मानसून और पूर्वानुमान

संदर्भ
गौरतलब है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग 18 अप्रैल को दक्षिण-पश्चिम मानसून का दीर्घावधि पूर्वानुमान जारी किया गया है। देश में मानसून का सीज़न चार महीनों का होता है। मानसून जून में शुरू होता है और सितंबर तक सक्रिय रहता है। दीर्घावधि पूर्वानुमान के दौरान मौसम विभाग कई पैमानों का इस्तेमाल कर इन चार महीनों के दौरान होने वाली मानसूनी बारिश की मात्रा को लेकर संभावना जारी करता है। इससे कृषि एवं अन्य क्षेत्रों को अपनी जरूरी तैयारियाँ करने में मदद मिलती है।

  • मानसून कृषि के लिये बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आधी से ज्यादा खेती-बाड़ी मानसूनी बारिश पर ही निर्भर करती है। लेकिन वैसे क्षेत्र जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध  हैं भी, वहाँ भी मानसूनी बारिश बहुत जरूरी होती है, क्योंकि बारिश नहीं होगी तो नदियाँ-झीलें भी सूख जाएंगी। वस्तुतः ये सभी वे स्रोत होते हैं, जहाँ से सिंचाई के लिये पानी आता है।
  • स्पष्ट है कि मानसून समृद्धि का ही नहीं, बल्कि संस्कृति का भी सूचक है। यह सांस्कृतिक रूप से भी हमारी जीवनशैली में रचा-बसा हुआ है। 

मानसून का अर्थ

  • ध्यातव्य है कि यह अरबी शब्द मौसिम से निकला हुआ शब्द है, जिसका अर्थ होता है हवाओं का मज़ाज। 
  • शीत ऋतु में हवाएँ उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर बहती हैं जिसे शीत ऋतु का मानसून कहा जाता है। उधर, ग्रीष्म ऋतु में हवाएँ इसके विपरीत दिशा में बहती हैं, जिसे दक्षिण-पश्चिम मानसून या गर्मी का मानसून कहा जाता है।
  • चूँकि पूर्व के समय में इन हवाओं से व्यापारियों को नौकायन में सहायता मिलती थी, इसीलिये इन्हें व्यापारिक हवाएँ या ‘ट्रेड विंड’ भी कहा जाता है।

मानसून की शुरुआत कैसे होती है?

  • ग्रीष्म ऋतु में जब हिन्द महासागर में सूर्य विषुवत रेखा के ठीक ऊपर होता है, तो मानसून का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में समुद्र की सतह गरम होने लगती है और उसका तापमान 30 डिग्री तक पहुँच जाता है। जबकि इस दौरान धरती का तापमान 45-46 डिग्री तक पहुँच चुका होता है।
  • ऐसी स्थिति में हिन्द महासागर के दक्षिणी हिस्से में मानसूनी हवाएँ सक्रिय हो जाती हैं। ये हवाएँ एक दूसरे को आपस में काटते हुए विषुवत रेखा पार कर एशिया की तरफ बढ़ने लगती है। इसी दौरान समुद्र के ऊपर बादलों के बनने की प्रक्रिया शुरू होती है।
  • विषुवत रेखा पार करके ये हवाएँ और बादल बारिश करते हुए बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का रुख करते हैं। इस दौरान देश के तमाम हिस्सों का तापमान समुद्र तल के तापमान से अधिक हो जाता है।
  • ऐसी स्थिति में हवाएँ समुद्र से ज़मीन की ओर बहनी शुरू हो जाती हैं। ये हवाएँ समुद्र के जल के वाष्पन से उत्पन्न जल वाष्प को सोख लेती हैं और पृथ्वी पर आते ही ऊपर की ओर उठने लगती है और वर्षा करती हुई आगे बढ़ती हैं।
  • बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में पहुँचने के बाद ये मानसूनी हवाएँ दो शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं।
  • एक शाखा अरब सागर की तरफ से मुंबई, गुजरात एवं राजस्थान होते हुए आगे बढ़ती है तो दूसरी शाखा बंगाल की खाड़ी से पश्चिम बंगाल, बिहार, पूर्वोत्तर होते हुए हिमालय से टकराकर गंगीय क्षेत्रों की ओर मुड़ जाती हैं और इस प्रकार जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरे देश में झमाझम पानी बरसने लगता है।

मानसून का पूर्वानुमान?

  • वस्तुतः मानसून एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसका अनुमान लगाना बेहद जटिल है। कारण यह है कि भारत में विभिन्न किस्म के जलवायु जोन और उप-जोन हैं। हमारे देश में 127 कृषि जलवायु उप-संभाग हैं और 36 संभाग हैं।
  • मानसून विभाग द्वारा अप्रैल के मध्य में मानसून को लेकर दीर्घावधि पूर्वानुमान जारी किया जाता है। इसके बाद फिर मध्यम अवधि और लघु अवधि के पूर्वानुमान जारी किये जाते हैं। हालाँकि पिछले कुछ समय से ‘नाऊ कास्ट’ के माध्यम से मौसम विभाग ने अब कुछ घंटे पहले के मौसम की भविष्यवाणी करना आरंभ कर दिया है।
  • ध्यातव्य है कि मौसम विभाग की भविष्यवाणियों में हाल के वर्षों में सुधार देखा गया है। अभी मध्यम अवधि की भविष्यवाणियाँ जो 15 दिन से एक महीने की होती हैं, 70-80 फीसदी तक सटीक निकलती है।
  • हालाँकि, लघु अवधि की भविष्यवाणियाँ जो आगामी 24 घंटों के लिये होती हैं करीब 90 फीसदी तक सही होती हैं। अलबत्ता, नाऊ कास्ट की भविष्यवाणियाँ करीब-करीब 99 फीसदी सही निकलती हैं।

अल-नीनो और ला-नीना
अल-नीनो

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका के निकट खासकर पेरु वाले क्षेत्र में यदि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द समुद्र की सतह अचानक गरम होनी शुरू हो जाए तो अल-नीनो की स्थिति बनती है।
  • यदि तापमान में यह बढ़ोतरी 0.5 डिग्री से 2.5 डिग्री के बीच हो तो यह मानसून को प्रभावित कर सकती है। इससे मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागर में हवा के दबाव में कमी आने लगती है। इसका असर यह होता कि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द चलने वाली ट्रेड विंड कमजोर पड़ने लगती हैं। यही हवाएँ मानसूनी हवाएँ होती हैं जो भारत में बारिश करती है।

ला-नीना

  • प्रशांत महासागर में उपरोक्त स्थान पर कभी-कभी समुद्र की सतह ठंडी होने लगती है। ऐसी स्थिति में अल-नीनो के ठीक विपरीत घटना होती है जिसे ला-नीना कहा जाता है। 
  • ला-नीना बनने से हवा के दबाव में तेजी आती है और ट्रेड विंड को रफ्तार मिलती है, जो भारतीय मानसून पर अच्छा प्रभाव डालती है। उदाहरण के लिये, वर्ष 2009 में मानसून पर अल-नीनो के प्रभाव के कारण कम बारिश हुई थी, जबकि वर्ष 2010 एवं 2011 में ला-नीना के प्रभाव के कारण अच्छी बारिश हुई थी। 

सामान्य मानसून के फायदे
खाद्यान्न उत्पादन बढ़ेगा

  • बारिश अच्छी होने का सबसे अच्छा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। जहाँ सिंचाई की सुविधा मौजूद नहीं है, वहाँ बारिश होने से अच्छी फसल होने की संभावना बढ़ जाती है। 
  • इसके अतिरिक्त ऐसे क्षेत्र जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं भी, तो ऐसे क्षेत्रों में समय पर अच्छी बारिश होने से किसानों को नलकूप चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। साथ ही उनकी उत्पादन लागत में कमी आयेगी। फलत: अच्छे उत्पादन से किसानों को फायदा होगा और खाद्यान्नों की मूल्यवृद्धि भी नियंत्रित रहेगी। 

बिजली संकट कम होगा 

  • जैसा की हम सभी जानते हैं कि मानूसन के चार महीनों में झमाझम बारिश होने से नदियों, जलाशयों का जलस्तर बढ़ जाता है। इससे बिजली उत्पादन भी अच्छा होता है।
  • यदि बारिश कम हो और जलस्तर कम हो जाए तो बिजली उत्पादन भी प्रभावित होता है।

पानी की कमी दूर होगी 

  • अच्छे मानसून से पीने के पानी की उपलब्धता संबंधी समस्या का भी काफी हद तक समाधान होता है। एक तो नदियों, तालाबों में पर्याप्त मात्रा में पानी जमा हो जाता है। दूसरे, भूजल का भी पुनर्भरण होता है। 

गर्मी से राहत

  • मानसून की बारिश जहाँ एक ओर खेती-बाड़ी, जलाशयों, नदियों को पानी से लबालब कर देती हैं, वहीं दूसरी ओर भीषण गर्मी से तप रहे देश को भी गर्मी से राहत प्रदान करती है।

मानसून से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

  • मानसून हिन्द महासागर में उत्‍पन्‍न होता है और मई के दूसरे सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान निकोबार द्वीपों में दस्तक देता है। इसके पश्चात् एक जून को केरल में इसका आगमन होता है।
  • यदि हिमालय पर्वत नहीं होता तो उत्तर भारत के मैदानी इलाके मानसून से वंचित रह जाते। क्योंकि मानसूनी हवाएँ बंगाल की खाड़ी से आगे बढ़ती है और हिमालय से टकराकर वापस लौटते हुए उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में बारिश करती है।
  • देश में मानसून के चार महीनों में 89 सेंटीमीटर औसत बारिश होती है। 80 फीसदी बारिश मानसून के चार महीनों जून-सितंबर के दौरान होती है।
  • देश की 65 फीसदी खेती-बाड़ी मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। बिजली उत्पादन, भूजल का पुनर्भरण, नदियों का पानी भी मानसून पर निर्भर करता है।
  • पश्चिम तट और पूर्वोत्तर के राज्यों में 200 से एक हजार सेमी बारिश होती है जबकि राजस्थान और तमिलनाडु के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ मानसूनी बारिश सिर्फ 10-15 सेमी ही होती है।