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लाइव-स्ट्रीमिंग कोर्ट कार्यवाही के लिये ड्राफ्ट नियम

  • 10 Jun 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ई-कोर्ट परियोजना

मेन्स के लिये:

लाइव-स्ट्रीमिंग कोर्ट कार्यवाही के लाभ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कोर्ट की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग के लिये प्रारूप मॉडल नियम जारी किये हैं।

  • न्यायपालिका में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के कार्यान्वयन के लिये ये नियम राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना का हिस्सा हैं।
  • ये नियम उच्च न्यायालयों, निचली अदालतों और न्यायाधिकरणों में कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग को कवर करेंगे।
  • इससे पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने न्यायिक प्रणाली में एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित पोर्टल 'SUPACE' लॉन्च किया, जिसका उद्देश्य न्यायाधीशों को कानूनी अनुसंधान में सहायता करना है।

प्रमुख बिंदु:

पृष्ठभूमि:

  • स्वप्निल त्रिपाठी बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया मामले (2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने लाइव स्ट्रीमिंग के ज़रिये इसे खोलने के पक्ष में फैसला सुनाया था।
  • इसने माना कि लाइव स्ट्रीमिंग की कार्यवाही संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के तहत न्याय तक पहुँचने के अधिकार का हिस्सा है।
  • गुजरात उच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय के बाद अदालती कार्यवाही को लाइवस्ट्रीम करने वाला पहला उच्च न्यायालय था।

मसौदा नियम:

  • कार्यवाही का प्रसारण: वैवाहिक विवादों, लिंग आधारित हिंसा, नाबालिगों से संबंधित मामलों और "मामले, जो बेंच की राय में, समुदायों के बीच दुश्मनी को भड़काने के परिणामस्वरूप होने की संभावना से जुड़े मामलों को छोड़कर उच्च न्यायालयों में सभी कार्यवाही का प्रसारण किया जा सकता है।
  • निर्णय लेने वाला प्राधिकरण: कार्यवाही या उसके किसी हिस्से की लाइव-स्ट्रीमिंग की अनुमति देने या न देने का अंतिम निर्णय बेंच का होगा, हालाँकि इस बेंच का निर्णय एक खुली और पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया के सिद्धांत द्वारा निर्देशित होगा।
  • आपत्तियों की अनुमति दें: नियम विशिष्ट मामलों में मामला दर्ज करने के चरण में या बाद के चरण में लाइव स्ट्रीमिंग के खिलाफ आपत्तियाँ दर्ज करने की अनुमति दी गई है।
  • कार्रवाई का रिकॉर्ड: यह मसौदा नियम छह महीने के लिये अदालती कार्यवाही को संग्रहीत करने की अनुमति देते हैं।
    • न्यायालय द्वारा अपने मूल रूप में अधिकृत रिकॉर्डिंग के उपयोग की अनुमति दी जा सकती है, अन्य बातों के साथ-साथ समाचार प्रसारित करने और प्रशिक्षण, शैक्षणिक तथा शैक्षिक उद्देश्यों के लिये भी अनुमति दी जा सकती है।

प्रतिबंध:

  • सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों के बीच चर्चा का न्यायाधीशों द्वारा अधिवक्ता और उसके मुवक्किल के बीच संचार हेतु न तो सीधा प्रसारण किया जाएगा और न ही इसे संग्रहीत किया जाएगा।
  • ये नियम सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म सहित मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारण को रिकॉर्ड करने या साझा करने पर भी रोक लगाते हैं, जब तक कि अदालत द्वारा अधिकृत नहीं किया जाता है।
  • रिकॉर्डिंग का उपयोग किसी भी रूप में वाणिज्यिक, प्रचार उद्देश्यों या विज्ञापन के लिये नहीं किया जाएगा।

संभावित लाभ:

  • यह कागज़ी फाइलिंग को सीमित करके न्याय वितरण प्रणाली को सस्ती, पारदर्शी, तेज़ और जवाबदेह बना सकता है।
  • यह समय बचाने वाला हो सकता है और इसलिये लंबित मामलों के बैकलॉग को कम कर सकता है और अनैतिक गतिविधियों की संख्या को भी कम कर सकता है।

चिंताएँ:

  • अदालतों में तकनीकी जनशक्ति की कमी और वादियों, अधिवक्ताओं के बीच जागरूकता और व्यवस्था में बदलाव के प्रति उनकी स्वीकृति।
  • साइबर सुरक्षा खतरा एक बड़ी चिंता होगी।
  • न्यायालयों की लाइव स्ट्रीमिंग दुर्व्यवहार के लिये अतिसंवेदनशील है। इस प्रकार गोपनीयता के मुद्दे उत्पन्न हो सकते हैं।
  • अदालतों की लाइव कार्यवाही को लागू करने में इंफ्रास्ट्रक्चर, खासकर इंटरनेट कनेक्टिविटी भी एक बड़ी चुनौती है।

ई-कोर्ट परियोजना:

  • ई-कोर्ट परियोजना की अवधारणा "भारतीय न्यायपालिका में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के कार्यान्वयन के लिये राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना - 2005" के आधार पर ई-समिति, भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रस्तुत की गई थी। 
  • ई-कोर्ट मिशन मोड प्रोजेक्ट एक अखिल भारतीय परियोजना है, जिसकी निगरानी और वित्त पोषण देश भर के ज़िला न्यायालयों के लिये कानून और न्याय मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

परियोजना की परिकल्पना के कारण:

  • ई-कोर्ट प्रोजेक्ट चार्टर में वर्णित कुशल और समयबद्ध नागरिक-केंद्रित सेवाएँ प्रदान करना।
  • न्यायालयों में निर्णय समर्थन प्रणालियों को विकसित, स्थापित और कार्यान्वित करना।
  • अपने हितधारकों को सूचना की पहुँच में पारदर्शिता प्रदान करने के लिये प्रक्रियाओं को स्वचालित करना।
  • न्यायिक उत्पादकता को गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों रूप से बढ़ाना, न्याय वितरण प्रणाली को वहनीय, सुलभ, लागत प्रभावी, पूर्वानुमेय, विश्वसनीय और पारदर्शी बनाना।

आगे की राह:

  • एक मज़बूत सुरक्षा प्रणाली की तैनाती की आवश्यकता है जो उपयुक्त पक्षों को मामले की जानकारी तक सुरक्षित पहुँच प्रदान करे।
  • इसके अलावा सरकार को ई-कोर्ट परियोजना का समर्थन करने के लिये आवश्यक बुनियादी ढाँचे की पहचान और विकास करने की आवश्यकता है।
  • यह अदालतों में मामलों के निपटान में अत्यधिक देरी, आर्थिक ऑपरेटरों द्वारा वाणिज्यिक विवादों के त्वरित समाधान तक पहुँच की सुविधा, न्याय प्रणाली को सभी उपयोगकर्त्ताओं के अनुकूल और सस्ती बनाने तथा देश में कानूनी सहायता सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार जैसी चुनौतियों का समाधान करेगा तथा ई-कोर्ट के कामकाज को चलाने के लिये अनिवार्य होगा।

स्रोत- इंडियन एक्सप्रेस

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