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भारतीय राजनीति

आभासी न्यायालय

  • 04 Sep 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 142, आभासी न्यायालय की कार्यवाही के वैज्ञानिक पक्ष 

मेन्स के लिये:

आभासी न्यायालय से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) एन.वी. रमना ने आभासी सुनवाई के लिये सर्वोच्च न्यायालय में नए लगाए गए ओपन न्यायालय सॉफ्टवेयर के प्रति असंतोष व्यक्त किया है।

  • यह असंतोष आभासी सुनवाई के दौरान आवाज़ो की प्रतिध्वनि की समस्या से उत्पन्न हुआ।

प्रमुख बिंदु

  • आभासी न्यायालय के बारे में:
    • आभासी न्यायालय या ई-न्यायालय एक अवधारणा है जिसका उद्देश्य न्यायालय में वादियों या वकीलों की उपस्थिति को समाप्त करना और मामले का ऑनलाइन निर्णय करना है।
      • इसके लिये एक ऑनलाइन वातावरण और एक सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) सक्षम बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता होती है।
    • वर्ष 2020 में कोरोनावायरस महामारी के मद्देनज़र, सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्ति का प्रयोग करते हुए देश भर के सभी न्यायालयों को न्यायिक कार्यवाही के लिये वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग का व्यापक रूप से उपयोग करने का निर्देश दिया।
    • इससे पहले न्यायिक प्रणाली में CJI द्वारा एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित पोर्टल 'SUPACE' लॉन्च किया गया था, जिसका उद्देश्य न्यायाधीशों को कानूनी अनुसंधान में सहायता करना था।
    • साथ ही SC ने न्यायालय की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग के लिये ड्राफ्ट मॉडल नियम जारी किये हैं।

ई-न्यायालय परियोजना

  • ई-समिति द्वारा प्रस्तुत "भारतीय न्यायपालिका में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के कार्यान्वयन के लिये राष्ट्रीय नीति एवं कार्ययोजना-2005" के आधार पर इसकी अवधारणा की गई थी। इसमें भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय न्यायपालिका को ICT सक्षमता युक्त करने की परिकल्पना की गई थी ।
  • ई-न्यायालय मिशन मोड प्रोजेक्ट, एक अखिल भारतीय परियोजना है, जिसकी निगरानी और वित्तपोषण न्याय विभाग, कानून तथा न्याय मंत्रालय द्वारा देश भर के ज़िला न्यायालयों के लिये किया जाता है।
  • लाभ:
    • वहनीय न्याय: ई-न्यायालय के विस्तार से समाज के सभी वर्गों के लिये न्यायालयों में न्याय तक सस्ती और आसान पहुँच सुनिश्चित होगी।
    • न्याय की तेज़ी से डिलीवरी: ई-न्यायालय के प्रसार से न्याय निर्णयन प्रक्रिया तीव्र हो जाएगी तथा इसके लिये आवश्यक उपकरण प्रदान किये जाने चाहिये।
    • पारदर्शिता: ई-न्यायालय चुनौतियों को दूर कर सेवा वितरण तंत्र को पारदर्शी और लागत प्रभावी बना सकते हैं।
      • सेवा वितरण के लिये बनाए गए विभिन्न चैनलों के माध्यम से वादी अपने मामले की स्थिति ऑनलाइन देख सकते हैं।
  • न्यायपालिका का एकीकरण: विभिन्न न्यायालयों और विभिन्न विभागों के बीच डेटा साझा करना भी आसान हो जाएगा क्योंकि एकीकृत प्रणाली के तहत सब कुछ ऑनलाइन उपलब्ध होगा।
    • यह न्यायालयी प्रक्रियाओं में सुधार लाने और नागरिक केंद्रित सेवाएँ प्रदान करने में फायदेमंद होगा।
  • चुनौतियाँ:
    • संचालन संबंधी कठिनाइयाँ: आभासी न्यायालय में खराब कनेक्टिविटी, प्रतिध्वनि और अन्य व्यवधानों के कारण सुनवाई के दौरान तकनीकी रुकावटें देखी गई हैं।
      • प्रक्रिया में वादी की निकटता न होने से विश्वास की कमी जैसे अन्य मुद्दें शामिल हैं।
    • हैकिंग और साइबर सुरक्षा: प्रौद्योगिकी के स्तर पर साइबर सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता होगी।
    • बुनियादी ढाँचा: अधिकांश तालुका/गाँवों में अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे और बिजली तथा इंटरनेट कनेक्टिविटी की अनुपलब्धता के कारण चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
    • ई-न्यायालय रिकॉर्ड बनाए रखना: परंपरागत स्टाफ दस्तावेज़ या रिकॉर्ड साक्ष्य को प्रभावी ढंग से संभालने के लिये अच्छी तरह से सुसज्जित और प्रशिक्षित नहीं है जो साक्ष्यों तथा विवरणों को वादी एवं परिषद के साथ-साथ न्यायालय तक आसानी से पहुँचा सकें।

आगे की राह:

  • भारत की न्यायिक प्रणाली के लिये एक नया मंच विकसित करते समय डेटा गोपनीयता और डेटा सुरक्षा चिंताओं को दूर करने की आवश्यकता है।
  • आभासी कार्यवाही प्रदान करने के लिये बुनियादी ढाँचे को पर्याप्त मशीनरी और डेटा कनेक्टिविटी के साथ अद्यतन करने की आवश्यकता है।
  • एक उपयोगकर्त्ता के अनुकूल ई-न्यायालय तंत्र विकसित किया जाना चाहिये, जो आम जनता के लिये सरल और आसानी से सुलभ हो, यह भारत में वादियों को ऐसी सुविधाओं का उपयोग करने के लिये प्रोत्साहित करेगा।
  • वार्ता और संगोष्ठियों के माध्यम से ई-न्यायालय के बारे में जागरूकता पैदा कर सुविधाओं के संबंध में जानकारी देने में मदद मिल सकती है और ई-न्यायालय आसानी से न्याय की सुविधा प्रदान कर सकते हैं।

स्रोत: द हिंदू 

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