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विश्व ज़ूनोसिस दिवस

  • 08 Jul 2023
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

विश्व ज़ूनोसिस दिवस, ज़ूनोटिक रोग, वन हेल्थ  

मेन्स के लिये:

वन हेल्थ अवधारणा एवं इसका महत्त्व, ज़ूनोटिक रोग और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव 

चर्चा में क्यों?  

हाल ही में मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के पशुपालन और डेयरी विभाग ने आज़ादी का अमृत महोत्सव पहल के हिस्से के रूप में विश्व ज़ूनोसिस दिवस (6 जुलाई, 2023) पर ज़ूनोटिक रोगों पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया।

  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को ज़ूनोटिक रोग के जोखिमों एवं रोकथाम के लिये राष्ट्रीय प्रयासों के बारे में शिक्षित करना था। पशुओं के साथ निकट संपर्क के कारण किसानों को ज़ूनोटिक रोग होने का खतरा अधिक होता है।
  • ज़ूनोटिक रोग जोखिमों को संबोधित करने हेतु "वन हेल्थ" अवधारणा के महत्त्व पर बल दिया गया है। 

विश्व ज़ूनोसिस दिवस:

  • इतिहास: 
    • विश्व ज़ूनोसिस दिवस एक ज़ूनोटिक बीमारी के खिलाफ पहले टीकाकरण की वर्षगाँठ का प्रतीक है।
    • 6 जुलाई, 1885 को फ्राँसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने ज़ूनोटिक रोग का पहला टीका सफलतापूर्वक लगाया।
  • महत्त्व:  
    • विश्व ज़ूनोसिस दिवस लोगों को मानव और पशु स्वास्थ्य पर ज़ूनोटिक रोगों के जोखिमों और प्रभावों के बारे में शिक्षित करता है।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 60% ज्ञात संक्रामक रोग और 75% उभरते संक्रामक रोग ज़ूनोटिक हैं।

ज़ूनोटिक रोग:

  • परिचय: 
    • ज़ूनोटिक रोग वे बीमारियाँ हैं जो पशुओं  और मनुष्यों के बीच फैल सकती हैं। ये रोग बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी या कवक के कारण हो सकते हैं।
  • वर्गीकरण: 
    • रोगजनकों पर आधारित: 
      • बैक्टीरियल ज़ूनोज़: ये रोग जीवाणु संक्रमण के कारण होते हैं जो पशुओं से मनुष्यों में फैल सकते हैं।
      • वायरल ज़ूनोज़: प्रसिद्ध वायरल ज़ूनोटिक  रोगों में रेबीज़, इबोला और कोविड-19 शामिल हैं।
      • परजीवी ज़ूनोज़: टोक्सोप्लासमोसिस और लीशमैनियासिस जैसे रोग इस श्रेणी में आते हैं।  
      • फंगल ज़ूनोज़: दाद जैसे ज़ूनोटिक फंगल संक्रमण, कवक के कारण होते हैं जो जानवरों से मनुष्यों में फैल सकते हैं।
    • पशु प्रजातियों पर आधारित:
      • वन्यजीव ज़ूनोज़: इन बीमारियों में मुख्य रूप से मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच परस्पर क्रिया शामिल होती है, जैसे कि कृन्तकों द्वारा प्रसारित हंतावायरस संक्रमण या जंगली पक्षियों द्वारा फैलने वाली बीमारियाँ, जैसे एवियन इन्फ्लूएंज़ा (Bird Flu)
      • घरेलू पशु ज़ूनोज़: मवेशियों से ब्रुसेलोसिस (Brucellosis )या बिल्लियों से होने वाला टोक्सोप्लासमोसिस (Toxoplasmosis) जैसे रोग इस श्रेणी में आते हैं।
    • ट्रांसमिशन के तरीके के आधार पर:
      • प्रत्यक्ष संपर्क ज़ूनोज़: संक्रमण जो संक्रमित जानवरों, उनके शरीर के तरल पदार्थ या दूषित सतहों के सीधे संपर्क से होता है।
        • उदाहरणों में जानवरों के काटने से फैलने वाला रेबीज़ और संक्रमित पशुओं के संपर्क से क्यू बुखार शामिल हैं।
      • सदिश-जनित ज़ूनोज़ : मच्छरों और किलनी जैसे वाहकों द्वारा फैलने वाले रोग।
        • उदाहरणतः किलनी से फैलने वाला लाइम रोग और मच्छरों से फैलने वाला डेंगू बुखार शामिल हैं।
      • जलजनित ज़ूनोज़: दूषित जल स्रोतों से लेप्टोस्पायरोसिस (Leptospirosis) जलजनित ज़ूनोटिक रोग का एक उदाहरण है।
  • ज़ूनोटिक रोगों का कारण:
    • ज़ूनोटिक रोगों का उद्भव और प्रसार कई कारकों से प्रभावित होता है, जिनमें पर्यावरणीय परिवर्तन, वन्यजीव संपर्क, पशुधन कृषि  के तरीके और मानव व्यवहार शामिल हैं।
    • प्राकृतिक आवासों में अतिक्रमण, वन्यजीव व्यापार, अपर्याप्त खाद्य सुरक्षा उपाय और अनुचित स्वच्छता ज़ूनोटिक रोगों के संचरण में योगदान करते हैं।
  • रोकथाम रणनीतियाँ: 
    • ज़ूनोटिक  रोगों की रोकथाम और नियंत्रण हेतु बहुक्षेत्रीय सहयोग आवश्यक है।
    • "वन हेल्थ" दृष्टिकोण मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण क्षेत्रों के बीच सहयोग पर ज़ोर देता है।
    • ज़ूनोटिक रोगों की शीघ्र पहचान और निगरानी प्रणालियाँ प्रकोप एवं महामारी को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
    • हाथ धोने, खाद्य सुरक्षा उपायों और जानवरों की सुरक्षित देख-रेख जैसी स्वच्छता विधियों को बढ़ावा देने से संचरण के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।
    • जानवरों हेतु टीकाकरण कार्यक्रम, विशेष रूप से मनुष्यों के निकट संपर्क में रहने वाले जानवरों में ज़ूनोटिक रोगों को रोकने में प्रभावी हो सकते हैं।
    • ज़ूनोटिक रोगों और उनकी रोकथाम के बारे में सार्वजनिक जागरूकता तथा शिक्षा में सुधार करना ज़िम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देने एवं संचरण के जोखिम को कम करने हेतु महत्त्वपूर्ण है।

ज़ूनोटिक रोगों से संबंधित भारत की पहल: 

  • राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP):
    • इसने दो प्रमुख ज़ूनोटिक रोगों को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई: पैर और मुँह रोग (Foot & Mouth Disease- FMD) एवं ब्रुसेलोसिस।
  • मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयाँ (MVU):
    • MVU को किसानों के दरवाज़े पर पशु चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करने हेतु शुरू किया गया है, जिसमें रोग निदान, उपचार, छोटी सर्जरी और रोगग्रस्त जानवरों के प्रबंधन के बारे में जागरूकता बढ़ाना शामिल है।
  • पशु जन्म नियंत्रण (कुत्ते) नियम, 2023:
    • ये नियम जनसंख्या स्थिरीकरण के साधन के रूप में आवारा कुत्तों के रेबीज़ रोधी टीकाकरण और बधियाकरण पर केंद्रित हैं।
  • ज़ूनोज़ की रोकथाम और नियंत्रण के लिये राष्ट्रीय वन हेल्थ कार्यक्रम:
    • यह अंतर-क्षेत्रीय समन्वय और सहयोग के माध्यम से ज़ूनोटिक रोगों का अनुवीक्षण, निदान, रोकथाम और नियंत्रण तंत्र को मज़बूत करने पर केंद्रित है।
  • टीकाकरण के प्रयास: 
    • भैंस, भेड़, बकरियों और सूअरों की आबादी में 100% FMD वैक्सीन कवरेज़ और साथ ही 4 से 8 महीने की उम्र के बीच के मादा गोजातीय बछड़ों में 100% ब्रुसेलोसिस टीकाकरण का लक्ष्य प्राप्त करना।

वन हेल्थ अवधारणा: 

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. भारत में ‘सभी के लिये स्वास्थ्य’ को प्राप्त करने के लिये समुचित स्थानीय सामुदायिक स्तरीय स्वास्थ्य देखभाल का मध्यक्षेप एक पूर्वाप्रेक्षा है। व्याख्या कीजिये।. (2018) 

स्रोत: पी.आई.बी.

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