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आपदा प्रबंधन

भूस्खलन के प्रति अनुकूलन

  • 24 Aug 2023
  • 23 min read

यह एडिटोरियल 23/08/2023 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित ‘‘Resisting Landslides’’ लेख पर आधारित है। इसमें हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन के पीछे के कारणों, उनसे होने वाले विनाश और उनके विरुद्ध एक प्रत्यास्थी आपदा प्रबंधन तंत्र के निर्माण के तरीकों के बारे में चर्चा की गई है।

प्रिलिम्स के लिये:

भूस्खलन और उसके प्रकार, राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम प्रबंधन रणनीति, भूस्खलन जोखिम शमन योजना (LRMS), बाढ़ जोखिम शमन योजना (FRMS), भूस्खलन और हिमस्खलन पर राष्ट्रीय दिशानिर्देश, लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण

मेन्स के लिये:

जेनरेटिव AI : इसके अनुप्रयोग, चुनौतियाँ और इन चुनौतियों का समाधान करने हेतु नीतिगत उपाय।

हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन के कारण हाल ही में हुई मौतों और विनाश ने एक बार फिर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की भेद्यताओं एवं चुनौतियों को उजागर किया है। हिमालय, जिसे प्रायः विश्व की सबसे नई और ऊबड़-खाबड़ पर्वत शृंखला के रूप में संदर्भित किया जाता है, एक अद्वितीय और जटिल वातावरण है जो इस भूभाग के भूविज्ञान, जलवायु एवं जैव विविधता को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

भूस्खलन:

  • भूस्खलन (Landslide) एक भूवैज्ञानिक घटना है जिसमें शैल, मिट्टी और मलबे के एक भाग का नीचे की ओर खिसकना या संचलन शामिल होता है। यह संचलन छोटे एवं स्थानीय बदलावों से लेकर बड़े एवं विनाशकारी घटनाओं तक भिन्न-भिन्न पैमाने का हो सकता है।
  • भूस्खलन प्राकृतिक और मानव-निर्मित, दोनों ही ढलानों पर घटित हो सकते हैं तथा वे प्रायः भारी वर्षा, भूकंप, ज्वालामुखीय गतिविधि, मानव गतिविधि (जैसे निर्माण या खनन) और भूजल स्तर में परिवर्तन जैसे कारकों के संयोजन से उत्पन्न होते हैं। 

भूस्खलन को उनकी गति/संचलन विशेषताओं के आधार पर कई प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: 

  • स्खलन/स्लाइड (Slides): ये किसी विखंडित सतह (rupture surface) या दुर्बल क्षेत्र (zone of weakness) में मिट्टी या शैल का संचलन हैं। इन्हें आगे रोटेशनल स्लाइड (rotational slides)—जहाँ विखंडित सतह घुमावदार होती है; और ट्रांसलेशनल स्लाइड (translational slides)—जहाँ विखंडित सतह रेखीय होती है, में विभाजित किया जा सकता है। 
  • प्रवाह/फ्लो (Flows): ये मिट्टी या शैल के ऐसे संचलन हैं जिनमें बड़ी मात्रा में जल भी शामिल होता है, जो इस द्रव्यमान को तरल पदार्थ की तरह प्रवाहित करता है। इन्हें शामिल सामग्री और गति की दर के आधार पर मृदा प्रवाह (earth flows), मलबा प्रवाह (debris flows), पंक प्रवाह (mud flow) और क्रीप (creep) में विभाजित किया जा सकता है। 
  • फैलाव/स्प्रेड (Spreads): ये मिट्टी या शैल के ऐसे संचलन हैं जिनमें पार्श्व विस्तार और द्रव्यमान का टूटना शामिल होता है। वे आमतौर पर सामग्री के द्रवीकरण (liquefaction) या प्लास्टिक विरूपण (plastic deformation) के कारण घटित होते हैं। 
  • अग्रपात/टॉपल्स (Topples): ये मिट्टी या शैल के ऐसे संचलन हैं जिनमें ऊर्ध्वाधर या निकट-ऊर्ध्वाधर भृगु या ढलान से द्रव्यमान का आगे की ओर घूमना और मुक्त रूप से गिरना शामिल होता है। 
  • प्रपात/फॉल्स (Falls): ये मिट्टी या शैलों के ऐसे संचलन हैं जिनमें ये खड़ी ढलान या भृगु से अलग हो जाते हैं और मुक्त रूप से गिरते हैं तथा लुढ़कते हुए आगे बढ़ते हैं। 

हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन के कारण:

  • भंगुर पारिस्थितिकी तंत्र: शैल विरूपण, उत्खनन एवं शैलों के रि-वर्क जैसी कई उपसतह प्रक्रियाओं से संबद्ध टेक्टोनिक या नव-टेक्टोनिक गतिविधियाँ तथा कटाव, अपक्षय एवं वर्षा/हिमपात जैसी सतह प्रक्रियाएँ पारिस्थितिकी तंत्र को स्वाभाविक रूप से भंगुर (fragile) बनाती हैं। 
    • भूकंप: हिमालय क्षेत्र में यूरेशियन प्लेट के साथ भारतीय प्लेट के टकराने ने भूमिगत तनाव पैदा किया है जो भूकंप के रूप में प्रकट होता है और इसके परिणामस्वरूप यह दरार/फ्रैक्चर का निर्माण करता है तथा पर्वत सतह के निकट लिथो-संरचनाओं को ढीला कर देता है। इससे ढलान के साथ शैलों के संचलन की संभावना बढ़ जाती है। 
      • मलबे का प्रवाह और भूमिगत जल ढलान को दुर्बल बनाते हैं और स्थल खंड इससे नीचे खिसक सकता है। 
  • जलवायु प्रेरित चरम घटनाएँ: जलवायु-प्रेरित चरम घटनाएँ, जैसे बर्फ़ का जमना/पिघलना और भारी वर्षा/हिमपात के कारण हिमस्खलन, भूस्खलन, मलबा प्रवाह, GLOFs (Glacial Lakes Outburst Floods), LLOFs (Landslide Lakes Outburst Floods) और ‘फ्लैश फ्लड’ की स्थिति उत्पन्न होती है। वे पर्वतीय प्रणाली की अनिश्चितता को और बढ़ाते हैं। मानवजनित गतिविधियों से हिमालय पर और अधिक दबाव बनता है। 
    • जलवायु परिवर्तन का हिमनदों, नदी प्रणालियों, भू-आकृति विज्ञान और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप पर्वतीय राज्यों में लोगों की भेद्यता/असुरक्षा बढ़ गई है। 
      • भूमि क्षरण से यह समस्या और बढ़ जाती है। 
  • मानवजनित कारक: सड़क निर्माण, सुरंग निर्माण, खनन, उत्खनन, वनों की कटाई, शहरीकरण, कृषि, अत्यधिक पर्यटन और जलविद्युत परियोजना जैसी मानवीय गतिविधियाँ भी हिमालय में भूस्खलन का कारण बन सकती हैं या इसे गंभीर बना सकती हैं। ये गतिविधियाँ वनस्पति आवरण को हटाने, जल निकासी पैटर्न में बदलाव करने, मिट्टी के कटाव को बढ़ाने, कृत्रिम ‘कट एंड फिल’ का निर्माण करने, शैलों को तोड़ने और कंपन पैदा करने के रूप में ढलानों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ सकती हैं। 
    • ये गतिविधियाँ मानव बस्तियों और अवसंरचना के लिये भूस्खलन के खतरे एवं जोखिम को भी बढ़ा सकती हैं। 
    • वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी इस भूभाग में होटल, सड़क, पुल और बाँध जैसी अनियोजित विकास एवं निर्माण गतिविधियों से भी प्रभावित हुई थी, जिसने प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली को बदल दिया था और मृदा का कटाव बढ़ गया था। 
  • भूवैज्ञानिक संरचना: हिमालय की कुछ शैलें चूना पत्थर से बनी हैं, जो अन्य प्रकार की शैलों की तुलना में जल एवं भूस्खलन के प्रति अधिक प्रवण होती हैं, क्योंकि यह अम्लीय वर्षा जल या भूजल में घुल सकती हैं। यह प्रक्रिया गुफाओं, सिंकहोल और अन्य कार्स्ट स्थलाकृति का निर्माण करती है जो ढलानों की स्थिरता को कमज़ोर करती हैं। 
  • पश्चिमी विक्षोभ और मानसून: पश्चिमी विक्षोभ (जो भूमध्य सागर से उत्पन्न होने वाली और पूर्व की ओर आगे बढ़ते हुए मध्य एशिया एवं उत्तरी भारत में पहुँचने वाली निम्न दाब प्रणाली है) और दक्षिण-पश्चिम भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून के अभिसरण के कारण जम्मू-कश्मीर के कुछ भागों, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अत्यधिक एवं केंद्रित वर्षा होती है जो फिर भूस्खलन एवं फ्लैश फ्लड का कारण बनती है। 

हिमालय क्षेत्र के भूस्खलन की पश्चिमी घाट के भूस्खलन से भिन्नता: 

  क्षेत्र 

कारण 

  • हिमालय 
  • प्लेट टेक्टोनिक गति के कारण उच्च भूकंपीयता 
  • आसानी से नष्ट होने वाली अवसादी शैलें 
  • उच्च कटाव क्षमता वाली युवा एवं ऊर्जावान नदियाँ  
  • भारी वर्षा और हिमपात 
  • वनों की कटाई, झूम खेती, सड़क निर्माण जैसी मानवजनित गतिविधियाँ। 
  • पश्चिमी घाट 
  • संकेंद्रित वर्षा 
  • पहाड़ियों का अतिभार 
  • खनन एवं उत्खनन 
  • कृषि कार्य, पवनचक्की परियोजनाओं जैसी मानवजनित गतिविधियाँ। 
  • पतली मिट्टी पर सघन वनस्पति के साथ वन विखंडन 

भूस्खलन के खतरे को कम करने के लिये सरकार द्वारा की गई पहलें: 

  • राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम प्रबंधन रणनीति (National Landslide Risk Management Strategy), 2019: यह एक व्यापक दस्तावेज़ है जो भूस्खलन आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन के सभी घटकों को संबोधित करता है, जैसे कि खतरा मानचित्रण, निगरानी, पूर्व-चेतावनी प्रणाली, जागरूकता कार्यक्रम, क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण, विनियमन, नीतियाँ, भूस्खलन का स्थिरीकरण एवं शमन आदि।  
  • भूस्खलन जोखिम शमन योजना (Landslide Risk Mitigation Scheme- LRMS): यह एक तैयार की जा रही एक योजना है जिसमें भूस्खलन प्रवण राज्यों द्वारा अनुशंसित स्थल-विशिष्ट भूस्खलन शमन परियोजनाओं के लिये वित्तीय सहायता की परिकल्पना की गई है, जिसमें आपदा रोकथाम रणनीति, आपदा शमन और गंभीर भूस्खलन की निगरानी में अनुसंधान एवं विकास के नियोजन को दायरे में लिया गया है; इस प्रकार, पूर्व-चेतावनी प्रणाली और क्षमता निर्माण पहलों के विकास की ओर आगे कदम बढ़ाया गया है। 
  • बाढ़ जोखिम न्यूनीकरण योजना (Flood Risk Mitigation Scheme- FRMS): यह एक अन्य योजना है जिसे तैयार किया जा रहा है। इसमें मॉडल बहुउद्देश्यीय बाढ़ आश्रयों के विकास के लिये पायलट परियोजनाओं और नदी बेसिन विशिष्ट बाढ़ पूर्व-चेतावनी प्रणाली के विकास तथा बाढ़ की स्थिति में सुरक्षित निकासी के लिये ग्रामीणों को पूर्व-चेतावनी देने हेतु बाढ़ मॉडल्स तैयार करने के लिये डिजिटल एलिवेशन मैप जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।  
  • भूस्खलन और हिमस्खलन पर राष्ट्रीय दिशानिर्देश (National Guidelines on Landslides and Snow Avalanches): ये सभी स्तरों पर भूस्खलन से उत्पन्न जोखिम को कम करने के लिये परिकल्पित गतिविधियों का मार्गदर्शन करने के लिये राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा तैयार किये गए दिशानिर्देश हैं। ये दिशानिर्देश जोखिम मूल्यांकन, भेद्यता विश्लेषण, जोखिम प्रबंधन, संरचनात्मक एवं गैर-संरचनात्मक उपाय, संस्थागत तंत्र, वित्तीय व्यवस्था, सामुदायिक भागीदारी आदि विभिन्न पहलुओं को कवर करते हैं। 
  • लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया: लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया (Landslide Atlas of India) एक दस्तावेज़ है जो भारत के भूस्खलन प्रांतों में मौजूद भूस्खलन स्थलों का विवरण प्रदान करता है और इसमें विशिष्ट भूस्खलन स्थलों का क्षति आकलन भी शामिल है। इसे इसरो (ISRO) के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (National Remote Sensing Centre- NRSC) द्वारा तैयार किया गया है। 

आगे की राह:  

  • प्रत्यास्थता का निर्माण: इन चुनौतियों से निपटने के लिये प्राकृतिक प्रक्रियाओं, पर्यावरणीय क्षरण और मानवीय गतिविधियों के कारण उत्पन्न होने वाले भू-खतरों के विरुद्ध प्रत्यास्थता (resilience) विकसित करना महत्त्वपूर्ण है। इसमें वास्तविक समय निगरानी और डेटा संग्रह के लिये सेंसर तंत्र (a network of sensors) लागू करना शामिल है। 
  • प्रभावी निगरानी के लिये प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना: 
    • वेब-आधारित सेंसर—जैसे रेन गेज (rain gauges), पीज़ोमीटर (piezometers), इनक्लिनोमीटर (inclinometers), एक्सटेंसोमीटर (extensometers), InSAR (Interferometric Synthetic Aperture Radar)—और टोटल स्टेशन (total stations) संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी में मदद कर सकते हैं। घनी आबादी वाले और निर्मित क्षेत्रों (built-up zones) में निगरानी को प्राथमिकता दी जानी चाहिये। 
    • एकीकृत पूर्व-चेतावनी प्रणाली: AI और मशीन लर्निंग (ML) एल्गोरिदम का उपयोग करके एक एकीकृत पूर्व-चेतावनी प्रणाली (Early Warning System- EWS) का विकास करना महत्त्वपूर्ण है। ऐसी प्रणाली आसन्न खतरों का पूर्वानुमान करने और समुदायों को सचेत करने में मदद कर सकती है, जिससे उन्हें निवारक उपाय करने के लिये बहुमूल्य समय प्राप्त हो सकता है। 
  • हिमालयी राज्य परिषद का गठन: एक ऐसे सहयोगी मंच की स्थापना करना जो हिमालयी क्षेत्र के विभिन्न राज्यों के आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों को एक साथ लाता हो, एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक कदम होगा। यह केंद्रीकृत परिषद भूभाग पर विभिन्न दबावकारी घटकों के प्रभावों का प्रभावी ढंग से आकलन करने और उनका प्रबंधन करने के लिये ज्ञान, अनुभव एवं संसाधनों की साझेदारी को सक्षम बनाएगी। 
    • सिमुलेशन और खतरे का आकलन: यह परिषद प्राकृतिक प्रक्रियाओं, पर्यावरणीय क्षरण, जलवायु-प्रेरित घटनाओं और मानवजनित गतिविधियों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले खतरे के परिदृश्यों के सिमुलेशन/अनुकरण एवं आकलन पर ध्यान केंद्रित कर सकती है। इससे संभावित जोखिमों को समझने और उचित शमन रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी। 
    • ज्ञान का प्रसार: जबकि हिमालय क्षेत्र पर्याप्त रूप से विविध और भिन्न है, विभिन्न राज्यों के बीच आकलन के निष्कर्षों को साझा करना आवश्यक है। सहयोगात्मक प्रयासों और साझा ज्ञान से चुनौतियों एवं संभावित समाधानों की अधिक व्यापक समझ का माहौल बन सकता है। 
    • पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण: इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना एक प्राथमिक दायित्व है। परिषद संवहनीय अभ्यासों और उत्तरदायी संसाधन उपयोग को बढ़ावा देकर प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा में मदद कर सकती है। 
  • संवहनीय सामाजिक-आर्थिक विकास: भूभाग में मौजूद मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों (जैसे हिमनद, जलधाराएँ, खनिज, ऊर्जा स्रोत और औषधीय वनस्पति) को चिह्नित करना संवहनीय सामाजिक-आर्थिक विकास की क्षमता प्रदान करता है। हालाँकि, दीर्घकालिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिये संसाधन दोहन और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच संतुलन बनाये रखना महत्त्वपूर्ण है। 
  • पर्यावरण संबंधी विचार: पर्वतीय इलाकों की अनूठी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए उचित नगर नियोजन महत्त्वपूर्ण है। भारी निर्माण को प्रतिबंधित करना, प्रभावी जल निकासी प्रणालियों को लागू करना, ढलान-कटाई का वैज्ञानिक रूप से प्रबंधन करना और धारक-भित्ति (retaining walls) का उपयोग करना पर्यावरण के प्रति जागरूक विकास के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। 
    • धारक भित्ति अपेक्षाकृत सुदृढ़ दीवारें होती हैं जिनका उपयोग मिट्टी को पार्श्व रूप से सहारा देने के लिये किया जाता है ताकि इसे दोनों तरफ भिन्न स्तरों पर बनाए रखा जा सके। 
  • भवन निर्माण संहिता और आकलन: शहरों की हाई-रिज़ॉल्यूशन मैपिंग और उनकी भार-वहन क्षमता का आकलन प्रभावी भवन निर्माण संहिता के निर्माण के आवश्यक घटक हैं। यह दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि विशेष रूप से भूस्खलन एवं भूकंप जैसे प्राकृतिक खतरों से प्रवण क्षेत्रों में निर्माण सुरक्षित एवं प्रत्यास्थी है। 
  • सतत्/संवहनीय पर्यटन: सतत् पर्यटन (Sustainable Tourism) पर्यावरण जागरूकता, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं सुरक्षा और जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति सम्मान को बढ़ावा देकर भूस्खलन को कम कर सकता है। 
    • यह स्थानीय समुदायों के लिये आर्थिक प्रोत्साहन एवं सामाजिक लाभ भी प्रदान कर सकता है, जो प्राकृतिक खतरों से निपटने के लिये उनकी प्रत्यास्थता एवं अनुकूलन क्षमता को बढ़ा सकता है। 
  • संवहनीय सरकारी परियोजनाओं का निर्माण: हिमालयी क्षेत्र में उत्तरदायी विकास सुनिश्चित करने के लिये कुछ प्रमुख उपायों में पर्यावरण आकलन करना, पर्यावरण-अनुकूल प्रौद्योगिकियों का उपयोग करना, स्थानीय समुदायों को संलग्न करना, हितधारक जागरूकता की वृद्धि करना और सरकारी क्षेत्रों के बीच समन्वय को बढ़ावा देना शामिल हैं। 

अभ्यास प्रश्न: हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन की बढ़ती घटनाओं के आलोक में इसके अंतर्निहित कारकों एवं परिणामों को बताते हुए इसके प्रभावों को कम करने हेतु संभावित उपायों पर चर्चा कीजिये। 

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

मेन्स:

प्रश्न. हिमालय क्षेत्र और पश्चिमी घाट में भूस्खलन के कारणों के बीच अंतरों को बताइये। (2021)

प्रश्न. हिमालय क्षेत्र भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इसके प्रमुख कारणों पर चर्चा करते हुए इसके शमन हेतु उपाय बताइये। (2016)

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