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तमिलनाडु में NEET विरोधी आंदोलन

  • 19 Aug 2023
  • 17 min read

यह एडिटोरियल 11/08/2023 को ‘लाइवमिंट’ में प्रकाशित ‘‘The anti-NEET movement in Tamil Nadu is misguided’’ लेख पर आधारित है। यह तमिलनाडु में NEET विरोधी आंदोलन और NEET से जुड़े मुद्दों के बारे में चर्चा की गई है।

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET), केंद्र और राज्य की शक्तियाँ, समवर्ती सूची।

मेन्स के लिये:

राज्यों द्वारा केंद्रीय कानून तोड़ने के परिणाम, भारतीय शिक्षा प्रणाली से संबंधित चुनौतियाँ।

हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने राज्य को राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (National Eligibility and Entrance Test- NEET) से छूट देने के लिये तमिलनाडु अंडरग्रेजुएट मेडिकल डिग्री पाठ्यक्रम प्रवेश विधेयक, 2021 (Tamil Nadu Admission to Undergraduate Medical Degree Courses Bill, 2021) पारित किया, लेकिन तमिलनाडु के राज्यपाल ने इस पर अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया है। इससे राज्य और केंद्र के बीच एक गतिरोध उत्पन्न हो गया है और तमिलनाडु में चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा हुई हैं।

वर्ष 2017 में NEET को अनिवार्य बनाए जाने के बाद से ही तमिलनाडु द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। इस परीक्षा को राज्य की स्वायत्तता, स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली, सामाजिक न्याय और शैक्षिक गुणवत्ता के लिये खतरे के रूप में देखा जाता है। इस संदर्भ में NEET के लाभ और हानियों पर विस्तार से चर्चा करना प्रासंगिक होगा।

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET):

  • NEET, जिसे पूर्व में अखिल भारतीय प्री-मेडिकल परीक्षा (AIPMT) के रूप में जाना जाता था, भारतीय मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में एमबीबीएस और बीडीएस कार्यक्रमों के लिये पात्रता परीक्षा है।
  • इसे वर्ष 2013 में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा पेश किया गया था और अब इसे राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) द्वारा संचालित किया जाता है।

NEET परीक्षा के लाभ:

  • एकल प्रवेश परीक्षा: NEET परीक्षा भारत में मेडिकल और डेंटल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिये एकल प्रवेश परीक्षा है। यह पूर्व में आयोजित की जातीं विभिन्न राज्य-स्तरीय और निजी परीक्षाओं को प्रतिस्थापित करती है। इससे छात्रों और कॉलेजों के लिये समय, धन और श्रम की बचत होती है। छात्रों को विभिन्न परीक्षाओं के लिये आवेदन करने और अलग-अलग शुल्क का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है। कॉलेजों को अलग-अलग परीक्षा और काउंसलिंग सत्र आयोजित करने की आवश्यकता नहीं है।
  • निष्पक्षता और पारदर्शिता: NEET परीक्षा कुछ राज्य-आधारित और स्वतंत्र परीक्षाओं में प्रचलित भ्रष्टाचार, कदाचार और प्रश्न पत्रों के लीक होने की संभावना को कम कर देती है। यह निजी कॉलेजों में सीटें सुरक्षित करने के लिये डोनेशन या कैपिटेशन शुल्क की आवश्यकता को भी समाप्त कर देती है। अब NEET परीक्षा में छात्रों के मेरिट और रैंक के आधार पर कॉलेज में प्रवेश दिया जाता है।
  • समान अवसर: NEET परीक्षा देश भर के सभी छात्रों को एकसमान अवसर प्रदान करती है। इसका राज्यों या केंद्र सरकार की आरक्षण नीतियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। राज्य NTA द्वारा तैयार की गई मेरिट लिस्ट के आधार पर अपनी आरक्षण प्रणाली लागू कर सकते हैं। छात्र अपनी प्राथमिकता और पात्रता के आधार पर राज्य कोटा या अखिल भारतीय कोटा के तहत प्रवेश के लिये आवेदन कर सकते हैं। ग्रामीण या दूरदराज के क्षेत्रों के छात्र भी शहरी या महानगरीय क्षेत्रों के छात्रों के साथ एकसमान स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा कर सकते हैं।
  • भाषा विकल्प: NEET परीक्षा 13 भाषाओं में आयोजित की जाती है, जिनमें अंग्रेज़ी, हिंदी, असमिया, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। इससे छात्रों को परीक्षा के लिये अपनी पसंदीदा भाषा चुनने का विकल्प प्राप्त होता है। इससे उन्हें भाषा की बाधा को दूर करने और बेहतर प्रदर्शन करने में भी मदद मिलती है।

NEET परीक्षा से संबद्ध प्रमुख मुद्दे:

  • उच्च जोखिम कारक: NEET परीक्षा एक अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धी परीक्षा है जिसमें हर साल लाखों छात्र उपस्थित होते हैं। छात्रों के पास एक वर्ष के अंदर परीक्षा पास करने और अपने पसंदीदा कॉलेज में सीट सुरक्षित करने का केवल एक अवसर होता है। यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं तो उन्हें एक और वर्ष तक प्रतीक्षा करनी होती है या अन्य पाठ्यक्रमों का विकल्प चुनना होता है। यह उन छात्रों में तनाव, दुश्चिंता और अवसाद का कारण बन सकता है जिनकी स्वयं से या उनके माता-पिता की उनसे बहुत उम्मीदें हैं।
  • CBSE पाठ्यक्रम: NEET परीक्षा CBSE पाठ्यक्रम पर आधारित है, जो सभी छात्रों के लिये उपयुक्त नहीं भी हो सकता है। जिन छात्रों ने विभिन्न राज्य बोर्डों के तहत अध्ययन किया है, उन्हें पाठ्यक्रम और परीक्षा की कठिनाई के स्तर का सामना करना जटिल लग सकता है।
  • लागत कारक: NEET परीक्षा सभी छात्रों के लिये लागत अनुकूल नहीं है। परीक्षा शुल्क सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिये 1500 रुपए और आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिये 800 रुपए है। इसके अलावा, छात्रों को कोचिंग फीस, अध्ययन सामग्री, यात्रा व्यय आदि अन्य खर्च भी वहन करने पड़ते हैं। गरीब या ग्रामीण पृष्ठभूमि के कुछ छात्रों के लिये यह लागत वहनीय नहीं भी हो सकती है। उन्हें फिर शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ सकता है या वित्तीय बाधाओं के कारण अपने स्वप्न को छोड़ना पड़ सकता है।
  • भाषाई बाधा: चूँकि NEET केवल 13 भाषाओं में आयोजित की जाती है, इसलिये कुछ छात्रों को प्रश्नों को समझने या अपने उत्तरों को उस भाषा में व्यक्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है जो उनकी मातृभाषा या शिक्षा का माध्यम नहीं है। इससे उनकी समझ और सटीकता प्रभावित हो सकती है।
  • सामाजिक और आर्थिक कारक: कुछ छात्रों को अपनी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कोचिंग, संसाधनों या मार्गदर्शन तक पहुँच की कमी। ये कारक NEET में उनकी तैयारी और प्रदर्शन में बाधा डाल सकते हैं।

तमिलनाडु द्वारा NEET प्रवेश परीक्षा का विरोध करने के कारण:

  • संघवाद का उल्लंघन: NEET ने सरकारी क्षेत्र में मेडिकल स्नातकों के लिये राज्य के इन-सर्विस कोटा को भी समाप्त कर दिया है, जिसके बारे में आलोचक मानते हैं कि इसने गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल को कमज़ोर कर दिया है।
    • राज्य की अपनी प्रवेश प्रणाली है जो 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में प्राप्त अंकों पर आधारित है और इसे NEET की तुलना में अधिक समावेशी एवं न्यायसंगत माना जाता है।
    • दूसरी ओर, NEET को राज्य सरकारों से परामर्श किये बिना केंद्र द्वारा लागू किया गया है और यह विभिन्न क्षेत्रों की विविधता एवं आवश्यकताओं की उपेक्षा करता है।
  • वंचित छात्रों के लिये अवसरों की हानि:
    • ए.के. राजन समिति (तमिलनाडु में मेडिकल प्रवेश पर NEET के प्रभाव का अध्ययन करने के लिये वर्ष 2021 में तमिलनाडु सरकार द्वारा नियुक्त) के अनुसार, NEET परीक्षा उन गरीब और वंचित छात्रों के अधिकारों एवं हितों को नुकसान पहुँचाती है जो डॉक्टर बनने का स्वप्न रखते हैं।
    • समिति की रिपोर्ट में निष्कर्ष दिया गया है कि NEET ने रिपीटर्स (वर्ष 2021 में 71%) और कोचिंग की मदद लेने वाले छात्रों (वर्ष 2020 में 99%) को असंगत रूप से लाभान्वित किया है, जबकि पहली बार आवेदन करने वाले छात्रों के साथ भेदभाव किया है।
  • कोचिंग संस्कृति को बढ़ावा: रिपोर्ट में NEET को लर्निंग के बजाय कोचिंग संस्कृति को बढ़ावा देने और सांस्कृतिक, क्षेत्रीय, भाषाई एवं सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रहों का पोषण करने का दोषी बताया गया है जो वंचित समूहों के विरुद्ध है।
    • आरोप लगाया गया है यह CBSE के अंतर्गत शिक्षा प्राप्त उन छात्रों के पक्ष में झुका हुआ है जो कोचिंग कक्षाओं की मदद लेते हैं, निजी अंग्रेज़ी-माध्यम स्कूलों में पढ़े हैं और समृद्ध शहरी पृष्ठभूमि रखते हैं।
  • छात्रों की आत्महत्या: NEET को तमिलनाडु में छात्र आत्महत्या के कई मामलों से भी जोड़ा गया है, जिससे राज्य भर में आक्रोश की वृद्धि हुई है और विरोध प्रदर्शन किये गए हैं। कई छात्र जिन्होंने अपनी बोर्ड परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन किया है या चिकित्सा के प्रति जुनून रखते हैं, NEET में असफल होने के बाद उम्मीद और आत्मविश्वास खो दिया है।

NEET परीक्षा के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में हालिया याचिका:

  • फ़रवरी 2023 में तमिलनाडु सरकार ने NEET की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया और आरोप लगाया कि NEET संघवाद के सिद्धांत का उल्लंघन करती है जो संविधान के मूल ढाँचा का अंग है।
  • तमिलनाडु सरकार ने यह दावा भी किया है कि NEET व्यवस्था शिक्षा के संबंध में निर्णय ले सकने की राज्यों की स्वायत्तता का हरण करती है।
  • यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत दायर की गई है, जो सर्वोच्च न्यायालय को केंद्र और राज्य/राज्यों के बीच विवादों का निपटारा करने की अनुमति देता है।
  • याचिका में आरोप लगाया गया कि NEET संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है क्योंकि यह ‘‘ग्रामीण क्षेत्रों और राज्य बोर्डों के छात्रों के साथ भेदभाव करती है।’’
  • राज्य ने कहा है कि NEET CBSE/NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित है, जिससे ग्रामीण छात्रों को नुकसान होता है।
    • राज्य ने आरोप लगाया है कि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के पास कोचिंग कक्षाओं का खर्च उठाने के लिये आर्थिक संसाधनों की कमी होती है, जो राज्य बोर्डों में अच्छे स्कोर के बावजूद उन्हें नुकसान की स्थिति में रखती है।
  • तमिलनाडु सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 की धारा 14 को कई आधारों पर संविधान के तहत अधिकारातीत (ultra vires) घोषित करने की मांग की है।

आगे की राह:

  • शिक्षा को राज्य सूची में ले जाना: शिक्षा को संविधान की समवर्ती सूची से राज्य सूची में स्थानांतरित किया जा सकता है, जिससे राज्यों को अपनी प्रवेश नीतियों और मानदंडों को तय करने के लिये अधिक स्वायत्तता और लचीलापन प्राप्त होगा।
    • इससे राज्य अपनी शिक्षा प्रणाली को अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुसार डिज़ाइन करने में सक्षम होंगे तथा NEET जैसी साझा प्रवेश परीक्षाओं पर केंद्र के साथ टकराव से बच सकेंगे।
  • समानता और गुणवत्ता को संतुलित करना: एक संभावित समाधान यह हो सकता है कि एक अधिक समावेशी और समग्र प्रवेश प्रक्रिया तैयार की जाए जो NEET स्कोर और बारहवीं कक्षा के अंक के साथ ही पात्रता, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, क्षेत्रीय विविधता एवं ग्रामीण सेवा जैसे अन्य कारकों पर विचार करे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि योग्यता और सामाजिक न्याय से समझौता नहीं किया जाएगा तथा विभिन्न पृष्ठभूमि के छात्रों को डॉक्टर बनने के अपने स्वप्न को पूरा करने के लिये समान अवसर प्राप्त होंगे।
  • इसके साथ ही, कम प्रतिनिधित्व रखने वाले समुदायों के लिये आरक्षण एक संवैधानिक रूप से स्थापित लक्ष्य है जिसे हर कीमत पर संरक्षित किया जाना चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: तमिलनाडु का NEET विरोधी रुख केंद्र-राज्य संबंधों और चिकित्सा शिक्षा में समानता को कैसे प्रभावित करता है?

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारतीय संविधान के निम्नलिखित में से कौन-से प्रावधान शिक्षा पर प्रभाव डालते है? (2012)

  1. राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व
  2. ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय
  3. पंचम अनुसूची
  4. षष्ट अनुसूची
  5. सप्तम अनुसूची

निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1, 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर: (d)


मेन्स

प्रश्न. भारत में डिजिटल पहल ने देश की शिक्षा प्रणाली में किस प्रकार योगदान दिया है? अपने उत्तर में विस्तार से बताइये। (2020)

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