॉक्स’ उत्तरदायित्व: स्वचालित निर्णय-निर्माण में 'स्पष्टीकरण के अधिकार' के अभाव के कारण ऋण सुविधा, भर्ती तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में AI-संचालित भेदभाव बिना किसी प्रभावी कानूनी उपचार के निरंतर जारी रह सकता है।
    • भारत में वर्तमान में लगभग 1.2 करोड़ गिग वर्कर्स के वेतन निर्धारण को एल्गोरिथम प्रबंधन द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है, जहाँ अधिकांश डिलीवरी पार्टनर वेतन में अस्पष्ट उतार-चढ़ाव के कारण 'एल्गोरिथम संबंधी चिंता' व्यक्त करते हैं।
    • इसके अलावा, एल्गोरिदम ऑडिट को अनिवार्य किये बिना मध्यस्थों के लिये ‘सेफ हार्बर’ को विनियमित करने से डिजिटल अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक पूर्वाग्रहों को दूर करने में एक बड़ा अंतर रह जाता है।
  • ‘राज्यीय छूट’ के माध्यम से निगरानी को वैध बनाना: आलोचकों के अनुसार, 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के नाम पर राज्य एजेंसियों को प्रदान की जाने वाली व्यापक छूट एक ऐसा कानूनी अंतर निर्मित करती है, जहाँ प्रशासनिक सुविधा के समक्ष नागरिकों की गोपनीयता गौण हो जाती है।
    • यह 'सूचित निगरानी' की संरचना, पुट्टास्वामी निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित आनुपातिकता मानकों को दरकिनार करती है।
    • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP अधिनियम), 2023 की धारा 7 के अंतर्गत 'कुछ वैध उपयोगों' की अनुमति दी गई है, जिसके तहत राज्य सब्सिडी अथवा सुरक्षा उद्देश्यों के लिये सहमति के बिना डेटा संसाधन कर सकता है।
  • अनुपालन विषमता एवं स्टार्टअप के लिये बाधाएँ: 'बिग टेक' को ध्यान में रखकर निर्मित एकसमान एवं कठोर नियामक ढाँचा अनजाने में 'इंडिया स्टैक’ स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के लिये बाधाएँ उत्पन्न कर रहा है, क्योंकि यह अनुपालन लागत का अनुपात अत्यधिक बढ़ा देता है।
    • लघु एवं मध्यम उद्यम (SME) जटिल 'डिज़ाइन द्वारा गोपनीयता' मापदंडों के साथ संघर्ष करते हैं, जिससे पूंजी संपन्न संस्थानों द्वारा बाज़ार का केंद्रीकरण होता है।
    • अनुमानों के अनुसार, DPDP अनुपालन से प्रारंभिक चरण की फिनटेक कंपनियों की परिचालन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। 
    • हालिया उद्योग सर्वेक्षण इंगित करता है कि भारत के परिवर्तित डिजिटल विनियमों के कारण 67% कंपनियाँ त्वरित अनुकूलन की आवश्यकता अनुभव कर रही हैं, जबकि 40% कंपनियाँ अभी भी अनुपालन में पिछड़ रही हैं
      • इसके अतिरिक्त, लगभग 39% संस्थाएँ प्रौद्योगिकी, बजट तथा संसाधनों की सीमाओं से जूझ रही हैं, जो नियामक महत्त्वाकांक्षा एवं संस्थागत क्षमता के मध्य बढ़ते हुए अंतर को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
  • डिजिटल ‘सिंगल मार्केट’ का विखंडन: सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), दूरसंचार प्राधिकरण (TRAI) और प्रतियोगिता आयोग (CCI) के अधिकार क्षेत्रों के अतिव्यापक होने से एक ‘नियामक जटिलता’ (regulatory thicket) उत्पन्न होती है, जो वैश्विक निवेशकों को भ्रमित करती है।
    • किसी ‘सुपर-रेगुलेटर’ या सुसंगत ‘डिजिटल इंडिया एक्ट’ के अभाव में लागू होने वाले आदेश विरोधाभासी हो जाते हैं, जहाँ एक एजेंसी की ‘नवाचार-सुविधाजनक’ नीति दूसरे की ‘सुरक्षा-नियंत्रक’ प्रतिबंधात्मक नीति से निरस्त हो जाती है।
  • सेफ हार्बर का क्षरण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘चिलिंग इफेक्ट’: मध्यस्थ दिशानिर्देशों में हालिया संशोधनों ने लक्ष्य को प्लेटफ़ॉर्म उत्तरदायित्व से व्यक्तिगत जवाबदेही की ओर स्थानांतरित कर दिया है, जिससे डिजिटल गोपनीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्षरण की चिंताएँ बढ़ गई हैं।
    • 'गैर-कानूनी' कृत्रिम सामग्री को हटाने हेतु 3 घंटे की अनिवार्य समय-सीमा के कारण प्लेटफॉर्म ऐसी परिस्थिति में आ जाते हैं, जहाँ उन्हें आपराधिक दायित्व से बचने के लिये अत्यधिक सेंसरशिप का सहारा लेना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक बार वैध व्यंग्य एवं पत्रकारिता सामग्री भी प्रभावित हो जाती है।
    • AI-शासन नियमों में पत्रकारिता अथवा कलात्मक अभिव्यक्ति के लिये स्पष्ट छूटों के अभाव से एक प्रकार का 'भयभीत करने वाला प्रभाव' उत्पन्न होता है, जहाँ प्लेटफॉर्म 'उचित प्रक्रिया' के स्थान पर 'स्वचालित अवरोधन' को प्राथमिकता देने लगते हैं।
  • ‘प्रतिनिधि विधायी अधिकार’ के माध्यम से कार्यपालिका का अतिक्रमण: नई संरचना में एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा ‘जैसा निर्धारित किया जा सकता है’ खंडों पर अत्यधिक निर्भरता है, जो कार्यपालिका को संसदीय बहस के बिना उप-नियमों के माध्यम से कानून के दायरे को परिभाषित करने की अनुमति देता है।
    • यह ‘विधायी खाली चेक’ सरकार को सरल अधिसूचनाओं द्वारा ‘संवेदनशील डेटा’ की परिभाषा बदलने या ‘राज्यीय छूट’ का विस्तार करने में सक्षम बनाता है, जिसके परिणामस्वरूप संवैधानिक नियंत्रण एवं संतुलन की वह व्यवस्था, जिसका उद्देश्य राज्यीय निगरानी को सीमित करना है, प्रभावी रूप से दरकिनार हो सकती है।
    • जब किसी विधि के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रावधानों को 'अधिनियम' के स्थान पर 'नियमों' में निहित कर दिया जाता है तब कार्यपालिका को बिना विधायी मतदान की पारदर्शिता के डिजिटल सामाजिक अनुबंध को पुनर्परिभाषित करने की व्यापक शक्ति प्राप्त हो जाती है।
    • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP अधिनियम), 2023 तथा प्रस्तावित डिजिटल इंडिया विधेयक में अनेक ऐसे प्रावधान निहित हैं, जहाँ महत्त्वपूर्ण प्रवर्तन विवरण को कार्यकारी नियमों पर छोड़ दिया गया है। 
      • इसके अतिरिक्त, DPDP अधिनियम, 2023 के अंतर्गत केंद्र सरकार को डेटा संरक्षण बोर्ड की नियुक्ति का अधिकार प्रदान किया गया है, जिससे निगरानी तंत्र पर कार्यपालिका का प्रत्यक्ष नियंत्रण सुदृढ़ हो जाता है।
  • डिजिटल विभाजन एवं सहमति की भ्रांति: ‘सूचना और सहमति’ पर निर्भरता यह मानती है कि भारत की विविध भाषायी और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में आवश्यक डिजिटल साक्षरता मौजूद है, जो वास्तविकता में अनुपस्थित है।
    • इस परिप्रेक्ष्य में, उपयोगकर्त्ता 'डार्क पैटर्न’ के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं, जिसके कारण सहमति प्रक्रिया एक सार्थक निर्णयात्मक अधिकार के बजाय केवल एक यांत्रिक 'टिक-बॉक्स' अभ्यास में परिवर्तित हो जाती है।
    • भारत में 850 मिलियन से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्त्ता होने के बावजूद, अनुमानतः मात्र 38% उपयोगकर्त्ताओं के पास ही जटिल गोपनीयता शर्तों को समझने हेतु कार्यात्मक डिजिटल साक्षरता उपलब्ध है।

भारत की डिजिटल नियामक संरचना को सुदृढ़ करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है? 

  • एकीकृत डिजिटल नियामक की संस्थागत स्थापना: अधिकार-क्षेत्रीय अतिक्रमण तथा नियामक मनमानी को समाप्त करने हेतु भारत को एक वैधानिक सर्वोच्च निकाय की स्थापना की दिशा में अग्रसर होना चाहिये, जो दूरसंचार, प्रतिस्पर्द्धा एवं डेटा संरक्षण प्राधिकरणों के जनादेशों में समन्वय स्थापित कर सके।
    • प्रस्तावित एकीकृत डिजिटल आयोग डिजिटल शासन के लिये एक केंद्रीय सूचना केंद्र के रूप में कार्य करेगा तथा स्वदेशी स्टार्टअप एवं वैश्विक हाइपर-स्केलर्स के लिये सिंगल विंडो अनुपालन इंटरफेस उपलब्ध कराएगा।
    • अलग-अलग विभागों की निगरानी प्रणाली से हटकर समन्वित एवं समग्र शासकीय दृष्टिकोण को अपनाने से राज्य एक सुसंगत एवं पूर्वानुमानित नीतिगत वातावरण को प्रोत्साहित कर सकेगा।
      • इस प्रकार की संस्थागत संरचना जनरेटिव AI तथा विकेंद्रीकृत वित्त (DeFi) जैसी क्षैतिज प्रौद्योगिकीय चुनौतियों के अनुरूप बिना अतिरिक्त प्रशासनिक बाधाएँ उत्पन्न किये तीव्र अनुकूलन की क्षमता प्रदान करती है।
  • एल्गोरिदम ऑडिट एवं व्याख्या योग्य AI (XAI) को अनिवार्य बनाना: वर्तमान नियामक संरचना को केवल मध्यस्थ दायित्वों तक सीमित न रखते हुए, स्वचालित निर्णय-निर्माण प्रणालियों के लिये अनिवार्य तृतीय-पक्ष एल्गोरिदम प्रभाव आकलन की व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिये।
    • नीति-निर्माताओं को व्याख्या योग्य AI (XAI) के सिद्धांतों को मौलिक अनुपालन आवश्यकताओं में समाहित करना चाहिये, ताकि उच्च-जोखिम क्षेत्रों में एल्गोरिदमिक परिणाम पारदर्शी एवं विवाद योग्य बने रहें।
    • किसी भी नागरिक के 'स्पष्टीकरण के अधिकार' को कानूनी रूप से संहिताबद्ध करके यह ढाँचा AI प्रणालियों के विकासकर्त्ताओं एवं परिनियोजकों पर एल्गोरिदम जवाबदेही का दायित्व प्रत्यक्ष रूप से आरोपित करता है।
  • गोपनीयता बढ़ाने वाली प्रौद्योगिकियों (PET) का संचालन: डेटा-संचालित नवाचार एवं संप्रभु गोपनीयता के मध्य विद्यमान अंतर्विरोधों के समाधान हेतु नियामक ढाँचे को गोपनीयता बढ़ाने वाली प्रौद्योगिकियों (PET) के मूलभूत एकीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिये।
    • राज्य को संवेदनशील सामाजिक-आर्थिक एवं बायोमेट्रिक डेटा का संसाधन करने वाली संस्थाओं के लिये शून्य-ज्ञान प्रमाण (Zero-Knowledge Proofs), होमोमोर्फिक एंक्रिप्शन तथा विभेदक गोपनीयता (Differential Privacy) जैसे उन्नत प्रोटोकॉल के उपयोग को अनिवार्य करना आवश्यक है।
    • यह 'डिज़ाइन द्वारा गोपनीयता' पर आधारित सक्रिय इंजीनियरिंग प्रतिमान केंद्रीकृत डेटा हनीपॉट्स के जोखिमों को निष्प्रभावी करते हुए डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में सुरक्षित डेटा अंतरसंचालनीयता सुनिश्चित करता है।
  • स्तरीकृत तथा जोखिम-आनुपातिक अनुपालन ढाँचे की स्थापना: तकनीकी एकाधिकार कंपनियों द्वारा नियामकीय अधिग्रहण की प्रवृत्ति को रोकने हेतु राज्य को एक कठोर स्तरित अनुपालन मैट्रिक्स लागू करना चाहिये, जो उद्यम के आकार के स्थान पर परिचालन जोखिम को प्राथमिक आधार बनाए।
    • यह ढाँचा नवोदित डिजिटल स्टार्टअप्स के लिये गतिशील एवं सरलीकृत रिपोर्टिंग दायित्व निर्धारित करेगा, जबकि उच्च बाज़ार एकाग्रता प्रदर्शित करने वाली प्रणालीगत संस्थाओं पर कठोर एवं सक्रिय निगरानी सुनिश्चित करेगा।
    • नियामक सैंडबॉक्स को स्थानीय सुरक्षित-आश्रय प्रावधानों के साथ तैनात कर नीति-निर्माता उच्च-जोखिम वाले नवाचारों को नियंत्रित वातावरण में परीक्षण की अनुमति दे सकते हैं, बिना व्यापक डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को प्रणालीगत जोखिमों के प्रति उजागर किये।
      • इस प्रकार की असममित एवं जोखिम-आधारित संरचना स्वदेशी उद्यमशीलता को संरक्षण प्रदान करती है, साथ ही स्थापित बाज़ार प्राचीरों के एकाधिकारवादी व्यवहार को प्रभावी रूप से सीमित करती है।
  • संप्रभु डिजिटल अधिकार न्यायाधिकरण की स्थापना: डिजिटल क्षेत्र में संवैधानिक न्यायशास्त्र की रक्षा हेतु एक स्वतंत्र एवं समर्पित अपीलीय न्यायाधिकरण की स्थापना अनिवार्य है, जो तकनीकी-कानूनी विवादों के निपटारे में विशेषज्ञता रखता हो।
    • यह विशेषीकृत न्यायिक तंत्र डिजिटल विवाद समाधान को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से संरक्षित करेगा तथा नागरिकों को राज्यीय निगरानी एवं कॉर्पोरेट डेटा दुरुपयोग दोनों के विरुद्ध संवैधानिक रूप से सुदृढ़ उपाय उपलब्ध कराएगा।
    • इस न्यायाधिकरण में न्यायिक विशेषज्ञों एवं तकनीकी प्रौद्योगिकीविदों का समन्वित प्रतिनिधित्व यह सुनिश्चित करेगा कि एल्गोरिदम भेदभाव तथा सीमा-पार डेटा उल्लंघन जैसे जटिल मामलों का निपटारा डोमेन-विशिष्ट सटीकता के साथ किया जाए।
    • इस अपीलीय संरचना का संस्थागतकरण यह सुनिश्चित करता है कि डेटा संरक्षण एवं डिजिटल बाज़ार विनियमन का प्रवर्तन प्रक्रियात्मक निष्पक्षता तथा संवैधानिक आनुपातिकता के मानकों से बंधा रहे।
  •  खुले डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र एवं अंतरसंचालनीयता को प्रोत्साहन: डिजिटल अर्थव्यवस्था में विद्यमान 'बंद प्रणालियों' को समाप्त करने हेतु नियामकों को प्रमुख तकनीकी प्लेटफॉर्मों पर ओपन API मानकों एवं प्रणालीगत अंतरसंचालनीयता को अनिवार्य बनाना होगा।
    • मानकीकृत मशीन-पठनीय प्रारूपों के माध्यम से डेटा पोर्टेबिलिटी अधिकारों को लागू कर राज्य उपभोक्ताओं को विभिन्न प्रतिस्पर्द्धी सेवा प्रदाताओं के मध्य अपनी डिजिटल पहचान एवं संपत्तियों का निर्बाध हस्तांतरण करने हेतु सशक्त बना सकता है।
    • यह संरचनात्मक हस्तक्षेप बाज़ार तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण करता है, जिससे स्वदेशी नवोन्मेषकों के लिये प्रवेश बाधाएँ मौलिक रूप से कम हो जाती हैं।
    • कानूनी रूप से अनिवार्य ओपन-आर्किटेक्चर प्रतिमान विक्रेता लॉक-इन को निष्प्रभावी करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि प्रतिस्पर्द्धा का आधार निरंतर सेवा नवाचार हो, न कि उपयोगकर्त्ता नेटवर्क का एकाधिकारवादी संचय
  • अनुकूली सीमा-पार डेटा कॉरिडोर की रूपरेखा: कठोर डेटा स्थानीयकरण या बाइनरी ब्लैकलिस्ट पर निर्भर रहने के बजाय, भारत को गतिशील, भू-राजनीतिक रूप से संरेखित डेटा कॉरिडोर विकसित करने चाहिये, जो पारस्परिक पर्याप्तता समझौतों पर आधारित हों।
    • यह परिष्कृत दृष्टिकोण गैर-संवेदनशील सूचना परिसंपत्तियों का सीमा-पार सुरक्षित और सहज हस्तांतरण सक्षम करता है, जिससे वैश्वीकृत IT और BPO क्षेत्रों की परिचालन क्षमता बनी रहती है।
    • बहुपक्षीय डिजिटल व्यापार ढाँचों का लाभ उठाकर, राज्य अत्यधिक डिजिटल संरक्षणवाद में निहित आर्थिक अलगाव से बचते हुए सख्त बाह्य क्षेत्रीय अनुपालन को लागू कर सकता है। 
    • इस प्रकार की रणनीतिक, सशर्त अंतरसंचालनीयता राष्ट्रीय डिजिटल संप्रभुता को सुरक्षित करती है और राष्ट्र को वैश्विक डिजिटल सेवाओं की आपूर्ति शृंखला में विश्वसनीय केंद्र के रूप में स्थापित करती है।
  • वास्तविक समय में साइबर लचीलेपन प्रोटोकॉल का संस्थागतकरण: प्रतिक्रियात्मक घटना प्रबंधन से आगे बढ़ते हुए, डिजिटल नियामक ढाँचे को महत्त्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना के सभी संचालकों हेतु एक अनिवार्य, खुफिया-संचालित 'सक्रिय रक्षा' दृष्टिकोण को विधिक रूप से स्थापित करना आवश्यक है।
    • इसमें सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के डिजिटल परिधि में निरंतर एवं स्वचालित खतरा पहचान तंत्र को लागू करना तथा 'शून्य-विश्वास' (Zero-Trust) नेटवर्क आर्किटेक्चर का संस्थागतकरण सम्मिलित है।
    • इसमें राज्य-प्रायोजित साइबर अनियमितताओं के प्रति सामूहिक, राष्ट्रव्यापी प्रतिरक्षात्मक प्रतिक्रिया बनाने के लिये प्रतिस्पर्द्धी कॉर्पोरेट संस्थाओं के बीच मानकीकृत, गुमनाम खतरे की खुफिया जानकारी साझा करना शामिल होना चाहिये। 
    • आवधिक सुरक्षा ऑडिट से आगे बढ़कर निरंतर, रियल टाइम क्रिप्टोग्राफिक अनुकूलन की ओर स्थानांतरित करके राज्य अपने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की दीर्घकालिक अखंडता एवं विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है।

निष्कर्ष

भारत की डिजिटल संरचना का विकास सुरक्षात्मक निगरानी से आगे बढ़ते हुए एक सक्रिय, संप्रभु-नेतृत्व वाले शासन मॉडल की ओर संक्रमण को दर्शाता है, जो नागरिक सुरक्षा एवं बाज़ार लोकतंत्रीकरण को प्राथमिकता प्रदान करता है। स्वतंत्र पर्यवेक्षण तथा क्रमिक एवं संतुलित वृद्धि पर आधारित एक सुदृढ़ संस्थागत ढाँचा स्थापित करते हुए भारत स्वयं को एक विश्वसनीय, 1 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है। इस 'विकसित' डिजिटल स्थिति की प्राप्ति हेतु राज्य सुरक्षा, नियामकीय संतुलन तथा व्यक्तिगत डेटा स्वामित्व अधिकारों के मध्य संवैधानिक सामंजस्य स्थापित करना अत्यावश्यक है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

'सेफ हार्बर सुरक्षा' से 'एल्गोरिदमिक उत्तरदायित्व' की ओर संक्रमण भारत के मध्यस्थ विनियमन ढाँचे में एक मौलिक परिवर्तन को निरूपित करता है। प्रस्तावित डिजिटल इंडिया अधिनियम और कृत्रिम सामग्री के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. ‘डील वैल्यू थ्रेशहोल्ड’ (DVT) क्या है?
यह 2,000 करोड़ रुपये की एक मानक सीमा है, जिसका उपयोग भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग द्वारा उच्च-मूल्य वाली प्रौद्योगिकी विलयों की जाँच के लिये किया जाता है, जिनमें भौतिक परिसंपत्तियाँ कम लेकिन डेटा-पारीसंपत्तियाँ महत्त्वपूर्ण होती हैं।

2. डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP) के अंतर्गत आने वाले ‘कन्सेंट मैनेजर’ क्या हैं?
ये विशेष प्रकार की विनियमित संस्थाएँ हैं, जो भारतीय रिज़र्व बैंक जैसी नियामकीय संरचना के अनुरूप कार्य करती हैं तथा व्यक्तियों को एक ही मंच के माध्यम से अपने डिजिटल डेटा से संबंधित सहमतियों का प्रबंधन, निरसन और अनुश्रवण करने की सुविधा प्रदान करती हैं।

3. किसी बड़े साइबर उल्लंघन की रिपोर्टिंग के लिये अनिवार्य समय-सीमा क्या है?
CERT-In के वर्तमान दिशा-निर्देशों के अंतर्गत सभी सरकारी तथा कॉर्पोरेट संस्थाओं को किसी भी महत्त्वपूर्ण साइबर सुरक्षा घटना की सूचना उसके पता चलने के 6 घंटे के भीतर देना अनिवार्य है।

4. नया कानून ‘कृत्रिम रूप से उत्पन्न सूचना’ (SGI) को किस प्रकार परिभाषित करता है?
‘कृत्रिम रूप से उत्पन्न सूचना’ से आशय ऐसी विषय-वस्तु से है, जिसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निर्मित या परिवर्तित किया गया हो (जैसे: डीपफेक अथवा संशोधित ध्वनि) और जिस पर अब भ्रामक सूचना को रोकने हेतु स्पष्ट तथा दृष्टिगोचर चिह्न अंकित करना अनिवार्य होगा।

5. डिजिटल भारत अधिनियम के अंतर्गत अनुपालन न करने पर अधिकतम दंड क्या है?
प्रस्तावित ढाँचा 500 करोड़ रुपये तक के अत्यधिक वित्तीय दंड का प्रावधान करता है, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहाँ तंत्रगत विफलताएँ पाई जाती हैं, जैसे एल्गोरिद्मिक पक्षपात।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये- (2020) 

  1. भारत के संविधान के अनुसार, कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो मतदान के लिये योग्य है, किसी राज्य में छह माह के लिये मंत्री बनाया जा सकता है तब भी, जब कि वह उस राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है। 
  2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो दांडिक अपराध के अंतर्गत दोषी पाया गया है और जिसे पाँच वर्ष के लिये कारावास का दंड दिया गया है, चुनाव लड़ने के लिये स्थायी तौर पर निरर्हत हो जाता है, भले ही वह कारावास से मुक्त हो चुका हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर : (a)


प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017) 

  1. भारत का निर्वाचन आयोग पाँच-सदस्यीय निकाय है।
  2. संघ का गृह मंत्रालय, आम चुनाव और उप-चुनावों दोनों के लिये चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
  3. निर्वाचन आयोग मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवाद निपटाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3

(d) केवल 3

उत्तर: (d) 


मेन्स

प्रश्न 1. "लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक ही समय में चुनाव, चुनाव प्रचार की अवधि और व्यय को तो सीमित कर देंगे, परंतु ऐसा करने से लोगों के प्रति सरकार की जवाबदेही कम हो जाएगी।” चर्चा कीजिये। (2017)

close
Share Page
images-2
images-2